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हॅंगामा है क्यों बरपा, गाली ही तो दी है!

तानाशाह को भी सबसे ज़्यादा चिढ़ लोगों की हँसी से होती है। जब लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं, उससे होती है। 15 साल के छात्रों की गालियों से 56 इंच की सरकार घबरा गयी है! मोदी जी रील बनाकर संस्कृति की दुहाई दे रहे हैं। महामानव  इतने सुसभ्य और शालीन हैं कि छात्रों के व्यंग्य से क्षुब्ध होकर मूल मुद्दे को ही गोल कर रहे हैं! कितनी हास्यास्पद बात है कि जो प्रधानमंत्री महिलाओं को जर्सी गाय कहते हैं अब वह नैतिकता और संस्कृति की दुहाई दे रहे हैं। 15 – 16 साल के छात्रों द्वारा दी गयी गालियों को ‘कल्चरल शॉक’ बताने वाले नरेन्द्र मोदी जी को यह भी बताना चाहिए कि भरी सभा में सोनिया गांधी को जर्सी गाय, सुन्नदा पुष्कर को 55 करोड़ की गर्लफ्रेण्ड कहना क्या है? क्या प्रधानमंत्री इसके लिए माफ़ी माँगेंगे। क्या यह अभद्र भाषा नहीं है? भद्रता का मुखौटा हटाइये मोदी जी! जिन गालियों से आपको ठेस पहुँच रही है उनसे भी अधिक घटिया गालियों को संसद में खड़े होकर प्रचलित करने का काम आपकी ख़ुद की पार्टी के नेता रमेश बिधूड़ी ने किया है। 2023 में रमेश बिधूड़ी ने संसद में खड़े होकर मुसलमानों को भद्दी-भद्दी गालियाँ दी थीं। लेकिन आज तक आपको रमेश बिधूड़ी की गालियों से ‘कल्चरल शॉक’ तो छोड़िए कोई छोटी-मोटी फुरफुरी भी नहीं मची, फिर बिधूड़ी पर कोई कार्रवाई की बात तो बहुत दूर की है! गली के लोफरों-लफ़ंगों के स्टैण्डर्ड की भाषा बोलने वाले असम के मुख्यमंत्री की गालियों से आजतक आपकी भावनाएँ आहत नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट का मज़दूर-विरोधी चेहरा एक बार फिर बेनक़ाब! घरेलू कामगारों को न्यूनतम मज़दूरी देने की याचिका को किया ख़ारिज!!

घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन के दायरे में लाने वाली याचिका को ख़ारिज़ करके और यूनियन बनाने के अधिकार पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी से यह साफ ज़ाहिर होता है कि आज की न्याय व्यवस्था पूरी तरीक़े से मेहनतकश अवाम के विरोध में और बड़े-बड़े पूँजीपतियों और धनपशुओं के हितों के साथ खड़ी है। आज ज़रूरी है कि देशभर की घरेलू कामगार एकजुट और संगठित होकर अपने संघर्ष को और तेज़ करें। साथ ही अपने हक़-अधिकार हासिल करने के लिए लम्बी लड़ाई की तैयारी करें।

दिल्ली के शाहाबाद डेरी इलाक़े में छठ घाट पर डूबने से युवक की मौत

यह घाट बारिश के मौसम में नाले और बरसात के पानी से भर जाता है। बार-बार प्रशासन को बोलने के बावजूद इसपर कोई कार्रवाई नहीं की जाती। पाँच मन्दिर, शाहबाद डेरी में झुग्गियों के पीछे खुला मैदान स्थित है। यहाँ लोग पूरे दिन फैक्टरियों, कारखानों, और कोठियों में खटकर आने के बाद इस गर्मी और उमस के मौसम में बाहर टहलते हैं। कोई खुली जगह न होने के कारण बच्चे इसी पाँच मन्दिर के मैदान में खेलते-कूदते हैं। कुछ घटनाएँ ऐसी भी सामने आई जहाँ बच्चे तालाब में डूबते-डूबते बचे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए इस तालाब को नियमित तौर पर खाली करवाये जाने की माँग भी ज्ञापन में रखी गयी ताकि तालाब में डूबने से लेकर बीमारियों के पनपने के ख़तरे को टाला जा सके। इसके साथ ही यह माँग भी उठायी गयी कि तालाब के इर्द-गिर्द सुरक्षा हेतु चारदीवारी बनायी जाये और ख़राब पड़ी लाइट को जल्द से जल्द ठीक कराया जाये।

श्रीराम सेने नामक साम्प्रदायिक संगठन के नेता की शर्मनाक हरकत – मुस्लिम प्रिंसिपल से थी चिढ़ तो स्कूल की पानी टंकी में मिला दिया ज़हर

कर्नाटक में घटित इस घटना ने हमें सोचने पर मज़बूर कर दिया है कि आख़िर हमारा समाज किस ओर जा रहा है। यह घटना दिखाती है कि फ़ासीवादी भाजपा और आरएसएस की नफ़रती राजनीति और ज़हरीली मानसिकता कितनी गहराई में अपनी पैठ बना चुकी है। सत्ता में आने के बाद से फ़ासीवादी मोदी सरकार ने साम्प्रदायिकता की आग में देश को धकेला है, उसके परिणाम अब नग्न रूप में दिखने लगा है। एक ख़ास क़ौम के ख़िलाफ़ कभी टीवी मीडिया के रीढ़विहीन एंकरों द्वारा तो कभी अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा, हेमन्ता बिस्वा शर्मा जैसे दंगाइयों के द्वारा नफ़रत उगला जाता है। इससे स्थानीय स्तर पर मौजूद छोटे-छोटे साम्प्रदायिक संगठनों को खुली छूट मिलती है, जो किसी न किसी रूप में सीधे या घुमा-फिराकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समूची मशीनरी का ही हिस्सा होते हैं। इसलिये श्री राम सेने नामक दक्षिणपन्थी संगठन के नेता द्वारा पानी में ज़हर मिलाने की घटना को आरएसएस और भाजपा की साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिल्ली के शाहबाद डेरी इलाके का उच्च माध्यमिक विद्यालय

शिक्षा का अधिकार जीने के अधिकार के साथ जुड़ा हुआ है। समान और निःशुल्क शिक्षा हर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है। अगर हम आज शिक्षा के क्षेत्र में जारी ग़ैरबराबरी के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठायेंगे, तो अपने बच्चों के भविष्य के बरबाद होने के ज़िम्मेदार हम भी होंगे। याद रखें कि चुप्पी अन्याय करने वालों के लिए एक मौन समर्थन होता है। जिस तरह से हम ज़िन्दगी भर एक जगह से दूसरी जगह काम के लिए भागते रहते हैं, अगर आज हम नहीं बोलेंगे, तो हमारे बच्चे भी वैसी ही ज़िन्दगी जीने के लिए मजबूर होंगे।

हिमांशी नरवाल और शैला नेगी को संघी गुबरैलों द्वारा धमकी : यही है इन फ़ासिस्टों का असली चरित्र

हिमांशी नरवाल और शैला नेगी ने जिस बहादुरी के साथ इन संघियों के साम्प्रदायिक एजेण्डा को ध्वस्त किया है आज हमें इससे सीखने की ज़रूरत है। गुण्डों का ये गिरोह सड़कों पर जो आतंक मचाये फिर रहा है उसको उसी की भाषा में सड़कों पर मुँहतोड़ जवाब देना होगा। इन गुबरैलों को सबसे ज़्यादा डर लोगों की एकजुटता से लगता है। लोग एकजुट होकर इनके दोगलेपन पर सवाल न करने लगें इसीलिए जब भी कोई व्यक्ति इनसे सवाल करता है तो ये बिलबिला जाते हैं और फिर उसे जान से मारने, रेप आदि की धमकी देते हैं जैसा की इन मामलों में हुआ है। पहलगाम हमले के बाद संघ की पूरी मशीनरी ने देश में दंगा भड़काने की पूरी कोशिश की लेकिन जनता की एकजुटता ने उसके मंसूबों पर पानी फ़ेर दिया। आज हम मेहनतकश लोगों को ये बात समझ लेना होगा कि साम्प्रदायिकता, दंगा और युद्ध से हमें कुछ हासिल नहीं होगा। हमें अपनी वर्गीय एकजुटता कायम करके संघ और भाजपा के सभी प्रोपैगेण्डा को ध्वस्त करना होगा और उनके गुण्डा गिरोहों को मुँहतोड़ जवाब देना होगा। हमारे दुश्मन देश के बाहर नहीं हैं और न ही हमारे दुश्मन देश के अन्दर किसी धर्म या समुदाय के अल्पसंख्यक लोग हैं। हमारे दुश्मन हमारे ही देश के धन्नासेठ, धनी व्यापारी, धनी कुलक व पूँजीवादी भूस्वामी और इस समूचे पूँजीपति वर्ग की मैनेजिंग कमेटी का काम करने वाली पूँजीवादी सरकार है, जो आज फ़ासीवादी संघ परिवार के हाथों में है। सवाल धर्म का नहीं है, सवाल वर्ग का है। यही सवाल समझने की ज़रूरत है।

बढ़ते स्त्री विरोधी अपराध और प्रतिरोध का रास्ता

स्‍त्री उत्पीड़न के पीछे असल वज़ह पूँजीवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था है जिसमें महिलाएँ दोहरी गुलामी का शिकार हैं। जब तक यह व्यवस्था है तब तक हम चाहे जितना ‘सेफ़ स्पेस’ बना लें, कराटे सीख लें, ‘राजनीतिक रूप से सही भाषा’ में बात करना सीख लें, पढाई कर लें, हमारी मुक्ति सम्भव नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि इस पूँजीवादी व्यवस्था को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने के लिए सड़कों पर एक जुझारू आन्दोलन खड़ा किया जाये। इस व्यवस्था का पूर्ण रूप से ख़ात्मा ही स्‍त्री मुक्ति की पहली अनिवार्य शर्त है। मज़दूर सत्ता की स्‍थापना और समाजवाद का निर्माण ही एक लम्‍बी प्रक्रिया में क़दम-दर-क़दम मज़दूरों और उनके अंग की तौर पर स्त्रियों को भी मुक्‍त कर सकता है। पितृसत्ता वर्गों के साथ पैदा हुई थी और यह वर्गों के साथ ही ख़त्म हो सकती है। यह दूरगामी लक्ष्‍य है, यह लम्‍बी लड़ाई है, लेकिन इसकी शुरुआत हमें करनी ही होगी।

चुनाव आते ही मोदी के साम्प्रदायिक बयानों, झूठों और ग़लतबयानियों की अन्धाधुन्ध बमबारी के मायने

अपने दस साल के कार्यकाल में मोदी सरकार ने जनता की ज़िन्दगी को बद से बदतर बनाने का काम किया है। आम मेहनतकश जनता पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ लाद कर विजय माल्या, मेहुल चौकसी जैसे पूँजीपतियों का कर्ज़ा माफ़ करने का काम किया है। जनता से किये हुए वायदों को पूरा करने में ये सरकार पूरी तरह से विफल रही है। यही कारण है कि फ़ासीवादी मोदी सरकार चुनाव दर चुनाव जाति-धर्म, मन्दिर-मस्जिद का मुद्दा उठाकर अपनी चुनावी नैया पार करने की कोशिश करती रही है।

फ़ासिस्ट प्रोपेगैण्‍डा फैलाती दंगाई फ़िल्में

ये फ़ासिस्ट फ़िल्में और कुछ नहीं है बल्कि मेहनतकश जानता का ध्यान भटकाने का एक हथकण्डा मात्र है। पिछले 10 सालों से महँगाई और बेरोज़गारी का बुलडोज़र जिस तरीक़े से देश की जनता को रौंद रहा है उसके ख़िलाफ़ लोग एकजुट और संगठित ना हो जायें इसके लिए समय-समय पर कभी लव जिहाद, कभी धारा 370, कभी चीन-पाकिस्तान का हौवा उछाल दिया जाता है। और मोदी की गोदी में बैठे विवेक अग्निहोत्री और सुदिप्तो सेन जैसे “फ़िल्मकार” फ़िल्म बनाकर झूठा फासिस्‍ट प्रोपेगैण्‍डा फैलाने का काम शुरू कर देते हैं।

चुनाव नज़दीक आते ही मोदी सरकार द्वारा रसोई गैस की क़ीमत घटाने के मायने

मोदी सरकार के नौ सालों में जनता ने कमरतोड़ महँगाई का सामना किया है। बढ़ती क़ीमतों ने देश की मेहनतकश आबादी का जीना दूभर कर दिया है। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं मोदी सरकार द्वारा जनता का “हितैषी” बनने का ढोंग शुरू हो गया है। पिछले नौ सालों में जनता के मुद्दों के हर मोर्चे पर बुरी तरह विफल रहने के बाद, फ़ासीवादी मोदी सरकार को 2024 के लोकसभा चुनाव में हार का भूत अभी से डराने लगा है। इसका ताज़ा उदाहरण अभी मोदी सरकार द्वारा 2024 के चुनाव से ठीक पहले रसोई गैस की क़ीमत में दो सौ रूपए की “कटौती” करना है।