• June 29, 2026

    जनता के विरोध से घबराकर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बार फिर लगाया एस्मा!

    उत्तर प्रदेश में लगे एस्मा का खास महत्व है। इसे हमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों में बढ़ते असंतोष को दबाने के क्रम में देखने की ज़रूरत है। इस समय उत्तर प्रदेश में गहराते आर्थिक संकट, बिजली संकट और इन संकटों की वजह से बढ़ते जनाक्रोश की परिस्थिति से निपटने के लिए एस्मा लगाया गया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनावों से पहले योगी सरकार अपने कुशासन और जनविरोधी शासन के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के प्रतिरोध को पनपने से पहले ही कुचल देने कि कोशिशें कर रही है। इसीलिए योगी सरकार कभी एस्मा लगाती है तो कभी मज़दूर कार्यकर्ताओं के ऊपर रासुका जैसा दमनकारी क़ानून लगा दिया जाता है ताकि लोग अपनी बुनियादी माँगों मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार, आवास, न्यूनतम वेतन आदि के लिए एकजुट और संगठित न हो सकें।

  • June 29, 2026

    “आँकड़े छिपाओ, बेरोज़गारी भगाओ!” बेरोज़गारी से लड़ने का मोदी सरकार का नायाब नुस्ख़ा

    ज्ञात हो कि भारत की लगभग 93% कार्यशक्ति असंगठित क्षेत्र में काम करती है, लेकिन इस सरकारी सर्वेक्षण में उनके काम करने की स्थिति, काम के घण्टे, औसत मज़दूरी या वेतन और काम की प्रकृति का कोई आँकड़ा मौजूद नहीं। सरकार के लिए अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली आबादी का अस्तित्व ही नहीं है! सरकार द्वारा मान्य रोज़गार की परिभाषा के अनुसार अनौपचारिक क्षेत्र के दिहाड़ी, ठेका व कैजुअल मज़दूरों की एक बड़ी संख्या, जिनके पास कोई रोज़गार सुरक्षा नहीं है, को भी रोज़गारशुदा क़रार दे दी गया है। वहीँ दूसरी ओर 2025 के सर्वेक्षण में श्रमशक्ति भागीदारी दर (LFPR)  में जिस बढ़ोतरी को दिखाया गया है, उसका मुख्य कारण तथाकथित स्वरोज़गार में हुई वृद्धि है। लेकिन इन स्वरोज़गार करने वालों की स्थिति क्या है? यदि कोई व्यक्ति ढंग का रोज़गार न मिलने की सूरत में कहीं ठेला लगाकर या चाय स्टॉल लगाकर या फ़िर ई-रिक्शा/ऑटो चलाकर मुश्किल से अपनी रोज़ी कमा रहा है, या कोई छोटी जोत का ग़रीब किसान, जिसकी जोत से उसके खाने-पीने व दवा-इलाज का बुनियादी ख़र्च भी मुश्किल से जुट पा रहा हो, तो ऐसे तमाम व्यक्तियों को स्वरोज़गार के नाम पर रोज़गारशुदा मानना कितना वाजिब है?! जिनको नौकरी नहीं मिलती, वे सारे लोग आत्महत्या थोड़े ही कर लेते हैं! वे तथाकथित स्वरोज़गार कर किसी तरह से भुखमरी रेखा पर जीवित रहते हैं और मानवीयता से रिक्त पाशविक जीवन जीने को मजबूर होते हैं।

  • June 29, 2026

    क्यों लगातार गिर रहा है भारतीय रुपया?

    मोदी सरकार और उसके मन्त्रियों द्वारा रुपये के बेतरह गिरने के फ़ायदे बताने या फिर उसके नक़ली कारण बताने के प्रयास वास्तव में कुछ बुनियादी बातों को छिपाने के लिए हैं : एक, भारतीय अर्थव्यवस्था ढाँचागत तौर पर लाभप्रदता के संकट से गुज़र रही है; दो, इस संकट को और भी ज़्यादा विकराल बनाने में मोदी सरकार द्वारा किया गया अर्थव्यवस्था का कुप्रबन्धन और उसकी विवेकहीन विदेश नीति ज़िम्मेदार है; तीन, वास्तव में मन्दी झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था को पहले ही मोदी सरकार ने जो दो भूकम्प-समान झटके दिये थे, यानी नोटबन्दी और फिर योजनाविहीनता और तानाशाहाना तरीक़े से लागू किया गया कोविड लॉकडाउन, उससे भारतीय अर्थव्यवस्था कभी ढंग से उबर ही नहीं पायी थी; चार, देश के बड़े पूँजीपति वर्ग की चाव से सेवा करने के चक्कर में मोदी सरकार ने पूँजीवादी मानदण्डों से भी संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था का आश्चर्यजनक कुप्रबन्धन किया है। अब इन चीज़ों का नतीजा देश की जनता भुगत रही है। अगर आर्थिक कारकों की गति का अध्ययन किया जाये तो स्पष्ट है कि इस बात की पर्याप्त सम्भावना है कि अभी हम संकट का कम बुरा दौर ही देख रहे हैं। संकट का सबसे बुरा दौर अभी आना है। इसकी भी पूरी गुंजाइश है कि देश के सबसे धनी पूँजीपतियों पर संकट को कोई बोझ न पड़े इसे सुनिश्चित करने के लिए मोदी सरकार जनता से फिर से पेट पर पट्टी बाँधने के लिए कहेगी, कुछ दिन माँगेगी, उससे भी बात नहीं बनेगी तो साम्प्रदायिक तनाव को नये सिरे से भड़कायेगी और जनसंख्या पर आयोग बनाकर दरअसल मोदी सरकार यही करने वाली है। मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ने का झूठा हौव्वा खड़ा किया जायेगा, नये सिरे से “हिन्दू ख़तरे में है” के दावे किये जायेंगे।

  • June 28, 2026

    बारह साल, जनता बेहाल – टूटे सपनों का अम्बार! कौन है इसका ज़िम्मेदार ?

    एक ऐसे समय में जब जनता कमरतोड़ महँगाई और विकराल बेरोज़गारी की मार झेल रही है, जब देश के छात्र-युवा बरबाद होती शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था का नतीजा भुगत रहे हैं, जब देश के अल्पसंख्यक, विशेष तौर पर, मुसलमान साम्प्रदायिक तनाव और विषवमन के शिकार बन रहे हैं, जब स्त्री-विरोधी व दलित-विरोधी अपराध अपने चरम पर हैं, जब देश के ग़रीब छोटे किसान हर रोज़ तबाह हो रहे हैं और आत्महत्याएँ कर रहे हैं, उस समय नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्रित्व के 12 साल पूरे होने का भाजपा द्वारा मनाया जा रहा यह जश्न जनता के दुख-दर्द के साथ क्या एक भद्दा मज़ाक और राजनीतिक अश्लीलता की पराकाष्ठा नहीं है?

  • May 30, 2026

    नोएडा और मानेसर के मज़दूर संघर्षों में कौन “बाहरी” और कौन “भीतरी”

    जब भी कहीं मज़दूरों की कोई हड़ताल या आन्दोलन शुरू होता है, तो उसमें सक्रिय ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और मज़दूर संगठन के राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर पुलिस प्रशासन और सरकार “बाहरी तत्व” होने की तोहमत लगाते हैं। उनके अनुसार, जो स्वयं उस शहर या औद्योगिक क्षेत्र में कारखाने में काम नहीं करता, उसे मज़दूरों के मसले पर बोलने का या उनके आन्दोलन में शिरक़त करने का कोई अधिकार नहीं है। यह हुक्मरानों का पुराना “तर्क” है। बल्कि कहना चाहिए कि कुतर्क है। नोएडा के मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय मज़दूर कार्यकर्ताओं, श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं, छात्र कार्यकर्ताओं और उसका समर्थन करने वाले बुद्धिजीवियों मसलन सत्यम वर्मा, आदित्य आनन्द, रूपेश राय, हिमांशु ठाकुर, सृष्टि, आकृति आदि पर नोएडा पुलिस ने यही “बाहरी” होने का आरोप लगाया। उसी प्रकार मानेसर में गिरफ्तार कार्यकर्ता साथियों श्यामबीर और हरीश पर भी ये ही आरोप लगाये गये हैं। तो हमें इस आरोप का पूरा कुतर्क समझ लेना चाहिए।