मोदी सरकार द्वारा लाये गये चार लेबर कोड और वीबी-ग्रामजी क़ानून के ख़िलाफ़ चलाये जा रहे अभियान को मिल रहा व्यापक जनसमर्थन!
मज़दूरों-कर्मचारियों के हक़ों पर हुए इस हमले के ख़िलाफ़  अनिश्चितकालीन आम हड़ताल ही संघर्ष का एकमात्र कारगर रास्ता है!

लेबर कोड के काले क़ानून के विरुद्ध देश के कई राज्यों में ‘भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी’ (RWPI), ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’, कई क्रान्तिकारी यूनियनों व अन्य जन संगठनों द्वारा पिछले तीन महीने से निरन्तर सघन अभियान चलाया जा रहा है। यह अभियान असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के साथ-साथ संगठित क्षेत्र के मज़दूरों-कर्मचारियों के बीच भी चलाया जा रहा है। दिल्ली, कलकत्ता, पटना, चण्डीगढ़, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, उत्तराखण्ड, तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश के कई ज़िलों में चलाये जा रहे इस अभियान को लोगों ने सराहा और अपना समर्थन दिया है। मालूम हो कि चार लेबर कोड व वीबी-ग्रामजी क़ानून फ़ासिस्ट मोदी सरकार द्वारा देश के करोड़ों शहरी-ग्रामीण मज़दूरों-कर्मचारियों के अधिकारों पर अब तक का सबसे बड़ा हमला है।

इस दौरान रेलवे, सड़क परिवहन, बन्दरगाह, दूरसंचार, डाक, बीएसएनएल, भेल, बिजली, बैंक, बीमा, पीडब्लूडी जैसे विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों और कारख़ानों के संगठित तथा असंगठित मज़दूरों से लेबर कोड की असलियत पर बात की गयी। इस अभियान के तहत लाखों की संख्या में पर्चे बाँटे गये हैं। कार्यस्थल पर लोगों से बातचीत के अलावा नुक्कड़ सभाओं, गीत, नाटक, पोस्टर्स आदि माध्यमों के ज़रिये लेबर कोड लागू करने की मोदी सरकार की असल मंशा को विस्तार से बताया गया है। साथ ही सोशल मीडिया के ज़रिए भी लगातार लोगों तक यह बात पहुँचाई जा रही है।

अलग-अलग विभागों में कार्यरत पक्के कर्मचारियों की तरफ़ से यह बात हर जगह ही आयी कि सरकार के दावों और हक़ीक़त में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है। असलियत में सभी सरकारी विभागों में ‘आउटसोर्सिंग’ के ज़रिये लोगों की अस्थायी भर्तियाँ पहले ही शुरू हो गयी थीं, पक्की भर्तियों की संख्या में कमी करके संगठित क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों पर काम का दबाव लगातार बढ़ाया जा रहा है और उनके बचे-खुचे अधिकारों को भी छीना जा रहा है। रेल जैसे देश के सबसे बड़े सेक्टरों में से एक में लोग अमूमन 10-12 घण्टे काम करने के लिए मजबूर हैं।

दरअसल इन श्रम संहिताओं का मक़सद देश के संगठितऔपचारिक क्षेत्र में कार्यरत 10 करोड़ मज़दूरकर्मचारी आबादी के हालात को भी असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों जैसा अरक्षित बना देना है ताकि पूँजीपतियों कोईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ (धन्धा करने में आसानी) का अधिकार दिया जा सके! संगठित क्षेत्र पहले से ही सिकुड़ता जा रहा है और अब वहाँ भी ठेके और ‘आउटसोर्सिंग’ के ज़रिये काम की पूरी छूट दी जा रही है और वर्षों के संघर्ष और क़ुर्बानियों के दम पर जो श्रम अधिकार हासिल हुए थे, उसे इस सरकार ने चार लेबर कोड के ज़रिये एक झटके में ख़त्म कर दिया है।

असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को पहले भी आम तौर पर श्रम क़ानूनों का फ़ायदा नहीं मिलता था लेकिन इन श्रम संहिताओं के आने के बाद से तो क़ाग़ज़ी तौर पर मौजूद उन क़ानूनों को भी ख़त्म कर दिया गया है जिसे कभी-कभार असंगठित क्षेत्र के मज़दूर लड़कर एक हद तक हासिल कर लेते थे।

चार लेबर कोड की असलियत पर विस्तार से हम ‘मज़दूर बिगुल’ के पुराने अंकों में लिखते रहे हैं लेकिन इसे लागू करने के पीछे मोदी सरकार की मंशा को एक बार फ़िर रेखांकित करने की ज़रूरत है। 1 अप्रैल 2026 से इन मज़दूर-विरोधी क़ानूनों को लागू किया जाना अनायास नहीं है। इसके पीछे की असली मंशा मुनाफ़े की गिरती औसत दर के संकट से जूझते पूँजीपति वर्ग का हित साधना है।

इस वक़्त दुनियाभर और भारत में पूँजीवाद के आन्तरिक अन्तरविरोधों से जन्मा आर्थिक संकट जैसे-जैसे गहराता जा रहा है, वैसे-वैसे पूँजीपति वर्ग अपने मुनाफ़े को बचाने के लिए तिलमिला रहा है और नित-नये क्षेत्रों का निजीकरण कर रहा है (रेलवे, एयरपोर्ट, उच्च शिक्षा, एलआईसी आदि), जंगल-पहाड़-नदियों को लूट रहा है और रहे-सहे श्रम क़ानूनों को भी ख़त्म कर रहा है। मोदी सरकार द्वारा लागू किये गये चार लेबर कोड के पीछे असल मंशा भी यही है कि कर्मचारियों-मज़दूरों की मेहनत को लूटने की खुली छूट पूँजीपतियों को दी जा सके। इन क़ानूनों के लागू होने के बाद कर्मचारियों का ‘वर्कलोड’ और काम के घण्टे तो बढ़ेंगे ही, साथ-साथ यूनियन बनाकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होने का हक़ भी छीन लिया जायेगा। देश के पूँजीपति वर्ग ने 2014 में इसी काम के लिए भाजपा और नरेन्द्र मोदी को सत्ता में पहुँचाया था और उनके चुनाव प्रचार पर अरबों रुपये ख़र्च किये थे। यह श्रम संहिताएँ पूँजी की इसी ज़रूरत को पूरा करने के लिए लायी गयी हैं। यह मज़दूरों-कर्मचारियों की पूरी मेहनतकश आबादी को ग़ुलामों की फ़ौज में तब्दील करने का एक फ़ासीवादी उपक्रम है। हालाँकि गोदी मीडिया के प्रचार के ज़रिये मोदी सरकार इन क़ानूनों के फ़ायदे गिनाने में ज़ोर-शोर से लगी हुई है ताकि लोग इस सच्चाई से वाकिफ़ ही न हो सकें।

लेबर कोड के विरुद्ध देशव्यापी अभियान में अधिकांश जगहों पर इस पूरी बातचीत से सहमति जताते हुए मज़दूरों-कर्मचारियों ने अपनी कार्यस्थितियों के उदाहरण से मोदी सरकार द्वारा किये गये हमलों की तस्वीर को स्पष्ट किया और साथ ही मज़दूर-वर्ग के हक़ों पर हुए इस फ़ासीवादी प्रहार के ख़िलाफ़ संघर्ष तेज़ करने की ज़रूरत और उसके स्वरूप पर भी बात की।

रेलवेे कर्मचारियों ने बताया कि 1990 से 2023 तक रेलवे के नेटवर्क में काफ़ी वृद्धि हुई है जबकि पहले के मुक़ाबले कर्मचारियों की संख्या कम कर दी गयी है या उनमें पर्याप्त बढ़ोतरी नहीं की गयी है। 1990 में रेलवे कर्मचारियों की कुल संख्या लगभग 19, 50,000 के क़रीब थी जिसमें 16,51,800 नियमित कर्मचारी और लगभग 3 लाख ठेका कर्मचारी कार्यरत थे। आज उसकी तुलना में कर्मचारियों की संख्या में गिरावट आयी है। अभी रेलवे में कर्मचारियों की कुल संख्या लगभग 18,06,189 है, जिसमें 12.18 लाख नियमित कर्मचारी कार्यरत हैं और क़रीब 5.87 लाख ठेका एवं कैजुअल कर्मचारी हैं। इससे साफ़ तौर पर यह पता चलता है कि रेलवे में ठेकाकरण बढ़ा है और पक्की भर्तियों में कमी आयी है। कर्मचारियों का न सिर्फ ‘वर्कलोड’ बढ़ा है बल्कि उनके हक़ों को भी एक-एक करके छीना जा रहा है। जैसे जनवरी 2004 में OPS (पुरानी पेंशन स्कीम) को ख़त्म करके कर्मचारियों के अधिकारों पर बड़ा हमला किया गया और 2004 के बाद नियुक्त कर्मचारियों के ऊपर जबरन NPS (नयी पेंशन योजना) थोप दिया गया। NPS लाने के बाद इसका ज़बरदस्त विरोध हुआ जिसके बाद कर्मचारियों के असन्तोष पर पानी का ठण्डा छींटा मारने के लिए UPS (युनाइटेड पेंशन योजना) का झुनझुना थमाया गया। लेबर कोड के ज़रिये सिर्फ़ रेलवे ही नहीं बल्कि पूरे पब्लिक सेक्टर को निजी हाथों में सौंपने का रास्ता साफ़ कर दिया जायेगा। बीएसनल, एलआईसी आदि की स्थिति से यह बात आज साफ़ है। रेलवे का किश्तों में निजीकरण तो बहुत पहले ही शुरू हो चुका था पर मोदी सरकार द्वारा इसे और तेज़ किया गया और अब तो रेलवे को पूँजीपतियों के हाथों में सौंप देने की कवायद अन्धाधुन्ध तरीक़े से जारी है। रेलवे के 400 स्टेशनों को निजी हाथों में सौंपने की योजना इसकी एक बानगी है।

जनवरी महीने में बैंक कर्मचारियों की यूनियन ने भी कार्यदिवस घटाने की माँग को लेकर राष्ट्रव्यापी हड़ताल की थी जिसमें RWPI ने भागीदारी की। यूनाइटेड फ़ोरम ऑफ़ बैंक यूनियन्स (यूएफबीयू) ने बताया कि मार्च 2024 में वेतन संशोधन समझौते के दौरान इण्डियन बैंक्स एसोसिएशन (आईबीए) और यूएफबीयू के बीच सभी शनिवारों को अवकाश घोषित करने पर सहमति बनी थी लेकिन इसे अब तक कार्यान्वित नहीं किया गया है। इसलिए मजबूरन उन्हें कामबन्दी करनी पड़ रही है। यूनियन के प्रतिनिधियों ने बताया कि ‘सप्ताह में पाँच दिनों के काम की माँग बेहद जायज़ है और तमाम विभागों में इसे लागू किया जाना चाहिए। आज विज्ञान व तकनीक के विकास का स्तर इतना बढ़ चुका है कि कम घण्टों में पर्याप्त काम/उत्पादन किया जा सकता है लेकिन पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था में उन्नत तकनीक का इस्तेमाल कर्मचारियों और मज़दूरों का जीवन आसान बनाने के लिए नहीं बल्कि उनसे और काम करवाकर मुनाफ़ा पैदा करने के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि ‘नये लेबर कोड’ में ओवरटाइम की व्याख्या को अस्पष्ट कर दिया गया है ताकि काम के घण्टे बढ़ाये जा सकें। इसके ज़रिये बेगार काम करवाने को क़ानूनी जामा पहनाकर और सामान्य बना दिया गया है। चार लेबर कोड के सेक्शन 14 में कहा गया है कि सामान्य दिन के काम के घण्टे सरकार के नोटिफ़िशन के ज़रिये तय होंगे और उससे अधिक काम करना ओवरटाइम कहलायेगा। यानी अगर सरकार सामान्य दिन में 10 घण्टे काम का नोटिफ़िकेशन जारी करती है, तो 10 घण्टे के बाद किया जाने वाला काम ही ओवरटाइम कहलायेगा।

लेबर कोड के ख़िलाफ़ चलाये जा रहे इस देशव्यापी अभियान का असर 12 फ़रवरी की एकदिवसीय हड़ताल में भी देखने को मिला। RWPI, ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ व कई यूनियनों ने कई इलाकों में हड़ताल में शिरकत की। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर हुई इस हड़ताल में अलग-अलग विभागों के कर्मचारियों और मज़दूरों ने भागीदारी तो की, लेकिन पूरी तरह से कामबन्दी देशभर में बहुत कम जगहों पर ही देखने को मिली। हालाँकि लेबर कोड के ख़िलाफ़ चलाये जा रहे इस अभियान में शामिल संगठनों ने अपनी ताक़त के हिसाब से काम बन्द करने से लेकर स्थानीय प्रदर्शनों, रैलियों, मीटिंग्स के आयोजन के ज़रिये मोदी सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों का विरोध जताया।

दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत यूनियनों के प्रतिनिधियों ने इकट्ठा होकर चार लेबर कोड के ख़िलाफ़ अपनी बात भी रखी। राजधानी के कई औद्योगिक इलाक़े में हड़ताल सफलतापूर्वक की गयी। बवाना के सेक्टर 5 में ‘बवाना औद्योगिक क्षेत्र मज़दूर यूनियन’ के नेतृत्व में हड़ताल की गयी। मज़दूरों ने अपनी ताक़त का ज़बरदस्त प्रदर्शन करते हुए एक-एक फ़ैक्ट्री बन्द करवायी और जुलूस में शामिल हुए। बवाना के सेक्टर 5 में क़रीब 80-90 फ़ीसदी फैक्टरियों में काम ठप्प रहा। वज़ीरपुर के इलाक़े में ‘दिल्ली इस्पात उद्योग मज़दूर यूनियन’ समेत अन्य यूनियनों ने ए-ब्लॉक और बी-ब्लॉक में फैक्टरियों को बन्द करवाया और यह चेतावनी दी कि आने वाले वक़्त में मोदी सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ संघर्ष तेज़ करेंगे। इन दोनों ही इलाक़ों में हड़ताल के ज़रिये मज़दूरों ने यह चेतावनी दी कि अपनी माँगों के लिए आने वाले वक़्त में वे लम्बी हड़तालों के लिए भी तैयार हैं। ओखला, मायापुरी, झिलमिल से लेकर अन्य औद्योगिक इलाक़ों में भी हड़ताल का कुछ हद तक असर देखने को मिला।

हरियाणा के कलायत में देशव्यापी हड़ताल के तहत मज़दूरों, कर्मचारियों व ग़रीब किसान संगठनों ने शहर में रोष प्रदर्शन किया। ‘क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन’ ने भी हड़ताल में बढ़-चढ़कर भागीदारी की। मनरेगा यूनियन द्वारा बीडीपीओ कार्यालय में मनरेगा के तहत काम की माँग को लेकर ज्ञापन सौंपा गया। 12 फ़रवरी को कलायत के प्रदर्शन में मनरेगा मज़दूरों और ग़रीब किसानों के साथ बड़ी संख्या में कच्चे कर्मचारी, आँगनवाड़ी वर्कर, आशा वर्कर, मिड-डे मील वर्कर, ग्रामीण सफ़ाई कर्मचारी आदि शामिल हुए और यह ऐलान किया कि यदि समय रहते कच्चे कर्मचारियों को पक्का दर्जा नहीं दिया गया, तो आन्दोलन और तेज़ किया जायेगा। जनसभा को सम्बोधित करते हुए मनरेगा यूनियन के अजय ने कहा, “चार लेबर कोड के ज़रिये मोदी सरकार मज़दूरों के बचे-खुचे काग़ज़ी अधिकारों को भी छीनने पर तुली हुई है। यह सरकार लगातार मज़दूरों की ताक़त को कमज़ोर कर रही है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में ‘विकसित भारत – रोज़गार एवं आजीविका गारण्टी मिशन (ग्रामीण), 2025’ (VB-GRAM-G) जैसी योजनाएँ दरअसल रोज़गार गारण्टी को ही ख़त्म करने की साज़िश हैं। ऐसी योजनाओं के ज़रिये सरकार अपनी क़ानूनी जवाबदेही से बचना चाहती है।” उन्होंने आगे कहा कि 125 दिनों के रोज़गार का दावा महज़ एक खोखला नारा है। सरकार ने स्वयं संसद में स्वीकार किया है कि हाल के वर्षों में मज़दूरों को औसतन केवल 50.35 दिन का ही काम मिला है। मौजूदा बजट में भी VB-GRAM-G के तहत प्रावधान केवल लगभग 52 कार्यदिवसों के लिए ही फण्ड उपलब्ध कराते हैं। गाँव सिमला के अनिल ने बताया कि मनरेगा क़ानून स्वयं अधूरा है, क्योंकि यह केवल 100 दिनों के रोज़गार तक सीमित है, जबकि ज़रूरत साल के 365 दिन क़ानूनी रूप से गारण्टीशुदा स्थायी रोज़गार की है। रोष प्रदर्शन में ‘क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन’ ने कहा कि जब तक मज़दूर वर्ग स्वयं संगठित होकर संघर्ष नहीं करेगा, तब तक मज़दूर-विरोधी नीतियाँ और अधिक आक्रामक ढंग से थोपी जाती रहेंगी। इसलिए ग्रामीण और शहरी मज़दूरों से आह्वान है कि वे देशव्यापी हड़ताल को व्यापक बनाते हुए इसे अनिश्चितकालीन आम हड़ताल में बदलने की दिशा में आगे बढ़ें।

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में ‘मज़दूर बिगुल तेलुगू’ की टीम ने देशव्यापी आम हड़ताल में भाग लिया। ‘मज़दूर बिगुल’ की ओर से साथी भार्गवी ने हड़ताल के लिए एकजुट हुए सैकड़ों मज़दूरों-कर्मचारियों को बधाई देते हुए बात रखी। भार्गवी ने कहा कि मोदी सरकार के चार लेबर कोड आज़ादी के बाद मज़दूरों के अधिकारों पर अब तक का सबसे बड़ा हमला हैं। मोदी सरकार के रुख़ से यह स्पष्ट है कि वह 1 अप्रैल से इन कोड को लागू करने के लिए कमर कस चुकी है। ऐसे में एकदिवसीय रस्मी हड़ताल से इस फ़ासीवादी सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंगने वाली है। समय गया है कि मज़दूर वर्ग अपने अमोघ अस्त्र यानी अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का इस्तेमाल करे। हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि मोदी सरकार तभी झुकी है जब प्रदर्शनकारी अपनी माँग पूरी होने तक डेरा डालकर बैठ जाते हैं। अब मज़दूर वर्ग को अगर अपनी ग़ुलामी के दस्तावेज़ यानी चार लेबर कोड से निजात चाहिए तो उसे एक या दो दिन की हड़ताल नहीं बल्कि अनिश्चितकालीन आम हड़ताल के रास्ते पर जाना होगा। भार्गवी ने  पिछले कुछ महीनों में इस काले क़ानून के ख़िलाफ़ ‘मज़दूर बिगुल’ द्वारा चलाये गये अभियानों का हवाला देते हुए कहा कि तमाम मज़दूर और कर्मचारी चार लेबर कोड को रद्द करवाने के लिए अनिश्चितकालीन आम हड़ताल के रास्ते पर जाने के लिए तैयार हैं। उन्होंने इन लेबर कोड को रद्द करने, वीबी-ग्रामजी क़ानून को रद्द करने और मनरेगा को बहाल करने एवं नयी पेंशन स्कीम की बजाय पुरानी पेंशन स्कीम को लागू करने की माँग उठायी।

आन्ध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम, विजयवाड़ा, ताडेपल्ली, गुडीवाड़ा और मछलीपत्तनम शहरों में हुई हड़ताल में ‘मज़दूर बिगुल’ की टीम ने हिस्सा लिया। विशाखापत्तनम में हिन्दुस्तान शिपयार्ड,  हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और एलआईसी हेडक्वार्टर पर पर्चे बाँटकर एकदिनी हड़ताल को तेज़ करने की बात कही गयी। साथ ही, शहर में हुए जुलूस और गाँधी प्रतिमा पर हुई जन सभा में हिस्सा लिया गया और चार लेबर कोड के ख़िलाफ़ लड़ाई को अनिश्चितकालीन आम हड़ताल में तब्दील करने की अपील की गयी। विजयवाड़ा शहर में भी ‘मज़दूर बिगुल’ के स्थानीय साथियों ने केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा आयोजित एक बड़े जुलूस में भागीदारी की। गुडीवाड़ा में ‘श्रमिक हक्कुला पोराटा संघम’ (SHPS) ने ‘गुडीवाड़ा इण्डस्ट्रियल और ऑटोमोबाइल वर्कर्स यूनियन’ की हड़ताल को नेतृत्व दिया। यह यूनियन SHPS से जुड़ी हुई है और इसके सदस्यों ने आम हड़ताल के समर्थन में एक बाइक रैली निकाली। SHPS से कॉमरेड रघु ने मज़दूरों की सभा को सम्बोधित किया और उनका आह्वान किया कि अगर आज अनिश्चितकालीन आम हड़ताल की तरफ़ नहीं बढ़ते हैं तो कल बहुत देर हो जायेगी। ‘बिगुल’ के कार्यकर्ताओं ने मंगलगिरी-ताडेपल्ली कॉर्पोरेशन और मछलीपत्तनम शहर में हुई विरोध सभाओं में भी हिस्सा लिया, जिसमें चार लेबर कोड को तुरन्त रद्द करने की माँग की गयी।

कोलकाता में ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ ने चार लेबर कोड के ख़िलाफ़ 12 फ़रवरी को हुई एक दिन की हड़ताल में हिस्सा लिया और इस विरोध को अनिश्चितकालीन आम हड़ताल में बदलने की अपील की। इसके लिए इण्डियन कॉफ़ी हाउस, कॉलेज स्ट्रीट और कलकत्ता यूनिवर्सिटी के पास सड़कों पर कैम्पेन चलाये गये और धर्मतला इण्टरस्टेट बस डिपो पर बसों में अभियान चलाये गये।

चार लेबर कोड के ख़िलाफ़ उत्तराखण्ड में भी ‘नौजवान भारत सभा’ और ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ द्वारा व्यापक अभियान चलाया गया। अभियान का प्रथम चरण 14 दिसम्बर से शुरू होकर 12 फ़रवरी की एक दिवसीय हड़ताल तक चला। अभियान को हरिद्वार सिडकुल और भेल मज़दूरों के बीच व्यापक तौर पर चलाया गया। इसके साथ ही हरिद्वार और देहरादून के रेलवे, बैंक, बीमा, डाक, परिवहन और बिजली विभागों में भी विशेष तौर पर चलाया गया। इस अभियान में जगह-जगह नुक्कड़ सभा, पर्चा वितरण, पोस्टरिंग और घर-घर सम्पर्क किया गया।

हरिद्वार भेल की कालोनियों में घर-घर संपर्क के दौरान मज़दूरों से चार लेबर कोड के विरुद्ध संघर्ष की आवश्यकता को लेकर बहुत ही सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ मिलीं। ज़्यादातर मज़दूरों को इसकी गम्भीरता का एहसास था और वे इसके ख़िलाफ़ संघर्ष करने को तैयार थे लेकिन भेल मज़दूरों की विभिन्न यूनियनों में 12 फ़रवरी की एकदिवसीय हड़ताल को लेकर अनिश्चितता की स्थिति थी। कॉलोनी अभियान के दौरान टीम की कुछ यूनियन पदाधिकारियों से भी मुलाक़ात हुई। हड़ताल को लेकर उनका कहना था कि अभी उनकी यूनियन में इसपर कोई ठोस रणनीति नहीं बनी है। कुछ केन्द्रीय यूनियन/फ़ेडरेशन से जुड़े हुए पदाधिकारियों ने कहा कि इसपर ऊपर से जो दिशा-निर्देश आयेंगे, हम उसी पर चलेंगे। इसके साथ ही रेलवे, बैंक और एलआईसी के कर्मचारियों ने हमारे अभियान का स्वागत किया। अपने व्हाट्सएप ग्रुपों में हमारे पर्चे डाले। यूनियन लीडरों से मुलाक़ात करवायी। बहुत से मज़दूर-कर्मचारी लेबर कोड के लागू होने से चिन्तित थे और अपनी यूनियनों की कार्यप्रणाली को लेकर आलोचनात्मक थे। वहीं दूसरी तरफ़ हरिद्वार रेलवे के ज़्यादातर कर्मचारियों को 12 फ़रवरी की हड़ताल के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी! उनका कहना था कि ये तो आप लोगों से हमें पता चल रहा है कि ऐसी कोई हड़ताल भी होने वाली है। देहरादून रेलवे के कर्मचारियों ने बताया कि ऊपर से अभी कोई ठोस गाइडलाइंस नहीं आयी है। इसका परिणाम भी 12 फ़रवरी की हड़ताल में दिखायी दिया। हरिद्वार रेलवे में कुछ भी नहीं हुआ। देहरादून रेलवे में कर्मचारियों ने काली पट्टी और काला बैज लगाकर काम किया लेकिन काम का बहिष्कार नहीं किया। यही स्थिति बैंक, बीमा और डाक सेक्टर में रही! कुछ बैंकों और एलआईसी ऑफिस के सामने थोड़ी देर के लिए कर्मचरियों ने बाहर आकर नारे लगाये और वापस काम पर चले गये। हरिद्वार भेल के फ़ाउन्ड्री गेट पर संयुक्त प्रदर्शन में ‘नौजवान भारत सभा’ और ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ की भागीदारी रही। शाम 4 बजे हरिद्वार भेल के फ़ाउण्ड्री गेट पर सात से आठ यूनियनों और संगठनों ने चार लेबर कोड के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया और अपनी सभा की।

12 फ़रवरी की एकदिवसीय हड़ताल का उत्तराखण्ड में बहुत ही मिला-जुला असर रहा। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों/फ़ेडरेशनों की लोकल लीडरशिप भी 12 फ़रवरी की हड़ताल को लेकर कोई उत्सुकता नहीं दिखा रही थी और न ही उन्हें इस सम्बन्ध में अन्य यूनियनों की गतिविधियों को लेकर कोई उत्सुकता थी। बीते दो महीनों के इस अभियान के दौरान ‘नौजवान भारत सभा’ और ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ की टीम का यह अनुभव रहा कि इसे व्यापक बनाया जा सकता था लेकिन तमाम केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों और फ़ेडरेशनों के ढीले-ढाले रुख और कार्यप्रणाली ने इसे निष्प्रभावी बना दिया। लेकिन इसके बावजूद चार लेबर कोड को लेकर बहुसंख्यक मज़दूरों-कर्मचारियों में गुस्सा है और वे इसके ख़िलाफ़ संगठित होकर लम्बा संघर्ष करने को तैयार हैं।

चार लेबर कोड के विरुद्ध अभियान के तहत उत्तर प्रदेश में बनारस, लखनऊ, इलाहाबाद, गोरखपुर, मऊ, गाज़ीपुर, नोएडाअम्बेडकरनगर ज़िले में अभियान चलाया गया। इस सघन एवं व्यापक अभियान के दौरान इन ज़िलों में संगठित एवं असंगठित, दोनों ही क्षेत्रों में काम करने वाली आबादी के बीच विभिन्न स्वरूपों में अभियान चलाया गया।

लखनऊ में ‘भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी’ (RWPI) की ओर से 1 से 10 फ़रवरी के बीच सात दिन लेबर कोड पर अभियान चलाया गया।  RWPI के कार्यकर्ताओं ने इस दौरान चारबाग़ रेलवे स्टेशन पर रनिंग स्टाफ़, पार्सल विभाग और आरएमएस, चारबाग़ स्थित यूनियन कार्यालय, रेलवे लोको वर्कशॉप, रेलवे डीज़ल शेड, जवाहर भवन स्थित राज्य सरकार के कार्यालयों व जीपीओ में अभियान चलाया। एक दिन जवाहर भवन-इंदिरा भवन पर लेबर कोड को लेकर पोस्टर प्रदर्शनी लगाई और परचे बाँटे गये। चारबाग़ पर कुलियों के बीच भी एक दिन सभा करके पर्चा वितरण किया गया। कई जगहों पर ठेकेदारों और बड़े अधिकारियों ने अभियान को रोकने, कर्मचारियों से बातचीत में बाधा डालने की कोशिश की लेकिन आम कर्मचारियों, मज़दूरों ने बातों को संजीदगी से सुना।

12 फ़रवरी को RWPI के कार्यकर्ताओं की ओर से रेलवे लोको वर्कशॉप में यूनियन प्रतिनिधियों और कर्मचारियों के साथ पूरे वर्कशॉप में घूमकर सभाएँ की गयीं और परचे बाँटे गये। इसके बाद कार्यकर्ता शक्ति भवन गये जहाँ उनकी पहल पर बिजली कर्मचारियों और संयुक्त संघर्ष समिति ने विरोध प्रदर्शन किया। इसके बाद पूर्वोत्तर रेलवे के डीआरएम ऑफ़िस में यूनियन के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शन तथा नारेबाजी हुई।

ज़्यादातर जगहों पर कर्मचारियों ही नहीं, यूनियन के लोगों को भी एक दिन पहले तक यह पता ही नहीं था कि 12 को क्या और कहाँ होना है! इन सारे अभियानों का एक आम अनुभव यह रहा है कि लेबर कोड से होने वाले नुक़सान या इसकी गम्भीरता के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी। यह स्पष्ट रूप से देखने को मिला कि यूनियनों की तरफ़ से इस सवाल पर कर्मचारियों को जागरूक और लामबन्द करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। RWPI की ओर से लेबर कोड के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष और अनिश्चितकालीन आम हड़ताल की ज़रूरत पर बात की गयी तो कर्मचारियों से लेकर यूनियन नेताओं तक ने इसका समर्थन किया। सभी जगह केन्द्रीय नेतृत्व के ढुलमुलपन के प्रति कर्मचारियों में बहुत आक्रोश दिखा। सभी जगह कर्मचारियों ने उन पर काम के बढ़ते दबाव, ठेकाकरण, निजीकरण आदि समस्याओं के बारे में बताया और इस बात को माना कि लेबर कोड लागू होने के बाद से उनकी मुश्किलें बढ़ेंगी, साथ ही आवाज़ उठाना पहले से भी कठिन हो जायेगा।

बनारस में ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ ने चार लेबर कोड के विरोध में जारी पर्चों को लेकर बनारस शहर के अलग-अलग सरकारी विभागों में अभियान चलाया। इस अभियान में ‘दिशा छात्र संगठन’ की स्थानीय इकाई ने भी भागीदारी की। दिसम्बर माह में एलआईसी के कार्यालय में पर्चा वितरण के साथ इस अभियान की शुरुआत की गयी थी। इसके बाद बीएलडब्ल्यू, बिजली विभाग, रेल कर्मचारियों की कॉलोनियों, वाराणसी एवं बनारस जंक्शन, डाक विभाग, जल निगम आदि जगहों पर अभियान चलाया गया। इस अभियान के दौरान पर्चा वितरण, प्रदर्शनी, स्थानीय प्रदर्शनों में भागीदारी करते हुए लेबर कोड के पर्चे का वितरण आदि तरीक़े अपनाये गये। देशव्यापी हड़ताल की तिथि नज़दीक आने पर एक बार फिर से बिजली विभाग, बीएलडब्ल्यू, एलआईसी, पीडब्ल्यूडी, एसबीआई और यूओबी के कार्यालयों में पर्चा वितरित किया गया। बीएचयू के छात्रों के बीच भी इस सवाल पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया।

12 फ़रवरी की हड़ताल के दिन सिर्फ़ एलआईसी ने पूर्ण हड़ताल का कॉल दिया था। ‘बिगुल’ के कार्यकर्ताओं ने आन्दोलन स्थल पर जाकर हड़ताल को समर्थन दिया। इसके बाद ‘बिगुल’ के कार्यकर्ता ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ़ एसोसिएशन के कार्यक्रम में गये, जहाँ उन्होंने हड़ताल के समर्थन में बात रखी और गीत प्रस्तुत किये। बिजली विभाग के कर्मचारियों ने भी हड़ताल के समर्थन में कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें ‘बिगुल’ और ‘दिशा’ के कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की और सभा में बात रखी तथा गीत प्रस्तुत किये। बीएलडब्ल्यू में आम हड़ताल के समर्थन में वर्कशॉप गेट से प्रशासनिक भवन तक का मार्च छुट्टी के समय निकाला गया था। इस मार्च में भी इस अभियान की टोली ने भागीदारी की। इस पूरे अभियान के दौरान इस टोली ने हज़ारों पर्चे वितरित किये।

गोरखपुर शहर में ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ की ओर से चार लेबर कोड के ख़िलाफ़ दिसम्बर माह से 12 फ़रवरी तक सघन अभियान चलाया गया। 2 दिसम्बर को बरगदवा औद्योगिक क्षेत्र में नुक्कड़ सभा और व्यापक पर्चा वितरण किया गया। इसके बाद बरगदवा में ही चार लेबर कोड के ख़िलाफ़ मज़दूर लॉजों में अभियान चलाया गया। गोरखपुर में डेयरी रेलवे कॉलोनी में घर-घर अभियान 4 से 5 दिन तक चलाया गया। इस अभियान में लोगों की अच्छी प्रतिक्रिया मिली। रेलवे के वॉशिंग लाइन, क्रू लॉबी, पार्सल विभाग में एक-एक व्यक्ति से सम्पर्क करके लेबर कोड के ख़िलाफ़ पर्चा बाँटा गया और बातचीत की गयी। एलआईसी और बिजली विभाग में भी पर्चा बाँटा गया।

12 फ़रवरी की देशव्यापी हड़ताल को ध्यान में रखते हुए 6 फ़रवरी से गोरखपुर शहर में कारखाने और तमाम विभागों में पर्चा वितरण किया गया। रेलवे वॉशिंग लाइन, रेल कारखाना, डाक, एलआईसी बख़्शीपुर, एलआईसी तारामण्डल, एसबीआई मुख्य ब्राँच और रेलवे ऑफ़िशियल एरिया में 12 फ़रवरी को देशव्यापी हड़ताल को सफल बनाने की अपील करते हुए लोगों के बीच में यह बातचीत की गयी कि एकदिवसीय हड़ताल से अनिश्चितकालीन आम हड़ताल की तरफ़ बढ़ना होगा तभी सरकार झुकेगी। इस बात से ज़्यादातर विभागों के कर्मचारी सहमत थे कि बिना जुझारू संघर्ष के चार लेबर कोड पर सरकार झुकने वाली नहीं है।

12 फ़रवरी के दिन ‘बिगुल मजदूर दस्ता’ और ‘दिशा’ के कार्यकर्ताओं की तरफ़ से बैंक, एलआईसी बख़्शीपुर, एलआईसी तारामण्डल और रेलवे में आयोजित सभाओं में भागीदारी की गयी। वहाँ पर गीत गाये गये और नारेबाज़ी की गयी।  इस पूरे अभियान के दौरान गोरखपुर शहर में हज़ारों पर्चे वितरित किये गये।

इलाहाबाद में ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ और ‘दिशा छात्र संगठन’ ने मिलकर दिसम्बर माह से चार लेबर कोड के ख़िलाफ़ अभियान की शुरुआत की। शुरू में अभियान मुख्यतः लेबर चौराहों और नगर निगम के सफाई कर्मचारियों की मज़दूर बस्तियों को लक्षित करते हुए चलाया गया। साथ ही, सरकारी विभागों में कर्मचारियों से मिलने और कार्यालयों में पर्चा वितरण का सिलसिला चलता रहा। इलाहाबाद जंक्शन, प्रयाग जंक्शन, प्रयागराज संगम जंक्शन, फूलपुर रेलवे स्टेशन पर अभियान चलाया गया। इस दौरान यह बात बार-बार रेखांकित हुई कि ज़्यादातर विभागों में यूनियनों ने हड़ताल अथवा चार लेबर कोड के सवाल पर कर्मचारियों के बीच में कुछ भी नहीं किया। डाक, नेशनल इंश्योरेंस, रेलवे, बीएसएनएल, पीडब्ल्यूडी, सिंचाई  आदि विभागों के अधिकांश कर्मचारियों को हड़ताल के बारे में हमलोगों से जानकारी मिली। सरकारी विभागों के कर्मचारियों के एक बड़े तबके को लेबर कोड के बारे में जानकारी ही नहीं है। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने इस हड़ताल के लिए न तो प्रचार चलाया और न ही अपने सदस्यों को शिक्षित-प्रशिक्षित करने पर कोई विशेष ज़ोर दिया। हड़ताल की रैली में भी आँगनबाड़ी और आशाकर्मियों की एक बड़ी संख्या के अलावा अन्य विभागों से कोई उल्लेखनीय भागीदारी नहीं रही।

हड़ताल के दिन इलाहाबाद में केवल एलआईसी और कुछ बैंक बन्द रहे। एलआईसी में क्लर्क ग्रेड की यूनियन ही मुख्यतः हड़ताल में शामिल हुई, ऑफ़िसर्स यूनियन हड़ताल में शामिल नहीं रही लेकिन उनके  प्रतिनधि हड़ताल के समर्थन में सभा स्थल पर मौजूद रहे। शहर की मुख्य हड़ताल सभा एलआईसी परिसर में ही आयोजित हुई। इस सभा में ‘बिगुल’ और ‘दिशा’ की संयुक्त अभियान टीम के प्रतिनिधियों ने बात रखी, गीत गाये और व्यापक पर्चा वितरित किया। आँगनवाड़ी की महिलाएँ अलग जगह पर इकठ्ठा हुईं। इस जुटान में भी इस अभियान टोली ने भागीदारी की। बैंक की चार बड़ी यूनियनों में से केवल एक यूनियन सक्रिय तौर पर हड़ताल में शामिल रही। इसी यूनियन के लोग सुबह से ही बैंक बन्द करवाने में लगे रहे। बिजली विभाग के कर्मचारियों द्वारा लंच के समय हड़ताल के समर्थन में प्रदर्शन का आयोजन किया गया था। इन सभी आन्दोलनों, प्रदर्शनों और सभाओं में इस अभियान टोली की सक्रिय भूमिका रही।

अम्बेडकरनगर में RWPI के कार्यकर्ताओं ने हड़ताल के दिन बैंक कर्मचारियों के बीच पर्चा वितरण किया।

मऊ और गाज़ीपुर में ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ और ‘नौजवान भारत सभा’ ने चार लेबर कोड के विरुद्ध अभियान चलाया। मऊ में रेलवे, बिजली, एलआईसी, रोडवेज़, लोक निर्माण विभाग, बैंकों, सिंचाई विभाग में पर्चा वितरण किया गया। गाज़ीपुर में रेलवे, बिजली के एक हिस्से में, लोक निर्माण विभाग में अभियान चलाकर कर्मचारियों के बीच में चार लेबर कोड के विरुद्ध पर्चा वितरण किया गया।

उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में चले इस अभियान के दौरान यह आम अनुभव रहा कि अधिकांश कर्मचारियों और मज़दूरों की यूनियनों ने लेबर कोड के सवाल पर और हड़ताल को लेकर कर्मचारियों के बीच में कोई तैयारी नहीं की। कई विभागों में ‘भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी’ और ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ की अभियान टोलियों के माध्यम से ही कर्मचारियों को इस बारे में पता चला। चार लेबर कोड से कर्मचारियों को होने वाले नुक़सान पर बात करने पर ज़्यादातर कर्मचारियों ने बातचीत से सहमति प्रकट की। कर्मचारियों का एक हिस्सा ऐसा भी था, जिस पर फ़ासीवादी प्रचार का प्रभाव है लेकिन बड़ी आबादी इन ख़तरों पर बात करने पर सहमति प्रकट कर रही थी। यह भी सामने आया कि विभागों की परम्परागत यूनियनों पर कर्मचारियों का कोई भरोसा नहीं रह गया है और इन यूनियनों ने कर्मचारियों के बीच अपना आधार खो दिया है। ज़्यादातर कर्मचारियों में यूनियन के नेताओं के प्रति असन्तोष दिखायी दिया। सभी विभागों में कर्मचारियों ने अपने विभागों की समस्याओं पर बात करने पर बहुत सारे मुद्दे रेखांकित किये।

RWPI की तरफ से महाराष्ट्र में मुम्बई, पुणेअहमदनगर में चार लेबर कोड विरोधी अभियान चलाया जा रहा है जिसमें अबतक मुख्यतः बैंक, रेलवे, पोस्ट और टेलीग्राम के मज़दूरों-कर्मचारियों को लेबर कोड के फ़ासीवादी हमले से परिचित कराया गया है। इसके अलावा मुम्बई में बृहन्मुम्बई विद्युत आपूर्ति एवं यातायात (BEST) जो मुम्बई की मुख्य सार्वजनिक बस परिवहन और बिजली प्रदाता संस्था है और शहर के कुछ लेबर चौक पर भी अभियान चलाया गया। पुणे में मार्केटयार्ड में बोझा ढोने वाले मज़दूर, निर्माण मज़दूर, जीवन बीमा निगम, भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL), महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में और अहमदनगर में स्थानिक महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम में भी अभियान चलाया गया। आमतौर पर सभी विभागों के मज़दूरों के बीच चार लेबर कोड के ख़िलाफ़ गुस्सा है और मौजूदा यूनियन नेतृत्व द्वारा उठाये जा रहे प्रतीकात्मक क़दम और संघर्ष की दिशा को तय करने में देरी की समस्या है। इन सभी जगहों पर RWPI ने हस्तक्षेप करते हुए आज़ादी के बाद मज़दूर वर्ग पर हुए इस सबसे बड़े हमले के ख़िलाफ़ निर्णायक संघर्ष शुरू करने की बात कही। 12 फ़रवरी की हड़ताल में शिरकत करते हुए संघर्ष को अनिश्चितकालीन आम हड़ताल में तब्दील करने का आह्वान किया। पुणे में ‘महाराष्ट्र निर्माण मज़दूर यूनियन’ के बैनर तले निर्माण मज़दूर भी बड़ी संख्या में इस हड़ताल में शामिल रहे।

‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ द्वारा पटना, चण्डीगढ़, रोहतक में भी देशव्यापी हड़ताल में भागीदारी की गयी और मज़दूरों-कर्मचारियों के बीच व्यापक पर्चा वितरण करके प्रतीकात्मक विरोध-प्रदर्शनों से आगे बढ़ कर लेबर कोड के ख़िलाफ़ अनिश्चितकालिन आम हड़ताल की तैयारी करने पर विशेष ज़ोर दिया गया।

दिल्ली में 8 फ़रवरी को लेबर कोड के विरुद्ध RWPI द्वारा आयोजित सम्मेलन में अलग-अलग विभागों से मज़दूरों-कर्मचारियों के प्रतिनिधि शामिल रहे। इसके अलावा देशभर से कई यूनियनों व संगठनों के प्रतिनिधियों ने शामिल होकर लेबर कोड के ख़िलाफ़ संगठित होने की ज़रूरत पर अपनी बात रखी। ‘मज़दूर बिगुल पंजाब’ और तेलंगाना से प्रतिनिधियों ने हिस्सेदारी की। आन्ध्र प्रदेश से आये वरिष्ठ ट्रेड यूनियन नेता और ‘श्रमिक हक्कुला पोराटा संघम’ (SHPS) से जुड़े कॉमरेड रघु ने सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए लेबर कोड के विरुद्ध लम्बी और जुझारु लड़ाई की तरफ़ बढ़ने की बात कही। इसके अलावा ‘महाराष्ट्र बाँधकाम कामगार यूनियन’, ‘क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन’, ‘ऑटोमोबाइल इण्डस्ट्री कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन’ (AICWU), ‘बवाना औद्योगिक क्षेत्र मज़दूर यूनियन’, ‘मनरेगा संघर्ष मोर्चा’, ‘IFTU सर्वहारा’ और ‘मज़दूर’ पत्रिका के प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार साझा किये।

पिछले दो से अधिक महीने के दौरान पूरे देश में तमाम क्रान्तिकारी मज़दूर सगठनों व यूनियनों द्वारा इस सन्देश को सगंठित-असंगठित क्षेत्र के लाखों मज़दूरों तक पहुँचाया गया है और अभी भी पहुँचाया जा रहा है। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के पदाधिकारियों और नेतृत्व से मिलकर अनिश्चितकालीन आम हड़ताल की तैयारी की दिशा में आगे बढ़ने के लिए अपील-पत्र भी सौंपा गया है। रेलवे, डाक व टेलीग्राफ़, सड़क परिवहन, बैंक, बीमा व तमाम आवश्यक सेवाओं में काम करने वाली मज़दूर व कर्मचारी आबादी ने इस प्रस्ताव का पुरज़ोर समर्थन किया है। 8 फ़रवरी के सम्मेलन से लेकर अभियानों और हड़ताल, प्रदर्शनों के दौरान यह आम राय स्पष्ट तौर पर सगंठित मज़दूरों के बीच से सामने आयी है कि ऐसी अनिश्चितकालीन आम हड़ताल के ज़रिये ही मोदी सरकार की इन नयी तानाशाहाना श्रम संहिताओं को वापस करवाया जा सकता है। कई राज्यों में अलग-अलग स्वतन्त्र यूनियनों ने अनिश्चितकालीन आम हड़ताल के आह्वान पर उसमें शामिल होने की घोषणा भी की है।

ऐसे में, हम केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों से एक बार फिर अपील करते हैं कि वे इस दिशा में संघर्ष की घोषणा करें। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों की मौजूदगी बैंक, रेलवे, बीमा, डाक, परिवहन समेत तमाम सरकारी व निजी सेक्टरों के संगठित मज़दूरों-कर्मचारियों के बीच है और इसलिए उनके आह्वान पर मोदी सरकार के इस हमले को रोका जा सकता है। निश्चित तौर पर उपरोक्त क्षेत्रों में काम करने वाली मज़दूर आबादी आज कुल मज़दूर आबादी का महज़ 12-15 फ़ीसदी हिस्सा है। लेकिन रणनीतिक तौर पर अर्थव्यवस्था के इन सेक्टरों का महत्व सबसे अधिक है। इन सेक्टरों में काम का रुकना, मतलब पूँजीवादी व्यवस्था में उत्पादन व संचरण की मशीनरी का रुक जाना और नतीजतन समूची मुनाफ़ा केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था का ठप्प पड़ जाना। इन सभी सेक्टरों को मज़दूर व कर्मचारी अपनी मेहनत के बल पर चलाते हैं जिसके ज़रिये पूँजीपति अपना मुनाफ़ा बनाते हैं।

पूँजीपति वर्ग को घुटनों पर केवल तभी लाया जा सकता है, जब उसके मुनाफ़े का चक्का ठप्प पड़े। इसके बिना, एक-दो दिन की रस्मअदायगी वाली हड़तालों से केवल उसे कुछ तात्कालिक आर्थिक नुक़सान होता है और चूँकि पूँजीपति वर्ग एक राजनीतिक वर्ग है इसलिए अपने अहम राजनीतिक फ़ायदों के लिए वह ऐसा नुक़सान उठाने को तैयार भी होता है। इन एक या दो दिवसीय हड़तालों से अगर कुछ होना होता तो बहुत पहले ही हो चुका होता। 1991 से ये केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें कुल 24 ऐसी हड़तालें कर चुकी हैं। इससे पिछले 35 सालों में क्या हासिल हुआ है? क्या अनौपचारिकीकरण रुका है? क्या ठेकाकरण रुका है? क्या हमारी काम और जीवन की स्थितियों में कोई बेहतरी आयी है? सभी मज़दूर भाई और बहन इन सवालों का जवाब जानते हैं। उल्टा हमारी स्थिति और बदतर हुई है, पूँजी के हमले और तेज़ हुए हैं।

इस बात को एक हालिया उदाहरण से ही देख लेते हैं। 12 फ़रवरी की एकदिवसीय हड़ताल के तुरन्त बाद ही मोदी सरकार लेबर कोड को ज़ोर-शोर से लागू करने की घोषणा कर रही है। 17 फ़रवरी को भुवनेश्वर में हुए लेबर व एम्प्लॉयमेंट और इण्डस्ट्री सेक्रेटरीज़ के दो दिवसीय सम्मेलन में इसे त्वरित तौर पर लागू करने की योजनाएँ बनायी गयीं। यह सम्मेलन श्रम और रोज़गार मन्त्रालय द्वारा देशभर में अलग-अलग जगहों पर आयोजित किये गये पाँच स्थानीय सम्मेलनों की कड़ी़ में चौथा था। क्या यह उदाहरण दुश्मन के तेवर और उसके रुख़ को बताने के लिए काफ़ी नहीं है? क्या यह इस बात को पुष्ट करने के लिए काफ़ी नहीं है कि मोदी सरकार को इन रस्मी हड़तालों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है और वे अपने हमले को तेज़ करते जाने की तैयारी कर रहे हैं? क्या अब भी इन रस्मी कवायदों को जारी रखकर मज़दूर वर्ग पर हो रहे इन हमलों के ख़िलाफ़ लड़ा जा सकता है?

एक ऐसे समय में जब दुश्मन अपनी पूरी शक्ति के साथ हमला कर रहा हो और हमारे आख़िरी अधिकारों को भी ख़त्म कर देना चाहता हो, तब मज़दूर वर्ग को भी अपनी पूरी शक्ति के साथ उसका विरोध करना होगा। यह शक्ति है सभी अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले मज़दूरों-कर्मचारियों के एकता की और अनिश्चितकालीन आम हड़ताल की।

इस संघर्ष में संगठित क्षेत्र के मज़दूरों को पहलकदमी लेनी होगी और इसकी अगुवाई करनी होगी। संगठित क्षेत्र की मेहनतकश आबादी ने यह पहले भी कर दिखाया है। आज ज़रूरत है कि अपने जुझारू इतिहास से सीखते हुए लेबर कोड के ख़िलाफ़ संघर्ष को तेज़ करने की और इस बात का ऐलान करने की जब तक यह दमनकारी पूँजी-परस्त क़ानून वापस नहीं होता है तब तक एक साथ हर क्षेत्र में काम बन्द रहेगा।

केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों को और ग़रीब किसानों और ग्रामीण मज़दूरों की नुमाइन्दगी का दावा करने वाले यूनियनों व सगठनों को ऐसी आम हड़ताल का आह्वान करना चाहिए। व्यापक मज़दूर-मेहनतकश आबादी को इन संगठनों व यूनियनों पर ऐसी आम हड़ताल का ऐलान करने का दबाव बनाना चाहिए। हम एक बार फिर से केन्द्रीय ट्रेड यनिूयन फ़ेडरेशनों के नेतृत्व से दिली अपील करते हैं कि वे वक़्त की नज़ाकत और ज़रूरत को समझें। इस देश के मज़दूर वर्ग पर इससे बड़ा और कोई हमला नहीं हो सकता है और मोदी-शाह सरकार किसी भी तरह के रस्मी कवायद, ज़ुबानी जमाख़र्च, प्रतीकात्मक प्रदर्शन आदि करने से सुनने वाली नहीं है। उसे झुकाने के लिए आज अपने सबसे बड़े हथियारों में से एक यानी आम हड़ताल का इस्तेमाल करना ही होगा। इस वक़्त अगर केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें अनिश्चितकालीन आम हड़ताल की तरफ़ आगे बढ़ती हैं तो हम यह बात बिल्कुल दावे के साथ कह सकते हैं कि अन्य यूनियनें व संगठन भी उनका भरपूर साथ देंगे।

अगर अब भी केन्द्रीय फ़ेडरेशन ये क़दम उठाने से घबरा जाते हैं या देरी करते हैं तो फिर उनकी नीयत और इरादों पर गम्भीर प्रश्नचिह्न खड़े हो जायेंगे। अगर वे संघर्ष के आज के ज़रूरी क़दम पर मज़दूरों को नेतृत्व देने के लिए तैयार नहीं हैं, उनकी आवाज़ को सुनने को तैयार नहीं है तो फिर ऐसे नेतृत्व का फ़ायदा क्या है? सिर्फ़ इतना ही नहीं कल को जब यह दमनकारी क़ानून लागू हो जायेगा तब क्या उसमें करोड़ों की सदस्यता वाली इन यूनियनों की चुप्पी और अकर्मण्यता भी इसकी ज़िम्मेदार नहीं होगी?

चार लेबर कोड के ख़िलाफ़ अब अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान न करना प्राणघातक होगा। हम उम्मीद करते हैं कि केन्द्रीय ट्रेड यनिूयन फ़ेडरेशनें इस बात को समझते हुए जल्द ही उपयुक्त क़दम उठायेंगी और देशव्यापी अनिश्चितकालीन आम हड़ताल की तरफ़ आगे बढ़ेंगी। मनरेगा के क़ानून को ख़त्म किये जाने और चार लेबर कोड जैसे ग़ुलामी के क़ानून के विरुद्ध संघर्ष का एकमात्र यही तरीक़ा हो सकता है, इससे कम कुछ भी फ़ासीवादी मोदी सरकार के हमलों का जवाब देने के लिये अपर्याप्त है।

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2026

 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
     

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन