Category Archives: कारख़ाना इलाक़ों से

12 फ़रवरी की “हड़ताल” से मज़दूरों को क्‍या हासिल हुआ ?

हड़ताल मज़दूर वर्ग के सबसे अहम हथियारों में से एक होता है। एक अकेले मज़दूर का पूँजीवादी समाज में कोई मूल्‍य नहीं होता है। लेकिन पूँजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था और राजनीतिक व्‍यवस्‍था और समूचा पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के श्रम के शोषण पर ही आधारित होता है। इसलिए एक वर्ग के तौर पर, मज़दूर वर्ग की सामूहिक शक्ति से बड़ी शक्ति और कोई नहीं। पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के बेशी श्रम को निचोड़कर ही ज़‍िन्‍दा रहता है। उसके मुनाफ़े का स्रोत मज़दूरों की मेहनत होती है। समूचा समाज ही मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश आबादी के श्रम पर टिका होता है। ऐसे में, मज़दूर वर्ग यदि काम रोक दे तो मुनाफ़े का चक्‍का भी ठप्‍प हो जाता है। हड़ताल का अर्थ होता है मज़दूर वर्ग द्वारा अपनी माँगों की पूर्ति के लिए काम रोकना, मुनाफ़े के चक्‍के को ठप्‍प करना और पूँजीपति वर्ग और उसकी राज्‍यसत्‍ता को बाध्‍य करना कि वह उसकी माँगों को पूरा करे। क्‍या 12 फ़रवरी को केन्‍द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों के नेतृत्‍व ने वाकई हड़ताल का आयोजन करवाया? आप सभी इस सवाल का जवाब जानते हैं। हर जगह पर हड़ताल के नाम पर एकदिनी रस्‍मी विरोध प्रदर्शन, जुलूस-जलसा कर दिया गया, ताकि मज़दूर वर्ग का बढ़ता असन्‍तोष कुछ हद तक निकल जाये।

कोलकाता में वाउ मोमो और पुष्पांजलि डेकोरेटर्स के गोदामों में आग से झुलसकर हुई मज़दूरों की मौत

मज़दूर वर्ग अपने तजुर्बे से जानता है कि अभी तक की जो भी सीमित कार्रवाई हुई है, वो सबकुछ बस दिखाने के लिए है। पश्चिम बंगाल में मुख्य विरोधी दल, भाजपा भी मौका भुनाने के लिए विरोध कर रही है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की ये कुत्ताघसीटी सिर्फ़ पूँजीवादी चुनाव प्रणाली में अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए है। मज़दूरों का खून पसीना नोचने के सवाल पर इन सारे के सारे दलों में आम सहमति है।

गिग वर्कर्स की हड़ताल और आगे के संघर्ष का रास्ता

इन गिग तथा प्लैटफ़ॉर्म वर्कर्स के लिए किसी भी प्रकार का कोई श्रम अधिकार तथा सामाजिक सुरक्षा मौजूद नहीं है। नये लेबर कोड, जिन्हें लेकर इतना हो-हल्ला मचाया जा रहा है कि अब पहली बार गिग तथा प्लैटफ़ार्म वर्कर्स श्रम क़ानूनों के दायरे में आयेंगे, दरअसल मोदी सरकार के तमाम जुमलों की तरह केवल एक जुमला है, और न केवल जुमला है बल्कि मज़दूर वर्ग के श्रम अधिकारों पर अब तक का सबसे बड़ा हमला भी है। दरअसल हक़ीक़त यह है कि नये लेबर कोड ऐसे श्रमिकों को महज़ परिभाषित करते हैं लेकिन औपचारिक तौर पर कोई वास्तविक हक़-अधिकार नहीं देते। सच्चाई यह है कि गिग वर्कर्स को कर्मचारी नहीं बल्कि “स्व-रोज़गारप्राप्त” माना जाता है। यही कारण है कि उन्हें न्यूनतम वेतन, सवेतन अवकाश, भविष्य निधि, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और सामूहिक सौदेबाज़ी जैसे अधिकार नहीं मिलते। इसके अलावा अधिकांश सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ भी व्यवहार में इनपर लागू नहीं होती हैं। इन्हीं उपरोक्त कारणों की वजह से गिग तथा प्लैटफ़ार्म वर्कर्स हड़ताल करने के लिए विवश थे।

मज़दूर की ज़िन्दगी इतनी सस्ती क्यों?

उस मज़दूर की मौत का कारण भी यही घुटन भरी परिस्थितियाँ थी। बस उसकी मौत फैक्टरी में न होकर उसके कमरे पर हुई। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में साफ़ आया कि फेफड़ों में सूजन व गर्दा की वजह से वह मरा। उसकी मौत की ख़बर उसके घरवालों को दी गयी और उसके घर वाले दौड़े-दौड़े बिहार से गुड़गाँव आये। उसकी माँ ने मौत के मुआवजे़ के लिए बहुत दौड़ लगायी मगर कम्पनी मैनजमेंट को ज़रा भी तरस नहीं आया। उसकी माँ ने कम्पनी मैनेजेण्ट से अपील की और पुलिस से गुहार लगायी। कम्पनी में पुलिस आयी भी मगर कोई कुछ भी नहीं बोला और कोई सुराग भी हाथ नहीं लगा। क्योंकि उसकी मौत के अगले दिन ही उसकी हाज़िरी रजिस्टर से सात दिन की उपस्थिति ग़ायब कर दी गयी।

एकदिनी रस्मी हड़तालों से न कुछ हासिल हुआ है न हासिल होगा!

कोई भी मज़दूर साथी इस बात को सहज ही समझ सकता है। हड़ताल मज़दूर वर्ग के सबसे अहम हथियारों में से एक है। हड़ताल का मक़सद होता है मुनाफ़े का चक्का रोककर पूँजीपति वर्ग को अपनी माँगों पर झुकने के लिए मजबूर किया जाय। इसका मक़सद एकदिनी रोष-प्रदर्शन नहीं होता है। हड़ताल के इस बेहद अहम हथियार को पिछले तीन दशकों से जारी सालाना रस्मअदायगी वाली “हड़तालों” ने बेअसर कर दिया है। पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग पर निर्भर करता है। बिना उत्पादन के कोई मूल्य नहीं पैदा होता, कोई समृद्धि नहीं पैदा होती इसलिए कोई बेशी-मूल्य या मुनाफ़ा भी नहीं पैदा होता। और पूँजीपति को केवल एक ही बात से फ़र्क पड़ता है: मुनाफ़ा।

मारुति और बेलसोनिका के मज़दूरों के मामलों में गुड़गाँव श्रम न्यायालय ने सुनाये मज़दूर विरोधी फ़ैसले!

हाल ही में हरयाणा के श्रम विभाग ने आटोमोबाइल उद्योग की दो कम्पनियों से जुड़े मामलों में मज़दूर-विरोधी फ़ैसले सुनाये। दोनों मामलों में मज़दूरों द्वारा दायर अपील को एक तरफ़ा तरीके से ख़ारिज कर दिया गया। पहला फ़ैसला 2012 के मारुति आन्दोलन के दौरान बर्ख़ास्त एक मज़दूर के मामले में दिया गया। दूसरा फ़ैसला बेलसोनिका यूनियन के पंजीकरण को बहाल करने के लिए की गयी अपील के मामले में दिया गया।

आपस की बात – दिहाड़ी मज़दूरों की जिन्दगी!

मैं एक भवन निर्माण मज़दूर हूँ। मैं बिहार से रोजी-रोटी के लिए दिल्ली आया हूँ। यहाँ मुश्किल से 30 दिनों मंे 20 दिन ही काम मिल पाता है। जिसमें भी काम करने के बाद पैसे मिलने की कोई गारन्टी नहीं होती है। कहीं मिल जाते हैं तो कहीं दिहाड़ी भी मार ली जाती है। कोई-कोई मालिक तो जबरन पूरा काम करवाकर पैसे पूरे नहीं देते हैं और ज़्यादा समय तक काम करने पर उसका अलग से मज़दूरी भी नहीं देते हैं।

अमेरिकी टैरिफ़ बढ़ने के बाद कपड़ा उद्योग में बढ़ रही मज़दूरों की छँटनी

टैरिफ़ लगने के बाद कपड़ा उद्योग के मज़दूरों की स्थिति और अधिक बदहाल हो गयी है। एक तरफ़ तो अधिकतर कम्पनियों में से आधे मज़दूरों को बिना नोटिस दिये काम से निकाला जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ़ बहुत से मज़दूरों को बिना वेतन काम से कई दिनों की छुट्टी दी जा रही है। जिन्हें काम से निकाला नहीं गया, उनकी 8 घण्टे की शिफ़्ट चल रही है, जिस कारण उन्हे 8-9 हज़ार वेतन ही मिल रहा है, जो कि आज के महँगाई के दौर में नाकाफ़ी है। सालों तक कपड़ा लाइन में काम कर चुके मज़दूरों को अब किसी और फैक्ट्री में भी काम नहीं मिल रहा है। अलग-अलग राज्यों से काम करने आये मज़दूरों को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। नौकरी जाने या बिना वेतन के छुट्टी मिलने के कारण मज़दूरों को मकान का किराये देने से लेकर राशन लेने व घर का ख़र्च चलाने के लिए बेहद मशक्क़त करना पड़ रहा है। ऐसे में यह साफ़ हो जाता है कि टैरिफ़ बढ़ने से सबसे अधिक गाज मज़दूरों पर ही गिरी है।

तेलंगाना की फ़ार्मा-केमिकल फ़ैक्ट्री में भीषण आग – मालिक के मुनाफ़े की भट्ठी में जलकर ख़ाक हो गये 52 मज़दूर

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में भारत में 269 से अधिक केमिकल फ़ैक्टरियों, कोयला खदानों और निर्माण स्थलों पर बड़े औद्योगिक हादसे हुए हैं। इन सभी हादसों की जड़ में मुनाफ़े पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था ही है। ये बढ़ती औद्योगिक दुर्घटनाएँ पूँजीवाद के मानवद्रोही चरित्र को सरेआम उजागर कर देती हैं। आज मज़दूरों के सामने सवाल यह है कि वे आख़िर कब तक पूँजीपतियों के मुनाफ़े की भट्टी में झोंके जाने को बर्दाश्त करते रहेंगे? इससे पहले कि पूँजीवाद हमारी ज़िन्दगी और हमारे सपनो को जलाकर ख़ाक कर दे हमें पूँजीवाद को ख़ाक में मिलाने के लिए कमर कसनी होगी।

बरगदवा, गोरखपुर के मज़दूरों ने मई दिवस को संकल्प दिवस के रूप में मनाया

पिछली 1 मई को (अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस) ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ और ‘टेक्सटाइल वर्कर्स यूनियन’ द्वारा गोरखपुर के बरगदवा में संकल्प दिवस के रूप में मनाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत मई दिवस के शहीदों की तस्वीर पर माल्यार्पण और ‘कारवाँ चलता रहेगा’ गीत से किया गया। ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ के प्रसेन ने मई दिवस के इतिहास पर और इस इतिहास से मजदूरों की अनभिज्ञता, शासक वर्ग द्वारा इस विरासत को धूल-मिट्टी डालकर दबाने की साज़िश पर विस्तार से बात रखी।