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पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी द्वारा एसआईआर और जनगणना को जोड़े जाने का फ़ासीवादी बयान और उसके निहितार्थ

एसआईआर के बाद बंगाल में जिन 27 लाख लोगों का नाम न्यायिक निर्णयन के बाद हटाया गया है, उनमें मुसलमान ज़्यादा हो सकते हैं, लेकिन हिंदुओं की तादाद भी अच्छी-ख़ासी है! असल में न तो हिंदुओं के दुश्मन मुसलमान हैं, न ही मुसलमानों के दुश्मन हिन्दू हैं! बल्कि इन दोनों ही धर्मों से आने वाली मेहनतकश आवाम के आज सबसे बड़े दुश्मन संघ परिवार और भाजपा के दंगाई और फ़सादी हैं। इसलिए आज जब जनगणना और एसआईआर के बारे में सुवेन्दु अधिकारी ऐसी बातें बोल रहे हैं, तो उसे हमें हल्के में नहीं लेते हुए उसकी पुरज़ोर मुख़ालिफ़त करनी चाहिए। दूसरे, हम मेहनतकश लोगों को आपस में न बँटते हुए नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 और एसआईआर जैसी फ़ासीवादी कवायदों को फ़ौरन रद्द किये जाने की माँग ज़ोर-शोर से उठानी चाहिए।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार और बुलडोज़र का आतंक!

बंगाल में नये नवेले पहुँचे “बुलडोज़र राज” ने छोटे दुकानदारों, रेहड़ी पटरी वालों, फेरीवालों की आजीविका पर गम्भीर असर डाला है। ध्वस्तीकरण अभियान चलाने से पहले, तोड़फोड़ की कार्रवाई करने से पहले कहीं भी उन्हें पर्याप्त पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। कई छोटे व्यापारियों का कहना था कि जमींदोज़ की गईं कई दुकानें दशकों से मौजूद थीं और उन्होंने प्रशासन से उसके पुनर्वास या वैकल्पिक वेंडिंग (दुकान लगाने) की व्यवस्था की माँग की थी। लेकिन बजाय उनकी माँग पर ग़ौर फ़रमाने के सरकार ने उन्हें बुलडोज़ कर दिया। ग़ौरतलब है कि,”बुलडोज़र राज” में तमाम वैधानिक, क़ानूनी प्रक्रियाओं को धता बताते हुए, बुलडोज़र चलाया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने नवम्बर 2024 में ध्वस्तीकरण, बुलडोज़र कार्रवाई के सम्‍बन्‍ध में दिशा-निर्देश जारी किये थे, जिसमें अनिवार्य 15 दिन की नोटिस अवधि भी शामिल है, इन तमाम कार्रवाइयों में उन दिशानिर्देशों की अवेहलना की जा रही है। विडम्बना है कि बंगाल चुनाव के दौरान झालमुड़ी खाने की नौटंकी करने वाले महामानव की सरकार बनने के बाद झालमुड़ी बेचने वालों को ही दर-बदर किया जा रहा है।

बंगाल में चुनाव आयोग की मिलीभगत से एसआईआर के ज़रिये चुनाव को ‘हाईजैक’ करने में जुटी फ़ासिस्ट भाजपा!

बंगाल के साथ-साथ अन्य 12 राज्यों में घोषित या अघोषित तौर पर एसआईआर की प्रक्रिया जारी है। इन तमाम राज्यों में ख़ासकर ग़रीबों, मुसलमानों, दलितों, स्त्रियों और प्रवासी मज़दूरों को निशाना बनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल और अन्य राज्यों में एसआईआर का कोई एक स्वरूप नहीं है। हर राज्य में भाजपा व मोदी सरकार अलग-अलग तरीक़ों से चुनाव आयोग के साथ मिलकर इसे अंजाम दे रही है। सवाल यह भी उठता है कि बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ से ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर अलग-अलग राज्यों में काम करने के लिए जाते हैं और प्राकृतिक आपदाओं समेत अन्य कारकों की वजह से उनके प्रमाण पत्र या पहचान कार्ड उनके पास नहीं है, क्या उन सबको डिटेंशन कैंप में भेज दिया जायेगा? फ़ासीवादी भाजपा की मानें तो अब “अमृतकाल” में  इस देश में ऐसा ही होगा!

गोरखपुर के मज़दूरों के समर्थन में कोलकाता में सैकड़ों मज़दूरों का प्रदर्शन

27 मई 2011 को श्रमिक संग्राम समिति के बैनर तले कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कारपोरेशन, हिन्दुस्तान इंजीनियरिंग एण्ड इण्डस्ट्रीज़ लि. (तिलजला प्लाण्ट), भारत बैटरी, कलकत्ता जूट मिल, सूरा जूट मिल, अमेरिकन रेफ़्रिजरेटर कम्पनी सहित विभिन्न कारख़ानों के तक़रीबन 500 मज़दूरों ने कोलकाता के प्रशासनिक केन्द्र एस्प्लेनेड में विरोध सभा आयोजित की। सभा को सम्बोधित करने वाले अधिकतर वक्ता मज़दूर थे जो अपने-अपने कारख़ानों में संघर्षों का नेतृत्व कर रहे हैं। वक्ताओं ने प्रबन्‍धन, गुण्डों, पुलिस-प्रशासन एवं दलितों की मसीहा कही जाने वाली मायावती के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मज़दूरों पर किये गये बर्बर कृत्यों की कठोर शब्दों में निन्दा की और उनके ख़िलाफ मज़दूरों के प्रतिरोध को अपना समर्थन जताया।

आपने ठीक फ़रमाया मुख्यमन्त्री महोदय, बाल मजदूरी को आप नहीं रोक सकते!

बंगाल के ”संवेदनशील” मुख्यमन्त्री बुध्ददेव भट्टाचार्य बाल श्रम पर रोक लगाने के पक्षधर नहीं हैं! जहाँ 14 वर्ष की आयु से कम के बच्चों को मजदूरी कराये जाने को लेकर दुनियाभर में हो-हल्ला (दिखावे के लिए ही सही!) मचाया जा रहा हो, वहीं मजदूरों के पैरोकार का खोल ओढ़े भट्टाचार्य जी मजदूरों की एक सभा में कहते हैं कि वे बच्चों को मजदूरी करने से इसलिए नहीं रोक सकते, क्योंकि अपने परिवारों में आमदनी बढ़ाने में वे मददगार होते हैं और इसलिए भी ताकि वे काम करते हुए पढ़ाई भी कर सकें। मजदूरों के बच्चों को श्रम का पाठ पढ़ाने वाले बुध्ददेव भट्टाचार्य को संशोधनवादी वामपन्थी माकपा के अध्‍ययन चक्रों और शिविरों में मार्क्‍सवादी अर्थशास्त्र के सिध्दान्त का लगाया घोंटा थोड़ा बहुत याद तो होगा ही। जाहिरा तौर पर उन्हें इस बात की जानकारी है कि मुनाफे पर टिकी इस आदमख़ोर व्यवस्था में बाल श्रम को ख़तम ही नहीं किया जा सकता। पूँजीवाद की जिन्दगी की शर्त ही यही है कि वह सस्ते से सस्ता श्रम निचोड़ता रहे और उसे मुनाफे में ढालता जाये। आज भूमण्डलीकरण और वैश्विक मन्दी के दौर में तो मुनाफे की दर लगातार नीचे जा रही है और मुनाफे की दर को कायम रखने के लिए आदमख़ोर पूँजी एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका के पिछड़े पूँजीवादी देशों में सस्ते श्रम की तलाश में अपनी पहुँच को और गहरा बना रही है और वहाँ भी ख़ासतौर पर स्त्रियों और बच्चों का शोषण सबसे भयंकर तरीके से कर रही है क्योंकि उनका श्रम इन देशों में मौजूद सस्ते श्रम में भी सबसे सस्ता है।

ज्योति बसु और संसदीय वामपन्थी राजनीति की आधी सदी

इस बीच ज्योति बसु, माकपा और वाम मोर्चे का सामाजिक जनवादी चरित्र ज्यादा से ज्यादा नंगा होता चला गया। भद्रपुरुष ज्योति बाबू बार-बार मजदूरों को हड़तालों से दूर रहने और उत्पादन बढ़ाने की राय देने लगे, जबकि मजदूरों की हालत लगातार बद से बदतर होती जा रही थी। ज्योति बसु विदेशी पूँजी को आमन्त्रित करने के लिए बार-बार पश्चिमी देशों की यात्रा पर निकलने लगे (कभी छुट्टियाँ बिताने तो कभी आर्थिक-तकनीकी मदद के लिए 1990 तक रूस और पूर्वी यूरोप तो जाते ही रहते थे)। देशी पूँजीपतियों को पूँजी-निवेश के लिए पलक-पाँवड़े बिछाकर आमन्त्रित किया जाने लगा। देश के तमाम बड़े पूँजीपति (विदेशी कम्पनियाँ भी) पूँजी निवेश के लिए बंगाल के परिवेश को अनुकूल बताने लगे। दिक्कत अब उन्हें हड़तालों से नहीं थी, बल्कि माकपा के उन ट्रेड यूनियन क्षत्रपों से थी जो मजदूरों से वसूली करने के साथ ही मालिकों से भी कभी-कभी कुछ ज्यादा दबाव बनाकर वसूली करने लगते थे।