फ़ासिस्टों की गुण्डागर्दी के ख़िलाफ़ उठ खड़े होते आम लोग 

पिछले 11 वर्षों से देशभर में संघ-भाजपा गिरोह के लोगों की मनमानी और गुण्डागर्दी चलती रही है। मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, स्त्रियों, आम ग़रीब आबादी और संघ-भाजपा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले छात्रों-युवाओं, प्रगतिशील लोगों पर हमले, मारपीट से लेकर बुलडोज़र चढ़ाने और मॉब लिंचिंग तक की इन्हें खुली छूट मिली हुई है।

लेकिन पिछले कुछ समय से माहौल बदल रहा है। जगह-जगह लोग इनकी गुण्डई के ख़िलाफ़ उठ खड़े हो रहे हैं और इन्हें दुम दबाकर भागना पड़ रहा है।

उत्तराखण्ड के कोटद्वार में “मोहम्मद” दीपक और उनके दोस्त विजय रावत एक बुज़ुर्ग मुस्लिम व्यापारी के साथ गुण्डई करने वाले बजरंग दलियों से भिड़ गये और उन्हें भगा दिया। इसके कुछ समय पहले नैनीताल में शैला नेगी नाम की युवती ने बलात्कार की घटना पर विरोध प्रदर्शन को साम्प्रदायिक रंग दे रही संघियों की भीड़ का अकेले सामना करके उनकी साज़िश को नाकाम कर दिया था। मथुरा में एक मुस्लिम हेडमास्टर के ख़िलाफ़ झूठे आरोप लगाकर उन्हें निलम्बित कराने वाले संघियों के विरुद्ध उस गाँव की तमाम हिन्दू आबादी एकजुट होकर हेडमास्टर के साथ खड़ी हुई और प्रशासन को उन्हें बहाल करना पड़ा।

इन घटनाओं का असर अब पूरे देश में देखा जा रहा है। वैलेण्टाइन्स डे पर बजरंग दल के गुण्डों को कई जगह आम युवाओं ने ही खदेड़ दिया। लखनऊ विश्वविद्यालय में रमज़ान के दौरान मुस्लिम छात्रों के नमाज़ और इफ़्तार पर प्रशासन ने रोक लगाने की कोशिश की तो सैकड़ों छात्र उनके साथ खड़े हो गये और उनके चारों ओर मानव श्रृंखला बनाकर खड़े रहे। राजस्थान में कम्बल बाँट रहे एक भाजपा नेता ने जब एक मुस्लिम महिला से कम्बल वापस छीन लिया, तो गाँव की तमाम हिन्दू महिलाओं ने अपने कम्बल उस नफ़रती नेता के मुँह पर फेंक दिये।

जैसा कि भगतसिंह ने अपने समय में कहा था, आज की तरुण पीढ़ी को जो मानसिक ग़ुलामी तथा धार्मिक रूढ़िवादी बन्धन जकड़े हैं, उससे छुटकारा पाने के लिए तरुण समाज की जो बेचैनी है, क्रान्तिकारी उसी में प्रगतिशीलता के अंकुर देख रहा है।

राहुल सांकृत्यायन ने कहा था, रूढ़ियों को लोग इसलिए मानते हैं, क्योंकि उनके सामने रूढ़ियों को तोड़ने वालों के उदाहरण पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं।” 

हमें पूरा भरोसा है कि फ़ासिस्ट गुण्डों को खदेड़ने के उदाहरणों की अब कमी नहीं रहेगी। ये महज़ अलग-अलग घटनाएँ नहीं रहेंगी बल्कि एक लहर बनेगी जो इस देश को नफ़रत और बँटवारे की आग में झोंक रहे संघियों को बहा ले जायेगी।

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2026

 

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