सुप्रीम कोर्ट का मज़दूर-विरोधी चेहरा एक बार फिर बेनक़ाब! घरेलू कामगारों को न्यूनतम मज़दूरी देने की याचिका को किया ख़ारिज!!
घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन के दायरे में लाने वाली याचिका को ख़ारिज़ करके और यूनियन बनाने के अधिकार पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी से यह साफ ज़ाहिर होता है कि आज की न्याय व्यवस्था पूरी तरीक़े से मेहनतकश अवाम के विरोध में और बड़े-बड़े पूँजीपतियों और धनपशुओं के हितों के साथ खड़ी है। आज ज़रूरी है कि देशभर की घरेलू कामगार एकजुट और संगठित होकर अपने संघर्ष को और तेज़ करें। साथ ही अपने हक़-अधिकार हासिल करने के लिए लम्बी लड़ाई की तैयारी करें।






















