स्त्री मज़दूर दिवस और स्त्री मज़दूरों के हालात
हरियाणा में मज़दूरों की ‘हत्या’ के लिए अवैध कारख़ानेदार तथा श्रम क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ाने वाली भाजपा सरकार ज़िम्मेदार!
अजय
8 मार्च को पूरी दुनिया में अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस मनाया जाता है। सरकारें बड़े-बड़े दावे करती हैं—स्त्रियों की आज़ादी, बराबरी और सम्मान के। लेकिन हरियाणा के जींद ज़िले के सफीदों में घटी एक दर्दनाक घटना इन दावों की सच्चाई उजागर करती है। स्त्री दिवस से ठीक एक दिन पहले सफीदों की एक अवैध फ़ैक्ट्री में काम करने वाले मज़दूरों के लिए वह दिन किसी भयावह सपने से कम नहीं था। जींद ज़िले के सफीदों में भाट कॉलोनी स्थित गुलाल और रंग बनाने वाली एक फ़ैक्ट्री में 7 मार्च को भीषण आग लग गयी। इस हादसे में 10 स्त्री मज़दूरों की मौत हो गयी, जबकि लगभग 12 मज़दूर, जिनमें अधिकतर स्त्रियाँ हैं, गम्भीर रूप से झुलस गयीं।
इस भीषण आग ने एक बार फिर कार्यस्थलों पर मज़दूरों की जीवन-सुरक्षा की सच्चाई उजागर कर दी। बताया जा रहा है कि फ़ैक्ट्री के मुख्य गेट पर बाहर से ताला लगा हुआ था, जिसके कारण मज़दूर समय रहते बाहर नहीं निकल सके और भीतर ही क़ैद होकर जलते रहे। जान बचाने के लिए कुछ मज़दूरों ने छत से छलांग लगायी, लेकिन कई मज़दूरों की चीख-पुकार बाहर तक पहुँच ही नहीं पायी और उन्होंने फ़ैक्ट्री के भीतर ही दम तोड़ दिया। यह दृश्य किसी बड़ी त्रासदी से कम नहीं था।
प्राप्त जानकारी के अनुसार यह फ़ैक्ट्री रिहायशी इलाके में अवैध रूप से चल रही थी। मुनाफ़ाख़ोर मालिक मज़दूरों से काम करवाने के लिए बाहर से ताला लगाकर उन्हें अन्दर बन्द कर देता था। मज़दूरों के परिजनों के अनुसार यहाँ काम करने वाली महिलाओं को मात्र 6000 रुपये मासिक मज़दूरी मिलती थी, जो क़ानूनन तय न्यूनतम मज़दूरी से भी बेहद कम है। फ़ैक्ट्री में ज्वलनशील पाउडर और रसायन मौजूद थे, लेकिन अग्निरोधक उपकरण, दस्ताने, जूते या अन्य सुरक्षा साधन उपलब्ध नहीं थे। स्थानीय लोगों के अनुसार आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है, लेकिन यह केवल तात्कालिक कारण है। असल कारण हैं—बिना अनुमति के चल रही फ़ैक्ट्री, सुरक्षा मानकों की अनदेखी, फ़ायर सेफ़्टी का अभाव और आपातकालीन निकास का न होना।
यह हादसा कोई साधारण दुर्घटना नहीं, बल्कि भाजपा की हरियाणा सरकार की पूँजीपरस्त नीतियों और प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है। अवैध रूप से चल रही फ़ैक्ट्रियों पर कार्रवाई न करना और सुरक्षा मानकों की अनदेखी इसी नीति का हिस्सा है। इस दर्दनाक घटना के बाद सरकार ने खानापूर्ति करते हुए मृतकों के लिए 5-5 लाख और घायलों के लिए 2 लाख रुपये मुआवज़े की घोषणा की है। लेकिन सवाल यह है कि क्या मज़दूरों की जान की कीमत इतनी ही है? यह घटना मज़दूरों के लिए एक कड़वी सीख भी है कि मुनाफ़े की अन्धी दौड़ में मालिकों का पूरा वर्ग सुरक्षा इंतज़ामों की अनदेखी करता है। लागत कम करने और मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए औद्योगिक इकाइयों में सुरक्षा मानकों को अक्सर ताक पर रख दिया जाता है, जिसका खामियाज़ा मज़दूरों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है।
मोदी सरकार एक तरफ़ नये लेबर कोड के तहत महिलाओं को रात की पाली में काम करने की अनुमति देने की बात कर रही है, लेकिन दूसरी तरफ़ फ़ैक्ट्रियों में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाती है। नये लेबर कोड के तहत व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों से जुड़ी संहिता में कई ऐसे बदलाव किये गये हैं जो मज़दूरों के लिए ख़तरनाक साबित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, अब बिजली से चलने वाली इकाई को फ़ैक्ट्री मानने के लिए कम से कम 20 मज़दूर और बिना बिजली वाली इकाई के लिए 40 मज़दूर होना आवश्यक कर दिया गया है। इससे कई छोटी इकाइयाँ श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हो जायेंगी और वहाँ काम करने वाले मजदूरों को सुरक्षा, काम के घंटे और स्वास्थ्य सम्बन्धी कई क़ानूनी सुविधाएँ नहीं मिल पायेंगी।
इसके अलावा नये लेबर कोड में फ़ैक्ट्री इंस्पेक्टर की जगह “इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर” की व्यवस्था की गयी है, जिसकी भूमिका मुख्यतः उद्योगों को नियमों के पालन में “सहायता” करने की बतायी जा रही है। यानी अब से निरीक्षण प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन रिपोर्ट और डिजिटल रिकॉर्ड पर आधारित होगा। ज़ाहिरा तौर पर इससे वास्तविक निरीक्षण और जवाबदेही कमज़ोर पड़ेगी।
ऐसे में सवाल है कि जब मेहनतकश औरतों की ज़िन्दगी इतनी कठिन है, तो केवल नारों और औपचारिक कार्यक्रमों से स्त्री मुक्ति कैसे सम्भव होगी? असली बदलाव तब आयेगा जब मेहनतकश औरतें अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर संघर्ष करेंगी और बराबरी, सम्मान तथा बेहतर जीवन के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करेंगी।
इन परिस्थितियों में यह भी सवाल उठता है कि मज़दूर कब तक पूँजीपतियों के मुनाफ़े की भट्टी में झोंके जाते रहेंगे? पूँजीवादी व्यवस्था में मज़दूरों की जान अक्सर सस्ती समझी जाती है। जब तक हम मज़दूर इस शोषण और लापरवाही के ख़िलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ नहीं उठाएंगे, तब तक ऐसी “मौत की फ़ैक्ट्रियाँ” मज़दूरों की जान लेती रहेंगी। इसलिए हर मेहनतकश के लिए सच्चा स्त्री दिवस वही होगा, जब हर स्त्री मज़दूर को सुरक्षित काम, सम्मानजनक जीवन और बराबरी का अधिकार मिलेगा। 8 मार्च की विरासत हमें यही सिखाती है कि अपने अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













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