बंगाल में चुनाव आयोग की मिलीभगत से एसआईआर के ज़रिये चुनाव को ‘हाईजैक’ करने में जुटी फ़ासिस्ट भाजपा!
अदिति
पिछले कुछ समय से मोदी सरकार और चुनाव आयोग के गठजोड़ द्वारा 12 राज्यों में एसआईआर (स्पेशल इन्टेन्सिव रिवीज़न) की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। पूरे देश में भारी अलोकप्रियता के चलते अपनी डूबती हुई नैया पार लगाने के लिए भाजपा ने एक नया सहारा एसआईआर की शक़्ल में ढूँढ़ लिया है। इसका सीधा निशाना मुसलमान और ग़रीब मेहनतकश आबादी है। बंगाल में भी आगामी विधानसभा चुनावों से ऐन पहले बड़े पैमाने पर एसआईआर की प्रक्रिया चलायी जा रही है जिससे भाजपा को चुनाव में फ़ायदा पहुँचाया जा सके। अभी तक 62 लाख लोगों के नाम काटने की ख़बर सामने आयी है, जिसमें में से 24 लाख मृत लोग दिखाये गये हैं, 18 लाख लोगों के नाम शिफ़्ट (स्थानान्तरण) होने के तौर पर दिखाये गये हैं और 12 लाख लोगों को अनुपस्थित क़रार दिया गया है।
इससे पहले बिहार में एसआईआर के बाद जारी ड्राफ्ट सूची में आनन-फ़ानन में 65 लाख से अधिक वोटरों के नाम काट दिये गये थे। उत्तर प्रदेश में एसआईआर के लिए 4 नवम्बर से 4 दिसम्बर तक का समय तय किया गया था, लेकिन चुनाव आयोग को अपनी लचर व्यवस्था के चलते विरोध का सामना करना पड़ा। नतीजन केचुआ द्वारा वहाँ एसआईआर की समय अवधि फ़रवरी तक बढ़ा दी गयी। इसके अलावा पूरे देश से ही एसआईआर की प्रक्रिया में लगे बीएलओकर्मियों की आत्महत्या की घटनाएँ भी इस दौरान सामने आयीं हैं। कई जगह इन कर्मियों द्वारा काम के दबाव का कारण बताते हुए वीडियो व पत्र भी सामने आये। कई बीएलओ ने यह भी कहा कि उन पर भाजपा को फ़ायदा पहुँचाने के लिए लोगों के नाम हटाने का दबाव डाला जा रहा है। यह दिखलाता है कि भाजपा हर हाल में अपनी चुनावी जीत सुनिश्चित करना चाहती है, भले ही इस प्रक्रिया में आम लोगों की बलि ही क्यों न देनी पड़े!
चुनाव जीतने के लिए भाजपा का नया हथकण्डा
बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू होते ही भाजपा के सासंद शांतनु ठाकुर और भाजपा विधायक सुब्रतो ठाकुर द्वारा “हिन्दू” होने के कार्ड बाँटे गये, जिसमें सांसद साहब के हस्ताक्षर भी अंकित है! हिन्दू संगठनों द्वारा बाकायदा 700 कैम्प लगाने के दावे किये जा रहे हैं, जिसमें मतुआ समुदाय (नामशूद्र अनूसूचित जाति) के लोगों से 50 से 100 रुपये लेकर “हिन्दू” कार्ड बाँटे गये हैं। यही नहीं, 800 रुपये लेकर नागरिकता देने की गारण्टी भी भाजपा दे रही है! मतलब देशी-विदेशी पूँजीपतियों को देश बेचने के बाद अब ग़रीबों को नागरिकता बेचने का धन्धा भी भाजपा ने शुरू कर दिया है! भाजपा सांसद शांतनु ठाकुर का कहना है कि वह “हिन्दू” कार्ड धारकों के नाम वोटर सूची में डालने की सिफ़ारिश चुनाव आयोग से करेंगे! “हिन्दू” कार्ड बाँटने का मसला बंगाल के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन चुका है। मतुआ समुदाय की संख्या बंगाल में 30 लाख से लेकर 50 लाख के बीच बतायी जाती है, इसलिए चाहे ममता बनर्जी की तृणमूल काँग्रेस हो या फिर भाजपा हो, सभी पार्टियाँ तमाम हथकण्डों के ज़रिये इस समुदाय के वोट की फसल को काटने में लगी हुई हैं।
बंगाल के साथ-साथ अन्य 12 राज्यों में घोषित या अघोषित तौर पर एसआईआर की प्रक्रिया जारी है। इन तमाम राज्यों में ख़ासकर ग़रीबों, मुसलमानों, दलितों, स्त्रियों और प्रवासी मज़दूरों को निशाना बनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल और अन्य राज्यों में एसआईआर का कोई एक स्वरूप नहीं है। हर राज्य में भाजपा व मोदी सरकार अलग-अलग तरीक़ों से चुनाव आयोग के साथ मिलकर इसे अंजाम दे रही है। सवाल यह भी उठता है कि बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ से ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर अलग-अलग राज्यों में काम करने के लिए जाते हैं और प्राकृतिक आपदाओं समेत अन्य कारकों की वजह से उनके प्रमाण पत्र या पहचान कार्ड उनके पास नहीं है, क्या उन सबको डिटेंशन कैंप में भेज दिया जायेगा? फ़ासीवादी भाजपा की मानें तो अब “अमृतकाल” में इस देश में ऐसा ही होगा!
आज यह बात दिन के उजाले की तरह साफ हो गयी है कि अपनी जनविरोधी और पूँजीपरस्त नीतियों के चलते भाजपा की अलोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है जिसके कारण भाजपा सरकार में बने रहने के लिए वोट चोरी, एसआईआर, ईवीएम घोटाले जैसे हथकण्डे अपना रही है। यह हम 2024 के लोकसभा चुनावों के समय भी देख चुके हैं। बिना किसी घोटाले के भाजपा सरकार 240 सीटों के आँकड़े तक नहीं पहुँच सकती थी। मोदी सरकार अपने 11 साल के कार्यकाल में तमाम बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाती रही है। इसलिए एसआईआर के ज़रिये नागरिकता साबित करने की आम मेहनतकश-विरोधी प्रक्रिया पर पर्दा डालने और उसे वैध ठहराने के लिए फ़ासिस्ट न केवल “अवैध घुसपैठ को रोकने” का शोर मचा रहे हैं, बल्कि अवैध घुसपैठ को साम्प्रदायिक रंग देकर बड़ी आबादी का ध्यान भटकाने की साज़िश कर रहे हैं।
भाजपा नेताओं के साम्प्रदायिक बयानों को नमक-मिर्च लगाकर गोदी मीडिया और सोशल मीडिया पर इनके भक्तों द्वारा खूब प्रचारित किया जा रहा है। इनके द्वारा यह बात लोगों के दिमागों में बिठाने का काम किया जा रहा है कि एसआईआर की प्रक्रिया “बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियो” को चिह्नित करने के लिए चलायी जा रही है। बिहार चुनाव में अमित शाह और नरेन्द्र मोदी दोनों ने खुलकर कहा कि यह “घुसपैठियों” को भगाने का चुनाव है और एसआईआर के ज़रिये “घुसपैठियों” की पहचान की जायेगी। इन “घुसपैठियों” से मोदी-शाह का मतलब हमेशा बांग्लादेशी मुसलमान था। यानी “घुसपैठिये” के नक़ली शोर के पीछे भी भाजपाई फ़ासीवादियों का असली मक़सद था समाज में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना ताकि जनता को असल मसलों से भटकाया जा सके। भाजपा की झूठ-प्रचार मशीनरी ने फैलाया था कि बिहार के सीमांचल के चार ज़िले “घुसपैठियों” से भरे हुए हैं! लेकिन इन चार ज़िलों में नागरिकता के सम्बन्ध में मिलने वाली आपत्तियों की कुल संख्या थी मात्र 106, इनमें से भी केवल 40 के नाम ख़ारिज हुए, हालाँकि उसमें भी पर्याप्त धाँधली की गयी। इन 40 ख़ारिज मतदाताओं में हिन्दू कितने थे और मुसलमान कितने? हिन्दू थे 25 और मुसलमान थे 15! यानी, “घुसपैठिये” तो मिले नहीं, लेकिन वैध नागरिकों के ही नाम काट दिये गये और मुसलमान आबादी के बढ़ने का हौव्वा फैलाकर हिन्दू आम मेहनतकश आबादी को ही चपेट में ले लिया गया! यही असम के एनआरसी में भी हुआ था जिसमें 19 लाख रद्द नागरिकताओं में 14 लाख हिन्दू निकले थे।
असम, बिहार, बंगाल आदि के अनुभवों के बाद देश की मेहनतकश हिन्दू आबादी को कम-से-कम अब समझ लेना चाहिए कि एनआरसी, सीएए और अब एसआईआर वास्तव में समूची जनता के ख़िलाफ़ है और जहाँ कहीं मोदी सरकार इसे फिर से करने का प्रयास करे, वहाँ हमें सड़कों पर उतरकर इसका विरोध करना चाहिए। “घुसपैठियों” का नक़ली डर दिखाकर वास्तव में सभी धर्मों व जातियों की आम मेहनतकश जनता को निशाना बनाया जा रहा है। निश्चित तौर पर, इसके ज़रिये सबसे ज़्यादा मुस्लिम आम जनता के विरुद्ध ज़हरीला माहौल बनाया जा रहा है ताकि बेरोज़गारी और महँगाई से त्रस्त जनता का गुस्सा एक नक़ली दुश्मन पर फूट जाये और मोदी सरकार को जनता कठघरे से बाहर कर दे। हिन्दू का दुश्मन मुसलमान या मुसलमान का दुश्मन हिन्दू नहीं है, बल्कि समस्त आम मेहनतकश हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, दलितों, स्त्रियों, आदिवासियों की दुश्मन मोदी सरकार और यह पूँजीवादी व्यवस्था है।
एसआईआर के ज़रिये ‘केचुआ’ (केन्द्रीय चुनाव आयोग) और फ़ासीवादी ताक़तों की साज़िश को तभी ध्वस्त किया जा सकता है, जब अवाम ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से चुनाव करवाने के लिए सड़कों पर ज़बरदस्त आन्दोलन के लिए उतरे। क़ायदे से तो विपक्ष, जो कि लम्बे समय से चुनावों में वोट चोरी का मुद्दा उठा रहा है, उसे चुनावों का बहिष्कार करते हुए सड़कों पर उतर जाना चाहिए। क्योंकि जब वह आँकड़ों और तथ्यों के ज़रिये यह बात साबित कर चुका है तो फिर चुनाव के बाद जनादेश को स्वीकार कर लेना उनके वोट चोरी के मुद्दे को जनता के बीच सन्दिग्ध बना देता है। लेकिन आम तौर पर पूँजीवादी जनवाद के क्षरण के वर्तमान दौर में विपक्षी पूँजीवादी ग़ैर-फ़ासिस्ट पार्टियों द्वारा ‘निष्पक्ष और पारदर्शी’ मतदान के जनवादी अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना सम्भव नहीं दिखता। ‘निष्पक्ष और पारदर्शी’ मतदान के जनवादी अधिकार के लिए क्रान्तिकारी ताक़तों और इन्साफ़पसन्द प्रगतिशील शक्तियों को आम जनता को लामबन्द करने की तैयारी में लगना होगा। इसे विमर्श और प्रतीकात्मक प्रदर्शन की जगह एक देशव्यापी जुझारू जनान्दोलन में तब्दील करना होगा। दूसरे, तमाम क्रान्तिकारी और प्रगतिशील ताक़तों को एसआईआर के ज़रिये नागरिकता से हाथ धोने वाले लोगों की हर तरह की मदद के लिए आगे आना होगा। “अवैध घुसपैठ” और “मुसलमान” के सरकारी साम्प्रदायिक फ़ासिस्ट शोर की सच्चाई को आम जनता में उजागर करना होगा। इस फ़ासीवादी सरकार और भाजपा का घोर पूँजीपरस्त अमानवीय चेहरा जनता में नंगा करना होगा।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













