मोदी सरकार के चार लेबर कोड क्या हैं और ये मज़दूर-विरोधी क्यों हैं?
नये क़ानून के नाम पर जो वास्तविक अधिकार वैधानिक तौर पर मज़दूरों को प्राप्त थे, उनका मर्म ख़त्म कर, उन्हें केवल झुनझुने में तब्दील करने का काम किया जा रहा है। ये नयी संहिताएँ श्रमिक सुरक्षा को कमज़ोर करती हैं, असुरक्षा को बढ़ाती हैं और श्रम कानूनों के नाम पर जो सीमित क़ानूनी ताक़त मज़दूरों के पास थी, उन्हें अब खुले तौर पर मालिकों के पक्ष में स्थानांतरित करती हैं। सच तो यह है कि श्रम कानूनों को तमाम तरह के संशोधनों के साथ पहले की सरकारें भी कमज़ोर करती रही हैं। व्यवहार में वे आम तौर पर कागज़ी ही साबित होते रहे हैं। यह भी सच है की श्रम क़ानूनों के ठोस अनुपालन की कोई व्यवस्था नहीं रही है। श्रम विभाग आम तौर पर मालिकों के पक्ष में ही काम करता रहा है। हालाँकि मज़दूर आन्दोलन का इतिहास बताता है कि जब मज़दूर संगठित होकर संघर्ष करते थे और क़ानूनी लड़ाइयाँ लड़ते थे तो इन क़ानूनों को एक हद तक अपने पक्ष में लागू करवाने में सफलता भी हासिल कर लेते थे। लेकिन इन नयी संहिताओं के साथ अब मज़दूरों-कर्मचारियों के लिए स्थिति बेहद दुरूह हो जायेगी। व्यवहार में मज़दूरों से जो पहले छीना जा रहा था, अब मोदी सरकार उसे ही वैधानिक जामा पहनाकर नया विधान रच रही है और मालिकों को शोषण करने की नंगी क़ानूनी आज़ादी दे रही है।






















