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‘चार लेबर कोड’ मज़दूरों-कर्मचारियों के अधिकारों पर सबसे बड़ा हमला है! अब एकदिवसीय हड़तालों की रस्मअदायगी का वक़्त नहीं रहा!

अपने तीसरे कार्यकाल के दौरान मोदी सरकार खुलकर उन सभी कार्यभारों को पूरा कर रही है जिनके लिए देश के पूँजीपति वर्ग ने सत्ता की कमान उसके हाथ में सौंपी थी। आर्थिक मन्दी से बिलबिलाया हुआ पूँजीपति वर्ग लम्बे समय से “धन्धे की आज़ादी” के लिए किलबिला रहा था। वही “आज़ादी” मोदी सरकार ने चार लेबर कोड की शक्ल में मालिकों और पूँजीपतियों को बतौर सौगात थमायी है। देश के करोड़ों मज़दूरों-कर्मचारियों की बदहाल ज़िन्दगी को और भी तबाह करने वाले चार ख़तरनाक लेबर कोड मोदी सरकार पिछले महीने लागू कर चुकी है। 21 नवम्बर को अचानक एक अधिसूचना जारी करके सरकार ने इसकी घोषणा कर दी। यह फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा मज़दूरों और कर्मचारियों के अधिकारों पर अबतक का सबसे बड़ा हमला है।

शान्ति (SHANTI) विधेयक, 2025 – कॉरपोरेट मुनाफ़े के लिए मानव जीवन को ख़तरे में डालने का बेशर्म दस्तावेज़

बड़े पैमाने पर होने वाले परमाणु रिसाव, कचरे का अनुचित प्रबन्धन व निपटारा तथा परमाणु संचालन से जुड़े अन्य बड़े जोख़िम वाले कारकों से होने वाली आपदाओं को छिपाने, उन्हें कम करके दिखाने और उनकी ज़िम्मेदारी से पूँजीपतियों और निजी प्रतिष्ठानों को मुक्त करने की मंशा से ही यह विधेयक मूलतः संचालित है। जैसे-जैसे आप इस विधेयक को पढ़ेंगे तो पायेंगे कि यह पूरा क़ानून इस अत्यन्त ख़तरनाक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी और विदेशी भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया है। वहीं दूसरी तरफ़ सार्वजनिक सुरक्षा सम्बन्धी चिन्ताओं को पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ कर दिया गया है। यह विधेयक पूरी निर्माण श्रृंखला यानी खनन से लेकर संयंत्र संचालन और कचरा प्रबन्धन तक के लिए एक ही लाइसेंस की अनुमति देता है। इससे निजी कम्पनियाँ बिना किसी वास्तविक जवाबदेही और दण्ड से मुक्त रहते हुए अधिकतम मुनाफ़ा कमा सकती हैं।

सोवियत संघ में समाजवाद की युगान्तरकारी उपलब्धियाँ

समाजवाद का लक्ष्य सिर्फ़ भौतिक प्रगति के नये शिखरों तक पहुँचना नहीं था, बल्कि न्याय, समानता और पूरी आबादी की (भौतिक मुक्ति के साथ ही) आत्मिक मुक्ति के साथ-साथ भौतिक प्रगति हासिल करना था। इसके लिए ज़रूरी था कि निजी स्वामित्व की व्यवस्था के साथ ही वह उसके एक प्रमुखतम स्तम्भ पर, यानी पितृसत्तात्मक पारिवारिक ढाँचे पर भी चोट करे, चूल्हे-चौखट की दमघोंटू नीरस दासता से स्त्रियों को मुक्त करे, उन्हें पुरुषों के साथ वास्तविक बराबरी का दर्जा देते हुए सामाजिक उत्पादक गतिविधियों और राजनीतिक-सामाजिक दायरों में भागीदारी का भौतिक-वैचारिक आधार तैयार करे तथा इसके लिए पुरुष वर्चस्ववादी मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं की जड़ों पर कुठाराघात करे।

‘आई लव मुहम्मद’ विवाद और उसका फ़ासीवादी साम्प्रदायिक इस्तेमाल

कानपुर में मुस्लिमों पर एकतरफ़ा कार्यवाई के बाद पुलिस ने सफ़ाई देते हुए कहा कि यह कार्यवाई ‘आई लव मुहम्मद’ पर नहीं बल्कि नई परम्परा शुरू करने और माहौल ख़राब करने के लिए की गयी है।  लेकिन सवाल यह है कि माहौल ख़राब करने में हिन्दू संगठन के लोग भी ज़िम्मेदार थे लेकिन उन पर कोई कार्यवाई क्यों नहीं हुई? अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार पोस्ट डालना कैसे गुनाह हो गया? बजरंग दल से लेकर कई कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों ने ‘आई लव महादेव’ से लेकर ‘आई लव योगी’ तक के पोस्टर, बैनर लगाये और सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली। लेकिन तब इस “नई परम्परा” पर कोई कार्यवाई नहीं हुई। सोशल मीडिया पर मुस्लिम-विरोधी साम्प्रदायिक पोस्ट की बाढ़ आ गयी लेकिन इस पर भी कोई कार्यवाई नहीं हुई। हाथरस में एक प्रदर्शन में तो ‘आई लव यूपी पुलिस’, ‘आई लव योगी’ और ‘आई लव महादेव’ के बैनर लेकर लोग नारे लगा रहे थे- ‘यूपी पुलिस तुम लट्ठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं’! क्या इससे माहौल ख़राब नहीं होता?

एसआईआर के फ़र्जीवाड़े से लाखों प्रवासी मज़दूरों, मेहनतकशों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों के मताधिकार के हनन के बीच बिहार विधानसभा चुनाव – जनता के सामने क्या है विकल्प?

दूसरी ख़ास बात जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए वह यह है कि एसआईआर के ज़रिये मोदी-शाह जोड़ी ने वास्तव में वह काम करने का प्रयास किया है जो जनता के जुझारू आन्दोलनों के कारण वे देश में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के ज़रिये नहीं कर पायी थी। वास्तव में, चुनाव आयोग को नागरिकता की वैधता जाँचने, उसे क़ायम रखने या रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है। 2003 एसआईआर के दिशा-निर्देश स्पष्ट शब्दों में यह बात कहते हैं कि नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार सिर्फ़ गृह मन्त्रालय को है। शाह का गृह मन्त्रालय देशव्यापी जनविरोध के कारण देश के पैमाने पर एनआरसी नहीं करवा सका, तो अब यह काम चोर-दरवाज़े से एसआईआर के ज़रिये करवाया जा रहा है। यही कारण है कि जब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पक्षों ने 2003 के दिशा-निर्देशों को ज़ाहिर करने की बात की तो केचुआ ने कहा कि उसको वह दिशा-निर्देशों वाली फ़ाइल नहीं मिल रही है! यह भी मोदी-राज की एक ख़ासियत है! वही फ़ाइलें मिलती हैं जिसका फ़ायदा मोदी-शाह उठा सकते हैं! बाक़ी या तो ग़ायब हो जाती हैं, या फिर जल जाती हैं!

लद्दाख में जनवादी व लोकप्रिय माँगों को लेकर चल रहे जनान्दोलन का बर्बर दमन

यह सच है कि सोनम वांगचुक सहित लद्दाख के आन्दोलन से जुड़े तमाम लोगों ने अनुच्छेद 370 को हटाने का समर्थन किया था। यह भी सच है कि सोनम वांगचुक की राजनीति एक सुधारवादी एनजीओपन्थ की राजनीति है और उन्होंने कश्मीरियों के दमन के ख़िलाफ़ कभी कुछ नहीं बोला। परन्तु आज जब फ़ासिस्ट राज्यसत्ता लद्दाख के लोगों के न्यायसंगत और जनवादी आन्दोलन का दमन करने पर उतारू है तो मज़दूर वर्ग के लिए यह लाज़िमी हो जाता है कि वह उनके आन्दोलन का समर्थन करे। दमन-उत्पीड़न की किसी एक भी घटना पर चुप्पी दरअसल आम तौर पर शासक वर्गों के दमन, उत्पीड़न और हिंसा के अधिकार को वैधता प्रदान करती है। ऐसे में, आज भारत में आम मेहनतकश आबादी को भी लद्दाख में चल रहे घटनाक्रम पर सर्वहारा नज़रिये से सही राजनीतिक अवस्थिति अपनाने की आवश्यकता है।

उमर ख़ालिद आदि की दिल्ली हाई कोर्ट से ज़मानत रद्द किया जाना – न्यायपालिका के फ़ासीवादीकरण का जीता-जागता उदाहरण

उमर ख़ालिद, गुलफ़िशा फ़ातिमा, शरजील इमाम, आनन्द तेलतुम्बडे जैसे सामाजिक कार्यकर्ता सालों से जेल में सड़ रहे हैं, लेकिन सत्ता पक्ष यानी फ़ासीवादी भाजपा व संघ परिवार से जुड़े या संरक्षण प्राप्त दंगाइयों, बलात्कारियों-व्याभिचारियों, भ्रष्टाचारियों व हत्यारों को कोई सज़ा नहीं मिलती है। फ़र्ज़ी मुठभेड़ करवाने और करने वालों को, झूठे आरोप व साक्ष्य गढ़ने वालों को, फ़र्ज़ी मुक़दमे चलाने वालों के ख़िलाफ़ अदालतें और न्यायाधीश चूँ तक नहीं करते हैं। आडवाणी, अमित शाह, आदित्यनाथ से लेकर प्रज्ञा सिंह ठाकुर, संगीत सोम, असीमानन्द, नरसिंहानन्द, कुलदीप सिंह सेंगर “बाइज़्ज़त बरी” कर दिये जाते हैं और इनके ख़िलाफ़ दर्ज हत्याओं, दंगों, धार्मिक उन्माद फैलाने, नफ़रती भड़काऊ भाषणों के तमाम मामले रातोंरात काफ़ूर हो जाते हैं। धारा 370 हटने से लेकर तमाम सबूतों को दरकिनार करते हुए राम जन्मभूमि मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों द्वारा एकराय से लिए गये फ़ैसले ये बताते हैं कि आज भारतीय न्यायपालिका का चरित्र किस हद तक फ़ासीवादी राज्यसत्ता के वैचारिक-राजनीतिक प्रोजेक्ट के अनुसार ढलता जा रहा है। फ़ासीवाद के मौजूदा दौर में इस देश की न्यायिक व्यवस्था भी नहीं चाहती है कि उसके चरित्र को लेकर कोई भ्रम या मुग़ालता पाला जाये!

जीएसटी 2.0 : पाँव के नीचे से ज़मीन खिसकती देखकर मोदी-शाह सरकार द्वारा जनता के साथ एक और धोखाधड़ी

सच तो यह है कि जीएसटी में “सुधार” से कोई बुनियादी फ़र्क नहीं आयेगा और महँगाई दर में मामूली-सा अन्‍तर आयेगा, जबकि ज़रूरत यह थी कि इन अप्रत्‍यक्ष करों को समाप्‍त या लगभग समाप्‍त किया जाता, विशेष तौर पर उन वस्‍तुओं और सेवाओं पर जिनका उपयोग आम तौर पर आम मेहनतकश जनता करती है। शिक्षा, चिक‍ित्‍सा, आदि बुनियादी सुविधाओं और उनसे जुड़ी वस्‍तुओं व सेवाओं पर तो जीएसटी लगाने का कोई अर्थ ही नहीं है। मोदी सरकार ने उन्‍हें ख़त्‍म करने के बजाय उनमें मामूली-सी कमी की है और इसी का डंका बजाकर श्रेय लेने की कोशिश कर रही है।

देशभर में बाढ़, बादल फटने, भूस्खलन और जलभराव की मार झेलती मेहनतकश अवाम!

जलवायु परिवर्तन के पीछे सबसे बड़ा कारण कुदरत की भयंकर लूट और पर्यावरण का विनाश है। अनियोजन, अराजकता और असमान विकास पूँजीवादी व्यवस्था के चारित्र में ही निहित होते हैं। मुट्ठीभर धन्नासेठों के मुनाफ़े की ख़ातिर जंगलों की कटाई, पहाड़ों का विनाश, अनियोजित उत्पादन और प्रदूषण ने पर्यावरण के पूरे तानेबाने को बिगाड़ कर रख दिया है। बेमौसमी बारिश, सूखा, बाढ़, आदि इसी के लक्षण हैं। पेड़ों और पहाड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई के कारण बारिश का पानी भूस्खलन के साथ इमारतों और सड़कों को तहस-नहस करता हुआ बहुत तेज़ी के साथ नीचे आता है। सरकारी लापहरवाही और अफ़सरशाही के जनविरोधी चरित्र के कारण बाँधों और नहरों के बीच बिलकुल भी सामंजस्य नहीं है। पहाड़ों से उफ़नती नदियाँ बाँधों तक पहुँचकर उन्हें तोड़ डालती हैं या फिर बाँधों में एकत्रित हुए बेशुमार पानी को आनन-फ़ानन में नदियों और नहरों में छोड़ दिया जाता है।

लद्दाख से लेकर उत्तराखण्ड तक, नेपाल से लेकर बंगलादेश तक नयी युवा पीढ़ी का सड़कों पर उबलता रोष, लेकिन क्या स्वत:स्फूर्त विद्रोह पर्याप्त है ?

जनता के गुस्से का स्वत:स्फूर्त रूप से फूटना कितना भी हिंस्र और भयंकर हो, उसका स्वत:स्फूर्त विद्रोह कितना भी जुझारू हो, वह अपने आप में पूँजीवादी व्यवस्था को पलटकर कोई आमूलगामी बदलाव नहीं ला सकता है। वजह यह है कि ऐसे विद्रोह के पास कोई विकल्प नहीं होता है, कोई स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम और नेतृत्व नहीं होता है। वह पूँजीवादी व्यवस्था के कुछ लक्षणों का निषेध करता है, लेकिन वह समूची पूँजीवादी व्यवस्था को कठघरे में नहीं खड़ा करता और न ही उसका कोई व्यावहारिक विकल्प पेश कर पाता है। क्या नहीं चाहिए, यह उसे कुछ लक्षणों के रूप में समझ आता है, लेकिन क्या चाहिए इसका कोई एक सुव्यवस्थित विचार उसके पास नहीं होता है।