क़ानून और न्याय का माख़ौल उड़ाती यूपी सरकार और पुलिस!!
नोएडा के मज़दूर आन्दोलन का दमन करने के लिये यूपी पुलिस फर्ज़ी ख़बरों और मुक़दमों के ज़रिये छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को बना रही है निशाना!

दोस्तो, साथियो
इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको यूपी पुलिस द्वारा किये गये ग़ैर-क़ानूनी हरक़त और असंवैधानिक तौर-तरीके से सामाजिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेने के घटनाक्रम से वाक़िफ़ कराना चाहते हैं।
जैसा कि आपको पता है यूपी पुलिस ने बीते 11 अप्रैल की शाम तकरीबन 7 बजे बोटैनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से 4 लोगों को अगवा किया था जिसमें 3 महिलाएँ और एक पुरुष थे। सादी वर्दी में आकर यूपी पुलिस ने पुरुष के साथ-साथ महिलाओं को भी उठाया और आज चार दिन बाद भी एफ़आईआर की कॉपी पुलिस द्वारा साझा नहीं की गयी है। मालूम हो कि महिलाओं को उठाते वक़्त कोई भी महिला पुलिसकर्मी वहाँ मौजूद नहीं थी। 11 अप्रैल की रात के बाद से ही नोएडा पुलिस द्वारा गिरफ़्तार लोगों के बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की गयी — उन्हें क्यों उठाया गया, उनपर क्या धाराएँ लगायी गयी हैं, उन्हें कहाँ रखा गया है इत्यादि का कोई जवाब नहीं दिया गया। परिवारवालों, दोस्तों, रिश्तेदारों तक को उनसे मिलने नहीं दिया गया और बेल के लिये पता करने गये वकीलों और अन्य लोगों को ही जबरन डिटेन कर लिया गया। उसके बाद वकीलों को सूचित किया गया कि ज़मानती न होने के वजह से उन्हें जेल भेज दिया गया है। साथ ही, पुलिस ने यह भी सूचित किया कि उनपर मामूली चालान हुआ है और उन्हें बेल अगले दिन मिल जाएगी मगर आज तक उन्हें बेल नहीं मिली है। इस पोस्ट के साथ शामिल फ़ोटो में आप देख सकते हैं की जो धाराएँ इनपर लगायी गईं थी वे सभी ऐसी थी जिनमें थाने से ही ज़मानत देकर बेल करायी जा सकती थी। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें ज़मानत नहीं दी गयी और आज सुबह जब तीनों महिलाओं से मुलाकात के लिये उनके सगे-सम्बन्धी जेल पहुँचने लगे तो उन्हें बताया गया कि इन्हें कोर्ट ले जाया गया है।
कोर्ट में सुनवाई के बाद मजिस्ट्रेट द्वारा बेल दे दिया गया मगर आपको जानकर हैरानी होगी कि इसके बाद भी उन्हें जेल भेज दिया गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि केस से जुड़े एक पुलिसवाले (इंवेस्टिगेटिंग अफ़सर के नाम का अभी तक खुलासा नहीं किया गया है) द्वारा जज को आकर यह बताया जाता है कि इस केस में एक नयी धारा जोड़ी गयी है जो ग़ैर ज़मानती है। इसके आधार पर उनकी ज़मानत ख़ारिज करके वापस ज्यूडिशियल कस्टडी में भेज दिया गया है।
आप देख सकते हैं कि कैसे इस मामले में शुरू से ही पुलिस द्वारा न सिर्फ़ ग़ैर-क़ानूनी, असंवैधानिक तरीके से इन चार लोगों को उठाया गया बल्कि इनके क़ानूनी अधिकारों से भी इन्हें वंचित किया गया। इसके साथ ही लगातार भाजपा और आरएसएस के भोपूओं द्वारा इस मसले को “अर्बन नक्सल” और “पाकिस्तान” से लिंक के घिसे-पिटे नैरेटिव पर रचा जा रहा था ताकि मज़दूरों के इस संघर्ष का दमन किया जा सके और इसका ठीकरा उन लोगों को फोड़ा जाए जो शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से हड़ताल चलाने की बात कर रहे थे। मज़दूर बिगुल का कोई भी पाठक इस बात को जानता है और हमने तमाम प्रदर्शन या आन्दोलन में, अपने पेज पर इस बात को लगातार ही बताया है कि कोई भी संघर्ष शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से ही चलाकर जीता जा सकता है। साथ ही, किसी भी तरह के अराजक तत्त्वों से न सिर्फ़ सावधान रहना चाहिए बल्कि उन्हें अपने आन्दोलन से भी बाहर करना चाहिए। 11 अप्रैल को जब मज़दूर बिगुल की तरफ़ से लोग वेतन बढ़ोतरी के इस आन्दोलन में शामिल हुए थे तब भी उन्होंने इस बात शपथ दिलायी थी कि हम अपने आन्दोलन को बेहद शांतिपूर्वक चलाएंगे, जिसका वीडियो भी मज़दूर बिगुल के पेज पर डला हुआ है।
यूपी पुलिस ने साफ़ तौर पर झूठे और फर्ज़ी तरीके से मज़दूरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को फंसाने का काम किया है। “अराजक तत्वों” को रोकने के नाम पर न सिर्फ़ 400 के करीब मज़दूरों को 13 तारीख़ से जेल में बंद किया है बल्कि सैकड़ों मज़दूरों के साथ भयंकर मारपीट की है। इस वक़्त ख़ुद को “मज़दूरों की हितैषी” के तौर पर पेश कर रही यूपी सरकार ने मज़दूरों और उनके लिये आवाज़ उठाने वालों पर फर्ज़ी मुक़दमे लगाने में ज़रा भी देर नहीं लगाई मगर सालों से जब मज़दूरों को उनका हक़ नहीं दिया जा रहा था, कारख़ानों में मालिकों द्वारा श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थी तब किसी मालिक पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, उनपर कोई मुकदमा नहीं किया गया। उत्तर प्रदेश पुलिस ने इसपर कभी कोई जाँच करने की जल्दबाज़ी नहीं दिखायी। वैसे भी, भाजपा सरकार की मालिकों के प्रति पक्षधरता किसी से छुपी हुई नहीं रह गयी है।
अब तो आनन-फानन में झूठी ख़बरें गढ़ने और फ़र्ज़ी मुकदमें तैयार करने के लिए इन्होंने 11 अप्रैल को हिरासत में लिये गये रूपेश को 13 तारीख़ को नोएडा की घटना का “मास्टरमाइंड” घोषित कर दिया है। “अराजक तत्वों” को पकड़ने के नाम पर मज़दूरों,आम जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है। मज़दूरों की आवाज़ को दबाने, उनके हक़ों को कुचलने और आने वाले दिनों में प्रदर्शन और हड़ताल के अधिकार को छीनने के लिये यह यूपी पुलिस द्वारा की गयी साजिश है।
उत्तर प्रदेश पुलिस के इस असंवैधानिक, ग़ैर-क़ानूनी और शर्मनाक हरक़त की हम भर्त्सना करते हैं और हमें इस मामले में उत्तरप्रदेश पुलिस की जाँच पर ज़रा भी भरोसा नहीं है। हम इस मसले की उच्च न्यायिक जाँच की माँग करते हैं। हम सभी गिरफ़्तार साथियों की तत्काल रिहाई की माँग करते हैं।
 

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