सुप्रीम कोर्ट का मज़दूर-विरोधी चेहरा एक बार फिर बेनक़ाब!
घरेलू कामगारों को न्यूनतम मज़दूरी देने की याचिका को किया ख़ारिज!!

नौरीन

न्याय, बराबरी और निष्पक्षता का ढोंग करने वाली पूँजीवादी न्याय व्यवस्था का मज़दूर विरोधी चरित्र एक बार फिर सामने आ गया है। घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन की माँग को 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त और जॉयमाल्या बागची वाली न्यायपीठ ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मज़दूरी को मौलिक अधिकार के रूप में अस्वीकार करते हुए जो तर्क दिये हैं उसने एक बार फिर यह साफ़ कर दिया है कि न्याय आज किसके पक्ष में है! वैसे तो पूँजीवादी लोकतन्त्र के अंतर्गत रोज़-रोज़ न्याय व्यवस्था का मज़दूर विरोधी चरित्र बेहद घिनौने रूप में बाहर आता रहता है लेकिन हमारे देश में फ़ासीवादी भाजपा के सत्तासीन होने के बाद से पिछले 11 वर्षों में विशेष तौर पर न्यायालयों और समूची न्याय प्रणाली का घोर मज़दूर-विरोधी चेहरा स्पष्ट तौर पर सामने आया है। यह अनायास नहीं है। फ़ासीवादी शक्तियों ने न केवल सरकार में अपने पैर जमाये हैं बल्कि राज्य की पूरी मशीनरी पर ही भीतर से क़ब्ज़ा कर लिया है जोकि न्यायपालिका के बढ़ते फ़ासीवादीकरण के रूप में भी दिखलायी देता है।

घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मज़दूरी का क़ानून न बनाने के पीछे इस मामले में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त और जॉयमाल्या बागची की न्यायपीठ का यह तर्क है कि “अगर न्यूनतम मज़दूरी तय कर दी गयी तो लोग घरेलू कामगार रखना बन्द कर देंगे। हर घर मुक़दमेबाज़ी में फँस जायेगा।” यह तर्क साफ़ तौर पर दिखाता है कि मुख्य न्यायाधीश महोदय के लिए अमीर और उच्च मध्यवर्गीय घरों को मुक़दमेबाज़ी से बचाना, करोड़ों घरेलू कामगारों को भुखमरी के स्तर से ऊपर उठाने से अधिक महत्वपूर्ण है।

आँकड़ों के अनुसार भारत में 5 करोड़ से भी ज़्यादा घरेलू कामगार हैं। उनकी स्थिति दयनीय है। 12 घण्टे अलग-अलग कोठियों में काम करने के बाद उन्हें बमुश्किल 7000-8000 रुपये मिलते हैं। आये दिन नियोक्ता द्वारा पैसा मार लिया जाता है। देशभर में घरेलू कामगारों की स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है। जातिगत भेदभाव से लेकर यौन उत्पीड़न की तमाम घटनाएँ सामने आती हैं लेकिन उनपर कोई कार्रवाई नहीं होती है। घरेलू कामगारों का मज़दूर के दर्जे के लिए संघर्ष कोई नया नहीं है। तमाम राज्यों में अलग-अलग यूनियनों व संगठनों ने इस मसले को उठाया है जिसका ही नतीजा था कि महाराष्ट्र में सरकार को घरेलू कामगारों के लिए सीमित ही सही लेकिन क़ानून बनाने पड़े थे। हालाँकि तमाम अन्य श्रम क़ानूनों की तरह ही यह भी शायद ही लागू होता था। राज्य व केन्द्र सरकारों की इस मसले की तरफ़ अनदेखी भी किसी से छुपी हुई नहीं थी। इसलिए ही, न्यूनतम मज़दूरी की बुनियादी माँग को लेकर तमाम संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया था जो कि कथित तौर पर हर तरह के अन्याय और ग़ैरबराबरी के ख़िलाफ़ इंसाफ के पक्ष में फैसला करने के लिए जानी जाती है! लेकिन कोर्ट के फ़ैसले ने उन लोगों की आँखों की पट्टी आख़िरकार उतार दी जिन्हें आज भी इस न्याय व्यवस्था से उम्मीद थी।

जस्टिस सूर्यकान्त ने जो दूसरा तर्क दिया है वह और भी ख़तरनाक है। मुख्य न्यायाधीश के अनुसार “हमारे देश में औद्योगिक विकास के ठीक से न फल-फूल पाने का कारण मज़दूरों की ट्रेड यूनियनें हैं।” लेकिन तथ्य मुख्य न्यायाधीश के तर्क से कोसों दूर हैं। मसलन भारत में कारखानों के बन्द होने का मुख्य कारण ट्रेड यूनियनें नहीं, बल्कि पूँजीपतियों के बीच की तीव्र प्रतिस्पर्धा है। पूँजीवाद का नियम ही यह है कि मुनाफ़े की इस अन्धी दौड़ में केवल कुछ ही कम्पनियाँ टिक पाती हैं।

पिछले दिसम्बर लोकसभा में कॉरपोरेट मामलों के राज्य मन्त्री हर्ष मल्होत्रा द्वारा दिये गये लिखित उत्तर के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में दो लाख से अधिक कम्पनियाँ बन्द हुई हैं। इन बन्दियों का कारण ट्रेड यूनियन नहीं, बल्कि विलय, रूपान्तरण, विघटन या कम्पनी अधिनियम 2013 के तहत आधिकारिक रिकॉर्ड से हटाया जाना था – जो कि पूँजीवादी प्रतिस्पर्धा के ही परिणाम हैं। इस प्रकार, सरकारी आँकड़े स्वयं मुख्य न्यायाधीश के दावों को खारिज़ करते हैं। इसके अलावा सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक पर विराजमान मुख्य न्यायाधीश महोदय की यह टिप्प्णी मज़दूरों के संगठित होकर यूनियन बनाने के अधिकार, उनके सामूहिक मोल-भाव की क्षमता और उनके संघर्ष करने के संवैधानिक और जनवादी अधिकारों पर भी एक क्रूर हमला है।

घरेलू कामगारों के ख़िलाफ़ यह फ़ैसला इस फ़ासीवादी दौर में न्यायापालिका के चरित्र को नंगे तौर पर उजागर करता है। यह फ़ैसला इस बात को साबित करता है कि बीते कुछ सालों में एक लम्बी प्रक्रिया में तमाम जनवादी संस्थाओं के फ़ासीवादीकरण की प्रक्रिया बेहद तेज़ी से बढ़ी है। दरअसल घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मज़दूरी के न्यायसंगत अधिकार और जायज़ माँग का विरोध करना क़ानून व्यवस्था की वर्ग पक्षधरता को ही दिखलाता है। यह बात फिर से साबित हो गयी कि आज न्यायिक व्यवस्था शोषण और उत्पीड़न को ख़त्म करने के लिए नहीं बल्कि उसको बनाये रखने और बढ़ावा देने के तौर पर काम कर रही है।

इसके साथ ही मुख्य न्यायाधीश के इस फ़ैसले को सिर्फ़ घरेलू कामगारों तक सीमित करके नहीं देखने की बजाय मोदी सरकार द्वारा लागू किये गये चार लेबर कोड से जोड़कर देखना चाहिए। चार लेबर कोड के ज़रिये जो क़ानून बनाये गये हैं ये फ़ैसला उसे और पुख़्ता करता है। इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। मोदी सरकार द्वारा लागू किये गये चार लेबर कोड में भी न्यूनतम वेतन की जगह 178 रुपये प्रति दिन के हिसाब से ‘फ्लोर लेवल वेतन’ की बात की गयी है। परमानेण्ट नौकरी की जगह ‘फ़िक्स्ड टर्म इम्पलायमेण्ट’ लाकर ठेका प्रथा को क़ानूनी रूप दिया गया है। यूनियन बनाने की प्रक्रिया इतनी जटिल बना दी गयी है कि यूनियन बनना लगभग असम्भव है।

घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन के दायरे में लाने वाली याचिका को ख़ारिज़ करके और यूनियन बनाने के अधिकार पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी से यह साफ ज़ाहिर होता है कि आज की न्याय व्यवस्था पूरी तरीक़े से मेहनतकश अवाम के विरोध में और बड़े-बड़े पूँजीपतियों और धनपशुओं के हितों के साथ खड़ी है। आज ज़रूरी है कि देशभर की घरेलू कामगार एकजुट और संगठित होकर अपने संघर्ष को और तेज़ करें। साथ ही अपने हक़-अधिकार हासिल करने के लिए लम्बी लड़ाई की तैयारी करें।

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2026

 

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