देशभर में अनेक बीएलओ की मौत : ये एसआईआर के दबाव में होने वाली हत्याएँ हैं!
प्रियम्बदा
वोटर सूची में संशोधन के लिये देश में समय-समय पर एसआईआर आयोजित करवाये जाते रहें हैं। लेकिन यह पहली बार हुआ है जब एसआईआर करने के दबाव में लोग इस हद तक परेशान कर दिये गये हों कि उन्हें अपनी जान लेने पर मजबूर होना पड़ रहा है। एसआईआर यानी ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (SIR) में तमाम नियम-क़ायदों का उल्लंघन करते हुए चुनाव आयोग ने भाजपा सरकार की शह पर जिस फ़र्ज़ीवाड़े की शुरुआत की है वह लोगों की मौत का कारण बन रहा है। इसका खुलासा बड़े पैमाने पर तब हुआ जब ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) ने अपनी स्थिति बयान की।
उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल से लेकर केरल, तमिलनाडु से यह ख़बर आनी शुरू हुई कि एसआईआर करने वाले प्राइमरी स्कूल के शिक्षकों से लेकर आँगनवाड़ीकर्मी अमानवीय काम के बोझ और मानसिक दबाव से गुज़र रहे हैं। कई लोगों के लिये यह दबाव इस क़दर बढ़ चुका था कि उन्हें अपनी जान तक लेने को मजबूर होना पड़ा। एसआईआर के कारण सिर्फ़ नवम्बर महीने में 26 से अधिक बीएलओ की मौत हो चुकी है। यह वह आँकड़ा है जो हमारे सामने आ गया जबकि कई ऐसी घटनाएँ तो दर्ज ही नहीं हुई या फिर दबा दी गयीं।
कई बीएलओ ने अपनी आत्महत्या का कारण सीधे तौर पर एसआईआर और उसकी आड़ में चल रही भाजपा सरकार की धाँधली को बताया है। उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में विपिन यादव नाम के जिस एसआईआर सुपरवाइज़र ने ख़ुदकुशी की, उसके परिवार वालों ने बताया कि उनपर लगातार अधिकारियों द्वारा इस बात का दबाव बनाया जा रहा था कि वह मतदाता सूची से कुछ नामों को हटाकर उनकी जगह फ़र्ज़ी नाम जोड़े, जिससे मना करने पर उन्हें लगातार डराया-धमकाया जा रहा था इसलिए अन्ततः परेशान होकर विपिन ने अपनी जान ले ली। ठीक ऐसी ही एक घटना उत्तरप्रदेश के फतेहपुर से आयी जहाँ 25 वर्षीय एक नौजवान ने अपनी शादी से एक दिन पहले आत्महत्या कर ली और अपनी आत्महत्या का कारण काम का अत्यधिक दबाव बताया। सुधीर कुमार नाम का यह युवक दलित परिवार से आता था जिसे काफ़ी मुश्किलें झेलने के बाद 2024 में सरकारी क्लर्क की नौकरी मिली थी। 25 नवम्बर को सुधीर की शादी तय थी जिसकी तैयारी के लिये वह लम्बे समय से छुट्टी के आवदेन दे रहा था मगर उसकी छुट्टी हर बार खारिज़ कर दी जा रही थी। 23 नवम्बर यानी रविवार को एसआईआर के सम्बन्ध में किसी “आधिकारिक मीटिंग” में न शामिल रह पाने की वजह से सुधीर को सस्पेंड कर दिया गया जिसकी सूचना मिलने पर वह टूट गया और आख़िर में उसने अपनी जान ले ली। पश्चिम बंगाल में भी एक महिला बीएलओ ने ख़ुद को फाँसी लगा ली और अपने सुसाइड नोट में यह लिखा कि वह एसआईआर से सम्बन्धित काम के दबाव को झेल पाने में असमर्थ है।
मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तरप्रदेश में बीएलओज़ (BLOs) के काम की स्थिति बेहद अमानवीय है। कोई हार्टअटैक से मर रहा है तो किसी का ब्रेन हैमरेज हो रहा है और कुछ लोग तो अपनी जान लेने पर ही मजबूर हो रहें हैं। भाजपा-शासित राज्यों में यह आँकड़ा सबसे अधिक है। देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है जब बीएलओज़ पर FIR किये जा रहें हैं! नोएडा में 60 बीएलओ पर काम पूरा न करने का कारण बताते हुए केस दर्ज हुए हैं जिसमें अधिकांश या तो आँगनवाड़ी कार्यकर्ताएँ हैं या फिर प्राइमरी स्कूल के शिक्षक हैं जो पहले ही अपने विभागों के काम के बोझ तले दबे होते हैं।
चुनाव आयोग के ही एक आँकड़े को देखें तो भाजपा सरकार द्वारा लादे गये काम के बोझ की भयानक स्थिति हमारे सामने साफ़ हो जाती है। ECI के अनुसार, 12 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों (UTs) में 50.97 करोड़ मतदाताओं के नाम वेरीफाई करने के लिये 5.32 लाख BLOs मौजूद हैं। इसके अनुसार एक BLO को एक महीने में कम से कम 956 मतदाताओं के नाम को वेरीफाई करना होगा यानी अगर महीने में 30 दिन भी रोज़ काम किया जाये तो हर दिन कम से कम 31-32 लोगों के घर पहुँच कर उनके कागज़ात देखना, फ़ॉर्म भरना इत्यादि सभी काम करने होंगे। अगर हम यह भी मान लें कि प्रत्येक व्यक्ति पर बीएलओ को औसतन आधा घण्टा ही लगता है तब भी 32 लोगों के लिये उसे प्रतिदिन 16 घण्टे काम करना होगा तब जाकर कहीं वह अपना काम पूरा कर पायेगा। लेकिन इतनी अनुकूल परिस्थितियाँ असल में होती नहीं हैं क्योंकि कई बार तो लोगों के पास कागज़ात पूरे नहीं होते इसलिए उनके पास बार-बार जाना पड़ता है या फिर हर बार सभी मतदाता घर पर मिलें ही यह भी ज़रूरी नहीं होता। मतदाताओं तक फ़ॉर्म पहुँचाने से लेकर उन्हें इकट्ठा करने और उनकी समस्याओं को हल करने का काम दिये गये समय में कर पाना शायद ही किसी बीएलओ के लिये सम्भव हो! इसलिए इस अमानवीय कार्यास्थिति के ख़िलाफ़ जगह-जगह लोगों का गुस्सा भी फूट रहा है।
गुजरात में मतदाता सूचियों के एसआईआर के दौरान 250 प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों ने 27 नवम्बर को अहमदाबाद के खोखरा स्थित एक डेटा अपलोडिंग सेण्टर पर बढ़ते वर्कलोड से परेशान होकर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। उनकी मुख्य माँग थी कि काम के दबाव को कम किया जाये, सर्वर व एप्लिकेशन की समस्या का समाधान किया जाये और एफ़आईआर व केस की धमकी देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाये। पश्चिम बंगाल में भी काम के बढ़ते दबाव से परेशान बीएलओ ने विरोध प्रदर्शन किये।
लेकिन इस पूरी परिस्थिति को अनदेखा करते हुए भाजपा सरकार जिस हड़बड़ी में एसआईआर करवा रही है उससे कई सवाल हमारे सामने खड़े होते हैं। मसलन एसआईआर इतनी जल्दबाज़ी में करवाने के पीछे क्या कारण है? आख़िर भाजपा सरकार की मंशा क्या है? इससे किसका भला होगा? बेहिसाब काम के दबाव में हो रही इन मौतों का ज़िम्मेदार कौन है?
एसआईआर कुछ और नहीं बल्कि भाजपा सरकार द्वारा शुरू किया गया एक नया घोटाला है जिसके पीछे इनकी मंशा यही है कि चुनाव की समूची प्रणाली को ही बेअसर बना दिया जाये। एसआईआर के जरिये भाजपा सरकार उन सामाजिक वर्गों व समुदायों के मताधिकार को रद्द करने का प्रयास कर रही है जो उसके विरुद्ध जाने की प्रबल सम्भावना रखते हैं। बिहार में हुए एसआईआर का उदाहरण हमारे सामने है। एसआईआर के ज़रिये भाजपा सरकार ने बिहार की जनता के उन हिस्सों के मताधिकार को छीनने की साज़िश की, जो हिस्से मुसलमानों, ग़रीब दलित, स्त्रियों और प्रवासी मज़दूरों के बीच से आते हैं यानी उन जगहों से जहाँ से भाजपा को वोट मिलने की उम्मीद नगण्य है। यानी जनता की सामूहिक इच्छा चाहे कुछ भी हो, वह चुनावों की प्रक्रिया में सटीकता के साथ प्रकट ही न हो पाये और भाजपा सरकार में बरक़रार रहे! इसलिए ही इसको हर जगह लागू करने को लेकर मोदी सरकार इतनी हड़बड़ी में है। ऐसी चुस्ती और मुस्तैदी जनता के ज़रूरी मुद्दों यानी शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य, बढ़ते प्रदूषण इत्यादि के सवाल पर हमें तो कभी नहीं दिखायी देती है!
एसआईआर से भाजपा और संघ परिवार के अलावा किसी का भला नहीं होने वाला है। यह वास्तव में समूची जनता के ख़िलाफ़ है। “घुसपैठियों” का नक़ली डर दिखाकर वास्तव में सभी धर्मों व जातियों की आम मेहनतकश जनता को निशाना बनाया जा रहा है। निश्चित तौर पर, इसके ज़रिये सबसे ज़्यादा आम मुस्लिम आबादी के विरुद्ध ज़हरीला माहौल बनाया जा रहा है ताकि बेरोज़गारी और महँगाई से त्रस्त जनता का गुस्सा एक नक़ली दुश्मन पर फूट पड़े और मोदी सरकार को कठघरे से बाहर कर जनता आपस में ही लड़ती रहे। इसलिए, हमें एसआईआर के पीछे मोदी सरकार की असल मंशा को समझना होगा और जहाँ कहीं भी इसे लागू करने की तैयारी हो रही है वहाँ सबसे पहले तो सड़कों पर उतरकर इसका विरोध करना होगा।
इसके साथ ही एसआईआर के फर्ज़ीवाड़े की आड़ में हो रही हत्याओं के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठानी होगी। पिछले कुछ दिनों में एसआईआर के दबाव और मानसिक प्रताड़ना से होने वाली मौतों की संख्या जिस तरह बढ़ी है, वह असहनीय है। लोगों की इन असामयिक मौत की ज़िम्मेदार भाजपा सरकार और उसकी जन-विरोधी नीतियाँ हैं। इसके ख़िलाफ़ अगर हम अब भी चुप रहें तो कल जब हमारी बारी आयेगी तो बोलने के लिये कोई नहीं बचेगा!
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2025













