विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट से लेकर सूरत के सेप्टिक टैंक तक कार्यस्थल पर मज़दूरों की मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है!
सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में हर रोज़ कार्यस्थल पर हुई दुर्घटनाओं में 3 लोगों की मौत हो जाती है। हम सभी जानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा होगी। इसके बावजूद मज़दूरों की सुरक्षा कभी भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय नहीं बनती। नवउदारवादी पूँजीवाद के इस दौर में मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति उपेक्षा और लापरवाही लगातार बढ़ती गयी है। मुनाफ़े की नाली बेरोकटोक बहती रहे इसके लिए उसमें आने वाली बाधाओं को एक-एक करके हटाया जा रहा है। मज़दूरों के अधिकारों को लगातार छीना जा रहा है। ज़्यादातर काम ठेके पर कराये जा रहे हैं ताकि मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति कोई जवाबदेही ही न रहे। हाल ही में लागू हुए 4 मज़दूर-विरोधी लेबर कोड में से एक मज़दूरों की पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों से सम्बन्धित है। इसके नाम से किसी को लग सकता है कि इसमें ज़्यादा से ज़्यादा फ़ैक्ट्रियों में काम की परिस्थितियों को ज़्यादा सुरक्षित करने की बात होगी। पर असलियत यह है कि इस कोड में फ़ैक्ट्री की परिभाषा को ही इस तरह बदल दिया गया है कि देश की क़रीब आधी फ़ैक्ट्रियों को सुरक्षा की जवाबदेही से ही छुटकारा मिल गया है। ऐसे में स्प्ष्ट है कि इस देश का बेशर्म और बेरहम हुक़्मरान तबक़ा विशाखापट्टनम और सूरत जैसे हादसों के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है।























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