फ़ासिस्ट मोदी के राज में नफ़रती हिंसा और अपराध चरम पर
2014 में मोदी की सरकार के सत्ता में पहुँचने के बाद से ही आरएसएस और उनके तमाम अनुषंगी संगठनों को नफ़रत फैलाने और नफ़रती अपराधों को अंजाम देने की खुली छूट मिली हुई है। नफ़रती अपराधों को अंजाम देने में फ़ासीवादी आरएसएस-भाजपा परिवार से सम्बन्ध रखने वाले लोग सबसे अगली कतार में खड़े हैं, यह बात सभी जानते हैं। नफ़रती अपराध को अंजाम देने के बाद सत्ता के संरक्षण द्वारा दोषियों के बच निकलने की हर सम्भव मदद की जाती है। सत्ता की मेहरबानी नफ़रत का ज़हर उगलने वाले अपराधियों के मनोबल को बढ़ाने का काम कर रही है। अपराधियों को सत्ता की शह मिलने का नतीजा आज स्त्रियों, उत्तरपूर्व के राज्यों के निवासियों, मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, आदिवासियों आदि के विरुद्ध नफ़रती अपराध चरम पर है और यहाँ तक कि व्यापक पैमाने पर ग़रीब मेहनतकश हिन्दू आबादी भी इसकी चपेट में आ रही है। यह तो होना ही था। फ़ासीवाद जिन बर्बर शक्तियों को निर्बन्ध करता है, उसमें यह होता ही है और यह फ़ासीवादी राजनीति की ज़रूरत भी होती है।






















