देश भर में “हिन्दू” सम्मेलनों एवं यात्राओं में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी भारतीय फ़ासीवाद के ‘नीचे से उठते चक्रवात’ का जीता-जागता उदाहरण

हिमांशु

हालिया वर्षों में देश भर में आयोजित “हिन्दू” सम्मेलनों और शोभा यात्राओं की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोतरी देखी गयी है। फ़रवरी 2026 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ पदाधिकारी ने यह घोषणा की कि आरएसएस के सौ वर्ष पूरे होने के मौक़े पर संगठन ने देशभर में एक लाख हिन्दू सम्मेलन आयोजित कराने का फ़ैसला लिया है। इन सम्मेलनों और यात्राओं की फेहरिस्त में सबसे चर्चित नवम्बर 2025 में धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री (जिसे लोग ‘बाबा बागेश्वर’ के नाम से भी जानते है) द्वारा आयोजित ‘सनातन एकता यात्रा’ थी। दिल्ली से वृन्दावन तक चली 10 दिन की इस यात्रा में कई मन्त्री, खिलाड़ी और अभिनेता शामिल हुए। पूरी यात्रा का प्रचार वैसे तो आध्यात्मिक तीर्थ यात्रा के तौर पर किया गया लेकिन यात्रा के दौरान “हिन्दू राष्ट्र” बनाने की फ़ासीवादी विचारधारात्मक परियोजना केन्द्र में दिखायी दी। हिन्दुओं के बीच “लव जिहाद”, “लैण्ड जिहाद” जैसे झूठे फ़ासीवादी प्रॉपगेण्डा को बार-बार उछाला गया, मुसलमानों की जनसंख्या का डर दिखाते हुए धीरेन्द्र शास्त्री व अन्य वक्ताओं द्वारा मुसलमान-विरोधी भड़काऊ भाषणों में हिन्दुओं की “संस्कृति और धर्म” बचाने की बातें कही गयी और मुसलमानों के खिलाफ़ दंगे एवं मॉब लिन्चिंग को सही ठहराते हुए उनके आर्थिक बहिष्कार का संकल्प लिया गया। इन्हीं “हिन्दू” सम्मेलनों और भाषणों में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों के खिलाफ़ नफ़रती भाषणों की भरमार मौजूद होती है।

‘सेण्टर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज़्ड हेट’(CSOH) की एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल 2025 में ही धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ 1318 नफ़रती  भाषणों की घटनाएँ दर्ज की गयी। यानी औसतन 4 घटनाएँ प्रति दिन ऐसी दर्ज हुई जिसमें नफ़रती भाषण दिये गये। यह उन्माद स्वतःस्फ़ूर्त नहीं है बल्कि इसे हिन्दुत्ववादी फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा मिनट-दर-मिनट सुनियोजित तरीके से भड़काया जा रहा है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) और बजरंग दल 289 नफ़रती भाषणों के कार्यक्रमों के आयोजनकर्ता थे। ऐसे कार्यक्रमों की सबसे अधिक तादात उत्तर प्रदेश (266), महाराष्ट्र (193), मध्य प्रदेश (172), उत्तराखण्ड (155) और दिल्ली (76) जैसे राज्यों में है। उन्मादी भाषण देने में कई “गौरक्षक कार्यकर्ता” (दक्ष चौधरी, अक्कू पण्डित, अभिषेक सिंह ठाकुर), हिन्दुत्व कट्टरपन्थी नेता (यति नरसिंहानन्द, भूपेन्द्र चौधरी) और भाजपा के सांसद तक शामिल हैं। 21 जनवरी को रायबरेली ज़िले में आयोजित ‘विराट हिन्दू सम्मेलन’ में ऋद्धिमा शर्मा (यह खुद को हिन्दुत्व कार्यकर्ता बताती है) कुछ ऐसा बयान देती है: “अगर वे तुम्हारे दो मारते है तो तुम उनके (मुसलमानों के) 100 लोगों को मारो… अगर वे तुम्हारी एक हिन्दू लड़की को भगाते है तो तुम उनकी 100 लड़कियों को भगाओ।” इसी सम्मेलन में खुशबू पाण्डे नाम की संघी महिला 1989 के भागलपुर दंगों (जिसमें 1000 मृतकों में से 900 मुस्लिम थे) को गौरवपूर्ण तरीके से याद करते हुए यह बात कहती है कि 15 मिनट के लिए जब भागलपुर में पुलिस हटी थी तो गंगा में तैरती एक भी लाश किसी हिन्दू की नहीं थी।

मुसलमानों के नरसंहार की बातें जब इस तरह खुले मंच से हज़ारों की भीड़ के सामने लाउडस्पीकर पर कही जाए तो ऐसे लोगों को ‘फ्रिन्ज’ (परिधिगत) कहना नासमझी और बेवकूफ़ाना ही होगा। भारतीय लिबरलों का एक हिस्सा आज भी इन्हें ‘फ्रिन्ज’ कहकर नज़रअन्दाज़ करने की बात करता है। इस तरह के उन्मादी आह्वान केवल हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ताओं द्वारा ही नहीं बल्कि देश के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी, गृहमन्त्री अमितशाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ, असम के मुख्यमन्त्री हेमंत बिसवा शर्मा, उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री पुष्कर सिंह धामी आदि के भाषणों में समय-समय पर दिये जाते रहे है। ‘पीपल्स यूनियन फॉर सिवल लिबर्टीज़ (PUCL) के राष्ट्रीय महासचिव डॉ वी. सुरेश ने ठीक ही टिप्पणी की है कि आज के फ़ासीवादी वक़्त में ‘फ्रिन्ज’ और ‘मुख्यधारा’ के बीच परस्पर सहजीवी (symbiotic) सम्बन्ध स्थापित हो चुका है। वैसे तो सच यह है कि ऐसा कोई फर्क फ़ासीवादियों के बीच करना ही बेमानी है। इस तरह के “हिन्दू” सम्मेलनों व यात्राओं का असल मक़सद साफ है: जनता के अपने असल मुद्दों को ग़ायब करो और इसी प्रक्रिया में साम्प्रदायिक उन्माद को भड़काते हुए हिंदुओं को “जागृत” करो!

कौन हैजागृत हिन्दू”?

इन तमाम सम्मेलनों और यात्राओं का अगर हम विश्लेषण करें तो हम इनमें “जागृत हिन्दू” होने की बात को कई फ़ासीवादी नेताओं के भाषणों में पायेंगे। “जागृत हिन्दू” होने का यह मतलब बिलकुल नहीं है कि हिन्दू अपने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास के अधिकार जैसे सबसे बुनियादी मुद्दों के लिए जागृत हों; बल्कि “जागृत हिन्दू” का एकमात्र अर्थ है मुसलमानों के खिलाफ़ असीमित नफ़रत होना और अपनी धार्मिक साम्प्रदायिक पहचान से प्रस्थान करते हुए हर मसले को इसी नक़ली पहचान के चश्मे से देखना यानी अपने वर्गीय हितों और जीवन के वास्तविक मसलों को दरकिनार कर फ़ासीवादियों के साम्प्रदायिक प्रचार के चंगुल में फंसकर संघी नफरती राजनीति का वाहक बनना। इस नफ़रत को कभी “लव जिहाद” के मिथक से, कभी “गौहत्यारों” की छवि से और कभी मुसलमानों को “आक्रान्ता” और “बलात्कारी” बताकर उभारा जाता है। हिन्दुओं की घटती जनसंख्या दर का हवाला देकर मुसलमानों द्वारा भारत पर कब्ज़े का डर दिखाया जाता है जो दावा तथ्यों और वास्तविकता से मीलों दूर है। 25 जनवरी को कानपुर में हुए ‘हिन्दू सम्मेलन’ में मधुराम शरण शिवा नाम का कट्टर साधु यह कहता है: “हमें धर्म के लिए केवल मरने की ज़रूरत नहीं है बल्कि मारने की भी है”। इसी तरह 30 जनवरी को बागपत के ‘विराट हिन्दू सम्मेलन’ में कुख्यात यति नरसिंहानन्द इस्लाम को कैंसर बताते हुए हिन्दुओं का ‘आइएसआइएस’नुमा संगठन बनाने के लिए आह्वान करता है! इस तरह “हिन्दू खतरे में हैं” के नक़ली शोर और भ्रामक प्रचार का इस्तेमाल फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा साम्प्रदायिक उन्मादी भीड़ इकट्ठा करने और दंगा भड़काने के लक्ष्य से किया जाता है।

शौर्य यात्राएँऔर फ़ासिस्ट आन्दोलन

मुसलमानों के खिलाफ़ नफ़रत पैदा करने में “शौर्य यात्राएँ” भी बेहद अहम भूमिका अदा करती है। ‘सिटीजेन्स जस्टिस एण्ड पीस’(CJP) के मुताबिक दिसम्बर 2024 में 21 ऐसी शोभा यात्राएँ आयोजित की गयीं जिनमें बाबरी मस्जिद विध्वंस का महिमामण्डन किया गया। 7 दिसम्बर को हरिद्वार में आयोजित यात्रा के दौरान विहिप नेता अनुज वालिया कहता है कि जिस तरह हमने अयोध्या का कलंक मिटाया था वैसे ही हरिद्वार के कलंक भी हमें मिटाने हैं! बाबरी मस्जिद विध्वंस का हवाला देकर काशी और मथुरा की मस्जिदों को तोड़ने का आह्वान इन्हीं रैलियों में ज़ोर-शोर से होता है। “अयोध्या तो बस झाँकी है, काशी-मथुरा बाक़ी है” जैसे नारों की साम्प्रदायिक गूँज से ये नफरती यात्राएँ पटी पड़ी रहती हैं। ऐतिहासिक तौर पर भी इस प्रकार की धार्मिक (वास्तव में साम्प्रदायिक फ़ासीवादी) यात्राएँ भाजपा-आरएसएस के फ़ासीवादी प्रोजेक्ट का अहम और अभिन्न अंग रही हैं। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में जब फ़ासीवादी प्रतिक्रियावादी आन्दोलन एक उभार की शक़्ल ले रहा था तब ऐसी यात्राओं के ज़रिये ही साम्प्रदायिक भीड़ निर्मित की गयी थी। आडवाणी के नेतृत्व में यह अपने चरमोत्कर्ष पर ‘रथ यात्रा’ के रूप में पहुँचता है और 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस को अंजाम देता है। फ़ासीवादी उभार की ऐसी ही परिघटना को प्रख्यात चिंतक ऐज़ाज अहमद ‘नीचे से उठते हुए चक्रवात’ की संज्ञा देते हैं। वर्तमान में भी हम यह देख सकते हैं कि ऐसी कई यात्राओं के गंतव्य स्थान अयोध्या, काशी, मथुरा या वृन्दावन जैसे संवेदनशील स्थान रखे गए हैं। इनके ज़रिये आम जनता के बीच साम्प्रदायिक उन्माद को तेज़ी और तीखेपन के साथ भड़काने की सुनियोजित फ़ासीवादी साज़िश जारी है।

फ़ासिस्ट सत्ता के संरक्षण में फैलता साम्प्रदायिक उन्माद

इन सम्मेलनों और यात्राओं में ऐसे भाषण दिये जाते हैं जो सीधे तौर पर संवैधानिक मानकों और न्यायिक धाराओं के खिलाफ़ जाते है। लेकिन बिरले ही हम पाते हैं कि ऐसे किसी व्यक्ति पर कोई क़ानूनी कार्रवाई हुई हो। यह यही दर्शाता है कि आज के हिन्दुत्व फ़ासीवादी ताक़तों ने ‘अन्दर से’ सत्ता के अलग-अलग निकायों पर क़ब्ज़ा किया है और इनलिए इनकी गुण्डा वाहिनियों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। फ़ासीवादी सत्ता भी इन संघी गुण्डा वाहिनियों  के ज़रिये ही समाज में साम्प्रदायिक ज़हर बेहद बेशर्मी से फैलाने का प्रयास करती है। सत्ता की शह के दम पर ही ये हिंदुत्ववादी भाषणों और नारों से आगे बढ़कर दुकानों में घुस-घुसकर मुसलमान दुकानदारों के साथ बदतमीज़ी व हिंसा जैसे कुकृत्य कर पाते हैं। फ़ासीवादी सत्ता की ताक़त ही इन्हें वह कूवत देती है जिसके दम पर ये गुण्डे राह चलते मुसलमानों से जबरन ‘वन्दे मातरम’ बुलवाते हैं, कश्मीरी शॉल बेचने वालों को कश्मीरी बोलने पर उत्तराखण्ड में पीट-पीटकर अधमरा कर देते हैं और आवामी एकता की मिसाल देने वाले कोटद्वार के दीपक के घर के बाहर 150-200 की भीड़ लाकर साम्प्रदायिक और उन्मादी नारेबाज़ी करते हैं।

आवामी एकजुटता ही है साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का एकमात्र जवाब

इस बात में कोई दो-राय नहीं है कि सत्ता के दम पर आगे बढ़ रहे हिन्दुत्ववादी गुण्डे और संगठन बेहद सुनियोजित तरीके से साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति को समाज में पैठाने की कोशिश कर रहे है। इनसे लड़ने के लिए न्यायिक प्रक्रिया, किसी भी पूँजीवादी चुनवबाज़ पार्टी अथवा पुलिस-प्रशासन पर निर्भर रहने का मतलब है शेखचिल्ली का सपना देखना। आज इनके ख़िलाफ़ लड़ने की एकमात्र कारगर शक्ति आम जनता की फौलादी एकजुटता ही है। देशभर में आयोजित सैकड़ों “हिन्दू” सम्मेलनों ने जितना साम्प्रदायिक उन्माद भड़काया होगा उससे कहीं अधिक साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने का काम उत्तराखण्ड के दीपक की उस वाइरल वीडियो ने किया जिसमें वह एक बुजुर्ग मुसलमान दुकानदार के लिए बजरंग दल के गुण्डों से भिड़ गया और अपना नाम “मोहम्मद दीपक” बताया। वही हिन्दुत्ववादी ऋद्धिमा शर्मा जो एक हिन्दू की मौत के बदले 100 मुसलमानों की जान लेने की बात करती है जब अपनी साम्प्रदायिक राजनीति लेकर राजस्थान के गोगामेड़ी मन्दिर पहुँचती है तो उसे श्रद्धालुओं द्वारा ही हड़काते हुए बाहर खदेड़ा जाता है। देश के कई हिस्सों से ऐसी वीडियो सामने आ रही हैं जहाँ आम लोग संघियों की साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ़ खड़े हो रहे हैं। यह बताता है कि तमाम कोशिशों के बावजूद इन हिन्दुत्ववादी फ़ासीवादी संगठनों की साम्प्रदायिक राजनीति लगातार मुँह की खा रही है। आज ज़रूरत है कि इन तमाम स्वतःस्फूर्त विरोध की घटनाओं को, जोकि बेहद सकारात्मक परिघटना है, सचेतन तौर पर पूरी फ़ासीवादी राजनीति के ख़िलाफ़ क्रान्तिकारी मोड़ देना। इसलिए आज भाजपा और संघ परिवार की साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति का पर्दाफाश सड़कों पर उतरकर जनता के बीच करना क्रान्तिकारी शक्तियों का सर्वोपरि कार्यभार है। ज़रूरत है कि उन्हें संघ के “चाल-चेहरा-चरित्र” की सच्चाई से अवगत कराया जाये और फ़ासीवादी राजनीति और विचारधारा की असलियत बतायी जाये। साथ ही, सच्चे सेक्युलर विचारों पर आधारित एक जुझारू साम्प्रदायिकता-विरोधी जनआन्दोलन खड़ा किया जाये जो फ़ासीवादी साम्प्रदायिक ताक़तों की नफरत और हिंसा का माकूल जवाब सड़कों पर उतरकर दे। इसके साथ ही लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और आवास के अधिकार की अपनी ठोस, बुनियादी व वास्तविक माँगों पर संगठित करते हुए समूची पूँजीवादी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया जाये।

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2026

 

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