Category Archives: कारख़ाना इलाक़ों से

विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट से लेकर सूरत के सेप्टिक टैंक तक कार्यस्थल पर मज़दूरों की मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है!

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में हर रोज़ कार्यस्थल पर हुई दुर्घटनाओं में 3 लोगों की मौत हो जाती है। हम सभी जानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा होगी। इसके बावजूद मज़दूरों की सुरक्षा कभी भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय नहीं बनती। नवउदारवादी पूँजीवाद के इस दौर में मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति उपेक्षा और लापरवाही लगातार बढ़ती गयी है। मुनाफ़े की नाली बेरोकटोक बहती रहे इसके लिए उसमें आने वाली बाधाओं को एक-एक करके हटाया जा रहा है। मज़दूरों के अधिकारों को लगातार छीना जा रहा है। ज़्यादातर काम ठेके पर कराये जा रहे हैं ताकि मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति कोई जवाबदेही ही न रहे। हाल ही में लागू हुए 4 मज़दूर-विरोधी लेबर कोड में से एक मज़दूरों की पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों से सम्बन्धित है। इसके नाम से किसी को लग सकता है कि इसमें ज़्यादा से ज़्यादा फ़ैक्ट्रियों में काम की परिस्थितियों को ज़्यादा सुरक्षित करने की बात होगी। पर असलियत यह है कि इस कोड में फ़ैक्ट्री की परिभाषा को ही इस तरह बदल दिया गया है कि देश की क़रीब आधी फ़ैक्ट्रियों को सुरक्षा की जवाबदेही से ही छुटकारा मिल गया है। ऐसे में स्प्ष्ट है कि इस देश का बेशर्म और बेरहम हुक़्मरान तबक़ा विशाखापट्टनम और सूरत जैसे हादसों के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है।

नोएडा और मानेसर में गिरफ्तार मज़दूरों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों व छात्रों को रिहा करो! सभी अन्यायपूर्ण मुक़दमे वापस लो!

उत्तर प्रदेश सरकार का पुलिस प्रशासन पूँजीवादी व्यवस्था का वह डेढ़ सौ साल पुराना ‘टूलकिट’ ही लागू कर रहा है, जो इसके अमेरिकी पुरखों ने 1886 में मई दिवस के शहीदों एंजेल, स्पाइस, फिशर और पार्संस को फँसाने के लिए लागू किया था। डेढ़ सौ साल में ये लोग कुछ नया भी ईजाद नहीं कर पाये हैं! तब अमेरिकी पुलिस ने हेमार्केट में खुद के ही दलालों द्वारा बम फिंकवाकर बेगुनाह मज़दूर नेताओं को फँसाया था ताकि मज़दूरों के संघर्ष को तोड़ा जा सके। बाद में अमेरिकी पूँजीवादी अदालत तक को मानना पड़ा था कि मई दिवस के शहीद बेगुनाह थे। बाद में इसे मानने में पूँजीवाद को कोई ख़ास नुक़सान भी नहीं था। आज तक दुनिया भर में पूँजीवादी व्यवस्था की पुलिस मज़दूरों और मज़दूर नेताओं के ख़िलाफ़ इन्हीं तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल करती है। लेकिन मज़दूरों का संघर्ष न तो तब रुका था न अब रुका है और न ही तब तक रुकेगा जब तक इंसान द्वारा इंसान का शोषण जारी रहेगा। देश भर में इंसाफ़पसन्द लोगों और जनता ने पुलिस के इस ‘टूलकिट’ को समझ लिया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में नोएडा आन्दोलन के गिरफ्तार मज़दूरों, लेबर कार्यकर्ताओं, उनके समर्थन में उतरे बुद्धिजीवियों, छात्र कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए प्रदर्शन, प्रेस सम्मेलन, आदि हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस की संदेहास्पद भूमिका समूची जनता के सामने बेनक़ाब हो रही है। यह समूची पूँजीवादी व्यवस्था और मौजूदा फ़ासीवादी शासन को भी बेनक़ाब कर रहा है।

गुड़गांव- मानेसर में उठी वेतन बढ़ोतरी और मज़दूरों के जायज़ हक-अधिकारों की लड़ाई अब पूरे गुड़गांव, बिनौला, धारूहेड़ा और बावल सहित ऑटोमोबाइल और एक्सपोर्ट क्षेत्रों में फैल रही है। मज़दूरों की मांगें पूरी तरह जायज़ हैं—न्यायपूर्ण वेतन, बेहतर कार्य-परिस्थितियाँ और ठेका प्रथा का अंत। बिगुल मज़दूर दस्ता की अपील है कि गुरुग्राम, दिल्ली और पूरे एनसीआर के मज़दूर एक साझा मांग-पत्र तैयार करें और तालमेल कमेटी बनाकर इस संघर्ष को आगे बढ़ाएँ।

गुड़गांव- मानेसर में उठी वेतन बढ़ोतरी और मज़दूरों के जायज़ हक-अधिकारों की लड़ाई अब पूरे गुड़गांव, बिनौला, धारूहेड़ा और बावल सहित ऑटोमोबाइल और एक्सपोर्ट क्षेत्रों में फैल रही है। मज़दूरों…

हरियाणा में मज़दूरों की ‘हत्या’ के लिए अवैध कारख़ानेदार तथा श्रम क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ाने वाली भाजपा सरकार ज़िम्मेदार!

मोदी सरकार एक तरफ़ नये लेबर कोड के तहत महिलाओं को रात की पाली में काम करने की अनुमति देने की बात कर रही है, लेकिन दूसरी तरफ़ फ़ैक्ट्रियों में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाती है। नये लेबर कोड के तहत व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों से जुड़ी संहिता में कई ऐसे बदलाव किये गये हैं जो मज़दूरों के लिए ख़तरनाक साबित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, अब बिजली से चलने वाली इकाई को फ़ैक्ट्री मानने के लिए कम से कम 20 मज़दूर और बिना बिजली वाली इकाई के लिए 40 मज़दूर होना आवश्यक कर दिया गया है। इससे कई छोटी इकाइयाँ श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हो जायेंगी और वहाँ काम करने वाले मजदूरों को सुरक्षा, काम के घंटे और स्वास्थ्य सम्बन्धी कई क़ानूनी सुविधाएँ नहीं मिल पायेंगी।

संकेई प्रगति इण्डिया कम्पनी (हरियाणा) के हड़ताली मज़दूरों को मिली आंशिक जीत!

संकेई के मज़दूरों द्वारा हासिल की गयी इस छोटी-सी जीत ने यह दिखा दिया है कि अगर कम्पनी में स्थायी व अस्थायी मज़दूरों की एकता मज़बूत हो तो प्रबन्धन को एक हद तक झुकाया जा सकता है। आगे भी संकेई के मज़दूर साथियों को स्थायी-अस्थायी मज़दूरों की एकता को बरक़रार रखना होगा, तभी हड़ताल में हुए समझौते को लागू करवाया जा सकता है।

इलाहाबाद में मुनाफ़ाखोरी की भेंट चढ़ी मेहनतकशों की ज़िन्दगियाँ

भारत में हर दिन औसतन 10 इमारतें गिर जाती हैं। इन घटनाओं में औसतन 7 लोग रोज़ाना मौत के मुँह में समा जाते हैं। हर साल केवल इमारतों के गिरने से 2700 लोग जान गँवा देते हैं। नेताओं-ठेकेदारों-नौकरशाहों का नापाक गठजोड़ हर रोज देश में दर्जनों मेहनतकशों की मौत का कारण बन रहा है। अभी कुछ दिनों पहले ही मध्यप्रदेश में नकली कफ सीरप पीने से 20 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो गई। भारत के सबसे स्वच्छ शहर माने जाने वाले इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 25 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई। अपराधियों को बचाने के लिए बिना पोस्टमार्टम किये कई शवों का अन्तिम संस्कार कर दिया। जिन लोगों का पोस्टमार्टम हुआ उनकी मौत का कारण पानी के जहरीले होने का तथ्य स्पष्ट हो गया। सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ 4 मौतें दर्ज की गयीं। अब यही खेल इलाहाबाद की इस घटना में भी खेला जा रहा है।

मज़दूरों का जीवन तो मीडिया में कहीं दिखता ही नहीं था, अब उनकी मौत भी ‘ख़बर’ नहीं रही

नागपुर ही नहीं, देशभर में लगातार कारख़ानों में हो रही दुर्घटनाओं में मज़दूरों की मौतें हो रही हैं। हर साल हज़ारों मज़दूर अपनी जान गँवा देते हैं या बुरी तरह घायल होते हैं। इसकी ज़िम्मेदारी पूरी तरह कारख़ाना मालिकों की होती है जो सुरक्षा उपायों पर पैसे और समय ख़र्च करके अपने मुनाफ़े में ज़रा भी कमी नहीं आने देना चाहते। उनके लिए यह फ़ालतू का ख़र्च है क्योंकि मज़दूर का श्रम और उसकी जान सस्ते में उपलब्ध है। उनके टुकड़ों पर पलने वाले सरकारी अफ़सर और नेता भी उन हत्याओं के लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं जो इस अँधेरगर्दी को देखकर आँखें मूँदे रहते हैं। लेकिन दिनभर टुच्ची और मसालेदार ख़बरें और नफ़रती प्रचार में डूबे टीवी चैनलों के लिए यह रिपोर्ट करने का मसला नहीं है।