नोएडा के गारमेण्ट सेक्टर में काम करने वाली मज़दूर महिलाओं की समस्याएं और मांगें
नोएडा के गारमेण्ट सेक्टर में काम करने वाली मज़दूर महिलाओं की समस्याएं और मांगें
नोएडा के गारमेण्ट सेक्टर में काम करने वाली मज़दूर महिलाओं की समस्याएं और मांगें
मज़दूरों के संघर्ष के दवाब के कारण बढ़ा हरियाणा में न्यूनतम वेतन! आन्दोलन के दबाव में हरियाणा सरकार को मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने की घोषणा करनी पड़ी! गुड़गाँव-मानेसर…
इस देश की आबादी के सबसे बड़े, मगर सबसे अदृश्य हिस्से, औद्योगिक मज़दूर वर्ग में सरगर्मी तेज़ी से बढ़ रही है! क्या आप इससे वाकिफ़ हैं? पिछली फ़रवरी से मार्च…
गुड़गांव- मानेसर में उठी वेतन बढ़ोतरी और मज़दूरों के जायज़ हक-अधिकारों की लड़ाई अब पूरे गुड़गांव, बिनौला, धारूहेड़ा और बावल सहित ऑटोमोबाइल और एक्सपोर्ट क्षेत्रों में फैल रही है। मज़दूरों…
हड़ताल मज़दूर वर्ग के सबसे अहम हथियारों में से एक होता है। एक अकेले मज़दूर का पूँजीवादी समाज में कोई मूल्य नहीं होता है। लेकिन पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था और समूचा पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के श्रम के शोषण पर ही आधारित होता है। इसलिए एक वर्ग के तौर पर, मज़दूर वर्ग की सामूहिक शक्ति से बड़ी शक्ति और कोई नहीं। पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के बेशी श्रम को निचोड़कर ही ज़िन्दा रहता है। उसके मुनाफ़े का स्रोत मज़दूरों की मेहनत होती है। समूचा समाज ही मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश आबादी के श्रम पर टिका होता है। ऐसे में, मज़दूर वर्ग यदि काम रोक दे तो मुनाफ़े का चक्का भी ठप्प हो जाता है। हड़ताल का अर्थ होता है मज़दूर वर्ग द्वारा अपनी माँगों की पूर्ति के लिए काम रोकना, मुनाफ़े के चक्के को ठप्प करना और पूँजीपति वर्ग और उसकी राज्यसत्ता को बाध्य करना कि वह उसकी माँगों को पूरा करे। क्या 12 फ़रवरी को केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों के नेतृत्व ने वाकई हड़ताल का आयोजन करवाया? आप सभी इस सवाल का जवाब जानते हैं। हर जगह पर हड़ताल के नाम पर एकदिनी रस्मी विरोध प्रदर्शन, जुलूस-जलसा कर दिया गया, ताकि मज़दूर वर्ग का बढ़ता असन्तोष कुछ हद तक निकल जाये।
मज़दूर वर्ग अपने तजुर्बे से जानता है कि अभी तक की जो भी सीमित कार्रवाई हुई है, वो सबकुछ बस दिखाने के लिए है। पश्चिम बंगाल में मुख्य विरोधी दल, भाजपा भी मौका भुनाने के लिए विरोध कर रही है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की ये कुत्ताघसीटी सिर्फ़ पूँजीवादी चुनाव प्रणाली में अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए है। मज़दूरों का खून पसीना नोचने के सवाल पर इन सारे के सारे दलों में आम सहमति है।
इन गिग तथा प्लैटफ़ॉर्म वर्कर्स के लिए किसी भी प्रकार का कोई श्रम अधिकार तथा सामाजिक सुरक्षा मौजूद नहीं है। नये लेबर कोड, जिन्हें लेकर इतना हो-हल्ला मचाया जा रहा है कि अब पहली बार गिग तथा प्लैटफ़ार्म वर्कर्स श्रम क़ानूनों के दायरे में आयेंगे, दरअसल मोदी सरकार के तमाम जुमलों की तरह केवल एक जुमला है, और न केवल जुमला है बल्कि मज़दूर वर्ग के श्रम अधिकारों पर अब तक का सबसे बड़ा हमला भी है। दरअसल हक़ीक़त यह है कि नये लेबर कोड ऐसे श्रमिकों को महज़ परिभाषित करते हैं लेकिन औपचारिक तौर पर कोई वास्तविक हक़-अधिकार नहीं देते। सच्चाई यह है कि गिग वर्कर्स को कर्मचारी नहीं बल्कि “स्व-रोज़गारप्राप्त” माना जाता है। यही कारण है कि उन्हें न्यूनतम वेतन, सवेतन अवकाश, भविष्य निधि, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और सामूहिक सौदेबाज़ी जैसे अधिकार नहीं मिलते। इसके अलावा अधिकांश सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ भी व्यवहार में इनपर लागू नहीं होती हैं। इन्हीं उपरोक्त कारणों की वजह से गिग तथा प्लैटफ़ार्म वर्कर्स हड़ताल करने के लिए विवश थे।
उस मज़दूर की मौत का कारण भी यही घुटन भरी परिस्थितियाँ थी। बस उसकी मौत फैक्टरी में न होकर उसके कमरे पर हुई। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में साफ़ आया कि फेफड़ों में सूजन व गर्दा की वजह से वह मरा। उसकी मौत की ख़बर उसके घरवालों को दी गयी और उसके घर वाले दौड़े-दौड़े बिहार से गुड़गाँव आये। उसकी माँ ने मौत के मुआवजे़ के लिए बहुत दौड़ लगायी मगर कम्पनी मैनजमेंट को ज़रा भी तरस नहीं आया। उसकी माँ ने कम्पनी मैनेजेण्ट से अपील की और पुलिस से गुहार लगायी। कम्पनी में पुलिस आयी भी मगर कोई कुछ भी नहीं बोला और कोई सुराग भी हाथ नहीं लगा। क्योंकि उसकी मौत के अगले दिन ही उसकी हाज़िरी रजिस्टर से सात दिन की उपस्थिति ग़ायब कर दी गयी।
कोई भी मज़दूर साथी इस बात को सहज ही समझ सकता है। हड़ताल मज़दूर वर्ग के सबसे अहम हथियारों में से एक है। हड़ताल का मक़सद होता है मुनाफ़े का चक्का रोककर पूँजीपति वर्ग को अपनी माँगों पर झुकने के लिए मजबूर किया जाय। इसका मक़सद एकदिनी रोष-प्रदर्शन नहीं होता है। हड़ताल के इस बेहद अहम हथियार को पिछले तीन दशकों से जारी सालाना रस्मअदायगी वाली “हड़तालों” ने बेअसर कर दिया है। पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग पर निर्भर करता है। बिना उत्पादन के कोई मूल्य नहीं पैदा होता, कोई समृद्धि नहीं पैदा होती इसलिए कोई बेशी-मूल्य या मुनाफ़ा भी नहीं पैदा होता। और पूँजीपति को केवल एक ही बात से फ़र्क पड़ता है: मुनाफ़ा।
हाल ही में हरयाणा के श्रम विभाग ने आटोमोबाइल उद्योग की दो कम्पनियों से जुड़े मामलों में मज़दूर-विरोधी फ़ैसले सुनाये। दोनों मामलों में मज़दूरों द्वारा दायर अपील को एक तरफ़ा तरीके से ख़ारिज कर दिया गया। पहला फ़ैसला 2012 के मारुति आन्दोलन के दौरान बर्ख़ास्त एक मज़दूर के मामले में दिया गया। दूसरा फ़ैसला बेलसोनिका यूनियन के पंजीकरण को बहाल करने के लिए की गयी अपील के मामले में दिया गया।
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