Category Archives: बुर्जुआ जनवाद – दमन तंत्र, पुलिस, न्‍यायपालिका

देशभर में अनेक बीएलओ की मौत : ये एसआईआर के दबाव में होने वाली हत्याएँ हैं!

उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल से लेकर केरल, तमिलनाडु से यह ख़बर आनी शुरू हुई कि एसआईआर करने वाले प्राइमरी स्कूल के शिक्षकों  से लेकर आँगनवाड़ीकर्मी अमानवीय काम के बोझ और मानसिक दबाव से गुज़र रहे हैं। कई लोगों के लिये यह दबाव इस क़दर बढ़ चुका था कि उन्हें अपनी जान तक लेने को मजबूर होना पड़ा। एसआईआर के कारण सिर्फ़ नवम्बर महीने में 26 से अधिक बीएलओ की मौत हो चुकी है। यह वह आँकड़ा है जो हमारे सामने आ गया जबकि कई ऐसी घटनाएँ तो दर्ज ही नहीं हुई या फिर दबा दी गयीं।

मारुति और बेलसोनिका के मज़दूरों के मामलों में गुड़गाँव श्रम न्यायालय ने सुनाये मज़दूर विरोधी फ़ैसले!

हाल ही में हरयाणा के श्रम विभाग ने आटोमोबाइल उद्योग की दो कम्पनियों से जुड़े मामलों में मज़दूर-विरोधी फ़ैसले सुनाये। दोनों मामलों में मज़दूरों द्वारा दायर अपील को एक तरफ़ा तरीके से ख़ारिज कर दिया गया। पहला फ़ैसला 2012 के मारुति आन्दोलन के दौरान बर्ख़ास्त एक मज़दूर के मामले में दिया गया। दूसरा फ़ैसला बेलसोनिका यूनियन के पंजीकरण को बहाल करने के लिए की गयी अपील के मामले में दिया गया।

उत्तर प्रदेश में एसआईआर का खेल और डिटेंशन कैम्प बनाने की फ़ासिस्ट साज़िश

आम मेहनतकश आबादी, ग़रीब दलित, मुसलमानों, स्त्रियों, प्रवासी मज़दूरों, झुग्गियों और सड़कों पर रहने वाली और घुमन्तू आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस साज़िश का शिकार होगा। एक बड़ी आबादी जिसका नाम एसआईआर के ज़रिये काटा जायेगा उसके लिए अपनी नागरिकता को साबित करना मुश्किल होगा। उन्हें डिटेंशन कैम्पों में ठूँस दिया जायेगा। यह आबादी न तो यह साबित कर पायेगी कि वह बांग्लादेश की या किसी और देश की है और न ही उनकी कोई वापसी होगी। उन्हें मताधिकार आदि से वंचित कर दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर इन डिटेंशन कैंपों में रखा जायेगा। वैसे तो चार लेबर कोड के लागू होने के बाद तो हर कारखाना-फ़ैक्ट्री डिटेंशन कैम्प जैसे ही होंगे। लेकिन इस डिटेंशन कैंप में रहने वाले लोगों के कोई नागरिक अधिकार नहीं होंगे। उन्हें अम्बानी-अदानी के कारखानों में जानवरों से बदतर हालात में खटाया जायेगा। यानी अपने देश के नागरिकों को ही नागरिकता से वंचित कर फ़ासिस्ट उन्हें अपने “असली नागरिक” यानी अम्बानी-अदानी जैसे पूँजीपतियों की ग़ुलामी में लगा देंगे!

बनारस की दालमण्डी में विनाशलीला रचता योगी सरकार का साम्प्रदायिक फ़ासीवादी बुलडोज़र

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का साम्प्रदायिक फ़ासीवादी बुलडोज़र “विकास” की एक और परियोजना अंजाम देने में जुटा हुआ है। बनारस के दालमण्डी इलाक़े की मुख्य सड़क को चौड़ा करने के बहाने सारी दुकानों को ध्वस्त किया जा रहा है। पूरा मीडिया का तंत्र इस कार्रवाई की चटखारे ले-लेकर रिपोर्टिंग करने में लगा हुआ है। अख़बारों से लेकर टीवी चैनलों तक लगातार दालमण्डी के सवाल पर इस तरह से रिपोर्टिंग की जा रही है जिससे इसके ज़रिये अधिकतम सम्भव साम्प्रदायिक उन्माद पैदा किया जा सके। विरोध करने वालों की धार्मिक पहचान को विभिन्न तरीक़ों से मुद्दा बनाकर प्रचारित किया जा रहा है। जिस परियोजना को योगी सरकार अपनी सरकारी मशीनरी के दम पर रातों-रात अंजाम दे सकती है, उसे कई महीनों से जानबूझकर धीरे-धीरे अंजाम दिया जा रहा है ताकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का तन्दूर लम्बे समय तक गर्म रखा जा सके।

इतिहास का सबक़ – इटली में फ़ासीवाद द्वारा मज़दूर वर्ग के अधिकारों पर हमला और मोदी सरकार के ‘चार लेबर कोड’

भारत में चार श्रम संहिताओं के ज़रिये मोदी सरकार ने हड़ताल के अधिकार पर हमला किया है तथा यूनियन बनाने के हक़ को कमज़ोर कर दिया है। इटली में फ़ासिस्ट यूनियन की तर्ज़ पर ही भारत में ‘भारतीय मज़दूर संघ’ को फ़ासीवादियों द्वारा खड़ा किया है जो पूरी तरह से एक सरकारी यूनियन ही है। इटली के उदाहरण से भारत में समानता साफ़ देखी जा सकती हैं लेकिन भारत के फ़ासिस्टों को यह याद है कि मुसोलिनी का अन्त में क्या हश्र हुआ था! इतिहास से सबक़ लेते हुए इसलिए उन्होंने इटली की तरह संसद, जनवादी संस्थाओं का और श्रम क़ानूनों का समूल नाश नहीं किया है। लेकिन आज के दौर में फ़ासीवादियों द्वारा पूँजीवादी राज्यसत्ता की जनवादी अन्तर्वस्तु को लगातार नष्ट करते हुए भी इसके खोल को बरक़रार रखने के वस्तुगत कारण भी हैं। आज के नवउदारवादी पूँजीवाद के दौर में पूँजीवादी राज्यसत्ता में उतनी भी जनवादी सम्भावनाएँ बची नहीं जितनी कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में थीं और उन्हें ध्वस्त करना भी इसलिए फ़ासीवादी शक्तियों के लिए आवश्यक नहीं रह गया है।

पूँजीपतियों के मुनाफ़े के लिए अरावली पर्वत श्रृंखला को तबाह करने पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

हमारा जीवन उस हवा पर निर्भर करता है, जिसमें हम साँस लेते है, उस पानी पर निर्भर करता है, जिसे हम पीते हैं और उस खाद्यान्न पर निर्भर करता है, जिसका हम सेवन करते हैं। जब इन तीनों को सोचे-समझे तरीके से नष्ट किया जाता रहे, लोगों को साफ हवा और स्वच्छ पानी भी नसीब न हो, खाने का अनाज तक प्रदूषित हो जाये, तब ऐसे हालात में हम चुप नहीं बैठ सकते हैं। हमें आगे आकर अपने पर्यावरण को बचाने के इस संघर्ष में अपनी भूमिका चुननी होगी। पारिस्थितिकी तंत्र को बचाना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाये रखने का प्रश्न बन चुका है! इसलिए, जनस्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के सन्तुलन की कीमत पर पूँजीवादी मुनाफ़ाखोरी की मशीनरी को प्रश्रय देने वाली वाली इस पर्यावरण-विरोधी फ़ासीवादी सत्ता के ख़िलाफ़ एक सतत और निरंतर संघर्ष आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अरावली के वर्तमान मुद्दे पर आज हमारी यह तात्कालिक माँग होनी चाहिए कि अरावली पर्वत श्रेणी की परिभाषा में कोई बदलाव नहीं किया जाये और अरावली में हो रहे अवैध खनन पर तत्काल रोक लगा कर, इसके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक आधार पर कार्यक्रम चलाये जाये।

“माओवाद” से लड़ने के नाम पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आम आदिवासियों की न्यायेतर हत्याएँ बन्द करो

भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) मोदी सरकार द्वारा जारी सीपीआई (माओवादी) के नेतृत्व और आम कार्यकर्ताओं की हत्याओं की भर्त्सना करती है और माँग करती है कि इन तमाम हत्याओं की उच्च-स्तरीय न्यायिक जाँच हो। साथ ही ‘ऑपरेशन कगार’ समेत तमाम तथाकथित “उग्रवाद-विरोधी ऑपरेशनों” को तत्काल बन्द किया जाये। इसके अलावा मध्य भारत समेत पूरे भारत में लगाये जाने वाले आपवादिक क़ानूनों को तुरन्त भंग किया जाये।

वोटचोरी : फ़ासीवाद की प्रयोगशाला से निकला सत्ता हथियाने का नया हथकण्डा!

आज की तारीख़ में जनता को उनके वास्तविक मुद्दों पर संगठित कर सड़कों पर उतरने का माद्दा किसी भी चुनावबाज़ पार्टी  में नहीं है। ये तमाम पार्टियाँ असल में पूँजीपति वर्ग के ही विभिन्न धड़ों की नुमाइन्दगी करती हैं। इसलिए इनसे ज़्यादा उम्मीद करना ही बेमानी है। आज मतदान के राजनीतिक जनवादी अधिकार पर हो रहे फ़ासीवादी हमले के विरुद्ध भी क्रान्तिकारी शक्तियों को आम जनता को गोलबन्द और संगठित करना होगा, राजनीतिक जनवाद के अधिकार की हिफ़ाज़त के इस मुद्दे को भी अपने हाथों में लेना होगा और इसके लिए एक जनान्दोलन खड़ा करना होगा। जनता के मताधिकार की रक्षा के लिए खड़ा हुआ आन्दोलन देश में फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष की अहम कड़ी होगी।

‘आई लव मुहम्मद’ विवाद और उसका फ़ासीवादी साम्प्रदायिक इस्तेमाल

कानपुर में मुस्लिमों पर एकतरफ़ा कार्यवाई के बाद पुलिस ने सफ़ाई देते हुए कहा कि यह कार्यवाई ‘आई लव मुहम्मद’ पर नहीं बल्कि नई परम्परा शुरू करने और माहौल ख़राब करने के लिए की गयी है।  लेकिन सवाल यह है कि माहौल ख़राब करने में हिन्दू संगठन के लोग भी ज़िम्मेदार थे लेकिन उन पर कोई कार्यवाई क्यों नहीं हुई? अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार पोस्ट डालना कैसे गुनाह हो गया? बजरंग दल से लेकर कई कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों ने ‘आई लव महादेव’ से लेकर ‘आई लव योगी’ तक के पोस्टर, बैनर लगाये और सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली। लेकिन तब इस “नई परम्परा” पर कोई कार्यवाई नहीं हुई। सोशल मीडिया पर मुस्लिम-विरोधी साम्प्रदायिक पोस्ट की बाढ़ आ गयी लेकिन इस पर भी कोई कार्यवाई नहीं हुई। हाथरस में एक प्रदर्शन में तो ‘आई लव यूपी पुलिस’, ‘आई लव योगी’ और ‘आई लव महादेव’ के बैनर लेकर लोग नारे लगा रहे थे- ‘यूपी पुलिस तुम लट्ठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं’! क्या इससे माहौल ख़राब नहीं होता?

अडाणी की लूट उजागर करने पर स्वतन्त्र पत्रकारों को नोटिस – अब देश को बेधड़क लूट रहे धनकुबेरों का नाम लेना भी गुनाह!

आज जिस स्तर पर भाजपा खुले आम पूँजीपतियों के लिए काम कर रही है, यह किसी से शायद ही छिपा हो। ऐसे में थोड़ी-सी सच्चाई भी जनता को पता चलना सत्ता में बैठे फ़ासीवादियों को गवारा नहीं है। लोग पहले ही महँगाई, बेरोज़गारी, महँगी शिक्षा, महँगी स्वास्थ्य सेवाओं आदि जैसे मुद्दों से परेशान हैं। भाजपा और संघ की लाख कोशिशों के बावजूद हिन्दू–मुस्लिम, मन्दिर–मस्जिद, हिन्दुस्तान–पाकिस्तान जैसे नकली मुद्दे बड़ा रूप अख़्तियार नहीं कर पा रहे हैं। इसके उलट, बिहार में अडाणी को सस्ते दर पर ज़मीन देने, गडकरी के बेटे के एथेनॉल घोटाले से लेकर वोट चोरी का मामला छिपाये नहीं छिप रहा है। ऐसे में रही-सही मीडिया की आज़ादी इनके गले में हड्डी बन रही है।