यूजीसी विनियम, 2026: सही क्रान्तिकारी अवस्थिति क्या होनी चाहिए?

अविनाश

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के द्वारा एक राजपत्र अधिसूचना के माध्यम से विगत 13 जनवरी को एक नयी नियमावली ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026’ जारी की गयी। इन नये नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में होने वाले जातिगत उत्पीड़न और सामाजिक भेदभाव को दूर करना बताया गया। इन नियमों के द्वारा जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, लिंग और विकलांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव के खात्मे की बात की गयी। इन नियमों के आने के साथ ही देश भर में बड़ी संख्या में लोग इनके समर्थन और विरोध में जुट गये। एक तरफ़ अस्मितावादी राजनीति के झण्डाबरदार इन नियमों का स्वागत करने और मोदी सरकार को धन्यवाद देने में जुट गये। वहीं दूसरी तरफ़, संघ परिवार के बगलबच्चा संगठनों और लग्गु-भग्गुओं ने इन नियमों के दुरुपयोग की सम्भावना जताते हुए और इसे सवर्णों पर हमला बताते हुए इसके ख़िलाफ़ जगह-जगह विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। कांग्रेस समेत तमाम अन्य पूँजीवादी पार्टियों के नेताओं ने अपने-अपने वोटबैंक को ध्यान में रखते हुए इन नियमों के समर्थन और विरोध की राजनीति शुरू  कर दी। स्थिति यह थी कि एक ही पार्टी का एक नेता इन निर्देशों का समर्थन तो दूसरा इनका विरोध कर रहा था!

इस घमासान के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इन नियमों पर रोक लगा दी। इन नियमों के दुरुपयोग होने की आशंका जताते हुए कोर्ट ने 2012 के पुराने नियम को ही प्रभावी करने का निर्देश दिया है। पहले मजबूरी में इन नये नियमों को यूजीसी द्वारा अधिसूचित कराना और फिर कोर्ट के हस्तक्षेप से इन नियमों पर रोक लगा देने की फ़ासीवादी चाल ने भाजपा के असली चेहरे को बेनकाब कर दिया। लेकिन भाजपा और संघ परिवार ने अपनी फ़ासीवादी राजनीति को परवान चढ़ाने के लिए इस मौक़े को भुनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कोर्ट द्वारा रोक लगवाने के बाद भी न केवल इनके तमाम पिछलग्गू संगठनों ने इसके ख़िलाफ़ माहौल बनाना, प्रदर्शन करना, बयानबाज़ी करना जारी रखा बल्कि जहाँ कहीं भी इस सवाल पर किसी भी तरह की परिचर्चा, बातचीत अथवा कार्यक्रम आयोजित किये गये, उनपर हमला करने और इसे मुद्दा बनाकर जातिगत ध्रुवीकरण करने की हर सम्भव कोशिश की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दिशा छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा इन नियमों के विभिन्न पहलुओं पर चल रही स्वस्थ परिचर्चा पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने हमला किया और नारेबाज़ी करने का फ़र्ज़ी आरोप लगाते हुए दिशा के कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट की। इसी तरह दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर चल रहे प्रदर्शन, दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों के प्रदर्शन पर भी एबीवीपी के कार्यकर्ताओं और फ़ासीवादी गुण्डों ने हमला किया।

ग़ौरतलब है कि मौजूदा फ़ासीवादी सत्ता के पिछले 11 सालों में शायद यह पहला मौक़ा है जब सुप्रीम कोर्ट ने किसी नियम पर रोक लगायी हो। यह वही कोर्ट है जिसने जनता के प्रतिरोध को नज़रअन्दाज़ करते हुए बीएनएस, बीएनएसएस, बीएसए, राजद्रोह के क़ानूनों में बदलाव, यूपीकोका, मकोका जैसे क़ानूनों को लागू होने दिया और फ़ासिस्टों के हाथों में जनता के प्रतिरोध को कुचलने की खुली शक्ति दे दी और इन काले क़ानूनों और और सीएए-एनआरसी और अनुच्छेद 370 हटाये जाने जैसे फ़ासीवादी क़दमों के ख़िलाफ़ जनता के प्रतिरोध को नज़रअन्दाज़ किया। उस वक़्त इस देश के सर्वोच्च न्यायालय को इन क़ानूनों के दुरुपयोग का भय नहीं सताया था! भाजपा सरकार अपने हित में चुनाव आयोग, ईडी और सीबीआई का खुला दुरुपयोग कर रही है लेकिन यह सब कोर्ट की आँखों से “ओझल” है। दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक जीएन साईं बाबा, प्रोफ़ेसर हैनी बाबू, फादर स्टेन स्वामी जैसे सैकड़ों शिक्षकों, छात्रों, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना कोई आरोप साबित हुए, क़ानूनों का दुरुपयोग करके सालों-साल जेल में क़ैद रखा गया। इनमें से अभी भी कितने जेलों में क़ैद हैं और कितनों की न्यायिक हत्याएँ की जा चुकी है। क़ानूनों के दुरुपयोग की वजह से ही बिल्किस बानों के बलात्कारी रिहा हो जाते हैं, रसूख़दार भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को बेल मिल जाती है, रामरहीम जैसा बलात्कारी बार-बार पैरोल पर बाहर आ जाता है। ऐसा नहीं है कि ये सभी मामले कोर्ट की निगाह में नहीं हैं। परन्तु इन मामलों में आज तक कोर्ट द्वारा न तो कोई हस्तक्षेप ही किया गया और न ही कोई कारगर क़दम ही उठाये गये हैं। लेकिन किसी सम्भावित दुरुपयोग की सम्भावना के आधार पर एक ऐसे ज़रूरी नियम पर रोक लगा दी गयी है जो सालों से परिसरों में बढ़ते जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय, भाषाई, लैंगिक, जेंडरगत और विकलांग उत्पीड़न को रोकने की दिशा में बेहद आवश्यक क़दम है।

देश भर के परिसरों में जाति, धर्म और लिंग के आधार पर उत्पीड़न या भेदभाव कोई अदृश्य कल्पना नहीं हैं बल्कि हमारे समाज की एक जीती-जागती सच्चाई है। यूजीसी द्वारा संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत आँकड़ों से पता चलता है कि देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में पिछले पाँच वर्षों में 118.4% की वृद्धि हुई है। यदि हम पूरे समाज की बात करें तो सरकारी संस्था एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार ही देश में 2013 से लेकर 2023 तक के 10 सालों में जातीय शोषण और उत्पीड़न के मामलों में तक़रीबन 46 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। जातिवादी उत्पीड़न के मामलों की संख्या जहाँ 2013 में 39,408 थी वहीं 2023 में इनकी संख्या 57,789 हो गयी। भारतीय समाज की जिस किसी को ज़रा सी भी समझ है और उन्होंने पड़ताल किया है तो वह इस बात को अच्छी तरह से समझ सकता है कि इन मामलों के झूठे होने की सम्भावना से अधिक यह सम्भावना ज़रूर है कि बहुत से मामले दर्ज़ ही नहीं हो पाये होंगे क्योंकि आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक ताक़त तथाकथित उच्च जातियों के सम्पन्न हिस्सों के पास ही तो केन्द्रित है।

दरअसल रोहित वेमुला, पायल तडवी और दर्शन सोलंकी की सांस्थानिक हत्या के बाद उपजे सवालों और सालों से परिसरों में चले आ रहे भेदभाव के ख़िलाफ़ सड़कों पर उभरे प्रतिरोध के बाद यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में भेदभाव को रोकने के लिए यूनिवर्सिटी ग्राण्ट्स कमीशन को नयी गाइडलाइंस बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा था। इन गाइडलाइंस की सिफ़ारिश भी इन सांस्थानिक हत्याओं के बाद दायर की गयी एक याचिका के आधार पर कोर्ट द्वारा गठित एक संसदीय समिति द्वारा की गयी थी। इन नयी गाइडलाइंस में ऐसा कुछ भी “क्रान्तिकारी” नहीं था जिसका पलक-पाँवड़े बिछाकर स्वागत किया जाये। जिस देश में जाति, लिंग और धर्म के आधार पर भेदभाव और उत्पीड़न एक सामान्य बात हो, वहाँ ऐसी गाइडलाइंस को लाने में इतना लम्बा समय लगना अपने-आप में सवाल खड़ा करता है। कुछ लोग इन नयी गाइडलाइंस को लेकर इतने उत्साहित हो गये हैं कि इसे ही भारत में जाति व्यवस्था की ताबूत में आख़िरी कील के रूप में प्रचारित कर रहे हैं! वास्तव में ये बेहद ज़रूरी गाइडलाइंस हैं जिन्हें बहुत पहले ही लागू कर दिया जाना चाहिए था। इतने लम्बे समय बाद आयी इन नयी गाइडलाइंस में भी ऐसे कितने ही लूपहोल्स छोड़ दिये गये हैं जो न्याय और जनवाद को किनारे लगाकर उत्पीड़न करने वाले को सुरक्षित बच निकलने का रास्ता प्रदान करेगा।

नयी गाइडलाइंस के मुताबिक़ प्रत्येक विश्वविद्यालय और कॉलेज में एक समता समिति स्थापित की जायेगी जिसमें 10 सदस्य होंगे। इनमें दो छात्र, दो शहर के मानिन्द लोग, तीन प्रोफ़ेसर, एक ग़ैर-शैक्षणिक कर्मचारी, संस्थान के प्रमुख पदेन और केन्द्र के समन्वयक सदस्य होंगे। ये सभी सदस्य मनोनीत होंगे। ऐसे में इस बात की प्रचुर सम्भावना है कि जिसके पास राजनीतिक पहुँच और रसूख होगा वह इस समिति का सदस्य बनेगा और न्याय को प्रभावित भी कर पायेगा। सदस्यों के चुनाव के सम्बन्ध में आम छात्रों, कर्मचारियों और विश्वविद्यालय के अन्य सदस्यों की कोई भूमिका नहीं रहेगी। जनवादी प्रक्रिया यही हो सकती है कि सदस्यों का चुनाव हो, ना कि सदस्य मनोनीत हों। इस समता समिति के पास आरोपी को दण्डित करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि किसी मामले में दण्ड विधि के तहत कोई मामला बनता है तो समता समिति पुलिस को सूचित भर कर सकती है। समिति के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सम्बन्धित व्यक्ति द्वारा लोकपाल के समक्ष अपील की जा सकती है। लोकपाल किसी भी अपील की सुनवाई को सुविधाजनक बनाने के लिए एक एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) नियुक्त कर सकता है। यह न्याय मित्र न्याय के बदले शुल्क लेगा जिसका भुगतान संस्थान को करना होगा। पहली बात तो यह  कि विश्वविद्यालय में पैसों का पेड़ नहीं लगा होता है! ऐसे में बहुत साफ़ है कि न्याय मित्र को न्याय करने के बदले जो शुल्क दिया जायेगा उसका भुगतान येन-केन-प्रकारेण छात्रों से वसूला जायेगा जिसकी सीधी मार ग़रीब-मेहनतकश परिवारों से आने वाले छात्रों युवाओं पर पड़ेगी। न्याय के बदले शुल्क की यह नीति मज़दूर-मेहनतकश परिवारों से आने वाले छात्रों को परिसरों से दूर धकेल देगी। दूसरी बात अपील के बाद लोकपाल मामले को 30 दिनों के भीतर निपटाने की “कोशिश” करेगा। यानी लुब्बेलुबाब यह है कि इस पूरे तामझाम में इस बात की पूरी सम्भावना है कि यह पूरी प्रक्रिया ही नौकरशाही का एक नया ढाँचा बनकर रह जाये और भेदभाव का शिकार व्यक्ति खुद न्याय पाने की आशा ही त्याग दे।

नये नियमों को निर्दोषों को फँसा देने वाला बताया जाना तो निहायत ही हास्यास्पद है। उल्टे, इन नियमों में इतनी खामियाँ हैं कि इनके लागू हो जाने पर उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवादी उत्पीड़न के खात्मे की उम्मीद करना आकाश कुसुम की अभिलाषा के समान है। इसके अलावा यूजीसी के द्वारा अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) को उत्पीड़ित की श्रेणी में डाला गया है जबकि आज के दौर में असल में गाँवों से लेकर शहरों तक में दलितों के ख़िलाफ़ जातिगत उत्पीड़न के बहुत से मामलों को अंजाम देने का काम तो इसी से सम्बन्धित जातियों के लोगों के द्वारा किया जाता है! इस प्रकार से यूजीसी के नये नियमों में सकारात्मक तौर पर संशोधन की काफ़ी दरकार थी लेकिन इसके बावजूद इनके द्वारा कैम्पसों में जातिवादी शोषण-उत्पीड़न होने के तथ्य को स्वीकारा जाना और इनके ख़िलाफ़ आधे-अधूरे ढंग से ही सही-समाधान तलाशना भी एक सकारात्मक क़दम था।

इस नये गाइडलाइंस के आने के बाद से ही एक तरफ जातिवादी-ब्राहमणवादी सोच की ज़मीन पर खड़े होकर सवर्ण जातियों का एक हिस्सा सड़कों पर उतर कर इसका विरोध कर रहा है। वहीं दूसरी ओर एक आबादी ऐसी भी है जो एकदम अनआलोचनात्मक तरीके से इन गाइडलाइंस का समर्थन कर रही है। इस तरह यह दोनों धड़े छात्रों की व्यापक एकजुटता के लिए ख़तरनाक हैं और भाजपा के ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति के ही पिच पर खेलते नज़र आ रहे हैं। इस पूरे मसले का सबसे ज़्यादा लाभ फ़ासीवादी भाजपा को होने वाला है क्योंकि एक तरफ़ अधूरे और भेदभाव रोकने के लिए नाकाफ़ी तथा ग़ैर-जनवादी नये गाइडलाइंस लाकर मोदी सरकार पिछड़ों और एससी/एसटी वर्ग के हितैषी के रूप में अपने को पेश कर रही है; वहीं दूसरी तरफ सवर्ण जातियों का जो हिस्सा विरोध में उतर भी रहा है वह मुख्यतः और मूलतः फ़ासीवादी-जातिवादी विचारों का ही वाहक है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नये गाइडलाइंस पर स्टे लगा देने के बाद भाजपा आसानी से इस आबादी को अपनी साम्प्रदायिक राजनीति के आधार पर साध लेगी। एक ऐसे महत्वपूर्ण दौर में जब पूरी दुनिया एक उथल-पुथल के मुहाने पर खड़ी है, विदेश नीति में मुँह की खाने के बाद मोदी सरकार की “लोकप्रियता” तेज़ी से गिर रही है, इन्दौर में गन्दा पानी पीने से दर्जनों लोगों की मौत के बाद मोदी और भाजपा सरकार लगातार सवालों के घेरे में है, जब पूरे देश में बेरोज़गारी और महँगी शिक्षा छात्रों-युवाओं के सामने सुरसा के जैसे मुँह खोले खड़ी है, तब ऐसे दौर में यह ध्रुवीकरण भाजपा के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करेगा।

इस रूप में यूजीसी की ये नयी गाइडलाइंस एक ज़रूरी क़दम हैं लेकिन यह भी सच्चाई है कि इसके अमल के लिए जनवादी प्रक्रिया को नहीं अपनाया गया है। दूसरा यह भी समझने की ज़रूरत है कि यह जाति उन्मूलन का कोई दस्तावेज़ नहीं बनने जा रहा है, जैसा कि कुछ लोग प्रचारित कर रहे हैं। किसी भी जाति समूह से ताल्लुक रखने वाली स्त्रियों और विकलांगों के साथ-साथ आर्थिक रूप से पिछड़े हुए सवर्णों और अल्पसंख्यकों को भी ये नये नियम सुरक्षा दे रहे हैं, इसलिए इस पूरे मामले को सवर्ण बनाम एससी-एसटी-ओबीसी बनाना ही फ़ासीवादी बाइनरी में उलझना है।

दरअसल हमारे समाज में ये तमाम भेदभाव पूँजी की सत्ता द्वारा पोषित हैं और जबतक पूँजी की सत्ता कायम रहेगी ऐसे भेदभाव की ज़मीन उत्पादित और पुनरुत्पादित होती रहेगी। अन्त में हम यह भी कहना चाहेंगे कि तथाकथित बहुजन एकता के नारे और पहचान की राजनीति के तहत जातिवाद के ख़िलाफ़ नहीं लड़ा जा सकता है बल्कि जातिवाद का मुक़ाबला मेहनतकश जनता की वर्गीय एकजुटता और पूँजीवाद-विरोधी क्रान्तिकारी आन्दोलन के द्वारा ही किया जा सकता है।

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2026

 

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