Category Archives: सीएए-एनपीआर-एनआरसी

देशभर में अनेक बीएलओ की मौत : ये एसआईआर के दबाव में होने वाली हत्याएँ हैं!

उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल से लेकर केरल, तमिलनाडु से यह ख़बर आनी शुरू हुई कि एसआईआर करने वाले प्राइमरी स्कूल के शिक्षकों  से लेकर आँगनवाड़ीकर्मी अमानवीय काम के बोझ और मानसिक दबाव से गुज़र रहे हैं। कई लोगों के लिये यह दबाव इस क़दर बढ़ चुका था कि उन्हें अपनी जान तक लेने को मजबूर होना पड़ा। एसआईआर के कारण सिर्फ़ नवम्बर महीने में 26 से अधिक बीएलओ की मौत हो चुकी है। यह वह आँकड़ा है जो हमारे सामने आ गया जबकि कई ऐसी घटनाएँ तो दर्ज ही नहीं हुई या फिर दबा दी गयीं।

उत्तर प्रदेश में एसआईआर का खेल और डिटेंशन कैम्प बनाने की फ़ासिस्ट साज़िश

आम मेहनतकश आबादी, ग़रीब दलित, मुसलमानों, स्त्रियों, प्रवासी मज़दूरों, झुग्गियों और सड़कों पर रहने वाली और घुमन्तू आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस साज़िश का शिकार होगा। एक बड़ी आबादी जिसका नाम एसआईआर के ज़रिये काटा जायेगा उसके लिए अपनी नागरिकता को साबित करना मुश्किल होगा। उन्हें डिटेंशन कैम्पों में ठूँस दिया जायेगा। यह आबादी न तो यह साबित कर पायेगी कि वह बांग्लादेश की या किसी और देश की है और न ही उनकी कोई वापसी होगी। उन्हें मताधिकार आदि से वंचित कर दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर इन डिटेंशन कैंपों में रखा जायेगा। वैसे तो चार लेबर कोड के लागू होने के बाद तो हर कारखाना-फ़ैक्ट्री डिटेंशन कैम्प जैसे ही होंगे। लेकिन इस डिटेंशन कैंप में रहने वाले लोगों के कोई नागरिक अधिकार नहीं होंगे। उन्हें अम्बानी-अदानी के कारखानों में जानवरों से बदतर हालात में खटाया जायेगा। यानी अपने देश के नागरिकों को ही नागरिकता से वंचित कर फ़ासिस्ट उन्हें अपने “असली नागरिक” यानी अम्बानी-अदानी जैसे पूँजीपतियों की ग़ुलामी में लगा देंगे!

नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) को रद्द करो! इस जन विरोधी फ़ैसले को लागू करने के ख़िलाफ़ एक बार फिर जनता की लामबन्दी ज़रूरी!

चुनावों से ठीक पहले सीएए क़ानून को लागू करना वोटों के ध्रुवीकरण करने का एक तरीक़ा है। देशभर में राम मन्दिर के नाम पर लोगों को धर्म की राजनीति में उलझाये रखने के लिए जब मोदी सरकार ने पूरी राज्य मशीनरी, नौकरशाही, मीडिया को और दूसरी तरफ संघ परिवार ने अपने कार्यकर्ताओं को झोंक दिया लेकिन फ़िर भी उससे उतनी बड़ी हवा बनती नहीं दिखी, तब हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करने के लिए सीएए क़ानून को फ़िर से सामने लाया गया। पिछली बार सीएए-एनआरसी विरोधी आन्दोलन के दौरान दिल्ली में दंगे कराने में संघ परिवार कामयाब हुआ था और मोदी सरकार अब इसी प्रकार से साम्प्रदायिक तनाव पैदा करके चुनाव में वोटों की मोटी फ़सल काटने की योजना बनाये हुए है।

जन सत्याग्रह पदयात्रा : अवाम के बुनियादी मुद्दों पर एकजुट संघर्ष का पैग़ाम

दिल्ली में विभिन्न जनसंगठनों ने मिलकर 16 फरवरी से जन सत्याग्रह पदयात्रा शुरू की थी जिसका पहला चरण 4 मार्च को जन्तर-मन्तर पर एक जनसभा के रूप में समाप्त हुआ। यह यात्रा नरेला के भगतसिंह चौक से शुरू होकर शाहबाद डेरी, रोहिणी, भलस्वा डेरी, बुराड़ी, वज़ीराबाद, करावलनगर, खजूरी, मुस्तफाबाद, सीलमपुर, ओखला, जामिया, शाहीन बाग, हौज़रानी, कसाबपुरा होते हुए जन्तर-मन्तर तक पहुँची। पूरी यात्रा में पदयात्रियों ने करीब 300 किलोमीटर का सफर पैदल तय किया, 250 से अधिक जनसभाएँ कीं, और लाखों पर्चे बाँटते हुए जनता तक अपनी बात पहुँचायी।

सीएए-एनआरसी पर घर में मीटिंग कर रहे नौभास कार्यकर्ताओं को अँधेरगर्दी करते हुए जेल भेजा!

सीएए-एनआरसी के विरोध में देशभर में हो रहे विरोध से बौखलायी भाजपा की सरकारें आन्दोलन का दमन करने और विरोध में उठने वाली हर आवाज़ का गला घोंटने पर इस क़दर आमादा हैं कि क़ानून-संविधान-मानवाधिकार सबको बेशर्मी के साथ जूते की नोक पर रखकर मनमाने फ़ैसले किये जा रहे हैं।

असम में आप्रवासन : मज़दूर वर्गीय दृष्टिकोण

नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएए) के ख़िलाफ़ देशभर में सबसे उग्र विरोध असम में हो रहा है। लेकिन ग़ौर करने वाली बात यह है कि असम में यह विरोध सीएए के साम्प्रदायिक व ग़ैरजनवादी स्वरूप की वजह से नहीं हो रहा है। यह विरोध इस आधार पर नहीं हो रहा है कि सीएए में मुस्लिमों को नहीं शामिल किया गया है, बल्कि इस आधार पर हो रहा है कि सीएए असम समझौते के ख़िलाफ़ जाता है जिसमें असम में 1971 के बाद आये सभी आप्रवासियों को खदेड़ने की बात कही गयी थी। इसलिए असम में चल रहे इन विरोध-प्रदर्शनों का अनालोचनात्मक महिमामण्डन करने की बजाय इसके पीछे की राजनीति और विचार को समझने की ज़रूरत है और उसके लिए हमें असम में आप्रवासन के इतिहास को समझना होगा।

एनआरसी लागू नहीं हुआ पर ग़रीबों पर उसकी मार पड़नी शुरू भी हो गयी!

अमित शाह ने पूरे देश में एनआरसी लागू करने की घोषणा कर दी मगर मोदी ने इसे झूठ बता दिया। रावण दस सिरों से एक साथ बोलता था, मगर एक ही बात बोलता था। भाजपाइयों के अलग-अलग चेहरे अलग-अलग बात बोलते हैं मगर उनका गन्‍दा इरादा एक ही होता है।

अपने लिए जेल ख़ुद बना रहे हैं असम में एनआरसी से बाहर हुए मज़दूर

असम के ग्वालपाड़ा ज़िले के मटिया इलाके़ के दोमोनी-दलगोमा गाँव में डिटेंशन सेंटर का काम काफ़ी तेज़ी से चल रहा है। यहाँ मौजूद इंजीनियर बताते हैं कि इसे 30 दिसम्बर, 2019 तक तैयार करने को कहा गया था। लेकिन विडम्बना यह है कि इस सेंटर को जो मज़दूर तेज़ी के साथ बना रहे हैं, भविष्य में ज़्यादातर वही इस सेंटर की ‘शोभा’ बढ़ायेंगे।

असम में डिटेंशन कैम्प के भीतर क्या-क्या होता है

कल्पना कीजिए कि एक 35 फ़ुट x 25 फ़ुट के कमरे में क़रीब 35 आदमी सो रहे हों। सुबह पाँच बजे लगभग सभी को एक दहाड़ती हुई आवाज़ के साथ जगा दिया जाये। छह बजे तक इन सभी को कमरे में मौजूद एकमात्र टॉयलेट से फ़ारिग होकर चाय और बिस्कुट ले लेने होंगे। साढ़े छह बजे इन सभी लोगों को बाहर एक बड़े से आँगन में छोड़ दिया जायेगा, पूरा दिन काटने के लिए।

सरकार की धोखेबाज़ी से सावधान! एनपीआर ही एनआरसी है!

पूरे देश में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के विरोध में चल रहे तूफ़ानी आन्दोलन के कारण, मोदी-शाह की जोड़ी और सरकार में खलबली मची हुई है। सत्ताधारी लोग गिरगिट की तरह रंग बदल रहे हैं। गृहमन्त्राी अमित शाह ने बार-बार कहा, ‘आप क्रोनोलॉजी समझिये, पहले सीएए आयेगा, फि‍र एनआरसी को पूरे देश में लागू किया जायेगा!’ इसके जवाब में शाहीन बाग, दिल्ली की बहादुर औरतों ने एक ऐसा आन्दोलन खड़ा किया जो देश भर में संघर्ष की मिसाल बन गया। थोड़े समय में ही देश में 50 से भी ज़्यादा जगहों पर शाहीन बाग जैसे ही दिनो-रात चलने वाले धरने शुरू हो गये। छोटे क़स्बों से लेकर बड़े महानगरों तक पिछले डेढ़ महीने से लाखों लोग लगातार सड़कों पर हैं।