Category Archives: श्रम क़ानून

मोदी सरकार के चार लेबर कोड क्या हैं और ये मज़दूर-विरोधी क्यों हैं?

नये क़ानून के नाम पर जो वास्तविक अधिकार वैधानिक तौर पर मज़दूरों को प्राप्त थे, उनका मर्म ख़त्म कर, उन्हें केवल झुनझुने में तब्दील करने का काम किया जा रहा है। ये नयी संहिताएँ श्रमिक सुरक्षा को कमज़ोर करती हैं, असुरक्षा को बढ़ाती हैं और श्रम कानूनों के नाम पर जो सीमित क़ानूनी ताक़त मज़दूरों के पास थी, उन्हें अब खुले तौर पर मालिकों के पक्ष में स्थानांतरित करती हैं। सच तो यह है कि श्रम कानूनों को तमाम तरह के संशोधनों के साथ पहले की सरकारें भी कमज़ोर करती रही हैं। व्यवहार में वे आम तौर पर कागज़ी ही साबित होते रहे हैं। यह भी सच है की श्रम क़ानूनों के ठोस अनुपालन की कोई व्यवस्था नहीं रही है। श्रम विभाग आम तौर पर मालिकों के पक्ष में ही काम करता रहा है। हालाँकि मज़दूर आन्दोलन का इतिहास बताता है कि जब मज़दूर संगठित होकर संघर्ष करते थे और क़ानूनी लड़ाइयाँ लड़ते थे तो इन क़ानूनों को एक हद तक अपने पक्ष में लागू करवाने में सफलता भी हासिल कर लेते थे। लेकिन इन नयी संहिताओं के साथ अब मज़दूरों-कर्मचारियों के लिए स्थिति बेहद दुरूह हो जायेगी। व्यवहार में मज़दूरों से जो पहले छीना जा रहा था, अब मोदी सरकार उसे ही वैधानिक जामा पहनाकर नया विधान रच रही है और मालिकों को शोषण करने की नंगी क़ानूनी आज़ादी दे रही है।

इतिहास का सबक़ – इटली में फ़ासीवाद द्वारा मज़दूर वर्ग के अधिकारों पर हमला और मोदी सरकार के ‘चार लेबर कोड’

भारत में चार श्रम संहिताओं के ज़रिये मोदी सरकार ने हड़ताल के अधिकार पर हमला किया है तथा यूनियन बनाने के हक़ को कमज़ोर कर दिया है। इटली में फ़ासिस्ट यूनियन की तर्ज़ पर ही भारत में ‘भारतीय मज़दूर संघ’ को फ़ासीवादियों द्वारा खड़ा किया है जो पूरी तरह से एक सरकारी यूनियन ही है। इटली के उदाहरण से भारत में समानता साफ़ देखी जा सकती हैं लेकिन भारत के फ़ासिस्टों को यह याद है कि मुसोलिनी का अन्त में क्या हश्र हुआ था! इतिहास से सबक़ लेते हुए इसलिए उन्होंने इटली की तरह संसद, जनवादी संस्थाओं का और श्रम क़ानूनों का समूल नाश नहीं किया है। लेकिन आज के दौर में फ़ासीवादियों द्वारा पूँजीवादी राज्यसत्ता की जनवादी अन्तर्वस्तु को लगातार नष्ट करते हुए भी इसके खोल को बरक़रार रखने के वस्तुगत कारण भी हैं। आज के नवउदारवादी पूँजीवाद के दौर में पूँजीवादी राज्यसत्ता में उतनी भी जनवादी सम्भावनाएँ बची नहीं जितनी कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में थीं और उन्हें ध्वस्त करना भी इसलिए फ़ासीवादी शक्तियों के लिए आवश्यक नहीं रह गया है।

पायलट-विमानकर्मियों के हितों और यात्रियों की सुरक्षा को ताक पर रखकर मोदी सरकार की पूँजीपतियों के प्रति वफ़ादारी एक बार फिर हुई ज़ाहिर!

इस घटना के बाद से देश के पूँजीपतियों के प्रति मोदी सरकार की पक्षधरता एक बार फिर ज़ाहिर हो गयी है। मोदी सरकार इण्डिगो के मुनाफ़े को बचाने के लिए जी जान से लगी हुई है। उन्हें न तो पायलट और क्रू के लोगों के ऊपर कामों के बढ़ते दबाव से कोई मतलब है और न ही लोगों की सुरक्षा से। मोदी सरकार उस काम को बख़ूबी निभा रही है, जिसे करने के लिए इन पूँजीपतियों ने उसे करोड़ों का चन्दा दिया था और सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाया था। इस पूरे मसले को लेकर जहाँ एक ओर मोदी सरकार की पक्षधरता साफ़ तौर पर नज़र आ रही है वहीं दूसरी ओर कुछ लोग एकाधिकार पूँजीवाद के बरक्स “मुक्त प्रतिस्पर्धा” के दौर के पूँजीवाद की वकालत कर रहे हैं क्योंकि विमानन सेक्टर में इण्डिगो फिलहाल एक इजारेदार की स्थिति में है। लेकिन ऐसे “भोले” लोग यह नहीं समझ पाते है कि न तो पूँजीवाद के मुक्त प्रतिस्पर्धा के दौर में प्रतिस्पर्धा वास्तव में “मुक्त” थी और न ही आज इजारेदारी के दौर में प्रतिस्पर्धा पूरी तरह समाप्त हो गयी है। ये दोनों दौर असल में पूँजीवाद के ही अलग-अलग चरण हैं। हमें यह समझना होगा कि अपने आप में यह समस्या पूँजीवाद-जनित है, और एकाधिकार पूँजीवाद असल में “मुक्त प्रतिस्पर्धा” की ही तार्किक परिणति है। इसलिए इस समस्या को, बिना पूँजीवादी व्यवस्था से जोड़े, न तो समझा जा सकता है और न ही हल किया जा सकता है। मुनाफ़े के लिए मज़दूरों-कर्मचारियों के ऊपर कामों के बढ़ते दबाव और उनकी इस स्थिति का स्थायी समाधान असल में पूँजीवाद के ख़ात्मे के बिना मुमकिन नहीं है।

उत्तर प्रदेश औद्योगिक संशोधन क़ानून : मुँह में राम बगल में छुरी

योगी सरकार द्वारा श्रम क़ानूनों में किया गया बदलाव मज़दूरों के ऐतिहासिक तौर पर जीते गये 8 घण्टे काम के अधिकार को छीन लेता है। जबकि वर्तमान तकनीकी प्रगति और श्रम की उत्पादकता में वृद्धि को देखते हुए काम के घण्टों की क़ानूनी सीमा 8 घण्टे से काफ़ी कम होनी चाहिए। इतना ही नहीं 8 घण्टे की तीन शिफ़्ट को 12 घण्टे की दो शिफ़्ट में बदल देने से मज़दूरों की एक तिहाई आबादी बेरोज़गार होकर मज़दूरों की रिज़र्व आर्मी को बढ़ायेगी जो दूरगामी तौर पर मज़दूरों की पूँजीपतियों से मोल-भाव करने की उनकी ताक़त को और घटायेगी। 12 घण्टे की शिफ्ट (जिसमें बिना रुके 6 घण्टे काम करने का नियम शामिल है) मज़दूरों को न केवल शारीरिक तौर बहुत नुक़सान पहुँचायेगी वरन उनकी सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता की सम्भावना को भी सीमित करेगी। महिला मज़दूरों को रात की शिफ़्ट में काम करवाने की अनुमति इसलिए दी गयी है ताकि मालिकों को सस्ता से सस्ता श्रम 24 घण्टे उपलब्ध हो सके। हालाँकि इन नियमों के लागू होने से पहले भी बहुत से कारख़ानों में नियमों को ताक पर रखकर महिलाओं की नाइट शिफ़्ट चल रही थी।

करोड़ों मज़दूरों-कर्मचारियों पर क़हर बरपाने वाले चार लेबर कोड लागू हुए! इन काले क़ानूनों के खिलाफ़ मज़दूर वर्ग को लम्बी व जुझारू लड़ाई की तैयारी करनी होगी!

‘औद्योगिक सम्बन्ध संहिता’ को इसलिए तैयार किया गया है कि मालिकों को बिना किसी नोटिस या जवाबदेही के मज़दूरों को काम से निकालने का रास्ता साफ़ हो जाये। यानी रोज़गार की सुरक्षा के प्रति मालिक की सारी क़ानूनी ज़िम्मेदारी को ख़त्म करने का रास्ता खोल दिया गया है; जब चाहे मज़दूरों को काम पर रखो और जब चाहे उन्हें निकाल बाहर करो! पूँजीपति वर्ग बहुत समय से यह “आज़ादी” माँग रहा था। यह संहिता लागू होने का मतलब यह होगा कि किसी भी मज़दूर के लिए स्थायी नौकरी का सपना देखना भी असम्भव हो जायेगा। साथ ही जिन कारख़ानों में 300 तक मज़दूर हैं, उन्हें ‘लेऑफ़’ या छँटनी करने के लिए सरकार की इजाज़त लेने की अब ज़रूरत नहीं होगी (पहले यह संख्या 100 थी)। मैनेजमेंट को 60 दिन का नोटिस दिये बिना मज़दूर हड़ताल पर नहीं जा सकते। अगर किसी औद्योगिक न्यायाधिकरण में उनके मामले की सुनवाई हो रही है, तो फ़ैसला आने तक मज़दूर हड़ताल नहीं कर सकते। इन बदलावों का सीधा मतलब है कि कारख़ानों में हड़ताल लगभग असम्भव हो जायेगी क्योंकि अगर 300 मज़दूरों से कम हैं (जो काग़ज़ पर दिखाना बिल्कुल आसान है), तो कम्पनी हड़ताल के नोटिस की 60 दिनों की अवधि में आसानी से छँटनी करके नये लोगों की भरती कर सकती है।

दिल्ली में म्यूनिसिपल कर्मचारियों की हड़ताल – भाजपा का मज़दूर-कर्मचारी-विरोधी चेहरा एक बार फिर हुआ बेनक़ाब!

एमसीडी के ये कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर इन कामों को अंजाम देते हैं लेकिन दिल्ली में “चार इंजन” की सरकार इन्हें बुनियादी सुरक्षा देने में नाकाम है। ड्यूटी के दौरान जोखिम भरे हालात में काम करने वाले कर्मचारियों की मौत होने पर उनके परिजनों को नौकरी तक नहीं दी जाती है। बीमारी की स्थिति में, काम पर न आ पाने की सूरत में, जितने दिन काम पर नहीं आये उतने दिन की तनख़्वाह काट ली जाती है। “एक देश एक टैक्स” और “एक देश एक चुनाव” का राग अलापने वाली भाजपा सरकार देश की राजधानी में इन कर्मचारियों को कहीं 12 हज़ार रुपये तो कहीं 20 हज़ार रुपये में खटा रही है लेकिन “एक काम एक वेतन” नहीं दे रही है! एक ही विभाग के अन्दर छ: अलग अलग वेतनमान लागू होते हैं। 5200 कर्मचारियों में मात्र 212 लोगों को 27 हज़ार रुपये वेतन मिलता है।

बेरोज़गारी की आग अब टेक व आईटी सेक्टर के खाते-पीते मज़दूरों को भी ले रही है अपनी ज़द में

पिछले महीने प्राइवेट सेक्टर के स्वर्ग कहे जाने वाले टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), और उसके बाद पूरे आईटी सेक्टर में, तब खलबली मच गयी जब कम्पनी ने 12,000 कर्मचारियों की छँटनी का खुलासा किया। इनमें से कई मँझोले स्तर के खाते-पीते, 6 से 10 साल काम कर चुके कर्मचारी भी हैं। नौकरी से निकाले जाने वाले इन कर्मचारियों को उनकी छँटनी के बारे में पहले से कोई सूचना या कोई नोटिस भी नहीं दी गयी है। टीसीएस कर्मचारियों के अनुसार हर दिन दर्जनों कर्मचारियों को मैनेजर के दफ़्तर में बुलाकर धमकाया जा रहा है कि अगर वे “स्वेच्छा” से नौकरी से इस्तीफ़ा नहीं देते हैं तो उनकी वेतन रोक दी जायेगी और उन्हें ‘ब्लैकलिस्ट’ कर दिया जायेगा जिससे उन्हें भविष्य में कोई दूसरी कम्पनी नौकरी नहीं देगी। आईटी सेक्टर के कार्यपद्धति के जानकारों का यह कहना है कि इस तरीक़े से डरा-धमका कर “स्वैच्छिक” इस्तीफ़ा लेना आईटी सेक्टर में एक आम बात है जो हर कम्पनी करती है। यह इसलिए किया जाता है ताकि इस मसले पर कम्पनियों की अपनी जबावदेही ख़त्म हो जाये और औद्योगिक विवाद अधिनियम जैसे बचेखुचे श्रम क़ानूनों और छँटनी-सम्बन्धी क़ानूनों में उन्हें न उलझना पड़े। बिना नोटिस के छँटनी करना और फिर डरा-धमका कर “स्वैच्छिक” इस्तीफ़ा लेने पर मजबूर करना – यह पूरी प्रक्रिया निहायत ही ग़ैरक़ानूनी है। लेकिन बिडम्बना यह है कि टीसीएस, विप्रो, इन्फोसिस, एचसीएल जैसी बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ यह सब श्रम विभाग और सरकार के शह पर करती हैं। आख़िर मज़ाल है किसी की जो “विकसित भारत” के विकास रथ के इन अग्रिम घोड़ों के तरफ़ आँख भी उठाकर देख सके!

रणनीति की कमी की वजह से हैदराबाद में ज़ेप्टो डिलीवरी वर्कर्स की हड़ताल टूटी

कम लोगों को ही इस बेरहम सच्चाई का एहसास होता है कि ज़ेप्टो कम्पनी का वायदा पूरा करने के लिए उसके डिलीवरी मज़दूरों को अपनी जान और सेहत जोख़िम में डालनी पड़ती है। एक ओर इन मज़दूरों की आमदनी में लगातार गिरावट आती जा रही है वहीं दूसरी ओर उनके काम की परिस्थितियाँ ज़्यादा से ज़्यादा कठिन होती जा रही हैं। समय पर डिलीवरी पहुँचाने की हड़बड़ी में आए दिन उनके साथ सड़क दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। इन हालात से तंग आकर हाल ही में हैदराबाद में रामंतापुर और बोद्दुपल इलाक़ों में स्थित ज़ेप्टो डार्क स्टोर्स के डिलीवरी मज़दूरों ने हड़ताल पर जाने का फ़ैसला किया। डार्क स्टोर ज़ेप्टो जैसी गिग कम्पनियों द्वारा संचालित ऐसे स्टोर होते हैं जहाँ से डिलीवरी मज़दूर कोई ऑर्डर मिलने पर ग्राहक का सामान उठाते हैं।

तेलंगाना की फ़ार्मा-केमिकल फ़ैक्ट्री में भीषण आग – मालिक के मुनाफ़े की भट्ठी में जलकर ख़ाक हो गये 52 मज़दूर

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में भारत में 269 से अधिक केमिकल फ़ैक्टरियों, कोयला खदानों और निर्माण स्थलों पर बड़े औद्योगिक हादसे हुए हैं। इन सभी हादसों की जड़ में मुनाफ़े पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था ही है। ये बढ़ती औद्योगिक दुर्घटनाएँ पूँजीवाद के मानवद्रोही चरित्र को सरेआम उजागर कर देती हैं। आज मज़दूरों के सामने सवाल यह है कि वे आख़िर कब तक पूँजीपतियों के मुनाफ़े की भट्टी में झोंके जाने को बर्दाश्त करते रहेंगे? इससे पहले कि पूँजीवाद हमारी ज़िन्दगी और हमारे सपनो को जलाकर ख़ाक कर दे हमें पूँजीवाद को ख़ाक में मिलाने के लिए कमर कसनी होगी।

दिल्ली के मज़दूरों के लिए न्यूनतम वेतन बढ़ाने की घोषणा! भाजपा सरकार द्वारा फेंका गया एक और जुमला !!

यह भी बता दें कि यही “मज़दूर हितैषी” भाजपा सरकार है, जो चार लेबर कोड लेकर आयी है, जिसके लागू होने के बाद न्यूनतम वेतन जैसे क़ानूनों का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा। मोदी सरकार द्वारा पूँजीपतियों को रहे-सहे श्रम क़ानूनों की अड़चन से मुक्त कर मज़दूरों के बेहिसाब शोषण करने के लिए 44 केन्द्रीय श्रम क़ानूनों की जगह चार कोड या संहिताएँ बनायी गयी हैं- मज़दूरी पर श्रम संहिता, औद्योगिक सम्बन्धों पर श्रम संहिता, सामाजिक सुरक्षा पर श्रम संहिता और औद्योगिक सुरक्षा एवं कल्याण पर श्रम संहिता। मज़दूरी श्रम संहिता के तहत पूरे देश के लिए वेतन का न्यूनतम तल-स्तर निर्धारित किया जायेगा। सरकार का कहना है कि एक त्रिपक्षीय समिति इस तल- स्तर का निर्धारण करेगी, मगर इस सरकार के श्रम मन्त्री पहले ही नियोक्ताओं के प्रति अपनी उदारता दिखाते हुए प्रतिदिन के लिए तल-स्तरीय मज़दूरी 178 रुपये करने की घोषणा कर चुके हैं। यानी, मासिक आमदनी होगी महज़ 4,628 रुपये! यह राशि आर्थिक सर्वेक्षण 2017 में सुझाये गये तथा सातवें वेतन आयोग द्वारा तय किये गये न्यूनतम मासिक वेतन 18,000 रुपये का एक-चौथाई मात्र है।