इलाहाबाद में मुनाफ़ाखोरी की भेंट चढ़ी मेहनतकशों की ज़िन्दगियाँ
अविनाश
बीते 23 मार्च को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले में एक बेहद दर्दनाक हादसे में कम से कम (सरकारी आँकड़ों के मुताबिक) 4 मज़दूरों की जान चली गई और 17 से ज़्यादा मज़दूर घायल हो गए जिनका इलाज स्वरूप रानी मेडिकल कॉलेज में चल रहा है। घायल मजदूरों में से 14 की स्थिति बेहद नाज़ुक है। लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक मौत का आँकड़ा बतायी गई संख्या से कई गुना ज़्यादा है।
लखनऊ राजमार्ग पर फाफामऊ कस्बे के मलाक हरहर के पास चाँदपुर गाँव स्थित आदर्श कोल्ड स्टोरेज में अमोनिया गैस के रिसाव से टैंकर फट गया। जिससे कोल्ड स्टोरेज की पूरी बिल्डिंग ही भरभरा कर गिर गयी और वहाँ काम करने वाले मज़दूर इसकी चपेट में आ गये। यह कोल्ड स्टोरेज पूर्व सपा विधायक और मन्त्री अंसार अहमद का है। जो पिछले 25 वर्षों से निर्माण और सुरक्षा के सारे मानदण्डों को ताक पर रखकर संचालित हो रहा था। कोल्ड स्टोरेज में आलू रखा जाता था और इसमें करीब 100 मज़दूर कार्यरत थे। मजदूरों को न तो किसी प्रकार की ट्रेनिंग दी गई थी और ना ही सुरक्षा के उपकरण मुहैया कराये गये थे। यहाँ तक की सैकड़ों टन आलू को स्टोर करने वाले इस कोल्ड स्टोरेज में एक भी टेक्नीशियन नहीं था और बिल्डिंग भी बेहद ज़र्जर थी। मुनाफ़ाखोरी के लिए मज़दूरों की जान की कीमत पर क्षमता से बहुत ज्यादा स्टोरेज किया गया था।
स्थानीय लोगों के मुताबिक़ ज़हरीली अमोनिया गैस का रिसाव हुआ और गैस पूरे वातावरण में फैल गया, जिससे आसपास रहने वाले लोगों का दम घुटने लगा, आँखों से आँसू आने लगे और सांस लेने में भी दिक्कत होने लगी। लेकिन मौका रहते मालिक और जिला प्रशासन कान में तेल डाले सोते रहे जब तक की रिसाव की वजह से टैंकर फट नहीं गया और मज़दूरों की मौत नहीं हो गयी। हादसा कितना भयानक था इसका अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि रेस्क्यू की प्रक्रिया 24 घण्टे से ज़्यादा देर तक चलती रही। विस्फोट के तत्काल बाद मीडिया और आम लोगों को घटना स्थल पर जाने से रोक दिया गया जिससे हादसे की असल तस्वीर अब तक सामने नहीं आ सकी है।
हादसे के बाद पूँजीवादी पार्टियाँ अपनी रिवायत के अनुसार एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाना शुरू कर चुकी हैं। तमाम नेता घड़ियाली आँसू बहाते नज़र आ रहे हैं। पूँजीवादी परम्परा के अनुसार सूबे के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ ने मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख रूपये और घायलों को 50-50 हजार रुपए की आर्थिक मदद की भी घोषणा कर दी है और जिला उद्यान अधिकारी सौरभ श्रीवास्तव को निलम्बित कर दिया गया है। इस मामले में पुलिस ने 7 लोगों को नामज़द और 5 अज्ञात के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज़ कर अंसार अहमद सहित दो अन्य लोगों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया है।
इलाहाबाद में मज़दूरों-मेहनतकशों की जान की क़ीमत पर मुनाफ़ाखोरी की यह कोई पहली घटना नहीं है। उपरोक्त घटना के अगले ही दिन शहर के साऊथ मलाका इलाके में निर्माणाधीन होटल के लिए बेसमेण्ट की खुदाई का काम चल ही रहा था कि बगल मे स्थित एक ज़र्जर गोदाम भरभरा कर काम कर रहे मज़दूरों के ऊपर गिर गया जिसमें दो मज़दूर दब गये। इसमें से एक मज़दूर की इलाज के दौरान मौत हो गई और दूसरे का इलाज एसआरएन अस्पताल में चल रहा है जिसकी हालत नाज़ुक बनी हुई है। इस मामले में ख़बर लिखे जाने तक किसी की जवाबदेही तय नहीं हुई है।
मोदी-योगी सरकार की कुम्भ नगरी सही मायने में पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा मुनाफ़े की हवस को बुझाने के लिए की जाने वाली आम मेहनतकशों की ठण्डी हत्याओं की नगरी बनती जा रही है। अक्सर इन हत्याओं को प्राकृतिक दुर्घटनाओं, हादसों आदि का नाम दे दिया जाता है और बहुत सफ़ाई से लूट और मुनाफ़े के लिए की जाने वाली इन हत्याओं पर प्रशासनिक लीपापोती कर दी जाती है। हर बार इन घटनाओं से होने वाली मौतों की फ़ाइलें एक टेबल से दूसरे टेबल तक घूमती रहती हैं और कार्रवाई सिर्फ़ काग़ज़ों पर होती है। इस बीच दूसरी घटना का इन्तज़ार होता रहता है और इस कार्रवाई की क़ीमत अगली बार हज़ारों टन मलबे के नीचे दबकर दम तोड़ते लोग चुकाते हैं। इस घटना के बाद अब फिर से वही पुरानी कहानी दुहरायी जा रही है, जाँच का आदेश देकर, एक पार्टी के नेता दूसरे पार्टी पर, एक मंत्रालय दूसरे मंत्रालय पर, एक अफ़सर दूसरे अफ़सर पर दोषारोपण करके और मृतक परिवारों और घायलों के लिए मुआवज़े की घोषणा करके अपना पिण्ड छुड़ा रहे हैं। यह बस घोषणा ही बन कर रह जाती है क्योकि पूँजीवादी मशीनरी में इतने छेद हैं कि या तो मुआवज़ा मिलता ही नहीं है या फिर जिनको मिलता भी है उसका बड़ा हिस्सा मंत्रियो, अफ़सरो और बाबुओं की जेब में चला जाता है।
भारत में हर दिन औसतन 10 इमारतें गिर जाती हैं। इन घटनाओं में औसतन 7 लोग रोज़ाना मौत के मुँह में समा जाते हैं। हर साल केवल इमारतों के गिरने से 2700 लोग जान गँवा देते हैं। नेताओं-ठेकेदारों-नौकरशाहों का नापाक गठजोड़ हर रोज देश में दर्जनों मेहनतकशों की मौत का कारण बन रहा है। अभी कुछ दिनों पहले ही मध्यप्रदेश में नकली कफ सीरप पीने से 20 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो गई। भारत के सबसे स्वच्छ शहर माने जाने वाले इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 25 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई। अपराधियों को बचाने के लिए बिना पोस्टमार्टम किये कई शवों का अन्तिम संस्कार कर दिया। जिन लोगों का पोस्टमार्टम हुआ उनकी मौत का कारण पानी के जहरीले होने का तथ्य स्पष्ट हो गया। सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ 4 मौतें दर्ज की गयीं। अब यही खेल इलाहाबाद की इस घटना में भी खेला जा रहा है।
हर बार इन घटनाओं की पड़ताल करते समय सरकार, प्रशासन, ठेकेदार आदि की मिलीभगत से रचे जा रहे मौतों के इस ताण्डव के असली कारणों को छिपा देने की भरसक कोशिश की जाती है। ज़्यादातर मामलों में ये घटनाएँ घटिया निर्माण सामग्री के इस्तेमाल, सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर किये जाने वाले निर्माण कार्यों, ख़राब-रखरखाव, समय-समय पर होने वाले जाँचों को नज़रअन्दाज़ कर देने से होती है। सच्चाई यह है कि जब तक निजी मालिकाने पर आधारित मौजूदा पूँजीवादी लूट की व्यवस्था बनी रहेगी, तब तक आम मेहनतकश लोगों की ज़िन्दगी के साथ ऐसा खिलवाड़ होता रहेगा, उनकी ज़िन्दगी पूँजीवादी व्यवस्था की बलि चढ़ती रहेगी। इसलिए इन घटनाओं के बाद मुआवज़े, उचित जाँच और सुरक्षा और निर्माण के मानकों को लागू करवाने के साथ ही इस मुनाफ़ा आधारित पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का संघर्ष भी करना होगा।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













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