Category Archives: कला-साहित्‍य

कविता : लुटेरा और उसका नौकर / बेर्टोल्ट ब्रेष्ट Poem : The Robber and His Servant / Bertolt Brecht

खड़े थे वहाँ कई, आड़े तिरछे, किसान
था लेकिन सभी का
उन्हीं लुटेरों पर ध्यान।
देखा कि सच ही लुटेरों जैसा चेहरा था उस थुलथुल का
मगर उस सुखट्टे ने
क्यों साथ दिया उसका?

‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ – हरिशंकर परसाई

गणतंत्र-समारोह में हर राज्य की झाँकी निकलती है। ये अपने राज्य का सही प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। ‘सत्यमेव जयते’ हमारा मोटो है मगर झाँकियाँ झूठ बोलती हैं। इनमें विकास-कार्य, जनजीवन इतिहास आदि रहते हैं। असल में हर राज्य को उस विशिष्ट बात को यहाँ प्रदर्शित करना चाहिए जिसके कारण पिछले साल वह राज्य मशहूर हुआ।

महान साहित्यकार मक्सिम गोर्की के स्मृति दिवस (18 जून) के अवसर पर

“मैं मानव-जाति से प्रेम करता हूँ और चाहता हूँ कि उसे किसी भी तरह से दुःख न पहुँचाऊँ, परन्तु इसके लिये न तो हमें भावुकता का दामन पकड़ना चाहिए और न ही चमकीले शब्द- जाल और खूबसूरत झूठ की टट्टी खड़ी करके जीवन के भयानक सत्य को हमें छिपाना चाहिए ! ज़रूरी है कि हम जीवन की ओर मुँह करें और हमारे हृदय तथा मस्तिष्क में जो कुछ भी शुभ और मानवीय है, उसे जीवन में उड़ेल दें।”

साथी कविता कृष्णपल्लवी की एक मौजूँ कविता – हमला हो चुका है!

बर्बर हमलावरों ने हमला बोल दिया है।
आगे बढ़ रहे हैं वे लगातार
सृजन, विचारों, कल्‍पनाओं और स्वप्नों को रौंदते हुए
तर्क की मृत्यु की घोषणा करते हुए
धर्मध्वजा लहराते हुए
शिक्षा, कला, संस्कृति और जन संचार के
सभी प्रतिष्ठानों पर क़ब्ज़ा जमाते हुए

कविता – वे मुंतज़िर हैं / मेहजबीं

आज एक हफ्ता हो गया है फलाना ढिमकाना
को जेल में बंद हुए
इस बीच मैंने दस कविताएं लिख डाली हैं
एक पत्रिका में इस महीने मेरी कविताएं
आने वाली हैं
दो जगह से कविता पाठ का निमंत्रण भी
मिला है
मैंने जेल वाली पोस्ट को शेयर किया है
अपने प्रकाशित होने वाली पोस्ट को सब जगह शेयर किया है
अपने निमंत्रण समाचार को स्टेटस पर लगा दिया है

कविता – प्रचार की ज़रूरत / बेर्टोल्ट ब्रेष्ट Poem – The Necessity of Propaganda / Bertolt Brecht

प्रचार के मकसद के बारे में
और एक बात लाज़मी है : प्रचार जितना बढ़ता जाता है,
बाक़ी सारी चीज़ें उतनी ही घटने लगती हैं।

लघु कथा – रेल का सफर

इसी बीच उनके बीच कुछ नौजवान, हाथ में पर्चे और अख़बार लिये ट्रेन के डिब्बे में प्रवेश करते हैं। वे चलती ट्रेन में मेहनत की भट्टी में पके चेहरों के बीच नारे लगा रहे थे, ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे थे, उनकी गर्दन की नसें खिंची हुईं थीं, मुट्ठियाँ तनी हुईं थीं और क्रोध और आवेश उनके स्वर में भरा हुआ था। उनके नारे क्रान्तिकारियों को याद कर रहे थे, मज़दूरों और ग़रीबों को एकजुट होने का आह्वान कर रहे थे। उनके बीच एक नौजवान अख़बार के बारे में विस्तार से बता रहा था। उसने कहा कि यह मेहनतकश जनता का अख़बार है — उनका शिक्षक, उनका संगठनकर्ता।

‘केरला स्टोरी’ को राष्ट्रीय पुरस्कार, एक बेहूदा मज़ाक़

घोर स्त्री-विरोधी और मुसलमानों के प्रति नफ़रत और कुंठा से भरी यह फ़िल्म समाज को पीछे धकेलेने के सिवाय और कोई भूमिका नहीं अदा करती है। दर्शक के दिमाग में मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत बिठाकर यह फ़िल्म यह साबित करने का प्रयास करती है कि सारे मुसलमान आतंकवादी होते हैं। इतना ही नहीं बीच-बीच मैं इस फ़िल्म में कम्युनिस्टों और कश्मीर में राजकीय फौजी दमन के विरुद्ध संघर्षरत वहाँ की आम जनता को भी आतंकवादी क़रार देने की पूरी कोशिश की जाती है। कम्युनिस्टों को यहाँ जिस तरह बुरी और विदेशी विचारधारा फैलने वाले लोग और पश्चिमी संस्कृति के वाहकों के तौर पर दर्शाया गया है। वाक़ई में जो विचारधारा मज़दूरों-मेहनतकशों की बात करती है और उनकी मेहनत की लूट के ख़िलाफ़ जंग छेड़ती है उसे “विदेशी” दर्शाने का असल मकसद ही यह है की दर्शक के दिमाग़ में मज़दूर-विरोधी, न्‍याय-विरोधी, समानता-विरोधी भावनाएँ और सोच बिठायी जा सके और उनमें साम्‍प्रदायिक ज़हर घोला जा सके और इस साम्‍प्रदायिक उन्‍माद को ही देशी या “राष्‍ट्रीय” विचारधारा घोषित कर दिया जाय।

देश के विकास में बारिश का योगदान!

बरसात के मौसम के साथ ही शुरूआत होती है सड़क में गढ्ढे बनने और उसके धँसने की। इसी मौसम में पुल गिरते हैं, पुरानी इमारतें गिरती हैं, पेड़-खम्भों से लेकर न जाने क्या-क्या गिर जाता है। आप सोच रहे होंगे बात तो ठीक है, पर इससे देश की अर्थव्यवस्था का आगे बढ़ने से क्या लेना-देना है! महोदय! देश की विकास को समझने में, यही तो आप चूक गये! अब देखिए, जब कोई सड़क टूटती है या उसमें गढ्ढे बन जाते हैं, तो इसके बाद क्या होता है? इसके बाद अगले साल सरकार सड़क की मरम्मत के लिए नया टेण्डर निकालती है। कोई बड़ी कम्पनी सबसे अधिक पैसा देकर टेण्डर ख़रीदती है। फिर कम्पनी ठेकेदार नियुक्त करती है। ठेकेदार मज़दूरों को काम पर रखता है। फिर दुबारा नयी सड़क बनकर तैयार होती है। इसके बाद मोदीजी या माननीय मुख्यमन्त्री सड़क का उद्घाटन करने आते हैं। यानी सड़क के टूटने के कारण ही कम्पनी को टेण्डर मिला, ठेकेदार को सड़क बनाने के लिए ठेका मिला, मुनाफ़ा मिला और इससे ही मज़दूरों को 2-3 महीने के लिए काम मिला और अपना शोषण करवाने का अधिकार प्राप्त हो पाया और अन्त में सरकार को भी जनता के हित में किये गये काम को दिखाने का मौक़ा मिला।