मोदी सरकार के ‘अमृतकाल’ में आर्थिक-सामाजिक असमानता की लगातार गहराती खाई
सरकारी तथ्य जब इस बात को स्पष्ट करते हैं कि देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, मुट्ठीभर लोगों के हाथ में समस्त सम्पत्ति-सम्पदा इकट्ठी होती जा रही है तो इसका दूसरा कड़वा पहलू यह है कि एक बड़ी आबादी को बदहाली, मुफ़लिसी और मौत के कगार पर धकेला भी जा रहा है। मोदी सरकार द्वारा लाये गये ‘अमृतकाल’ में इस गहराती आर्थिक-सामाजिक असमानता में भारत ने बिना शक बेहतर प्रदर्शन किया है! यह पिछले 12 सालों में भाजपा सरकार की पूँजीपरस्त नीतियों और पूँजीपति वर्ग की सेवा में न्योछावर होने की देन है। ‘अच्छे दिन’ का नारा देश के पूँजीपतियों, धन्नासेठों के लिए था, तो वहीं ‘सबका साथ, सबका विकास’ से अर्थ सभी अमीरों, करोड़पतियों का साथ और उनके विकास से था। हालाँकि, यह पूँजीवादी विकास की नैसर्गिक गति है कि एक तरफ़ तो सुख-समृद्धि और विलासिता की मीनारें खड़ी होती हैं, तो दूसरी तरफ़ ग़रीबी, भूखमरी, अभाव और बेबसी का गहरा कुआँ खोदा जा रहा होता है, जिसे मौजूदा फ़ासीवादी हुकूमत ने तेज़ी से अंजाम दिया है। बढ़ती आर्थिक असमानता यानी अमीरी-ग़रीबी के बीच की लगातार चौड़ी और गहरी होती खाई फ़ासीवादी ताक़तों और इस मानवद्रोही पूँजीवादी व्यवस्था के अन्त को और क़रीब लाती जा रही है।























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