Category Archives: बुर्जुआ जनवाद – दमन तंत्र, पुलिस, न्‍यायपालिका

अथ सर्वोच्च न्यायालय पुन: उवाच – सम्पत्ति रक्षा के नाम पर हड़ताली मजदूरों की हत्या जायज

न्यायपालिका अपने को जनता के ऊपर आरोपित तानाशाह मान रही है और पूंजीवाद के रक्षक के तौर पर आचरण कर रही है। पर उसे यह समझना चाहिये कि बहुसंख्यक मेहनतकश जनता को इस तरह धमकाने से पूंजीवाद की अवश्यंभावी मौत तो टलनेवाली नहीं ही है बल्कि इस तरह तो बारूद में पलीता और जल्दी लगेगा। कोई भी जनद्रोही व्यवस्था किसी भी प्रकार जनता के आक्रोश से नहीं बच सकती।

जरूरी है कि जनता के सामने क्रान्तिकारी विकल्प का खाका पेश किया जाये

आज चुनावों में हमें एक अलग ढंग से भागीदारी करनी चाहिए। चुनावों में उम्मीदवार खड़ा करना अपनी ताकत फ़ालतू खर्च करना है। इसके बजाय हमें चुनावों के गर्म राजनीतिक माहौल का लाभ उठाने के लिए इस दौरान जन सभाओं और व्यापक जनसम्पर्क अभियानों के द्वारा जनता तक अपनी बात पहुँचानी चाहिए, सभी संसदीय पार्टियों का और पूँजीवादी संसदीय व्यवस्था का भण्डाफ़ोड़ करना चाहिए तथा लोगों को यह बताना चाहिए कि किसी पार्टी को वोट देने से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, फ़र्क तभी पड़ेगा जब मेहनतकश जनता संगठित होकर सारी ताकत अपने हाथों में ले ले।