कोलकाता में वाउ मोमो और पुष्पांजलि डेकोरेटर्स के गोदामों में आग से झुलसकर हुई मज़दूरों की मौत
यह हादसा नहीं, मुनाफ़े के तन्त्र के हाथों एक सामूहिक हत्याकाण्ड है!
इस पूँजीवादी तन्त्र को उखाड़ फेंकना ही एकमात्र विकल्प!

शिशिर

इस साल जब देशभर के सभी सरकारी महकमे इस ‘गणतन्त्र’ के जश्न में गणतन्त्र दिवस मनाने की तैयारियाँ पूरी करके 25-26 जनवरी की रात को गहरी नींद सो रहे थे, उसी वक़्त तड़के 3 बजे कोलकाता के आनन्दपुर इलाके में वाउ मोमो और पुष्पांजलि डेकोरेटर्स के गोदामों में 52 मज़दूर आग में झुलस जलकर राख हो रहे थे। इस वारदात में अभी तक कुल 27 मज़दूरों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है। 25 अन्य मज़दूर अभी भी लापता हैं, यानी उनके झुलसे हुए शरीर के टुकड़ों को खोजने में पुलिस और अग्निशमन विभाग नाकाम रहे हैं। इस पर मुख्यधारा की मीडिया का रुख़ देखिये! धर्म के नाम पर लोगों के बीच फ़साद कराने वाली गोदी मीडिया की तो बात ही छोड़िए, ‘द हिन्दू’ जैसे उदार समाचार पोर्टलों ने भी शुरुआती कुछ दिनों की गहमागहमी के बाद इस ख़बर को जगह देना बन्द कर दिया है।

वाउ मोमो ने दावा किया है कि उनके गोदाम में आग से सुरक्षा के सारे नियमों का पालन किया जा रहा था, मगर हक़ीक़त यह है कि उनका गोदाम पैकेजिंग मटीरियल जैसी आसानी से आग पकड़ने वाली चीज़ों से भरा हुआ था। इसी तरह पुष्पांजलि डेकोरेटर्स के गोदाम में भी इंटीरियर डिज़ाइन से जुड़े ढेरों ज्वलनशील सामान, जैसे कि लकड़ी के पैलेट, प्री-फ़ैब्रिकेटेट दीवार, थर्माकोल, मेटल शीट्स इत्यादि रखे हुए थे। इसके अलावा, स्थानीय लोगों के मुताबिक़ ये ढाँचे आर्द्रभूमि (वेटलैण्ड) को भरकर बनाये गये हैं। आर्द्रभूमियों पर बने ढाँचे संरचनागत रूप से कमज़ोर हो सकते हैं और आग लगने की हालत में सापेक्षतः जल्दी ढह सकते हैं और साथ ही, भराई के दौरान उनमें बेहद ज्वलनशील मीथेन गैस फँसी हो सकती है जो आग लगने की सूरत में बाहर आने पर आग को और फैला सकती है। कहने को तो क़ानून के हिसाब से कोलकाता में आर्द्रभूमियों पर निर्माण कार्य वर्जित है, लेकिन ये खुला रहस्य है कि बिल्डरों और गोदाम मालिकों जैसे धनपशुओं, नौकरशाही और पूँजीवादी राजनीतिक दलों की मिलीभगत से ऐसे नियमों की आये दिन धज्जियाँ कैसे उड़ती रहती हैं।

ऐसा हादसा पहली बार नहीं हुआ है और अफ़सोस कि पूँजीवाद के रहते यह आख़िरी भी नहीं है। पूरे देश के किसी भी शहर को लिया जाये, ऐसे “हादसे” होते ही रहते हैं। अकेले दिल्ली में ही वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए अग्निशमन विभाग द्वारा प्रस्तुत किये गये विश्लेषण के हिसाब से दुकानों, गोदामों और शोरूमों जैसी कारोबारी जगहों पर आग लगने की 693 घटनाएँ हुईं और औद्योगिक जगहों पर इसी अवधि में आगजनी के 450 हादसे हुए। यानी, इस अवधि में काम करने की जगहों पर दिल्ली में हर दिन औसतन 3 आगजनी की घटनाएँ हुईं। कोलकाता में ही इससे पहले स्टीफ़न कोर्ट और एएमआरआई अस्पताल में आग लगने से क्रमशः 89 और 43 लोग मारे जा चुके हैं। क्या उन घटनाओं से प्रशासन को सीख लेकर सभी गोदामों और कारखानों इत्यादि की नियमित जाँच का इंतज़ाम नहीं करना चाहिए था? मगर पूँजीपतियों की सेवा में जी जान से जुटी सरकारें और उनकी नौकरशाही से ऐसी उम्मीद करना बेमानी होगी। सभी जानते हैं कि हमारे देश में मज़दूरों के लिए जैसे-तैसे, यहाँ तक कि ज्वलनशील सामान के बीच सोने का इंतज़ाम किया जाना आम बात है, क्योंकि पूँजीवाद में वे सिर्फ़ मशीनों के ही कलपुर्जे की तरह होते हैं और उनकी अहमियत सिर्फ़ उनकी श्रम शक्ति को निचोड़कर मुनाफ़ा बनाये जाने तक सीमित होती है। यही वजह है कि इस “हादसे” के बाद पूरे मामले से पल्ला झाड़ने के लिए पूरा पूँजीवादी तन्त्र हरक़त में आ चुका है और कामगारों के परिवारों समेत आम लोगों के गुस्से को फ़ौरी तौर पर शान्त करने के लिए राज्य एवं केन्द्र सरकारों ने मृतकों के परिवारजनों के लिए राहत पैकेज की घोषणा की है और दोनों गोदामों के मालिक, गंगाधर दास को और वाउ मोमो के दो अधिकारियों को गिरफ़्तार किया गया है और एक विशेष जाँच समिति बैठायी गयी है। मगर सवाल उठता है कि पुलिस तीन हफ़्ते से ज़्यादा का समय बीत जाने पर भी सिर्फ़ तीन लोगों को ही गिरफ़्तार क्यों कर पायी है? क्या यह स्पष्ट नहीं है कि वाउ मोमो के मालिक को और उस इलाके की देखरेख का ज़िम्मा सँभालने वाले श्रम विभाग के अधिकारियों को भी फ़ौरन गिरफ़्तार करके उनपर सख़्त से सख़्त धाराएँ लगानी चाहिए थी?

मज़दूर वर्ग अपने तजुर्बे से जानता है कि अभी तक की जो भी सीमित कार्रवाई हुई है, वो सबकुछ बस दिखाने के लिए है। पश्चिम बंगाल में मुख्य विरोधी दल, भाजपा भी मौका भुनाने के लिए विरोध कर रही है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की ये कुत्ताघसीटी सिर्फ़ पूँजीवादी चुनाव प्रणाली में अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए है। मज़दूरों का खून पसीना नोचने के सवाल पर इन सारे के सारे दलों में आम सहमति है। अभी-अभी 16 फ़रवरी को भाजपा-शासित राजस्थान के भिवाड़ी में पटाखे बनाने वाले कारख़ाने में हुए विस्फोट के बाद लगी आग में कम से कम 8 मज़दूर झुलसकर मौत का शिकार हो गए। इसलिए मज़दूर वर्ग ममता बनर्जी और सुवेंदु आधिकारी के घड़ियाली आँसुओं में नहीं फँसने वाला। जहाँ तक मज़दूरों के प्रति रवैये और पूँजीपति वर्ग के हितों की हिफ़ाज़त का सवाल है तो तमाम पूँजीवादी दल एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। भारत में ऐसे “हादसे” इतनी बड़ी तादाद में आये दिन होते रहते हैं कि इन्हें एक हादसा कहा जाना सरासर ग़लत  है, बल्कि इन्हें साफ़ तौर पर सामूहिक हत्याकाण्ड ही कहा जाना चाहिए।

ऐसी वारदातों से बचने व निपटने के लिए पहले जो थोड़े-बहुत क़ानून थे उनका भी क्रियान्वयन विरले ही होता था। लेकिन केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा द्वारा पारित की गयी और 1 अप्रैल से लागू होने जा रही चार श्रम संहिताओं में से ‘व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थितियाँ संहिता, 2020’ में तो आगजनी से निपटने से जुड़े सारे प्रावधान सरकार द्वारा जारी अधिसूचनाओं पर छोड़ दिये गये हैं, यानी मज़दूर वर्ग के पास वैधानिक अधिकार नहीं होंगे, बल्कि वह पूँजीपति वर्ग की मैनेजमेण्ट कमेटी, यानी पूँजीवादी सरकारों के रहमोकरम पर निर्भर होगा। दरअसल फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा लायी जा रही ये चारों श्रम संहिताएँ मज़दूर वर्ग पर अब तक का सबसे बड़ा हमला है। इसलिए आज हमारे तात्कालिक संघर्ष का एक मुख्य कार्यभार संगठित होकर इन मज़दूर-विरोधी क़ानूनों का विरोध करना भी है।

इसके साथ ही हम तात्कालिक तौर पर बंगाल सरकार से माँग करते हैं कि वह इस सामूहिक हत्याकाण्ड के लिए ज़िम्मेदार पूँजीपतियों के ऊपर द्रुत गति से कार्रवाई करते हुए उन्हें सख़्त से सख़्त सज़ा दिलवाये, मज़दूरों के परिवारजन को नागरिक स्वयंसवेक का झुनझुना देने के बजाय उन्हें एक पक्की नौकरी दे, जाँच करके पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील आर्द्रभूमि पर गोदाम बनाने की मिलीभगत में शामिल मालिकों, अधिकारियों, मन्त्रियों इत्यादि पर सख़्त से सख़्त कार्रवाई की जाये, और केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा मुआवज़े की रक़म कुल 12 लाख (राज्य व केन्द्र की ओर से क्रमशः 10 लाख और 2 लाख) से बढ़ाकर आने वाले दशकों की अपेक्षित महँगाई दर को ध्यान में रखते हुए उनके आजीवन सम्मानजनक ग़ुज़ारे के हिसाब से की जाये। समूचे मज़दूर एवं कर्मचारी वर्ग से हमारा आह्वान है कि हम फ़ौरी तौर पर चारों श्रम संहिताओं को वापस करवाने के संघर्ष के लिए एकजुट हों और इस समूचे पूँजीवादी तन्त्र को नेस्तनाबूद करने की दीर्घकालिक लड़ाई के लिए भी कमर कस लें।

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2026

 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन