12 फ़रवरी की “हड़ताल” से मज़दूरों को क्या हासिल हुआ ?
सम्पादकीय अग्रलेख
12 फ़रवरी को केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों ने मोदी सरकार के चार लेबर कोड के विरुद्ध एक दिन की आम हड़ताल का आह्वान किया था। लेकिन जो हुआ क्या उसे हड़ताल कहा जा सकता है? आम तौर पर कहें तो कतई नहीं। कई स्वतन्त्र व क्रान्तिकारी ट्रेड यूनियनों ने कई स्थानों पर अपने औद्योगिक क्षेत्र में कारखानों को वाकई बन्द करवाकर हड़ताल की। कुछ जगहों पर कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में भी केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों से सम्बद्ध यूनियनों ने स्वायत्त व्यवहार करते हुए उस दिन काम बन्द रखा। लेकिन संगठित क्षेत्र के मज़दूरों में लाखों की सदस्यता का दावा करने के बावजूद केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों ने हड़ताल के नाम पर महज़ विरोध प्रदर्शन, विरोध मीटिंग, काली पट्टी बाँधकर काम करने जैसी कार्रवाइयाँ कीं। वास्तव में, आम तौर पर जो हुआ वह बाक़ायदा कोई हड़ताल थी ही नहीं।
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि हड़ताल का अर्थ क्या होता है। हड़ताल मज़दूर वर्ग के सबसे अहम हथियारों में से एक होता है। एक अकेले मज़दूर का पूँजीवादी समाज में कोई मूल्य नहीं होता है। लेकिन पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था और समूचा पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के श्रम के शोषण पर ही आधारित होता है। इसलिए एक वर्ग के तौर पर, मज़दूर वर्ग की सामूहिक शक्ति से बड़ी शक्ति और कोई नहीं। पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के बेशी श्रम को निचोड़कर ही ज़िन्दा रहता है। उसके मुनाफ़े का स्रोत मज़दूरों की मेहनत होती है। समूचा समाज ही मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश आबादी के श्रम पर टिका होता है। ऐसे में, मज़दूर वर्ग यदि काम रोक दे तो मुनाफ़े का चक्का भी ठप्प हो जाता है। हड़ताल का अर्थ होता है मज़दूर वर्ग द्वारा अपनी माँगों की पूर्ति के लिए काम रोकना, मुनाफ़े के चक्के को ठप्प करना और पूँजीपति वर्ग और उसकी राज्यसत्ता को बाध्य करना कि वह उसकी माँगों को पूरा करे। क्या 12 फ़रवरी को केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों के नेतृत्व ने वाकई हड़ताल का आयोजन करवाया? आप सभी इस सवाल का जवाब जानते हैं। हर जगह पर हड़ताल के नाम पर एकदिनी रस्मी विरोध प्रदर्शन, जुलूस-जलसा कर दिया गया, ताकि मज़दूर वर्ग का बढ़ता असन्तोष कुछ हद तक निकल जाये।
क्या इस रस्मी एकदिनी तथाकथित “हड़ताल” का मोदी सरकार पर कोई असर पड़ा? क्या मोदी सरकार ने इस पर कोई जवाब या बयान दिया? क्या केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों द्वारा भेजे गये चिन्ता के मुद्दों पर प्रधानमन्त्री या श्रम मन्त्री ने कोई उत्तर दिया? नहीं। देंगे भी क्यों! वे भी समझ रहे हैं कि यह एक दिन की कवायद मात्र है जो उस एक दिन के बाद बीत जायेगी। यूँ भी सोचें तो क्या 1994 से लगभग हर साल होने वाली एक या दो दिन की रस्मी हड़तालों से मज़दूर वर्ग को कुछ हासिल हुआ है? क्या हम अनौपचारिकीकरण, ठेकाकरण, कैजुअलीकरण रोक पाये? क्या हम काम के बढ़ते घण्टे, घटती वास्तविक मज़दूरी, बुरे होते काम के हालात को बदल पाये? क्या इन रस्मी हड़तालों पर किसी भी सरकार ने हमारी सुनी? मोदी सरकार तो एक फ़ासीवादी सरकार है जो मज़दूर वर्ग की सबसे बड़ी शत्रु है, सबसे ज़्यादा तानाशाहाना और दमनकारी है। उसे तो ऐसी रस्मी क़वायदों से खुजली भी नहीं होने वाली है। ऊपर से, 2014 के बाद से तो हड़ताल की जगह काली पट्टी बाँधकर काम करने, कुछ मीटिंग-जुलूस आदि कर लेने को ही केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों का नेतृत्व हड़ताल बोलता रहा है।
देखने में यह आया कि पूरे देश में कुछ इलाकों को छोड़ दिया जाये तो केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों ने हड़ताल को सफल बनाने के लिए कोई ज़ोर ही नहीं लगाया। न तो ट्रेड यूनियन संगठनकर्ता व नेता इलाकों में भेजे गये, न काम बन्दी करवायी गयी, न ही मज़दूरों को विशाल तादाद में एकत्र किया गया। कई जगहों पर केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों से सम्बद्ध यूनियनों ने स्वयं ही काम बन्द किया, या आधा दिन काम बन्द किया। बाक़ी प्रमुख संगठित क्षेत्रों में, विशेषकर सरकारी क्षेत्रों, जैसे रेलवे, बैंक, बीमा, डाक, आदि में तो कई जगहों पर केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों ने ही काम बन्द करने से मना कर रखा था और यह कह रखा था कि काली पट्टी बाँधकर लंच टाइम में मेस में मीटिंग कर लो, या काम का वक़्त ख़त्म होने के बाद बाहर विरोध सभा या मीटिंग कर लो, इत्यादि।
ऐसे में केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन के नेतृत्व के साथियों से हमारा सवाल है: इससे आप क्या हासिल करने की उम्मीद करते हैं? आज जब आज़ाद भारत की अब तक की सबसे ज़्यादा मज़दूर-विरोधी सरकार ने मज़दूर हक़ों पर अब तक का सबसे बड़ा हमला किया है, तो इस प्रकार की कार्रवाइयों से क्या आप मोदी सरकार द्वारा लेबर कोड वापस लिये जाने की उम्मीद करते हैं? यह तो आकाश-कुसुम की अभिलाषा के समान है। क्या आप यह समझ नहीं पा रहे हैं कि ऐसे विरोध प्रदर्शनों, सभाओं, आदि से, ज़ुबानी जमाख़र्च से और इसी प्रकार की दिखावटी चीज़ों को “हड़ताल” बोल देने से न तो मोदी सरकार पर कोई फ़र्क पड़ने वाला है और न ही समूचे पूँजीपति वर्ग पर? वे तो यही चाहते हैं कि मज़दूरों का प्रतिरोध इसी प्रकार के दिखावे और रस्म-अदायगी तक सिमटा रह जाये, मज़दूर वर्ग कभी अपनी शक्ति को न पहचाने, कभी वास्तविक अनिश्चितकालीन आम हड़ताल की ओर न जाये। ऐसे में, केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों का नेतृत्व इतनी सीधी–सी बात क्यों नहीं समझ पा रहा है, जबकि रेल, सड़क परिवहन, डाक, बीएसएनएल, बैंक, बीमा, आदि तमाम बुनियादी उद्यमों में काम करने वाले मज़दूर और कर्मचारी ही समझ रहे हैं कि ऐसे एकदिनी कार्यक्रमों से कुछ नहीं होने वाला। यही वजह है कि कई जगह मज़दूरों व कर्मचारियों ने स्वयं ही इस एकदिनी क़वायद में हिस्सा नहीं लिया।
‘मज़दूर बिगुल’ के साथियों ने क़रीब 11 राज्यों में संगठित और असंगठित क्षेत्रों दोनों में ही लाखों की तादाद में पर्चा वितरण किया, सैंकड़ों सभाएँ कीं, कई औद्योगिक क्षेत्रों को बन्द करवाने की मुहिम में भागीदारी की और उन्हें बन्द भी करवाया। यह करने की प्रक्रिया में हमारे सामने कुछ बातें स्पष्ट तौर पर प्रकट हुईं।
पहली बात, सार्वजनिक व निजी दोनों ही प्रकार के संगठित क्षेत्र के उद्यमों के मज़दूरों में केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों के नेतृत्व के प्रति भारी असन्तोष और मोहभंग की स्थिति में है। अधिकांश मज़दूरों व कर्मचारियों ने अपना दुख प्रकट करते हुए बताया कि नेतृत्व ही समझौतापरस्त हो गया है, लड़ना नहीं चाहता, बन्द दरवाज़ों के पीछे घुटने टेक देता है और इसीलिए रस्मअदायगी वाली एकदिनी हड़तालों या विरोध-प्रदर्शनों से आगे जाने को वह कभी तैयार ही नहीं होता। जब मज़दूर व कर्मचारी ही वास्तविक आम हड़ताल की माँग करते हैं, तो वह कहता है कि ‘ऐसे नहीं होता है’, ‘धीरज से काम लेना पड़ता है’, ‘आम हड़ताल तो आखिरी हथियार होता है’, ‘सरकार दमन करेगी तो हम कैसे निपट पायेंगे’, ‘यूनियन नेतृत्व पर भरोसा करो, वह तुमसे ज़्यादा जानता है’, आदि कहकर उन्हें चुप करवा दिया जाता है। नतीजतन, मज़दूरों व कर्मचारियों में निराशा का माहौल था। भारी संख्या में अधिकांश मज़दूरों व कर्मचारियों ने दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों में कहा कि हम भी समझते हैं कि बिना अनिश्चितकालीन आम हड़ताल के मोदी सरकार को लेबर कोड वापस लेने को मजबूर नहीं किया जा सकता है, लेकिन यूनियन नेतृत्व ऐसा करने को तैयार ही नहीं है तो हम क्या कर सकते हैं। अभी उन्हें कोई और विकल्प दिखायी नहीं पड़ रहा है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि विकल्प से विकल्प नहीं पैदा होता, विकल्पहीनता से ही नया विकल्प पैदा होता है। इसलिए इस भारी मज़दूर व कर्मचारी आबादी को यह समझना होगा कि दो ही रास्ते हैं : या तो केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों के नेतृत्व को मोदी सरकार के लेबर कोड के विरुद्ध अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान करने को बाध्य किया जाय या फिर स्वयं स्वतन्त्र पहलक़दमी करते हुए, अपनी स्वतन्त्र यूनियनों का गठन करते हुए ऐसी हड़ताल की तैयारी की ओर आगे बढ़ा जाये। इसके अलावा क्या कोई तीसरा रास्ता हमारे पास है?
दूसरी बात यह सामने आयी कि आम तौर पर मज़दूर आबादी के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से को ठीक ढंग से पता नहीं है कि मोदी सरकार के लेबर कोड उसे किस प्रकार से उजरती ग़ुलामी के सबसे बदतर रूपों की ओर धकेल देंगे और किस प्रकार वस्तुत: उनसे आठ घण्टे काम का हक़, पक्के काम पर पक्की नौकरी का हक़, डबल रेट से ओवरटाइम का हक़, संगठित होने का हक़ छीन लिया जायेगा। ऐसे मज़दूर साथी असंगठित क्षेत्र में अधिक मिले जिसकी एक वजह है: असंगठित क्षेत्र में कागज़ी तौर पर ये सारे हक़ क़ानूनी तौर पर मौजूद होने के बावजूद अधिकांश मज़दूरों को मिलते ही नहीं हैं। नतीजतन, उनमें लेबर कोड के ख़तरनाक चरित्र को लेकर जागरूकता की कमी और एक प्रकार की तटस्थता का भाव था। लेकिन अपने काम के भयंकर हालात के कारण जहाँ कहीं भी क्रान्तिकारी यूनियनों व संगठनों ने औद्योगिक क्षेत्र बन्द करवाये, उसमें असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों ने ज़्यादा उत्साह से भागीदारी की और वाकई काम बन्दी की। लेकिन इसके बावजूद मोदी सरकार के चारों लेबर कोड के बारे में असंगठित क्षेत्र की व्यापक कामगार आबादी के बीच सघन प्रचार की आवश्यकता है। लेकिन बात सिर्फ़ असंगठित मज़दूरों की नहीं है, बल्कि संगठित क्षेत्र के संगठित व असंगठित (ठेका, दिहाड़ी, कैजुअल) मज़दूरों के बीच भी इन श्रम संहिताओं को लेकर जागरूकता की कमी देखने में आयी। ऐसे में, मोदी सरकार के लेबर कोड के विरुद्ध संघर्ष का एक अहम कार्यभार इनके खतरनाक चरित्र से व्यापक मज़दूर आबादी को अवगत कराना भी है।
तीसरी बात, इसके लिए तमाम स्वतन्त्र व क्रान्तिकारी ट्रेड यूनियनों को साथ एक मंच पर आना चाहिए। इसके ज़रिये न सिर्फ़ भविष्य में हड़तालों को ज़्यादा कारगर बनाया जा सकता है, बल्कि केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों पर भी जुझारू अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान करने का दबाव बनाया जा सकता है और ऐसा न करने की सूरत में संगठित क्षेत्र के मज़दूर वर्ग को अपने आपको उनसे स्वतन्त्र रूप में संगठित करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
हम फिर दुहराना चाहते हैं : अगर मज़दूर वर्ग मोदी सरकार की श्रम संहिताओं द्वारा लायी जाने वाली ग़ुलामी के ख़िलाफ़ प्रभावी ढंग से लड़ना चाहता है, तो उसे अनिश्चितकालीन आम हड़ताल को संगठित करने की ओर आगे बढ़ना होगा। जब तक देशस्तर पर इस प्रकार का प्रयास संगठित नहीं किया जा सकता, तब तक अलग-अलग कारखानों के स्तर पर, अलग-अलग सेक्टरों के स्तर पर और अलग-अलग इलाकों के स्तर पर मज़दूरों को संगठित होकर अपने श्रम अधिकारों के लिए लड़ना होगा। यह सच है कि इन क़ानूनों को रद्द करवाना मज़दूर वर्ग का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि कार्रवाई क़ानून से पहले आती है। अगर मज़दूर वर्ग संगठित होकर लड़ेगा, तो संघर्ष के परिणाम के निर्णय उसकी संगठित शक्ति और पूँजी की शक्ति के सन्तुलन से होगा। पहले भी इतिहास में ऐसी मिसालें मौजूद हैं जब क़ानून बाद में बने या बदले, लेकिन मज़दूरों ने लड़कर अपना हक़ हासिल किया। लेकिन यह भी सच है कि अगर क़ानूनी अधिकार समाप्त किये जाते हैं तो मज़दूरों के लिए अपने अधिकारों के लिए संघर्ष का रास्ता पहले से मुश्किल हो जाता है। जहाँ तक मोदी सरकार को उसकी चार श्रम संहिताओं को वापस लेने के लिए बाध्य करने का प्रश्न है, वह तभी हो सकता है जब देश के बड़े हिस्से में मज़दूर वर्ग एकजुट व संगठित तौर पर अनिश्चितकालीन आम हड़ताल को आयोजित करे।
इसलिए हम केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन के नेतृत्व से फिर अपील करेंगे कि वह रस्मअदायगी और दिखावटी प्रदर्शन कर उसे “हड़ताल” का नाम देने के बजाय वास्तविक संघर्ष का रास्ता अख्तियार करे और अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान करे। पूरे देश में समस्त वास्तविक मज़दूर यूनियनें व मज़दूर संगठन उनका साथ अवश्य देंगे। मज़दूर वर्ग में बिगड़ती जीवन व कार्य-स्थितियों को लेकर ज़बर्दस्त असन्तोष है। आज वह निराशा व विकल्पहीनता के बोध से ग्रस्त ज़रूर है, लेकिन ऐसी कोई भी स्थिति स्थायी नहीं होती है, इतिहास इसका गवाह है। यदि केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन संघर्ष का रास्ता नहीं चुनेंगे तो ऐसा नहीं कि मज़दूर वर्ग स्वयं संगठित होकर कभी संघर्ष का रास्ता नहीं चुनेगा। यदि वे रस्मअदायगी, औपचारिकताओं, सुधारवाद और अर्जीबाज़ी करने के रास्ते पर अटल रहेंगे, तो मज़दूर वर्ग भी इस समझौतापरस्ती को हमेशा स्वीकार करता रहेगा, ऐसा नहीं होगा।
केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों की शक्ति और प्रभाव पिछले तीन दशकों में लगातार सीमित होता रहा है और इसके लिए वे अपने नेतृत्व के अलावा किसी और को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते। जब-जब मज़दूरों के हक़ों पर बड़े हमले हुए तो उन्होंने मज़दूरों के प्रतिरोध आन्दोलन को सुधारवाद व “क़ानूनवाद” तथा अर्जीबाज़ी के गोल चक्कर में घुमा दिया। नतीजतन, मज़दूर आबादी भी उनपर से भरोसा खोती गयी। उसके पहले भी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों का संघर्ष अर्थवाद और वेतन-भत्तों में बढ़ोत्तरी की लड़ाई से आगे नहीं जाता था। लेकिन अब वे उतना भी नहीं करते। आज नहीं तो कल यह प्रश्न मज़दूरों के दिमाग़ में आयेगा और आज भी आ रहा है कि ऐसे में ऐसी यूनियनों की आवश्यकता ही क्या है, जो कोई वास्तविक संघर्ष करने को तैयार ही नहीं है? आज जब मोदी सरकार ने लेबर कोड के ज़रिये मज़दूर वर्ग पर आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा हमला किया है, तो यह मौक़ा है कि वे अपने इस आचरण को सुधार लें और एक वास्तविक संघर्ष का ऐलान करें।
क्रान्तिकारी शक्तियों को अपनी ताक़तों पर भरोसा करते हुए अपनी तैयारी लगातार जारी रखनी होगी, मज़दूरों को संगठित व असंगठित दोनों ही क्षेत्रों में संगठित करना होगा, उनकी जुझारू यूनियनें स्थापित करनी होंगी। असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की भारी तादाद उन्हें एक शक्ति प्रदान करती है, जबकि संगठित क्षेत्रों की पूँजीवादी व्यवस्था और राज्यसत्ता में रणनीतिक जगह संगठित क्षेत्र के मज़दूरों व कर्मचारियों को किसी भी आम अनिश्चितकालीन हड़ताल जैसे संघर्ष को संगठित करने के लिए अहम बनाती हैं। ये लेबर कोड संगठित व असंगठित दोनों ही क्षेत्र में मज़दूरों, यानी समूचे मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश जनता पर ही हमला हैं।
लुब्बेलुबाब यह कि एकदिनी रस्मअदायगी और हड़ताल के नाम पर (या हड़ताल शब्द को ही कलंकित करते हुए) काली-पट्टी-विरोध प्रदर्शनों व मीटिंगों से मोदी सरकार के कानों पर जूँ भी नहीं रेंगने वाली। श्रम संहिताओं को वापस लेने के लिए मोदी सरकार को बाध्य करने का एक ही रास्ता है: खूँटा गाड़कर अपने जायज़ हक़ों के लिए संघर्ष का आगाज़ करना, यानी, अनिश्चितकालीन आम हड़ताल को संगठित करना।













