Category Archives: बुर्जुआ जनवाद – दमन तंत्र, पुलिस, न्‍यायपालिका

योगी राज का असली खेल: अपराधियों को बेल, बेगुनाहों को जेल!

योगी आदित्यनाथ ने साल 2017 में राज्य विधानसभा में घोषणा की कि राज्य सरकार जल्द ही “विभिन्न दलों के राजनेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं” के ख़िलाफ़ दर्ज लगभग 20,000 आपराधिक मामले वापस ले लेगी। इसके लिए यूपी सरकार ने ‘उत्तर प्रदेश दण्ड विधि (अपराधों का शमन एवं मुक़दमों का समापन) (संशोधन) विधेयक, 2017’ पेश किया जोकि बिना किसी विरोध के पारित हो गया। लेकिन वास्तव में यह विभिन्न राजनेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बजाय मुख्यतः भाजपा से जुड़े नेताओं और साम्प्रदायिक हिन्दुत्ववादी गुण्डों को योगी आदित्यनाथ द्वारा दिया गया आश्वासन था कि “टेंशन नहीं लेने का- मैं हूँ न!”

“सीज़फ़ायर समझौते” के बावजूद फ़िलिस्तीनियों पर हमले जारी : फ़िलिस्तीनी ज़मीन पर बढ़ती अवैध इज़रायली सेटलरों की संख्या!

“सीज़फ़ायर” और “शान्ति समझौते” जैसी घोषणाएं एक बार फिर साम्राज्यवादी साज़िश साबित हुई है। ज़ायनवादी उपनिवेशवादी सेटलर्स और साम्राज्यवादी अमेरिका दुनियाभर में फ़िलिस्तीनी-मुक्ति के समर्थन में बढ़ते जनान्दोलन से भयाक्रांत थे और इससे निजात पाने के लिए ही उन्होंने “सीज़फ़ायर” की नौटंकी की। यह सच्चाई दिन-ब-दिन हमारे सामने खुलती जा रही है। इज़रायली नेताओं के बयान को ही देख लें तो यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि “सीज़फ़ायर” का अर्थ उनके लिए कहीं से भी शान्ति या नरसंहार को रोकना नहीं था बल्कि बिना किसी रुकावट के हमलों को जारी रखना था। इज़रायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री बेन-ग्विर का हालिया बयान न सिर्फ़ सेटलर्स की मंशा को नंगे तौर पर उजागर करता है बल्कि ज़ायनवादियों की क्रूरता और अमानवीयता का भी चरम उदाहरण है।

योगी सरकार की चालों को उत्तर प्रदेश के मज़दूर-मेहनतकश भूलेंगे नहीं!

एक बार फिर से उत्तर प्रदेश की जनता के सामने और भी स्पष्टता से यह तथ्य सामने आ गया है कि योगी सरकार, मोदी सरकार और भाजपा पार्टी जैसी मज़दूर-विरोधी, मेहनतकश-विरोधी, स्त्री-विरोधी और जन-विरोधी और कोई भी पार्टी नहीं है। ऐसे में, उत्तर प्रदेश के सभी चेतनासम्पन्न मज़दूरों-मेहनतकशों को यह प्रण लेना चाहिए कि उनके समूचे वर्ग के साथ किये जा रहे इस अन्याय को वे भूलेंगे नहीं : फ़रवरी 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान वे याद रखेंगे कि पिछले दस वर्षों में योगी सरकार ने प्रदेश के मज़दूरों, मेहनतकशों, सरकारी कर्मचारियों, आशाकर्मियों, आँगनवाड़ीकर्मियों, शिक्षा मित्रों आदि के साथ क्या सुलूक किया है। वे याद रखेंगे कि प्रदेश के दलितों, स्त्रियों और मुसलमान आबादी के साथ योगी सरकार ने क्या सुलूक किया है। सब याद रखा जायेगा।

नोएडा मज़दूर आन्दोलन – सर्वोच्च न्यायालय ने ज्ञानेश कुमार पुत्री को दी राहत, जुर्माने के आदेश पर लगायी रोक! सुनवाई की प्रक्रिया गम्भीर सवालों के घेरे में!

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाला भारत उन चन्देक देशों में से है जहाँ का संविधान ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ के क़ानून की इजाज़त देता है, जिसके तहत केवल सरकार या पुलिस प्रशासन के अधिकारियों के ‘मनोगत तौर पर सन्तुष्ट’ होने के आधार पर किसी को भी बिना किसी सबूत या ट्रायल के अधिकतम 12 माह तक जेल में रखा जा सकता है। 1980 में इस क़ानून के बनने के पहले 1977 तक ऐसा ही एक दूसरा क़ानून ‘मीसा’ 1971 से प्रभाव में था। उसके पहले 1950 में एक प्रिवेण्टिव डिटेंशन क़ानून आया था। 1977 से 1980 तक के तीन वर्ष ही आज़ाद भारतीय गणराज्य में ऐसा दौर हैं, जबकि ऐसा ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ का कोई क़ानून मौजूद नहीं था। इसके अलावा, आज़ाद भारत के पूरे इतिहास में आम इंसान की आज़ादी का मख़ौल बनाने वाला कोई न कोई ऐसा क़ानून मौजूद रहा है।

भाजपा की योगी सरकार द्वारा मालिकों और पूँजीपतियों की सेवा में मेहनतकशों-मज़दूरों पर थोपा गया अमानवीय शोषण, दमन, अन्याय और आतंक का राज

भाजपा सरकारें, केन्द्र में व हर राज्य में, मज़दूरों की सबसे बड़ी दुश्मन साबित हुई हैं। यह बात हरेक सचेत मज़दूर और मेहनतकश को पता है। न सिर्फ़ नोएडा में बल्कि बरौनी में, पानीपत में, सूरत में और हर जगह भाजपा सरकारों के राज में पूँजीपतियों के हितों को साधने के लिए मज़दूरों की हर आवाज़ का क्रूरता से दमन किया गया है। अगर आप मज़दूरों की औसत मज़दूरी की राज्यवार पड़ताल करें, तो पाएँगे कि दिल्ली को छोड़ दें (जहाँ क़ानूनी काग़ज़ी न्यूनतम मज़दूरी कुछ ज़्यादा होने के ऐतिहासिक व आर्थिक कारण हैं और जो लागू भी नहीं होती!), तो अधिकांश भाजपा-शासित राज्यों में मज़दूरों की औसत मज़दूरी सबसे निचली कतारों में आती है। सभी भाजपा-शासित राज्यों में ठेकाकरण की रफ़्तार सबसे तेज़ है। श्रम कानूनों के उल्लंघन के मामले में भी भाजपा-शासित राज्य ही सबसे आगे हैं।

स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फिर की खोखले दावों, अनगिनत झूठों और बेहिसाब जुमलों की बरसात

हालिया छात्र-युवा आन्दोलन की प्रमुख उपलब्धियों नें से एक यह रही कि इसने आम जनता के व्यापक हिस्सों को निष्क्रियता की स्थिति से जगाने का काम किया और मोदी-शाह शासन द्वारा संचालित “हिन्दू-मुसलमान” और “मन्दिर-मस्जिद” की साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति के नक़ली मुद्दों को नकारते हुए उनके बरक्स आम जनता के वास्तविक मुद्दों को एक हद तक विमर्श के केन्द्र में फिर से स्थापित करने का काम किया, इसलिए फ़ासीवादी ताक़तों की बौखलाहट स्वाभाविक ही है। और चूँकि फ़ासीवादियों के पास उठाये जा रहे सवालों के कोई जवाब नहीं हैं, इसलिए उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने के लिए नये-नये राजनीतिक शब्द गढ़ने की अपनी पुरानी तरकीब का सहारा लेना पड़ रहा है और झूठे दावे करने पड़ रहे हैं कि यह देशविरोधी तत्व देश में “हिंसा और अराजकता” फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। ग़ौरतलब है कि देश की “सीमाओं के भीतर” होने वाले युद्ध की बात भी नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में की। लेकिन सबसे पहले मोदी जी को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि यह युद्ध कौन छेड़ रहा है और किसके ख़िलाफ़ छेड़ रहा है? पिछले 12 सालों का लेखा-जोखा निकालकर देख लिया जाये तो यह मोदी-शाह हुकूमत है जिसने देश में आतंक और हिंसा का माहौल क़ायम किया है, जिसकी लम्पट गुण्डा वाहिनियों ने कभी “लव जिहाद” तो कभी “गौ रक्षा” के नाम पर मुसलमानों का जीवन दूभर कर दिया है, जिसकी ट्रोल आर्मी ने सोशल मीडिया पर लड़कियों को बलात्कार, एसिड अटैक, हत्या तक की धमीकियाँ देकर उन्हें आतंकित करने का काम किया है, जिसकी आततायी पुलिस ने हर शान्तिपूर्ण आन्दोलन में निहत्थे मज़दूरों-नौजवानों को बर्बर दमन का निशाना बनाया है। दरअसल यह ख़ुद मोदी सरकार है जिसने पिछले 12 सालों में एक युद्ध छेड़ रखा है देश की अवाम के ख़िलाफ़!

मज़दूर अधिकारों की क़ीमत पर ही सही, “उद्योग का भविष्य” चमकते रहना चाहिए!

पिछले कुछ समय में हमारे देश के न्यायालयों ने एक के बाद एक कई ऐसे फैसले दिये हैं जिससे कि वे ‘न्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी कम बल्कि ‘अन्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी करते अधिक नज़र आये हैं। कई मसले देश की सुर्खियों में आये जो सीधे तौर पर न्यायालयों के जन-विरोधी चरित्र को दिखा रहे थे मगर ऐसे कई मसले सुर्खियों से भी ग़ायब रहे जो इस देश की आम मेहनतकश आबादी की ज़िंदगियों का फ़ैसला करते थे! इसी तरह का एक मसला बीते 20 अगस्त को चीफ़ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता में नौ न्यायाधीशों की खण्डपीठ द्वारा सुना गया। मामला उद्योग, उद्योगपतियों और मज़दूरों से जुड़ा हुआ था।

नोएडा मज़दूर आन्दोलन के तहत फ़र्ज़ी मुकदमों में चार महीने से गिरफ़्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं व मज़दूरों की रिहाई के लिए देशव्यापी प्रदर्शन!

देश को नुकसान पहुँचाने का काम असल में आज वे लोग कर रहें हैं जो मेहनतकश आबादी की ज़िन्दगी को नर्क बना रहें हैं, उन्हें गुलामों की तरह जीने पर मजबूर कर रहें हैं, उनसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार का अधिकार छीन रहें हैं। इसलिए, आज ज़रूरी है कि अपने हक़ों के लिए लड़ते हुए हम इन फ़ासिस्ट हुक्मरानों के जन-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करें।

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी द्वारा एसआईआर और जनगणना को जोड़े जाने का फ़ासीवादी बयान और उसके निहितार्थ

एसआईआर के बाद बंगाल में जिन 27 लाख लोगों का नाम न्यायिक निर्णयन के बाद हटाया गया है, उनमें मुसलमान ज़्यादा हो सकते हैं, लेकिन हिंदुओं की तादाद भी अच्छी-ख़ासी है! असल में न तो हिंदुओं के दुश्मन मुसलमान हैं, न ही मुसलमानों के दुश्मन हिन्दू हैं! बल्कि इन दोनों ही धर्मों से आने वाली मेहनतकश आवाम के आज सबसे बड़े दुश्मन संघ परिवार और भाजपा के दंगाई और फ़सादी हैं। इसलिए आज जब जनगणना और एसआईआर के बारे में सुवेन्दु अधिकारी ऐसी बातें बोल रहे हैं, तो उसे हमें हल्के में नहीं लेते हुए उसकी पुरज़ोर मुख़ालिफ़त करनी चाहिए। दूसरे, हम मेहनतकश लोगों को आपस में न बँटते हुए नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 और एसआईआर जैसी फ़ासीवादी कवायदों को फ़ौरन रद्द किये जाने की माँग ज़ोर-शोर से उठानी चाहिए।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार और बुलडोज़र का आतंक!

बंगाल में नये नवेले पहुँचे “बुलडोज़र राज” ने छोटे दुकानदारों, रेहड़ी पटरी वालों, फेरीवालों की आजीविका पर गम्भीर असर डाला है। ध्वस्तीकरण अभियान चलाने से पहले, तोड़फोड़ की कार्रवाई करने से पहले कहीं भी उन्हें पर्याप्त पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। कई छोटे व्यापारियों का कहना था कि जमींदोज़ की गईं कई दुकानें दशकों से मौजूद थीं और उन्होंने प्रशासन से उसके पुनर्वास या वैकल्पिक वेंडिंग (दुकान लगाने) की व्यवस्था की माँग की थी। लेकिन बजाय उनकी माँग पर ग़ौर फ़रमाने के सरकार ने उन्हें बुलडोज़ कर दिया। ग़ौरतलब है कि,”बुलडोज़र राज” में तमाम वैधानिक, क़ानूनी प्रक्रियाओं को धता बताते हुए, बुलडोज़र चलाया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने नवम्बर 2024 में ध्वस्तीकरण, बुलडोज़र कार्रवाई के सम्‍बन्‍ध में दिशा-निर्देश जारी किये थे, जिसमें अनिवार्य 15 दिन की नोटिस अवधि भी शामिल है, इन तमाम कार्रवाइयों में उन दिशानिर्देशों की अवेहलना की जा रही है। विडम्बना है कि बंगाल चुनाव के दौरान झालमुड़ी खाने की नौटंकी करने वाले महामानव की सरकार बनने के बाद झालमुड़ी बेचने वालों को ही दर-बदर किया जा रहा है।