Category Archives: बुर्जुआ जनवाद – दमन तंत्र, पुलिस, न्‍यायपालिका

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार और बुलडोज़र का आतंक!

बंगाल में नये नवेले पहुँचे “बुलडोज़र राज” ने छोटे दुकानदारों, रेहड़ी पटरी वालों, फेरीवालों की आजीविका पर गम्भीर असर डाला है। ध्वस्तीकरण अभियान चलाने से पहले, तोड़फोड़ की कार्रवाई करने से पहले कहीं भी उन्हें पर्याप्त पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। कई छोटे व्यापारियों का कहना था कि जमींदोज़ की गईं कई दुकानें दशकों से मौजूद थीं और उन्होंने प्रशासन से उसके पुनर्वास या वैकल्पिक वेंडिंग (दुकान लगाने) की व्यवस्था की माँग की थी। लेकिन बजाय उनकी माँग पर ग़ौर फ़रमाने के सरकार ने उन्हें बुलडोज़ कर दिया। ग़ौरतलब है कि,”बुलडोज़र राज” में तमाम वैधानिक, क़ानूनी प्रक्रियाओं को धता बताते हुए, बुलडोज़र चलाया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने नवम्बर 2024 में ध्वस्तीकरण, बुलडोज़र कार्रवाई के सम्‍बन्‍ध में दिशा-निर्देश जारी किये थे, जिसमें अनिवार्य 15 दिन की नोटिस अवधि भी शामिल है, इन तमाम कार्रवाइयों में उन दिशानिर्देशों की अवेहलना की जा रही है। विडम्बना है कि बंगाल चुनाव के दौरान झालमुड़ी खाने की नौटंकी करने वाले महामानव की सरकार बनने के बाद झालमुड़ी बेचने वालों को ही दर-बदर किया जा रहा है।

‘नोएडा के मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए अभियान’ (CaRWAN) के बैनर तले दिल्ली में विरोध प्रदर्शन

प्रोफेसर नंदिता नारायण ने कहा, “मुझे आकृति, हिमांशु और योगेश जैसे छात्रों पर गर्व है। आज की पीढ़ी के छात्रों को ऐसा ही करना चाहिए। केवल अपने करियर के बारे में सोचने के बजाय उन्होंने अपनी शिक्षा का उपयोग उत्पीड़ित लोगों की आवाज़ बनने के लिए किया। सभा में उपस्थित छात्रों को सम्बोधित करते हुए प्रो. नंदिता ने विश्वविद्यालयों में जनवादी स्पेस के सिकुड़ने पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “यह वास्तव में परेशान करने वाली बात है कि योगेश को यूपी पुलिस के सिविल ड्रेस में आए पुलिसकर्मियों द्वारा नॉर्थ कैंपस के अन्दर से अगवा किया गया और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।” सामाजिक कार्यकर्ता नौरीन ने नोएडा मज़दूर आन्दोलन के बाद यूपी पुलिस द्वारा चलाए गए “विच हंट” पर विस्तार से बाते रखी। यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने निजी स्थानों, लाइब्रेरी और कई जगहों पर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से छापेमारी की और बिना किसी उचित प्रक्रिया के युवाओं को अगवा कर अवैध रूप से गिरफ़्तार किया। नौरीन ने यह भी बताया कि ट्रैकिंग और निगरानी अभी भी जारी है। यूपी पुलिस के अधिकारी अब भी दिल्ली में महिला छात्रों का पीछा कर रहे हैं, उन्हें धमका रहे हैं। उन्होंने कहा, “ पुलिस ने मुझे भी अगवा किया था, मेरी धार्मिक पहचान के कारण प्रताड़ित किया, मुझे बांग्लादेशी तक कहा।”

करोड़ों लोगों के वोट देने के बुनियादी राजनीतिक अधिकार छीनने वाली एसआईआर (SIR) की क़वायद पर सर्वोच्च न्यायालय की मुहर!

एसआईआर वास्तव में भाजपा द्वारा अपने गिरते हुए जनाधार की सूरत में भी लम्बे समय तक सत्ता में बने रहने के तमाम हथकण्डों में से एक है। अगर हम एसआईआर को भाजपा की अन्य आगामी हथकण्डों—परिसीमन, एक देश एक वोट और क्षेत्रीय पार्टियों को तोड़ना— के साथ देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि आने वाले दिनों में येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहने की उसकी रणनीति क्या है। पहले जनता सरकार को चुनती थी अब सरकार जनता को चुनेगी।

जनता के विरोध से घबराकर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बार फिर लगाया एस्मा!

उत्तर प्रदेश में लगे एस्मा का खास महत्व है। इसे हमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों में बढ़ते असंतोष को दबाने के क्रम में देखने की ज़रूरत है। इस समय उत्तर प्रदेश में गहराते आर्थिक संकट, बिजली संकट और इन संकटों की वजह से बढ़ते जनाक्रोश की परिस्थिति से निपटने के लिए एस्मा लगाया गया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनावों से पहले योगी सरकार अपने कुशासन और जनविरोधी शासन के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के प्रतिरोध को पनपने से पहले ही कुचल देने कि कोशिशें कर रही है। इसीलिए योगी सरकार कभी एस्मा लगाती है तो कभी मज़दूर कार्यकर्ताओं के ऊपर रासुका जैसा दमनकारी क़ानून लगा दिया जाता है ताकि लोग अपनी बुनियादी माँगों मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार, आवास, न्यूनतम वेतन आदि के लिए एकजुट और संगठित न हो सकें।

नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान गिरफ़्तार राजनीतिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, छात्रों-कलाकारों का दमन व ‘विच हण्ट’ जारी!

तो आज मेहनतकशों और मज़दूरों का यह सवाल पूछना क्या जायज़ नहीं है कि ऐसा तो नहीं कि जिस “राष्ट्र”, उसके “हितों” और उसकी “सुरक्षा” की बातें बार-बार तमाम सरकारें, मालिकान व प्रबन्धन, तमाम कम्पनियाँ, पुलिस व प्रशासन और मुख्यधारा का मीडिया अनन्त रूप से करते रहते हैं, उस “राष्ट्र” में केवल इस देश के धनिक वर्ग, मालिक वर्ग, उनकी नुमाइन्दगी करने वाले नेता व मन्त्री, ऊँचे नौकरशाह व अधिकारी शामिल हैं? ऐसा तो नहीं कि उस “राष्ट्र” में देश के ग़रीब, मज़दूर, छोटे किसान, मेहनतकश और निम्न-मध्यवर्ग के लोग और उनके हक़ों की हिमायत करने वाले सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता शामिल ही नहीं हैं? और क्या यह सवाल भी जायज़ नहीं है कि मज़दूर अधिकारों की बात करना ही क्यों जुर्म में तब्दील कर दिया गया है? क्यों हड़ताल, संघर्ष, प्रतिरोध और आन्दोलन करने को ही अपराध क़रार दे दिया गया है? ये सवाल हर इंसाफ़पसन्द नागरिक के सामने आज खड़े हैं। 

नोएडा और मानेसर के मज़दूर संघर्षों में कौन “बाहरी” और कौन “भीतरी”

जब भी कहीं मज़दूरों की कोई हड़ताल या आन्दोलन शुरू होता है, तो उसमें सक्रिय ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और मज़दूर संगठन के राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर पुलिस प्रशासन और सरकार “बाहरी तत्व” होने की तोहमत लगाते हैं। उनके अनुसार, जो स्वयं उस शहर या औद्योगिक क्षेत्र में कारखाने में काम नहीं करता, उसे मज़दूरों के मसले पर बोलने का या उनके आन्दोलन में शिरक़त करने का कोई अधिकार नहीं है। यह हुक्मरानों का पुराना “तर्क” है। बल्कि कहना चाहिए कि कुतर्क है। नोएडा के मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय मज़दूर कार्यकर्ताओं, श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं, छात्र कार्यकर्ताओं और उसका समर्थन करने वाले बुद्धिजीवियों मसलन सत्यम वर्मा, आदित्य आनन्द, रूपेश राय, हिमांशु ठाकुर, सृष्टि, आकृति आदि पर नोएडा पुलिस ने यही “बाहरी” होने का आरोप लगाया। उसी प्रकार मानेसर में गिरफ्तार कार्यकर्ता साथियों श्यामबीर और हरीश पर भी ये ही आरोप लगाये गये हैं। तो हमें इस आरोप का पूरा कुतर्क समझ लेना चाहिए।

नोएडा के मज़दूर आन्दोलन और गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों के बारे में उत्तर प्रदेश पुलिस की विचित्र ‘सत्य कथाएँ’ और वास्तविक सच्चाई

देश में शायद ही कोई ऐसा हो जो यह न जानता हो कि नोएडा के मज़दूर आन्दोलन के दौरान सैंकड़ों मज़दूरों और 7 सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और छात्र कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। इन पर शुरू में उत्तर प्रदेश पुलिस और गोदी मीडिया ने “पाकिस्तानी एजेण्ट” होने का आरोप लगा दिया! इस पर जनता के बड़े हिस्से की हँसी छूट गयी। इसके बाद इनको “नक्सली” बताने का प्रयास भी किया गया। इस पर भी जनता अपनी हँसी मुश्किल से ही रोक पायी, पर कुछ लोग फिर फक से हँस दिये! लेकिन ज्यादा बड़ा चुटकुला सुनने का मन हो तो आप उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अब तक गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं की ज़मानत का विरोध करने वाले लिखित आवेदन और रिमाण्ड दस्तावेज़ देख सकते हैं। हम आपको विस्तार से उत्तर प्रदेश पुलिस के ये चुटकुले सुनाते हैं। ये चुटकुले उत्तर प्रदेश पुलिस के आला अधिकारियों और उनके तहत काम करने वाले पुलिसकर्मियों की मानसिक स्थिति और क्षमताओं के बारे में भी काफ़ी-कुछ बताते हैं। आइये, अब तक उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अदालत में पेश कुछ दस्तावेज़ों की पड़ताल करें। पुलिस की भाषा पढ़कर हँसी आ सकती है क्योंकि एक दसवीं पास लड़का भी इससे बेहतर भाषा लिख सकता है।

उत्तर प्रदेश की भयाक्रान्त फ़ासीवादी योगी सरकार ने मई दिवस पर आतंक का माहौल बनाने के लिए नोएडा में लगायी धारा 163 की पाबन्दियाँ

जब नोएडा में मज़दूरों का संघर्ष शुरू हुआ तब योगी सरकार के “खुशहाल उत्तर प्रदेश”, “सुखी कार्मिक”, “विकास के पथ पर अग्रसर प्रदेश”, वगैरह के सारे दावे ध्वस्त हो गये। ऊपर से अभी कुछ समय पहले ही जिन पूँजीपतियों से योगी आदित्यनाथ ने वायदा किया था कि उत्तर प्रदेश में उन्हें मज़दूरों की हड़ताल व आन्दोलन से पूर्ण मुक्ति मिलेगी, वहाँ वे 10-12 हज़ार में मज़दूरों को बेतरह खटा सकते हैं, और मज़दूरों को ज़रा भी चूँ-चपड़ नहीं करने दी जायेगी, आदि, उन पूँजीपतियों ने भी योगी सरकार पर त्यौरियाँ चढ़ा लीं। यही तो वजह है कि योगी सरकार ने ख़ुद उत्तर प्रदेश पुलिस का निर्देशन किया कि वह नोएडा में मज़दूर आन्दोलन को किसी भी तरीक़े से कुचले, वहाँ एक आतंक का राज्य क़ायम करे ताकि मज़दूर हमेशा के लिए शान्त हो जाएँ। सारे हुक़्मरानों को हमेशा यही मुग़ालता होता है कि वह दमन के बूते जनता को हमेशा के लिए गु़लामी के लिए तैयार कर सकता है। योगी आदित्यनाथ कोई अलग नहीं हैं।

गोदी मीडिया ने नोएडा और मानेसर के मज़दूर आन्दोलन को ग़ैर-क़ानूनी बनाकर पेश करने के लिए कैसी घृणित चालें चलीं?

नोएडा व मानेसर के मज़दूर आन्दोलनों को आपराधिक व ग़ैर-क़ानूनी बनाने का गोदी मीडिया ने पुरज़ोर प्रयास किया। उसके कार्यकर्ताओं पर तरह-तरह के लांछन लगाकर उन्हें कलंकित करने की हर सम्भव कोशिश इस दलाल मीडिया ने की। लेकिन जनता के बीच इसका उल्टा असर हुआ। जनता के सामने यह पहले से भी ज्यादा साफ़ हो गया कि सत्यम, रूपेश, आदित्य, हिमांशु, सृष्टि, आकृति और मनीषा का गुनाह सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने जनता का पक्ष चुना, कि उन्होंने न्याय का पक्ष चुना और इसी की सज़ा योगी सरकार और उसकी पुलिस उन्हें दे रही है। यही वजह है कि 11 अप्रैल के बाद दो सप्ताह के भीतर ही गोदी मीडिया नोएडा मज़दूर आन्दोलन और उसके गिरफ्तार मज़दूर व सामाजिक कार्यकर्ताओं के मसले पर चुप्पी साध गया है। अगर देश में कोई निष्पक्ष न्यायपालिका है तो उसे समूचे मुख्यधारा मीडिया द्वारा किये जा रहे दुष्प्रचार, अफ़वाहसाज़ी, साम्प्रदायिक उन्माद के प्रचार, फ़ेक न्यूज़ फैलाने की घटिया हरक़तों पर स्वयं संज्ञान लेना चाहिए और ऐसे चैनलों व समाचार प्रतिष्ठानों के प्रबन्धन और दोषी पत्तलकारों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। मतलब, होना तो यही चाहिए। बाक़ी देश के मौजूदा हालात आप सभी को पता हैं।

नोएडा और मानेसर में गिरफ्तार मज़दूरों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों व छात्रों को रिहा करो! सभी अन्यायपूर्ण मुक़दमे वापस लो!

उत्तर प्रदेश सरकार का पुलिस प्रशासन पूँजीवादी व्यवस्था का वह डेढ़ सौ साल पुराना ‘टूलकिट’ ही लागू कर रहा है, जो इसके अमेरिकी पुरखों ने 1886 में मई दिवस के शहीदों एंजेल, स्पाइस, फिशर और पार्संस को फँसाने के लिए लागू किया था। डेढ़ सौ साल में ये लोग कुछ नया भी ईजाद नहीं कर पाये हैं! तब अमेरिकी पुलिस ने हेमार्केट में खुद के ही दलालों द्वारा बम फिंकवाकर बेगुनाह मज़दूर नेताओं को फँसाया था ताकि मज़दूरों के संघर्ष को तोड़ा जा सके। बाद में अमेरिकी पूँजीवादी अदालत तक को मानना पड़ा था कि मई दिवस के शहीद बेगुनाह थे। बाद में इसे मानने में पूँजीवाद को कोई ख़ास नुक़सान भी नहीं था। आज तक दुनिया भर में पूँजीवादी व्यवस्था की पुलिस मज़दूरों और मज़दूर नेताओं के ख़िलाफ़ इन्हीं तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल करती है। लेकिन मज़दूरों का संघर्ष न तो तब रुका था न अब रुका है और न ही तब तक रुकेगा जब तक इंसान द्वारा इंसान का शोषण जारी रहेगा। देश भर में इंसाफ़पसन्द लोगों और जनता ने पुलिस के इस ‘टूलकिट’ को समझ लिया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में नोएडा आन्दोलन के गिरफ्तार मज़दूरों, लेबर कार्यकर्ताओं, उनके समर्थन में उतरे बुद्धिजीवियों, छात्र कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए प्रदर्शन, प्रेस सम्मेलन, आदि हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस की संदेहास्पद भूमिका समूची जनता के सामने बेनक़ाब हो रही है। यह समूची पूँजीवादी व्यवस्था और मौजूदा फ़ासीवादी शासन को भी बेनक़ाब कर रहा है।