• June 30, 2025

    मध्य-पूर्व में साम्राज्यवादी युद्ध का विस्तार – युद्ध, नरसंहार और विनाश के अलावा साम्राज...

    आने वाले दिनों में अमेरिकी साम्राज्यवाद अपने पतित होते वर्चस्व को रोकने के लिए मध्य-पूर्व सहित दुनिया के विभिन्न हिस्सों में युद्ध, नरसंहार, बेपनाह हिंसा का सहारा लेने से बाज़ नहीं आने वाला है। मध्य-पूर्व में चल रही मौजूदा उथल-पुथल का असर न सिर्फ़ उस क्षेत्र में होगा बल्कि तेल व गैस का भण्डार होने की वजह से उस क्षेत्र मे अस्थिरता का असर समूचे विश्व की अर्थव्यवस्थाओं पर होना लाज़िमी है। साथ ही यह उथल-पुथल, अनिश्चितता और अस्थिरता जनबग़ावतों की ज्वाला को भी भड़काने का काम करेगी।

  • June 30, 2025

    विश्व की “चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” के शोर के पीछे की सच्चाई

    जीडीपी का बढ़ना किसी भी देश की आर्थिक स्थिति के ठीक होने का सूचक नहीं है। क्योंकि इससे इस बात का पता नहीं चलता कि देश में पैदा होने वाली कुल सम्पदा का कितना हिस्सा देश के बड़े धनपशु हड़प लेते हैं और देश की आम मेहनतकश जनता की स्थिति क्या है? पिछले दिनों विश्व असमानता लैब की नवीनतम रिपोर्ट ‘भारत में आय और सम्पत्ति असमानता, 1922-2023: अरबपति राज का उदय’ (मार्च 2024) ने बताया कि भारत की शीर्ष 1% आबादी का राष्ट्रीय आय के 22.6% हिस्से पर नियन्त्रण है। शीर्ष 10% आबादी के पास राष्ट्रीय आय का 57.7% हिस्सा है, जबकि निचले 50% के पास केवल 15% हिस्सा है। यह असमानता दुनिया में सबसे अधिक है। साफ़ है कि दुनिया की “चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” में पूँजीपतियों-धन्नासेठों की तिजोरियों का आकार तो बढ़ता जा रहा है लेकिन आम मेहनतकश आबादी इस “चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” में तबाही और बरबादी की और गहरी खाई में धकेली जा रही है। यह हास्यास्पद है कि जिस जापान को पीछे छोड़कर चौथी अर्थव्यवस्था होने का दावा किया जा रहा है, वहाँ प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत की तुलना में लगभग 11.8 गुना अधिक है।

  • June 30, 2025

    रेखा गुप्ता सरकार दिल्ली में मज़दूरों की बस्तियों पर बेरहमी से चला रही है बुलडोज़र!

    पूँजीवाद में एक तरफ़ गाँव से शहरों की ओर प्रवास जारी रहता है और दूसरी तरफ़ शहर फैलते रहते हैं जिसमें शहरी “विकास” हर-हमेशा ग़रीबों की बस्तियों को उजाड़ने की क़ीमत पर किया जाता है। जो सीमित वैकल्पिक आवास मज़दूरों को मुहैया कराये जाते हैं वे मज़दूरों के रोज़गार के स्थान से दूर तथा अस्पताल, शिक्षा, पानी, बिजली जैसी सुविधाओं से रिक्त होते हैं। दिल्ली में बवाना और नरेला में झुग्गियों को उजाड़कर बसायी झुग्गी-झोंपड़ी क्लस्टर के मकान झुग्गियों से भी बदतर जीवन स्थिति देते हैं। झुग्गी-मुक्त शहर के दावे झूठे और बेमानी हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार ही भारत में 6.5 करोड़ झुग्गीवासी थे और क़रीब एक लाख झुग्गियाँ थीं। ये झुग्गियाँ पटरी किनारे, नाले किनारे या शहर के कोनों में बसी होती हैं जहाँ बिजली, पानी, सीवर, शौचालय, सड़क से लेकर साफ़-सफ़ाई की समस्या हमेशा रहती है। हालाँकि कई रिपोर्टें बताती हैं कि यह आँकड़ा सटीक नहीं था और असल संख्या 14-15 करोड़ है।

  • May 26, 2025

    पाठ्यक्रमों में बदलाव और इतिहास का विकृतिकरण करना फ़ासीवादी एजेण्डा है!

    भारतीय फ़ासीवादियों का इतिहास को बदलने की एक वजह और है। वह है भारतीय राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में इनकी ग़द्दारी। आज यह कितना भी ख़ुद को सबसे बड़ा देशभक्त होने के तमगे दे लें लेकिन सच्चाई से सब वाकिफ़ हैं कि आज़ादी की लड़ाई में इन्होंने एक ठेला तक नहीं उठाया उल्टे चन्द्रशेखर आज़ाद जैसे क्रान्तिकारियों की मुखबिरी की। वी डी सावरकर जैसे इनके नेताओं ने माफ़ीनामे लिखकर दिये।

  • April 30, 2025

    भारत की मेहनतकश जनता को फ़िलिस्तीन की जनता का साथ क्यों देना चाहिए?

    अगर आपके देश में कोई साम्राज्यवादी ताक़त आकर कब्ज़ा कर ले तो क्या आपको हथियार उठा कर लड़ने का हक़ है? बिल्कुल है। अगर आप अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की बात करें, जिसे सभी देश मान्यता देते हैं, तो वह भी कहता है कि किसी भी जबरन कब्ज़ा करने वाली ताक़त के ख़िलाफ़ किसी भी देश के लोगों को हथियारबन्द बग़ावत करने और अपनी आज़ादी के लिए सशस्त्र संघर्ष करने की पूरी आज़ादी है। यह आतंकवाद नहीं है। यह आत्मरक्षा और मुक्ति के लिए और ग़ुलामी के विरुद्ध संघर्ष है। अगर आप को हथियारबन्द ताक़त और हिंसा के ज़रिये कोई ग़ुलाम बनाकर रखता है तो अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के ही मुताबिक आप हथियारबन्द संघर्ष और क्रान्तिकारी हिंसा द्वारा उसकी मुख़ालफ़त कर सकते हैं, उसके विरुद्ध लड़ सकते हैं। यह भी हम नहीं, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून कहता है, जिसे सभी देशों से मान्यता प्राप्त है, भारत से भी।