Category Archives: स्‍त्री विरोधी अपराध

‘एप्सटीन फ़ाइल्स’: पूँजीवाद की सड़ांध और गलाज़त को बेनक़ाब करता और दुनियाभर के शासक वर्गों की “नैतिकता” और “आदर्शों” की कलई खोलता सबसे बड़ा काण्ड

‘एप्सटीन फ़ाइल्स’ के उजागर होने से यही बात साबित होती है कि पूँजीवाद में मानव शरीर, मुख्यतः मेहनतकश वर्ग की स्त्रियों और यहाँ तक की मासूम बच्चियों का शरीर, महज़ श्रम शक्ति के लिए ही शोषित नहीं होता, बल्कि विलासिता की वस्तुओं के तौर पर भी उसका उपभोग किया जाता है। यह पूँजीवाद का वह घिनौना सच है, जिसे महज़ एक साइड इफ़ेक्ट नहीं कहा जा सकता। बल्कि यह तो इसका एक अनिवार्य लक्षण है।

अंकिता हत्याकाण्ड : न्याय के लिए एक बार फ़िर हज़ारों लोग सड़कों पर उतरे मगर भाजपा बेशर्मी से ‘वीआईपी’ को बचाने में जुटी!

ये कोई पहला मामला नहीं है जब भाजपा और संघ ने बलात्कारियों-अपराधियों को बचाने में, उनको संरक्षण देने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया हो! इतना ही नहीं इस “संस्कारी पार्टी” में बलात्कारियों-अपराधियों के स्वागत की एक नई परम्परा ही शुरू कर दी गई है। अभी कुलदीप सिंह सेंगर के जमानत के शर्मनाक फ़ैसले आने के बाद ये लोग फूल-माला लेकर ‘बलात्कारी स्वागत’ हेतु पहुँच गये थे। यह अलग बात है कि जन दबाव के चलते सुप्रीम कोर्ट को ये फ़ैसला रद्द करना पड़ा। कठुआ में आठ साल की बच्ची के बलात्कारियों के समर्थन में भाजपाइयों ने तिरंगा रैली निकाली थी। बिलकिस बानो के बलात्कारियों की रिहाई के बाद भाजपा नेताओं द्वारा अच्छे “संस्कारी ब्राह्मण” होने के लिए बलात्कारियों का फूल-माला से स्वागत किया गया था। आई.आई.टी बी.एच.यू के गैंगरेप के आरोपी की ज़मानत होने पर केक काटकर स्वागत किया गया था।

कुलदीप सिंह सेंगर को ज़मानत : न्यायपालिका में फ़ासिस्ट घुसपैठ और भाजपा राज में बलात्कारियों व अपराधियों को सत्ता के संरक्षण का एक और उदाहरण

न्यायपालिका में फ़ासीवादी घुसपैठ के कारण बलात्कारियों को शह और संरक्षण मिल रहा है। इस कारण उनका मनोबल भी बढ़ रहा है और स्त्री-विरोधी अपराध भी। NCRB के आँकड़ों के अनुसार जहाँ साल 2020 में 49,385 बलात्कार दर्ज हुए थे वहीं साल 2022 में स्त्री-उत्पीड़न की घटनाएँ बढ़कर 65,743 हो गयी। इसके विपरीत बलात्कार की घटनाओं में सज़ा मिलने की दर में कमी आयी है। साल 2021 में 25.2% मामलों में  सज़ा हुई तो वहीं साल 2022 में  23.2%  मामलों में ही सज़ा हुई।

पंजाब में प्रवासियों के ख़िलाफ़ भड़कायी जा रही नफ़रत से किसको होगा फ़ायदा ?

तर्क-विवेक और न्यायबोध को एक ओर रखकर एक प्रवासी मज़दूर के दोष का ठीकरा सभी प्रवासियों पर फोड़ा जाने लगा। देखते-देखते पंजाब में रहने वाले लाखों प्रवासी श्रमिकों में भय की लहर दौड़ गयी और उन्हें डर के साये में धकेल दिया गया। यह पूरा मामला दर्शाता है कि लोगों की निम्न राजनीतिक चेतना का फ़ायदा उठाकर उनका ध्यान उनके असली मुद्दों से भटकाना कितना आसान है।

भाजपा के “रामराज्य” में बढ़ते स्त्री-विरोधी अपराध

फ़ासीवादी भाजपा के शासन में एक तरफ़ महिलाओं को ही सीमा में और संस्कार में रहने की हिदायत दी जाती है, महिलाओं के कपड़े पहनने, खाने, जीवनसाथी चुनने की आज़ादी पर हमला किया जाता है और दूसरी तरफ़ बलात्कारियों को खुली छूट मिलती है! जब ऐसी पार्टी सत्ता में होगी तो क्या नवधनाढ्य वर्गों, लम्पट टुटपुँजिया वर्गों और नेताओं की बिगड़ी औलादों का दुस्साहस नहीं बढ़ेगा कि वह किसी भी औरत पर हमला करे और उसका बलात्कार करे? जब इन आपराधिक तत्वों को यह यक़ीन है कि इन अपराधों की उसे कोई सज़ा नहीं मिलेगी, बस उसे भाजपा में शामिल हो जाने की आवश्यकता है, तो ज़ाहिर सी बात है कि स्त्री–विरोधी अपराधों में बढ़ोत्तरी तो होगी ही। शुचिता और संस्कार का ढोंग करने वाली फ़ासीवादी भाजपा के राज ने इस पतनशील और प्रतिक्रियावादी स्त्री-विरोधी मानसिकता को और मज़बूत किया है। भाजपा के गुरू गोलवलकर का मानना था कि औरतें बच्चा पैदा करने का यन्त्र होती हैं; इनके माफ़ीवीर सावरकर का मानना था कि बलात्कार का राजनीतिक हिंसा के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यही इनकी असली जन्मकुण्डली है!

प्रधानमन्त्री के संसदीय क्षेत्र में बर्बर बलात्कार और न्यायपालिका का दिनोदिन बढ़ता दकियानूसी और स्त्री-विरोधी चरित्र

यह केवल न्यायपालिका का मामला नहीं है। बल्कि आज देश की सभी सर्वोच्च संस्थाओं में फ़ासीवादी घुसपैठ हो चुकी है। फ़ासीवाद अपनी मूल प्रकृति से ही स्त्री विरोधी विचारधारा को खाद पानी देने का काम करता है। जैसा कि वित्तमन्त्री निर्मला सीतारमण और योगी आदित्यनाथ के बयानों से समझा जा सकता है। जहाँ निर्मला सीतारमण का कहना है कि “पितृसत्ता वामपन्थी अवधारणा है।” वहीं योगी का मानना है कि “महिलाओं को स्वतन्त्र या आज़ाद नहीं छोड़ा जा सकता है।” बस योगी जी यह कहना भूल गए कि कुलदीप सिंह सेंगर, आशाराम, रामरहीम जैसे अपराधियों को आज़ाद छोड़ने से देश “विश्वगुरु” बनेगा। फ़ासीवादी शासन में बलात्कारियों के पक्ष में फ़ासिस्टों द्वारा तिरंगा यात्रा निकलने से लेकर आरोपियों को बेल मिलने पर फूल माला से स्वागत करना आम बात बन चुकी है। ऐसे में समाज के सबसे बर्बर, अपराधिक और बीमार तत्वों को अपराध करने की खुली छुट मिल जाती है। यह स्थिति और भी ख़तरनाक तब बन जाती है बुर्जुआ न्याय व्यवस्था बुर्जुआ जनवाद के अतिसीमित प्रगतिशीलता को स्थापित करने की जगह फ़ासिस्टों के हाथ की कठपुतली बन जाय और जनविरोधी-स्त्रीविरोधी बयानों की झड़ी लगा दे। न्यायपालिका के इस प्रकार के बयानों की वजह से समाज में गहराई से पैठी स्त्री विरोधी मानसिकता को फलने-फूलने के लिए खाद पानी मिलेगा। और कालान्तर में स्त्रियों के ख़िलाफ़ होने वाले जघन्य अपराधों के लिए ज़मीन तैयार हो रही है।।

अपराध को साम्प्रदायिक रंग देने की संघियों की कोशिश को जनता की एकजुटता ने फिर किया नाक़ाम!

पूरे इलाक़े में नशाखोरी बड़े पैमाने पर फैली हुई है। अक्सर नुक्कड़ चौराहों तक पर लम्पट तत्व छेड़खानी की घटनाओं को अंजाम देते हैं। बहुत से लम्पट तो भाजपा-आम आदमी पार्टी तथा अन्य चुनावबाज़ पार्टियों से ही जुड़े होते हैं। इन पार्टियों के तमाम नेता इन गुण्डों को शह देते हैं, ताकि चुनाव के समय इनका इस्तेमाल कर सकें। इलाक़े में इस तरह की यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी कई बार बच्चियों व स्त्रियों से बलात्कार के मामले सामने आ चुके हैं। एक वर्ष पहले साक्षी हत्याकाण्ड एवं कुछ साल पहले पाँच वर्ष की बच्ची मुस्कान के साथ भी बलात्कार और हत्या की घटना सामने आयी थी।

बढ़ते स्त्री विरोधी अपराध और प्रतिरोध का रास्ता

स्‍त्री उत्पीड़न के पीछे असल वज़ह पूँजीवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था है जिसमें महिलाएँ दोहरी गुलामी का शिकार हैं। जब तक यह व्यवस्था है तब तक हम चाहे जितना ‘सेफ़ स्पेस’ बना लें, कराटे सीख लें, ‘राजनीतिक रूप से सही भाषा’ में बात करना सीख लें, पढाई कर लें, हमारी मुक्ति सम्भव नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि इस पूँजीवादी व्यवस्था को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने के लिए सड़कों पर एक जुझारू आन्दोलन खड़ा किया जाये। इस व्यवस्था का पूर्ण रूप से ख़ात्मा ही स्‍त्री मुक्ति की पहली अनिवार्य शर्त है। मज़दूर सत्ता की स्‍थापना और समाजवाद का निर्माण ही एक लम्‍बी प्रक्रिया में क़दम-दर-क़दम मज़दूरों और उनके अंग की तौर पर स्त्रियों को भी मुक्‍त कर सकता है। पितृसत्ता वर्गों के साथ पैदा हुई थी और यह वर्गों के साथ ही ख़त्म हो सकती है। यह दूरगामी लक्ष्‍य है, यह लम्‍बी लड़ाई है, लेकिन इसकी शुरुआत हमें करनी ही होगी।

बढ़ते स्त्री-विरोधी अपराधों के पैदा होने की ज़मीन की शिनाख़्त करनी होगी!

कोई दिन नहीं जाता जब देश के किसी न किसी कोने में कोई न कोई बच्ची हवस का शिकार न होती हो। कहीं शिक्षक छात्राओं के उत्पीड़न में शामिल दिखते हैं, कहीं बालिका गृहों में बच्चियों पर यौन हिंसा होती है, कहीं झूठी शान के लिए लड़कियों को मार दिया जाता है, कहीं सत्ता में बैठे लोग स्त्रियों को नोचते हैं, कहीं जातीय या धार्मिक दंगों में औरतों पर ज़ुल्म होता है तो कहीं पर पुलिस और फ़ौज तक की वर्दी में छिपे भेड़िये यौन हिंसा में लिप्त पाये जाते हैं! ऐसा कोई क्षण नहीं बीतता जब बलात्कार या छेड़छाड़ की कोई घटना न होती हो! कोई भी पार्टी सत्ता में आ जाये किन्तु स्त्री विरोधी अपराध कम होने के बजाय लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं मगर फ़ासीवादी भाजपा के शासनकाल में बर्बर स्त्री-विरोधी अपराधों में भारी बढ़ोत्तरी हुई है।

प्रज्वल रेवन्ना सेक्स काण्ड – “धर्मध्‍वजाधारी” और “संस्कारी” भाजपाइयों द्वारा बलात्कारियों को प्रश्रय और संरक्षण देने की मुहिम का हुआ पर्दाफा़श!

शायद ही ऐसा कोई माह बीतता हो जब किसी बड़े भाजपाई नेता या उसके सहयोगी दलों के नेताओं का नाम स्त्री-विरोधी अपराधों में नहीं आता हो। भाजपा सरकार के पिछले 10 साल के कार्यकाल में बारम्‍बार इस प्रकार की घटनाएँ सामने आती रही हैं जिसमें कि ख़ुद भाजपा नेता ऐसे स्त्री-विरोधी अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। दूसरी तरफ़, तमाम बलात्कारियों को संरक्षण देने और बढ़ावा देने के काम में भाजपा सरकार निरन्‍तर संलिप्त पायी जाती रही है। लेकिन अभी कर्नाटक में जो यौन उत्पीड़न और बलात्कार के मामले सामने आये हैं उसकी वीभत्सता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कर्नाटक के हासन से वर्तमान जद(से) सांसद और भूतपूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवीगोड़ा के पोते प्रज्वल रेवन्ना ने क़रीब 2800 महिलाओं का न सिर्फ़ बलात्कार किया बल्कि अपने इन कुकृत्यों को रिकॉर्ड किया! ऐसे क़रीब 2976 वीडियो मौजूद हैं। यह वीडियो प्रज्वल ने इसलिए बनाये ताकि आगे इन महिलाओं को ब्लैकमेल कर सके। जिन महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, उनमें से कई महिलाएँ ख़ुद इसी की पार्टी की सदस्य थीं और कई तो ग़रीब परिवारों से आती थीं, जो मदद के सिलसिले में इस दरिन्दे से मिलने पहुँची थीं। इसने राज्य की महिला अधिकारियों को भी अपनी हवस का शिकार बनाया है। जो वीडियो सामने आये हैं, उनमें उस स्तर की यौन हिंसा है, जिसका ज़िक्र तक नहीं किया जा सकता है! घटना के बाहर आने पर पता चला कि यह घिनौने कुकृत्य कई सालों से जारी थे।