• March 31, 2025

    शहीदे-आज़म भगतसिंह आज देश के मज़दूरों, ग़रीब किसानों और मेहनतकशों को क्या सन्देश दे रहे हैं?...

    भारत के मज़दूरो, ग़रीब किसानो, आम मेहनतकशो और आम छात्रो व युवाओ! तुम चाहे किसी भी धर्म, जाति, नस्ल, क्षेत्र या भाषा से रिश्ता रखते हो, तुम्हारे राजनीतिक व आर्थिक हित समान हैं, तुम्हारी एक जमात है! तुम्हें लूटने वाली इस देश की परजीवी पूँजीवादी जमात है जिसमें कारख़ाना मालिक, खानों-खदानों के मालिक, ठेकेदार, धनी व्यापारी, धनी किसान व ज़मीन्दार, दलाल और बिचौलिये शामिल हैं! ये जोंक के समान इस देश की मेहनतकश अवाम के शरीर पर चिपके हुए हैं! ये ही इस देश की मेहनत और कुदरत की लूट के बूते अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं! इनके जुवे को अपने कन्धों से उतार फेंको! इसके लिए संगठित हो, अपनी क्रान्तिकारी पार्टी का निर्माण करो! केवल यही शहीदे-आज़म भगतसिंह की स्मृतियों को इस देश के मेहनती हाथों का सच्चा क्रान्तिकारी सलाम होगा, उनको सच्ची आदरांजलि होगी : एक ऐसे समाज का निर्माण करके जिसमें सुई से लेकर जहाज़ बनाने वाले मेहनतकश वर्ग उत्पादन, समाज और राज-काज पर अपना नियन्त्रण स्थापित करेंगे, परजीवी लुटेरी जमातों के हाथों से राजनीतिक और आर्थिक सत्ता छीन ली जायेगी, जो मेहनत नहीं करेगा उसे रोटी खाने का भी अधिकार नहीं होगा, दूसरे की मेहनत की लूट का हक़ किसी को नहीं होगा, जिसमें, भगतसिंह के ही शब्दों में, मनुष्य के हाथों मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा।

  • March 30, 2025

    क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षणमाला – 24 : मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के सिद्धान्त – खण...

    क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षणमाला – 24 : मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के सिद्धान्त : खण्ड-2 अध्याय – 1 पूँजी के परिपथ (सर्किट) अभिनव इस लेखमाला की सभी किश्‍तें इस लिंक से पढें …

  • March 29, 2025

    छावा : फ़ासीवादी भोंपू से निकली एक और प्रोपेगैण्डा फ़िल्म

    पहला तथ्य तो यही है कि यह फ़िल्म किसी ऐतिहासिक घटना पर नहीं बल्कि यह शिवाजी सावन्त के एक उपन्यास पर बनी है। लेकिन इसे पेश ऐसे किया जा रहा है जैसे कि यह इतिहास को चित्रित कर रही है। दूसरा, अगर ऐतिहासिक तथ्यों पर ग़ौर करें, तो यह बात तो स्पष्ट तौर पर समझ में आ जाती है कि औरंगज़ेब और शिवाजी के बीच की लड़ाई कोई धर्म-रक्षा की लड़ाई नहीं थी बल्कि पूरी तरह से अपनी राजनीतिक सत्ता के विस्तार की लड़ाई थी। शिवाजी की सेना में कितने ही मुस्लिम सेनापति मौजूद थे, साथ ही औरंगज़ेब की सेना और दरबार में हिन्दू मन्त्री, सेनापति और सैनिक भारी संख्या में मौजूद थे। औरंगज़ेब का मकसद अगर सभी को मुसलमान बनाना होता, तो ज़ाहिरा तौर पर पहले वह अपने दरबार और अपनी सेना में अगुवाई और सरदारी की स्थिति में मौजूद हिन्दुओं को मुसलमान बनाता। धर्मान्तरण का जब कभी उसने इस्तेमाल किया तो वह भी राजनीतिक वर्चस्व और अहं की लड़ाई का हिस्सा था, न कि इस्लाम का राज भारत में क़ायम करने की मुहिम।

  • February 27, 2025

    कुम्भ में भगदड़ : भाजपा के फ़ासीवादी प्रोजेक्ट की भेंट चढ़ी जनता

    ऐसे किसी भी धार्मिक आयोजन में सरकार की भूमिका केवल व्यवस्था और प्रबन्धन की हो सकती है, लेकिन फ़ासीवादी भाजपा सरकार यहाँ आयोजक बनी बैठी है और ऐसी अपनी फ़ासीवादी मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए एक प्रोजेक्ट के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। आज ज़रूरत है कि भाजपा और संघ परिवार के इस फ़ासीवादी प्रोजेक्ट की सच्चाई को लोगों तक पहुँचाया जाये और लोगों को उनकी ज़िन्दगी के असली सवालों पर लामबन्द किया जाये।

  • February 26, 2025

    क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षणमाला – 23 : मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के सिद्धान्त : खण्ड-...

    अधिकांश भोंड़े अर्थशास्त्री (जिनमें कुछ “मार्क्सवादी” अर्थशास्त्री भी शामिल हैं) ‘पूँजी’ के दूसरे खण्ड के महत्व को नहीं समझ पाते हैं। उसकी वजह यह है कि मार्क्सवादी अर्थशास्त्र के विषय में उनका ज्ञान अक्सर गौण स्रोतों, मसलन, कुछ ख़राब पाठ्यपुस्तकों पर आधारित होता है। साथ ही, वे लोग भी इस खण्ड का मूल्य नहीं समझ पाते, जो इसमें कोई उद्वेलनात्मक सामग्री नहीं ढूँढ पाते हैं। वे मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के सम्पूर्ण वैज्ञानिक चरित्र को नहीं समझ पाते। नतीजतन, वे यह समझने में असफल रहते हैं कि मार्क्स का राजनीतिक अर्थशास्त्र समूची पूँजीवादी व्यवस्था के पूरे काम करने के तरीक़े और उसकी गति के नियमों को उजागर करता है, जिसमें महज़ पूँजीपति वर्ग और मज़दूर वर्ग के सम्बन्धों की पड़ताल ही शामिल नहीं है, बल्कि आधुनिक पूँजीवादी समाज के सभी बुनियादी वर्गों के बीच के सम्बन्धों की पड़ताल शामिल है। अन्तत:, ऐसे लोग पूँजी के उत्पादन की प्रक्रिया और पूँजी के संचरण की प्रक्रिया की बुनियादी एकता को नहीं समझ पाते हैं, जिसमें बुनियादी निर्धारक भूमिका निश्चित तौर पर उत्पादन की प्रक्रिया ही निभाती है। यह एक अन्तरविरोधी एकता होती है और इस अन्तरविरोध का स्रोत और कुछ नहीं बल्कि स्वयं माल के भीतर मौजूद अन्तरविरोध ही है। यानी, उपयोग-मूल्य और विनिमय-मूल्य के बीच का अन्तरविरोध। ऐसे लोगों के विपरीत आजकल कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो उत्पादन की प्रक्रिया के निर्धारक महत्व को नहीं समझते और पूँजीवादी शोषण का मूल, आय के विभिन्न रूपों के समाज के विभिन्न वर्गों में बँटवारे के मूल को संचरण की प्रक्रिया में ढूँढते हैं और ‘पूँजी’ के दूसरे खण्ड को ठीक वह स्थान देते हैं, जो उसका स्थान हो ही नहीं सकता है। वे भी वास्तव में इस दूसरे खण्ड को समझने में असफल रहते हैं। ऐसे लोग पूँजीवादी संकट का मूल भी उत्पादन की प्रक्रिया में देखने के बजाय संचरण की प्रकिया में, बाज़ार में और मूल्य का वास्तवीकरण न होने के संकट में ढूँढते हैं। ये दोनों ही छोर ग़लत हैं और इन पर खड़े लोग मार्क्स की ‘पूँजी’ की परियोजना को समझने में असफल रहते हैं।