Category Archives: श्रम क़ानून

नोएडा मज़दूर आन्दोलन – सर्वोच्च न्यायालय ने ज्ञानेश कुमार पुत्री को दी राहत, जुर्माने के आदेश पर लगायी रोक! सुनवाई की प्रक्रिया गम्भीर सवालों के घेरे में!

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाला भारत उन चन्देक देशों में से है जहाँ का संविधान ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ के क़ानून की इजाज़त देता है, जिसके तहत केवल सरकार या पुलिस प्रशासन के अधिकारियों के ‘मनोगत तौर पर सन्तुष्ट’ होने के आधार पर किसी को भी बिना किसी सबूत या ट्रायल के अधिकतम 12 माह तक जेल में रखा जा सकता है। 1980 में इस क़ानून के बनने के पहले 1977 तक ऐसा ही एक दूसरा क़ानून ‘मीसा’ 1971 से प्रभाव में था। उसके पहले 1950 में एक प्रिवेण्टिव डिटेंशन क़ानून आया था। 1977 से 1980 तक के तीन वर्ष ही आज़ाद भारतीय गणराज्य में ऐसा दौर हैं, जबकि ऐसा ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ का कोई क़ानून मौजूद नहीं था। इसके अलावा, आज़ाद भारत के पूरे इतिहास में आम इंसान की आज़ादी का मख़ौल बनाने वाला कोई न कोई ऐसा क़ानून मौजूद रहा है।

भाजपा की योगी सरकार द्वारा मालिकों और पूँजीपतियों की सेवा में मेहनतकशों-मज़दूरों पर थोपा गया अमानवीय शोषण, दमन, अन्याय और आतंक का राज

भाजपा सरकारें, केन्द्र में व हर राज्य में, मज़दूरों की सबसे बड़ी दुश्मन साबित हुई हैं। यह बात हरेक सचेत मज़दूर और मेहनतकश को पता है। न सिर्फ़ नोएडा में बल्कि बरौनी में, पानीपत में, सूरत में और हर जगह भाजपा सरकारों के राज में पूँजीपतियों के हितों को साधने के लिए मज़दूरों की हर आवाज़ का क्रूरता से दमन किया गया है। अगर आप मज़दूरों की औसत मज़दूरी की राज्यवार पड़ताल करें, तो पाएँगे कि दिल्ली को छोड़ दें (जहाँ क़ानूनी काग़ज़ी न्यूनतम मज़दूरी कुछ ज़्यादा होने के ऐतिहासिक व आर्थिक कारण हैं और जो लागू भी नहीं होती!), तो अधिकांश भाजपा-शासित राज्यों में मज़दूरों की औसत मज़दूरी सबसे निचली कतारों में आती है। सभी भाजपा-शासित राज्यों में ठेकाकरण की रफ़्तार सबसे तेज़ है। श्रम कानूनों के उल्लंघन के मामले में भी भाजपा-शासित राज्य ही सबसे आगे हैं।

मज़दूर अधिकारों की क़ीमत पर ही सही, “उद्योग का भविष्य” चमकते रहना चाहिए!

पिछले कुछ समय में हमारे देश के न्यायालयों ने एक के बाद एक कई ऐसे फैसले दिये हैं जिससे कि वे ‘न्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी कम बल्कि ‘अन्यायिक व्यवस्था’ की नुमाइन्दगी करते अधिक नज़र आये हैं। कई मसले देश की सुर्खियों में आये जो सीधे तौर पर न्यायालयों के जन-विरोधी चरित्र को दिखा रहे थे मगर ऐसे कई मसले सुर्खियों से भी ग़ायब रहे जो इस देश की आम मेहनतकश आबादी की ज़िंदगियों का फ़ैसला करते थे! इसी तरह का एक मसला बीते 20 अगस्त को चीफ़ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता में नौ न्यायाधीशों की खण्डपीठ द्वारा सुना गया। मामला उद्योग, उद्योगपतियों और मज़दूरों से जुड़ा हुआ था।

सूरत में साप्ताहिक छुट्टी, वेतन बढ़ोत्तरी और आठ घण्टे के काम की माँग को लेकर आन्दोलनरत हैं मज़दूर!

इन मज़दूरों से 15-18 हज़ार के मासिक वेतन पर जानवरों की तरह काम कराया जाता है। 12 घण्टे फ़ैक्टरी के भीतर काम करने के बाद 3-4 घण्टे घर आने-जाने में लग जाते हैं। इसके बाद न तो शरीर को आराम मिल पाता है और न पर्याप्त भोजन। बेहतर शिक्षा और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी दूर की कौड़ी हैं। फैक्टरी, कारखाने में श्रम कानून लागू नहीं होते हैं। टेक्सटाइल मज़दूरों का कहना है कि काम के पीक सीज़न के दौरान मालिक मन-मुताबिक काम करवाता है और मना करने वाले मज़दूरों को काम से निकाल दिया जाता है। मजबूरन लोगों को दिन-रात जानवरों की तरह खटना पड़ता है। ये हालात सिर्फ़ गुजरात के मज़दूरों के नहीं हैं। देशभर में कमोबेश यही हालात हैं और पिछले 12 सालों में मेहनतकश आबादी की ज़िन्दगी और नारकीय हुई है। श्रम क़ानूनों के ज़रिये जो थोड़े-बहुत अधिकार मज़दूर हासिल कर पाते थे उसे भी भाजपा सरकार ने छीनने का काम किया है।

‘नोएडा के मज़दूरों और कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए अभियान’ (CaRWAN) के बैनर तले दिल्ली में विरोध प्रदर्शन

प्रोफेसर नंदिता नारायण ने कहा, “मुझे आकृति, हिमांशु और योगेश जैसे छात्रों पर गर्व है। आज की पीढ़ी के छात्रों को ऐसा ही करना चाहिए। केवल अपने करियर के बारे में सोचने के बजाय उन्होंने अपनी शिक्षा का उपयोग उत्पीड़ित लोगों की आवाज़ बनने के लिए किया। सभा में उपस्थित छात्रों को सम्बोधित करते हुए प्रो. नंदिता ने विश्वविद्यालयों में जनवादी स्पेस के सिकुड़ने पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “यह वास्तव में परेशान करने वाली बात है कि योगेश को यूपी पुलिस के सिविल ड्रेस में आए पुलिसकर्मियों द्वारा नॉर्थ कैंपस के अन्दर से अगवा किया गया और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।” सामाजिक कार्यकर्ता नौरीन ने नोएडा मज़दूर आन्दोलन के बाद यूपी पुलिस द्वारा चलाए गए “विच हंट” पर विस्तार से बाते रखी। यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने निजी स्थानों, लाइब्रेरी और कई जगहों पर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से छापेमारी की और बिना किसी उचित प्रक्रिया के युवाओं को अगवा कर अवैध रूप से गिरफ़्तार किया। नौरीन ने यह भी बताया कि ट्रैकिंग और निगरानी अभी भी जारी है। यूपी पुलिस के अधिकारी अब भी दिल्ली में महिला छात्रों का पीछा कर रहे हैं, उन्हें धमका रहे हैं। उन्होंने कहा, “ पुलिस ने मुझे भी अगवा किया था, मेरी धार्मिक पहचान के कारण प्रताड़ित किया, मुझे बांग्लादेशी तक कहा।”

विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट से लेकर सूरत के सेप्टिक टैंक तक कार्यस्थल पर मज़दूरों की मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है!

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में हर रोज़ कार्यस्थल पर हुई दुर्घटनाओं में 3 लोगों की मौत हो जाती है। हम सभी जानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा होगी। इसके बावजूद मज़दूरों की सुरक्षा कभी भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय नहीं बनती। नवउदारवादी पूँजीवाद के इस दौर में मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति उपेक्षा और लापरवाही लगातार बढ़ती गयी है। मुनाफ़े की नाली बेरोकटोक बहती रहे इसके लिए उसमें आने वाली बाधाओं को एक-एक करके हटाया जा रहा है। मज़दूरों के अधिकारों को लगातार छीना जा रहा है। ज़्यादातर काम ठेके पर कराये जा रहे हैं ताकि मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति कोई जवाबदेही ही न रहे। हाल ही में लागू हुए 4 मज़दूर-विरोधी लेबर कोड में से एक मज़दूरों की पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों से सम्बन्धित है। इसके नाम से किसी को लग सकता है कि इसमें ज़्यादा से ज़्यादा फ़ैक्ट्रियों में काम की परिस्थितियों को ज़्यादा सुरक्षित करने की बात होगी। पर असलियत यह है कि इस कोड में फ़ैक्ट्री की परिभाषा को ही इस तरह बदल दिया गया है कि देश की क़रीब आधी फ़ैक्ट्रियों को सुरक्षा की जवाबदेही से ही छुटकारा मिल गया है। ऐसे में स्प्ष्ट है कि इस देश का बेशर्म और बेरहम हुक़्मरान तबक़ा विशाखापट्टनम और सूरत जैसे हादसों के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है।

जनता के विरोध से घबराकर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बार फिर लगाया एस्मा!

उत्तर प्रदेश में लगे एस्मा का खास महत्व है। इसे हमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों में बढ़ते असंतोष को दबाने के क्रम में देखने की ज़रूरत है। इस समय उत्तर प्रदेश में गहराते आर्थिक संकट, बिजली संकट और इन संकटों की वजह से बढ़ते जनाक्रोश की परिस्थिति से निपटने के लिए एस्मा लगाया गया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनावों से पहले योगी सरकार अपने कुशासन और जनविरोधी शासन के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के प्रतिरोध को पनपने से पहले ही कुचल देने कि कोशिशें कर रही है। इसीलिए योगी सरकार कभी एस्मा लगाती है तो कभी मज़दूर कार्यकर्ताओं के ऊपर रासुका जैसा दमनकारी क़ानून लगा दिया जाता है ताकि लोग अपनी बुनियादी माँगों मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार, आवास, न्यूनतम वेतन आदि के लिए एकजुट और संगठित न हो सकें।

एक इंसान जैसी ज़िन्दगी जीने के लिए न्यूनतम मज़दूरी कितनी होनी चाहिए?

हमारे देश में 90 फ़ीसदी से ज़्यादा अनौपचारिक मज़दूरों की औसत मासिक आय 10 से 12 हज़ार रुपये के क़रीब है! यह हमारी मानवीय गरिमा पर चोट नहीं है तो क्या है? हमें कीड़ा-मकोड़ा और कॉकरोच समझा जाता है। हमें न तो इंसान माना जाता है और न ही इंसानों जैसा बर्ताव हमारे साथ किया जाता है। पूँजीपतियों के लिए हम बोझा ढोने वाले पशुओं से ज़्यादा और कुछ नहीं हैं, जिन्हें बस जीने की ख़ुराक़ दे दी जाय और बदले में वे कमरतोड़ मेहनत कर धन्नासेठों की तिजोरियाँ भर सकें, उनकी औलादों की ऐय्याशियों का ख़र्च उठा सकें, उनकी सात पुश्तों का भविष्य सुरक्षित कर सकें, जबकि हमारे बच्चे हमेशा भूख और कुपोषण की रेखा पर जियें, दवा-इलाज से वंचित रहें, शिक्षा उनकी पहुँच से बाहर रहे और हम पुश्त-दर-पुश्त रोज़ ग़ुलामों के समान खटने का अभिशप्त हों।

कर्नाटक और तेलंगाना में न्यूनतम वेतन वृद्धि : नाकाफ़ी और देरी से लागू की गयी बढ़ोत्तरी

यह वेतन वृद्धि भी कांग्रेस की सरकारों ने किसी भलमनसाहत से नहीं बल्कि इन राज्यों में सम्भावित मज़दूर आन्दोलन की लहर से घबराकर की है क्योंकि सतह के नीचे इन दोनों राज्यों में भी मज़दूरों का गुस्सा और उनकी नाराज़गी पनप रही थी। कर्नाटक में पूँजीपति इसका कड़ा विरोध करने में लगे हैं। उनके अनुसार मज़दूरी पर वे पहले ही बेहद अधिक “ख़र्चा” कर रहे हैं और इसे और बढ़ाना सरासर अन्याय है! जैसा कि हमने ऊपर बताया, यह कोरा झूठ है। असलियत यह है कि पूँजीपतियों द्वारा मज़दूरी पर होने वाला निवेश लगातार ही घटाया गया है और पूँजीपति इसे और भी कम कर देना चाहते हैं। पहली बात तो यह है कि पूँजीपति मज़दूरी पर “ख़र्च” नहीं बल्कि निवेश करते हैं, जो मज़दूरों के श्रम से पैदा मुनाफ़े के साथ उनके पास वापस आ जाता है। मालिक का मुनाफ़ा मज़दूर के शोषण के ज़रिये हासिल होता है। मज़दूरी और कुछ नहीं बल्कि एक मज़दूर की श्रमशक्ति की क़ीमत होती है और एक मज़दूर श्रमकाल के एक हिस्से से अपनी मज़दूरी के बराबर मूल्य पैदा करता है तो बाक़ी हिस्सा मालिक बेशी-मूल्य के रूप में हड़पता है। यही उसके मुनाफ़े का आधार होता है। मालिक हर-हमेशा कोशिश करता है कि मज़दूरी कम की जाये ताकि मुनाफ़ा और उसकी दर को बढ़ाया जा सके। मुनाफ़ा और मज़दूरी व्युत्क्रमानुपाती होते हैं। इसको गोल करके कर्नाटक के पूँजीपति कोर्ट में और मीडिया में नंगा झूठ बोल रहे हैं। उनके अनुसार, कर्नाटक सरकार द्वारा की गयी वेतन-बढ़ोत्तरी उनका दमन है और उनके धन्धा करने के संवैधानिक हक़ का हनन है! पूँजीवादी मानकों से इन सेठों-व्यापारियों का कहना सही भी है क्योंकि पूँजीवादी जनवाद का मर्म ही मज़दूरों के लिए यह है कि पूँजीपतियों को मज़दूरों का शोषण करने की आज़ादी मिले!

कॉकरोच जनता पार्टी और उसकी लोकप्रियता : भारतीय जनता में व्‍यवस्‍था और मौजूदा सरकार के प्रति बढ़ते गुस्‍से व असन्‍तोष और साथ ही विकल्‍पहीनता की अभिव्‍यक्ति 

कॉकरोच जनता पार्टी की अचानक बढ़ी भारी लोकप्रियता के पीछे मुख्‍य कारण यह है कि हमारे देश का शासक वर्ग, उसकी राज्‍यसत्‍ता और उसके विभिन्‍न अंग-उपांग मेहनतकश जनता की तक़लीफ़ों के प्रति आश्‍चर्यजनक असंवेदनशीलता दिखा रहे हैं और उनका रवैया काफ़ी हद तक पुराने फ्रांस की रानी मैरी एन्‍त्‍वानेत जैसा हो चुका है जिसने पूछा था कि “अगर जनता के पास खाने के लिए रोटी नहीं है, तो वह केक क्‍यों नहीं खा लेती?” उसी प्रकार, भूख और कुपोषण की कगार पर खड़ी भारी बहुसंख्‍यक मेहनतकश और आम मध्‍यवर्गीय आबादी को बताया जा रहा है कि “सब चंगा सी”, “मेलोडी खाओ खुद जान जाओ”, “देश शान्ति और विकास के पथ पर अग्रसर है”, आदि। वहीं दूसरी ओर, खाता-पीता उच्‍च मध्‍य वर्ग और उच्‍च वर्ग नशे में बुरी तरह से टल्‍ली है। यह नशा है उपभोक्‍तावाद, खाऊ-पियू-अघाऊ संस्‍कृति का जिसमें चूर यह वर्ग निरन्‍तर “खाओ-पियो-ऐश करो मितराँ” गाने पर उन्‍मादी नृत्‍य करता रहता है। उसे न सिर्फ़ सुई से लेकर जहाज़ तक बनाने वाली और हर सेवा पैदा करने वाली जनता के दुख-दर्द से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वह उसकी खिल्‍ली भी उड़ाता है। प्राचुर्य और धनाढ्यता का उसका यह अश्‍लील प्रदर्शन भी आँसुओं के समन्‍दर में खड़ी मेहनतकश जनता के धैर्य को परख रहा है।