Category Archives: संघी ढोल की पोल

एसआईआर मेहनतकश जनता का मताधिकार छीनने के लिए किया गया एक घोटाला है!

पहले यह प्रक्रिया स्वयं सरकार की पहलक़दमी पर होती थी। पहले चुनाव आयोग का नारा था : ‘कोई वोटर न छूटे’। लेकिन बहुत कम लोगों ने ग़ौर किया होगा कि अब उसका नारा हो गया है : ‘कोई योग्य वोटर न छूटे’। “योग्य वोटर” कौन होगा? यह मोदी-शाह की फ़ासीवादी सरकार तय करेगी! यहाँ एक बहुत बड़ा बदलाव किया गया है। पहले इस बात की ज़िम्मेदारी राज्यसत्ता पर होती थी कि वह यह पक्का करे कि हर नये वोटर का नाम मतदाता सूची में जुड़े। इसे ‘राजकीय पहलक़दमी पर होने वाला मतदाता पंजीकरण’ कहा जाता है। दुनिया के हर देश में जहाँ पूँजीवादी जनवाद किसी न किसी हद तक काम करता है, वहाँ यही होता है। इसके बरक्स कुछ देशों में एक दूसरा मॉडल लागू किया जाता है जिसे कहा जाता है ‘व्यक्तिगत पहलक़दमी पर होने वाला मतदाता पंजीकरण’। यह आम तौर पर सर्वसत्तावादी तानाशाहियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला तरीक़ा है, जिसका मक़सद ही यह होता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं का नाम काटा जाये और उनके मताधिकार को छीन लिया जाये। इसके कारणों को हम कुछ आगे समझेंगे।

बलात्कारियों को संरक्षण देने वाले स्त्रियों को दे रहे “संस्कारी” बनने की सलाह!

फ़ासीवादी भाजपा के शासन में एक तरफ़ महिलाओं को ही सीमा में और संस्कार में रहने की हिदायत दी जाती है, महिलाओं के कपड़े पहनने, खाने, जीवनसाथी चुनने की आज़ादी पर हमला किया जाता है और दूसरी तरफ़ बलात्कारियों को खुली छूट मिलती है! जब ऐसी पार्टी सत्ता में होगी तो क्या नवधनाढ्य वर्गों, लम्पट टुटपुँजिया वर्गों और नेताओं की बिगड़ी औलादों का दुस्साहस नहीं बढ़ेगा कि वह किसी भी औरत पर हमला करे और उसका बलात्कार करे? जब इन आपराधिक तत्वों को यह यक़ीन है कि इन अपराधों की उसे कोई सज़ा नहीं मिलेगी, बस उसे भाजपा में शामिल हो जाने की आवश्यकता है, तो ज़ाहिर सी बात है कि स्त्री–विरोधी अपराधों में बढ़ोत्तरी होगी ही। शुचिता और संस्कार का ढोंग करने वाली फ़ासीवादी भाजपा के राज ने इस पतनशील और प्रतिक्रियावादी स्त्री-विरोधी मानसिकता को और मज़बूत किया है। भाजपा के गुरू गोलवलकर का मानना था कि औरतें बच्चा पैदा करने का यन्त्र होती हैं; इनके माफ़ीवीर सावरकर का मानना था कि बलात्कार का राजनीतिक हिंसा के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यही इनकी असली जन्मकुण्डली है!

भाजपा की योगी सरकार द्वारा मालिकों और पूँजीपतियों की सेवा में मेहनतकशों-मज़दूरों पर थोपा गया अमानवीय शोषण, दमन, अन्याय और आतंक का राज

भाजपा सरकारें, केन्द्र में व हर राज्य में, मज़दूरों की सबसे बड़ी दुश्मन साबित हुई हैं। यह बात हरेक सचेत मज़दूर और मेहनतकश को पता है। न सिर्फ़ नोएडा में बल्कि बरौनी में, पानीपत में, सूरत में और हर जगह भाजपा सरकारों के राज में पूँजीपतियों के हितों को साधने के लिए मज़दूरों की हर आवाज़ का क्रूरता से दमन किया गया है। अगर आप मज़दूरों की औसत मज़दूरी की राज्यवार पड़ताल करें, तो पाएँगे कि दिल्ली को छोड़ दें (जहाँ क़ानूनी काग़ज़ी न्यूनतम मज़दूरी कुछ ज़्यादा होने के ऐतिहासिक व आर्थिक कारण हैं और जो लागू भी नहीं होती!), तो अधिकांश भाजपा-शासित राज्यों में मज़दूरों की औसत मज़दूरी सबसे निचली कतारों में आती है। सभी भाजपा-शासित राज्यों में ठेकाकरण की रफ़्तार सबसे तेज़ है। श्रम कानूनों के उल्लंघन के मामले में भी भाजपा-शासित राज्य ही सबसे आगे हैं।

देश के छात्रों-युवाओं ने किया “महामानव” की महाछवि को चकनाचूर!

मोदीजी की “महामानव” छवि को जेन-ज़ी आन्दोलन द्वारा चकनाचूर और ध्वस्त कर दिया गया है। यही वजह है कि भाजपा इस वक़्त पूरी तरह बौखलायी हुई है। इसलिए ही तो मोदी सरकार व अन्य राज्य भाजपा सरकारों की पुलिस देश के 15 से 25 साल के नौजवानों के पीछे पड़ी है कि उसने ‘फ्यूहरर’ का अपमान कैसे कर दिया? उनकी असंसदीय भाषा को बड़ा मसला बनाया जा रहा है। सारा मामला ही भाषाई शुचिता पर स्थानान्तरित करके भाजपा सरकार और संघ परिवार आन्दोलनरत युवाओं को ही दोषी ठहराने में लग गये हैं, उन्हें मर्डर और रेप तक की ऑनलाइन धमकियाँ दिलवायी जा रही हैं, उन्हें आतंकित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन हमारे देश के प्राचीन ग्रन्थों में ही एक उक्ति है : विनाश काले, विपरीत बुद्धि। जितना अधिक मौजूदा फ़ासीवादी सरकार इन चालबाज़ियों और साज़िशों को अंजाम दे रही है, उतना ही इस पीढ़ी के युवाओं का गुस्सा और मोहभंग बढ़ रहा है, उतना ही वह समझती जा रही है कि मौजूदा मोदी सरकार किस क़दर जनविरोधी, छात्र-विरोधी और युवा-विरोधी है, उतना ही उसके अन्दर परिवर्तन की भावना विकसित होती जा रही है और उतना ही उसके अन्दर का डर भी ख़त्म होता जा रहा है। जिस सीमा रेखा पर जनता का डर ख़त्म होता है, वहीं से आततायी सरकारों और हुक्मरानों का डर शुरू होता है। अब वह मंज़िल आ चुकी है।

फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा इतिहास को विकृत करने का एक और प्रयास

इतिहास पर यह हमला कोई आकस्मिक घटना नहीं है। इतिहास को विकृत करना उस वृहद फ़ासीवादी परियोजना का अभिन्न हिस्सा है, जिसका उद्देश्य वास्तव में मुनाफ़े पर आधारित इस पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा की गयी तमाम समस्याओं और संकट के लिए एक नक़ली व काल्पनिक दुश्मन का निर्माण करना और फिर उससे ही इन समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार ठहराना और उस नक़ली दुश्मन के बहिष्कार तथा विरोध के आधार पर एक विशुद्ध विचारधारात्मक समुदाय-अर्थात् “आर्यन राइख” या “हिन्दू राष्ट्र” का निर्माण करना है। इसके ज़रिये ही फ़ासीवाद टुट्टपूंजिया वर्गों के संगठित प्रतिक्रियावादी आन्दोलन को विशिष्ट तौर पर बड़ी पूँजी की सेवा और आम तौर पर पूँजी की सेवा में सन्नद्ध करता है। लेकिन न तो यह तथाकथित “नक़ली दुश्मन” और न ही यह विशुद्ध विचारधारात्मक समुदाय, मसलन ‘हिन्दू राष्ट्र’, किसी वास्तविक ऐतिहासिक आधार पर मौजूद है। इसलिए एक ऐसे स्वर्णिम, अखण्ड अतीत की काल्पनिक तस्वीर गढ़ी जाती है, जिसमें उस विचारधारात्मक समुदाय को हमेशा से महान और एकीकृत दिखाया जाता है तथा उसके ऊपर किसी “दुश्मन” द्वारा किये गये पतनकारी हमले की कहानी प्रस्तुत की जाती है।

बारह साल, जनता बेहाल – टूटे सपनों का अम्बार! कौन है इसका ज़िम्मेदार ?

एक ऐसे समय में जब जनता कमरतोड़ महँगाई और विकराल बेरोज़गारी की मार झेल रही है, जब देश के छात्र-युवा बरबाद होती शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था का नतीजा भुगत रहे हैं, जब देश के अल्पसंख्यक, विशेष तौर पर, मुसलमान साम्प्रदायिक तनाव और विषवमन के शिकार बन रहे हैं, जब स्त्री-विरोधी व दलित-विरोधी अपराध अपने चरम पर हैं, जब देश के ग़रीब छोटे किसान हर रोज़ तबाह हो रहे हैं और आत्महत्याएँ कर रहे हैं, उस समय नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्रित्व के 12 साल पूरे होने का भाजपा द्वारा मनाया जा रहा यह जश्न जनता के दुख-दर्द के साथ क्या एक भद्दा मज़ाक और राजनीतिक अश्लीलता की पराकाष्ठा नहीं है?

पेट्रोल-डीज़ल के दामों में पिछले 11 दिनों में चौथी बार बढ़ोतरी से मेहनतकश आबादी बेहाल

ऐसे में इस सरकार से यह सवाल बनता है कि जब अन्‍तरराष्‍ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में हुई भारी गिरावट का फ़ायदा आम जनता को नहीं हुआ तो फिर आज कच्‍चे तेल की क़ीमत में हो रही बढ़ोतरी का ख़ामियाज़ा आम जनता क्‍यों भुगते? पिछले 12 सालों में मोदी सरकार ने जहाँ अप्रत्‍यक्ष करों के रूप में आम जनता पर करों का बोझ बढ़ाया है वहीं पूँजीपतियों और सेठ-व्‍यापारियों को करों में अरबों रुपयों की रियायत दी है। प्रभावी कॉरपोरेट कर को 35 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत से भी कम कर दिया गया है। अगर आज इस सरकार को ग़रीबों-मज़दूरों आह सुनायी देती तो वह आसानी से पेट्रोल-डीज़ल पर लगाये जा रहे केन्‍द्रीय करों में ज्‍़यादा कटौती करके उसकी भरपायी धन्‍नासेठों पर करों का बोझ बढ़ाकर कर सकती थी। परन्‍तु सरकार की प्राथमिकता लोगों की भूख शान्‍त करना नहीं बल्कि धन्‍धा करने की सहूलियत सुनिश्चित करना है। यही वजह है देश की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है और धन्‍नासेठों की ऐय्याशियाँ बढ़ती जा रही हैं। इस प्रकिया में इस सरकार का जनविरोधी चरित्र ज्‍़यादा से ज्‍़यादा उजागर होता जा रहा है।

भाजपा और आरएसएस के झूठे प्रचार से सावधान!!

‘ऑपइण्डिया’ ने मज़दूर बिगुल के ख़िलाफ़ एक झूठा प्रचार करते हुए वीडियो पोस्ट किया जिसमें ‘ऑपइण्डिया’ यह दावा कर रहा है कि मज़दूर बिगुल ने हिंसा करवायी या हिंसा करने के लिए कहा। ‘ऑपइण्डिया’ के ग़लत इरादे से किये गये इस झूठे प्रचार के ख़िलाफ़ मज़दूर बिगुल ने उन्हें एक क़ानूनी नोटिस भेजा है और आगे की सख़्त क़ानूनी कार्यवाई कर रहा है।

मोदी सरकार का “सरेण्डर” और भारतीय शासक वर्ग का चरित्र

हालिया समय में मोदी सरकार की विदेश नीति के कुछ फ़ैसलों और रुख़ के चलते विपक्षी दलों ने नरेन्द्र मोदी के अमेरिका और इज़रायल के आगे “सरेण्डर” पर तीखी टिप्पणी की है। केजरीवाल ने तो मोदी को ट्रम्प का ग़ुलाम भी बता दिया। इस रवैये पर भारत के क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट खेमे की तरफ़ से भी अलग-अलग समझदारी पेश की गयी है। मोदी सरकार की “नतमस्तक” प्रतीत होती विदेश नीति जिस लघुकालिक सन्धि-बिन्दु और जिन आकस्मिक कारणों से पैदा हुई है उसका ठोस विश्लेषण करने की जगह नवजनवादी क्रान्ति के फ्रेमवर्क में फँसे कम्युनिस्टों ने इसे भारतीय पूँजीपति वर्ग के दलाल चरित्र का सत्यापन बता दिया है। यह सच है कि मोदी सरकार का हालिया दिनों में रुख़ 2014 के कार्यकाल से अपनाये गये आम रुख़ से अलग रहा है। मसलन अमेरिका के साथ व्यापारिक सौदा कर मोदी सरकार ने रूस से तेल ख़रीदना बन्द कर दिया। अमेरिका के राष्ट्रपति और उसके सेक्रेटरी द्वारा अमेरिका के साथ व्यापार सौदे पर भारत को “इजाज़त” देना या ट्रम्प का यह कहना कि उसने भारत को “अल्टीमेटम” दिया आदि बयानों को मोदी सरकार के अमेरिका के आगे “नतमस्तक” होने के उदाहरण के तौर पर पेश किया जा रहा है। मोदी सरकार ईरान पर इज़रायल और अमेरिका द्वारा हाल ही में थोपे गये साम्राज्यवादी युद्ध पर चुप रही और खामनेई की हत्या पर भी मोदी सरकार ने तत्काल कोई बयान जारी नहीं किया और इसपर भी चुप्पी साध ली। आइए, मोदी सरकार के इस बदले हुए रुख़ के आधार पर नवजनवादी क्रान्ति फ्रेमवर्क के पैरोकार कम्युनिस्टों द्वारा भारतीय शासक वर्ग को दलाल कहे जाने की बात की जाँच-पड़ताल करते हैं।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था और विज्ञान के विकास की पोल खुल गयी एआई समिट और गलगोटिया यूनिवर्सिटी प्रकरण में

ऐसा नहीं है कि यह विज्ञान और तर्कणा विरोधी बातें बस बयानबाज़ी तक सीमित हैं। सरकार द्वारा सांस्थानिक रूप से छद्म विज्ञान को बढ़ावा देने की पूरी कोशिश की जा रही है। सरकार द्वारा शिक्षा को लेकर लायी गयी तमाम नितियाँ और उठाये गये सारे क़दम यह साफ़-साफ़ बताते हैं कि कैसे योजनाबद्ध तरीक़े से शिक्षा का निजीकरण किया जा रहा है और इसे बर्बाद किया जा रहा है। छात्रों के तर्क करने की शक्ति पर हमला किया जा रहा है, उनकी आलोचनात्मक क्षमता को बाधित करके उसे सचेतन तौर कुन्द किया जा रहा है, वे सरकार की किसी भी नीति या बात पर सवाल न खड़ा करें, बस चुपचाप अनुशासित होकर फ़ासीवादी सरकार के हुक्म की तामील करें इसके लिए ही उन्हें अवैज्ञानिक और अतार्किक बनाने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है ताकि उन्हें आसानी से फ़ासीवादी उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनाया जा सके। पाठ्यक्रम से उद्भव के सिद्धान्त, पीरियॉडिक टेबल आदि विषयों का हटाया जाना, इतिहास का मिथ्याकरण करना आदि इसी दूरगामी फ़ासीवादी परियोजना के परिणाम हैं।