Category Archives: बुर्जुआ जनवाद – दमन तंत्र, पुलिस, न्‍यायपालिका

नेपाल में युवाओं की बग़ावत के बाद केपी शर्मा ओली की भ्रष्ट सत्ता का पतन

नेपाल के युवाओं का विद्रोह सिर्फ़ सत्तारूढ़ संशोधनवादी पार्टी या उसके नेताओं के ख़िलाफ़ ही नहीं बल्कि उन सभी पार्टियो व नेताओं एवं धन्नासेठों के ख़िलाफ़ था जिन्होंने पिछले 2 दशकों के दौरान सत्ता में भागीदारी की या जो सत्ता के निकट रहे हैं। यही वजह है कि प्रदर्शनकारियों के निशाने पर संसद, प्रधानमन्त्री निवास, शासकीय व प्रशासनिक मुख्यालय, उच्चतम न्यायालय के अलावा तमाम बड़ी पार्टियों के कार्यालय और उनके नेताओं के आवास भी थे जिनमें पाँच बार नेपाल के प्रधानमन्त्री रह चुके शेर बहादुर देउबा और माओवादी नेता व पूर्व प्रधानमन्त्री प्रचण्ड के आवास भी शामिल थे। इसके अलावा प्रदर्शनकारियों ने काठमांडू की कई बहुमंज़िला व्यावसायिक इमारतों और आलीशान होटलों में भी आग लगा दी जो धनाढ्यता का प्रतीक थीं। इस प्रकार यह बग़ावत वस्तुत: समूचे पूँजीवादी निज़ाम के ख़िलाफ़ थी।

उमर ख़ालिद आदि की दिल्ली हाई कोर्ट से ज़मानत रद्द किया जाना – न्यायपालिका के फ़ासीवादीकरण का जीता-जागता उदाहरण

उमर ख़ालिद, गुलफ़िशा फ़ातिमा, शरजील इमाम, आनन्द तेलतुम्बडे जैसे सामाजिक कार्यकर्ता सालों से जेल में सड़ रहे हैं, लेकिन सत्ता पक्ष यानी फ़ासीवादी भाजपा व संघ परिवार से जुड़े या संरक्षण प्राप्त दंगाइयों, बलात्कारियों-व्याभिचारियों, भ्रष्टाचारियों व हत्यारों को कोई सज़ा नहीं मिलती है। फ़र्ज़ी मुठभेड़ करवाने और करने वालों को, झूठे आरोप व साक्ष्य गढ़ने वालों को, फ़र्ज़ी मुक़दमे चलाने वालों के ख़िलाफ़ अदालतें और न्यायाधीश चूँ तक नहीं करते हैं। आडवाणी, अमित शाह, आदित्यनाथ से लेकर प्रज्ञा सिंह ठाकुर, संगीत सोम, असीमानन्द, नरसिंहानन्द, कुलदीप सिंह सेंगर “बाइज़्ज़त बरी” कर दिये जाते हैं और इनके ख़िलाफ़ दर्ज हत्याओं, दंगों, धार्मिक उन्माद फैलाने, नफ़रती भड़काऊ भाषणों के तमाम मामले रातोंरात काफ़ूर हो जाते हैं। धारा 370 हटने से लेकर तमाम सबूतों को दरकिनार करते हुए राम जन्मभूमि मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों द्वारा एकराय से लिए गये फ़ैसले ये बताते हैं कि आज भारतीय न्यायपालिका का चरित्र किस हद तक फ़ासीवादी राज्यसत्ता के वैचारिक-राजनीतिक प्रोजेक्ट के अनुसार ढलता जा रहा है। फ़ासीवाद के मौजूदा दौर में इस देश की न्यायिक व्यवस्था भी नहीं चाहती है कि उसके चरित्र को लेकर कोई भ्रम या मुग़ालता पाला जाये!

लद्दाख से लेकर उत्तराखण्ड तक, नेपाल से लेकर बंगलादेश तक नयी युवा पीढ़ी का सड़कों पर उबलता रोष, लेकिन क्या स्वत:स्फूर्त विद्रोह पर्याप्त है ?

जनता के गुस्से का स्वत:स्फूर्त रूप से फूटना कितना भी हिंस्र और भयंकर हो, उसका स्वत:स्फूर्त विद्रोह कितना भी जुझारू हो, वह अपने आप में पूँजीवादी व्यवस्था को पलटकर कोई आमूलगामी बदलाव नहीं ला सकता है। वजह यह है कि ऐसे विद्रोह के पास कोई विकल्प नहीं होता है, कोई स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम और नेतृत्व नहीं होता है। वह पूँजीवादी व्यवस्था के कुछ लक्षणों का निषेध करता है, लेकिन वह समूची पूँजीवादी व्यवस्था को कठघरे में नहीं खड़ा करता और न ही उसका कोई व्यावहारिक विकल्प पेश कर पाता है। क्या नहीं चाहिए, यह उसे कुछ लक्षणों के रूप में समझ आता है, लेकिन क्या चाहिए इसका कोई एक सुव्यवस्थित विचार उसके पास नहीं होता है।

काम से निकालने की धमकियों और सरकारी आदेश जारी कर शामिल किया गया आँगनवाड़ीकर्मियों व अन्य महकमों के कर्मचारियों को मोदी द्वारा किये जा रहे उद्घाटन समारोह में

अव्वलन तो सरकार द्वारा ऐसे उद्घाटन समारोहों का औचित्य ही समझ से परे है। ऊपर से कर्मचारियों को छुट्टी के दिन जबरन धमकी दे कर इन कार्यक्रमों में शामिल करवाने की ज़रूरत इन्हें क्यों पड़ रही है, यह ज़ाहिर है। भाजपा सरकार का देश में 11 साल का कार्यकाल और दिल्ली में छः महीने ही मेहनतकश जनता के लिए नर्क साबित हुए है। शिक्षा, रोज़गार, आवास, स्वास्थ्य जैसी ज़रूरतों को पूरा करने के बजाय इस सरकार ने जनविरोधी-नीतियों को लागू किया है और लोगों को नक़ली मुद्दों में उलझाये रखा है। गोदी मीडिया के चहेते “वर्ल्ड लीडर” की यह कैसी लोकप्रियता है कि इन्हें अपने कार्यक्रमों में भीड़ जुटाने के लिए सरकारी मुलाज़िमों को धमकी देने की ज़रूरत पड़ रही है!

‘महाराष्ट्र जन सुरक्षा क़ानून’ – “जन सुरक्षा” के नाम पर जनता के दमन की तैयारी!

सरकार की मर्जी के ख़िलाफ़ किसी भी व्यक्ति का सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने की ‘प्रवृत्ति’ होना, बस अब यह महसूस होने पर ही उक्त व्यक्ति अपराधी ठहराया जा सकता है। इसके लिए अब सरकार को सिर्फ “लगना” काफी होगा! क़ानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं, यह तय करना अब तक न्यायालयों का काम था। सरकार आरोप लगा सकती थी, लेकिन न्यायालयों द्वारा फैसला आने तक अपराध सिद्ध नहीं माना जाता था। लेकिन इस क़ानून ने किसी संगठन को अवैध है या नहीं, यह तय करने का प्रभावी अधिकार सरकार को ही दे दिया है। धारा-3 के अनुसार सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी कर किसी भी संगठन को अवैध घोषित कर सकती है, और धारा-3(2) के अनुसार उसके कारण बताना भी सरकार के लिए अनिवार्य नहीं है।

‘बंगलादेशी घुसपैठियों’ के नाम पर देशभर में मेहनतकश ग़रीब जनता पर पुलिस, प्रशासन और संघी संगठनों की गुण्डागर्दी व बर्बरता

पहली बात तो यह कि हर वह व्यक्ति जो इस देश में रहता है या आता है, सिर्फ़ पेट लेकर नहीं आता बल्कि दो हाथ भी लेकर आता है और मेहनत-मशक्क़त करता है और अपने हक़ का खाता है, वह यहाँ बस सकता है क्योंकि वह परजीवी नहीं बल्कि इसी समाज में अपने श्रम से भौतिक सम्पदा का सृजन कर रहा है। अगर किसी बंगलादेशी को देश से बाहर करना चाहिए तो वह बंगलादेश की ज़ालिम भूतपूर्व शासक शेख़ हसीना है, जिसे भारत की मोदी सरकार ने पनाह दे रखी है! वह तो बस यहाँ ऐश कर रही है! लेकिन निशाना मज़दूरों को बनाया जा रहा है, जिनमें से अधिकांश तो बंगलादेश से आये भी नहीं हैं, वे बस मुसलमान हैं और बांग्लाभाषी हैं।

क्या फ़िलिस्तीनी जनता के मुक्ति संघर्ष का समर्थन करना और वहाँ जारी जनसंहार के ख़िलाफ़ बोलना हमारे देश में अपराध है?

आज़ादी के बाद से ही हमारे देश की सरकारें हमेशा से फ़िलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष की समर्थक रही हैं। लेकिन आज फ़ासीवादी मोदी सरकार क़ागज़ पर तो फ़िलिस्तीन का समर्थन करती है लेकिन अलग-अलग मौक़े पर ज़ायनवादियों के साथ मोदी सरकार का नाजायज़ सम्बन्ध सबके सामने आ ही जाता है। हमारे देश की गोदी मीडिया, आईटी सेल, और सरकार फ़िलिस्तीन और इज़रायल के मुद्दे को मुसलमान बनाम यहूदी का मुद्दा बता रहे हैं, लेकिन जो लोग फ़िलिस्तीन का इतिहास जानते हैं उन्हें पता है कि 1948 से पहले इज़रायल नामक कोई देश नहीं था। इज़रायल कोई देश या राष्ट्र नहीं बल्कि फ़िलिस्तीन पर जबरन क़ब्ज़ा करने की एक सेटलर औपनिवेशिक परियोजना है। यह पश्चिमी साम्राज्यवाद द्वारा बनायी गयी एक औपनिवेशिक बस्ती है, जिसका इस्तेमाल वह फ़िलिस्तीनियों के दमन, विस्थापन व हत्या के लिए और साथ ही मध्य-पूर्व में पश्चिमी साम्राज्यवाद के हितों की सुरक्षा में इस्तेमाल की जाने वाली सैन्य चौकी के रूप में करता है। न तो फ़िलिस्तीन का मसला कभी धर्म का मसला था और न ही यह आज है। यह एक ग़ुलाम बनाये गये मुल्क की आज़ादी के लिए जारी लड़ाई है। ऐसे में आज दुनिया के हर इन्साफ़पसन्द इन्सान का कर्तव्य है कि वह फ़िलिस्तीन के साथ खड़ा हो।

रेखा गुप्ता सरकार दिल्ली में मज़दूरों की बस्तियों पर बेरहमी से चला रही है बुलडोज़र!

पूँजीवाद में एक तरफ़ गाँव से शहरों की ओर प्रवास जारी रहता है और दूसरी तरफ़ शहर फैलते रहते हैं जिसमें शहरी “विकास” हर-हमेशा ग़रीबों की बस्तियों को उजाड़ने की क़ीमत पर किया जाता है। जो सीमित वैकल्पिक आवास मज़दूरों को मुहैया कराये जाते हैं वे मज़दूरों के रोज़गार के स्थान से दूर तथा अस्पताल, शिक्षा, पानी, बिजली जैसी सुविधाओं से रिक्त होते हैं। दिल्ली में बवाना और नरेला में झुग्गियों को उजाड़कर बसायी झुग्गी-झोंपड़ी क्लस्टर के मकान झुग्गियों से भी बदतर जीवन स्थिति देते हैं। झुग्गी-मुक्त शहर के दावे झूठे और बेमानी हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार ही भारत में 6.5 करोड़ झुग्गीवासी थे और क़रीब एक लाख झुग्गियाँ थीं। ये झुग्गियाँ पटरी किनारे, नाले किनारे या शहर के कोनों में बसी होती हैं जहाँ बिजली, पानी, सीवर, शौचालय, सड़क से लेकर साफ़-सफ़ाई की समस्या हमेशा रहती है। हालाँकि कई रिपोर्टें बताती हैं कि यह आँकड़ा सटीक नहीं था और असल संख्या 14-15 करोड़ है।

प्रधानमन्त्री के संसदीय क्षेत्र में बर्बर बलात्कार और न्यायपालिका का दिनोदिन बढ़ता दकियानूसी और स्त्री-विरोधी चरित्र

यह केवल न्यायपालिका का मामला नहीं है। बल्कि आज देश की सभी सर्वोच्च संस्थाओं में फ़ासीवादी घुसपैठ हो चुकी है। फ़ासीवाद अपनी मूल प्रकृति से ही स्त्री विरोधी विचारधारा को खाद पानी देने का काम करता है। जैसा कि वित्तमन्त्री निर्मला सीतारमण और योगी आदित्यनाथ के बयानों से समझा जा सकता है। जहाँ निर्मला सीतारमण का कहना है कि “पितृसत्ता वामपन्थी अवधारणा है।” वहीं योगी का मानना है कि “महिलाओं को स्वतन्त्र या आज़ाद नहीं छोड़ा जा सकता है।” बस योगी जी यह कहना भूल गए कि कुलदीप सिंह सेंगर, आशाराम, रामरहीम जैसे अपराधियों को आज़ाद छोड़ने से देश “विश्वगुरु” बनेगा। फ़ासीवादी शासन में बलात्कारियों के पक्ष में फ़ासिस्टों द्वारा तिरंगा यात्रा निकलने से लेकर आरोपियों को बेल मिलने पर फूल माला से स्वागत करना आम बात बन चुकी है। ऐसे में समाज के सबसे बर्बर, अपराधिक और बीमार तत्वों को अपराध करने की खुली छुट मिल जाती है। यह स्थिति और भी ख़तरनाक तब बन जाती है बुर्जुआ न्याय व्यवस्था बुर्जुआ जनवाद के अतिसीमित प्रगतिशीलता को स्थापित करने की जगह फ़ासिस्टों के हाथ की कठपुतली बन जाय और जनविरोधी-स्त्रीविरोधी बयानों की झड़ी लगा दे। न्यायपालिका के इस प्रकार के बयानों की वजह से समाज में गहराई से पैठी स्त्री विरोधी मानसिकता को फलने-फूलने के लिए खाद पानी मिलेगा। और कालान्तर में स्त्रियों के ख़िलाफ़ होने वाले जघन्य अपराधों के लिए ज़मीन तैयार हो रही है।।

वक़्फ़ क़ानून में नये संशोधनों पर मज़दूर वर्ग का नज़रिया क्या होना चाहिए?

वक़्फ़ सम्पत्तियों के कुप्रबन्धन और उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार के तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता। परन्तु वक़्फ़ ही क्यों, सच तो यह है कि इस देश में धर्म-कर्म के नाम पर सभी धर्मों की धार्मिक व धर्मार्थ संस्थाओं ने सम्पत्ति का विशाल अम्बार खड़ा किया हुआ है जिनके प्रबन्धन में भी कोई जवाबदेही या पारदर्शिता नहीं है और इस मामले में हिन्दू धर्म के मन्दिरों, ट्रस्टों आदि में जो अरबों-खरबों का भ्रष्टाचार होता है, उसका तो किसी अन्य धर्म में कोई मुक़ाबला ही नहीं है। ऐसे में केवल इस्लाम धर्म की किसी संस्था में भ्रष्टाचार को लेकर ही अमित शाह के पेट में मरोड़ क्यों उठ रहा है? शाह इतने भोले तो हैं नहीं कि उन्हें यह पता ही न होगा कि इस देश में तमाम मन्दिरों, मठों, गुरुद्वारों, गिरजाघरों और बाबाओं के तमाम आश्रमों ने लोगों की धार्मिक आस्था के नाम पर अकूत सम्पदा इकट्ठी कर रखी है और उनके प्रबन्धन में भी ज़बर्दस्त भ्रष्टाचार होता है। वास्तव में, सबसे ज़्यादा समृद्ध तो तमाम हिन्दू मन्दिरों के ट्रस्ट व बोर्ड आदि हैं, जिनके पास जमा अथाह सम्पत्ति व धन-दौलत पर दशकों से गम्भीर सवाल उठते रहे हैं। इसी प्रकार तमाम गुरुद्वारों व गिरजाघरों और मठों के पास जमा चल व अचल सम्पत्ति का कोई हिसाब नहीं है।