पाँच राज्‍यों के विधान सभा चुनावों के नतीजों से फ़ासीवाद का विस्‍तार स्‍पष्‍ट: मज़दूर वर्ग के लिए इसके मायने क्‍या हैं?

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के विधान सभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं और इन नतीजों से साफ़ है कि फ़ासीवादी भाजपा का भौगोलिक विस्‍तार हुआ है। जहाँ असम व पुडुचेरी में भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने अपनी सत्‍ता बचाने में कामयाबी हासिल की वहीं पश्चिम बंगाल में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को मात देकर आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार पश्चिम बंगाल की सत्‍ता पर क़ब्‍ज़ा कर लिया है। इस प्रकार भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने अब 18 राज्‍यों की सत्‍ता में अपनी मौजूदगी दर्ज कर ली है। इन 18 राज्‍यों का क्षेत्रफल भारत के कुल क्षेत्रफल का 72 प्रतिशत हैं जबकि इनमें देश की 78 प्रतिशत आबादी रहती है। निश्चित रूप से यह फ़ासीवाद के विस्‍तार को दिखाता है जो पूरब, उत्‍तर व पश्चिमी भारत में अपने पैर पसार चुका है। भाजपा दक्ष‍िण भारत में भी अपने पैर पसारने की पूरी कोशिश कर रही है, हालाँकि इस बार के चुनावों में दक्षि‍ण भारत में उसका प्रदर्शन कुछ ख़ास नहीं रहा है। तमिलनाडु में फ़‍िल्‍म अभ‍िनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) ने एमके स्‍तालिन के नेतृत्‍व वाली द्रमुक सरकार को पटकनी देते हुए वहाँ की राजनीति में बड़ा उलटफेर किया है। जबकि केरल में वाम गठबन्‍धन की सरकार को बुरी हार का सामना करना पड़ा है और 10 सालों के अन्‍तराल के बाद वहाँ कांग्रेस के नेतृत्‍व वाले गठबन्‍धन (यूडीएफ़) की सरकार बनने जा रही है।

बेशक इन चुनावों की सबसे बड़ी ख़बर भाजपा का पश्चिम बंगाल की सत्‍ता पर क़ब्‍ज़ा करना है। यह पूर्वी भारत में भाजपा और उसके सहयोगी दलों के लगातार बढ़ते प्रभुत्‍व को दिखाता है। कई विश्‍लेषकों ने बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार और भाजपा की जीत के लिए मुख्‍य रूप से केन्‍द्रीय चुनाव आयोग (केचुआ) द्वारा की गई स्‍पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) की क़वायद को ज़‍िम्‍मेदार ठहराया है जिसके तहत वहाँ क़रीब 27 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से मिटा दिये गए हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि पिछले तमाम चुनावों की ही भाँति केचुआ ने बंगाल में भी भाजपा को जिताने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया था और एसआईआर की क़वायद का फ़ायदा फ़ासीवादियों को निश्चित तौर पर हुआ है। कई सीटों में भाजपा की जीत का अन्‍तर एसआईआर के तहत मतदाता सूची से हटाये गये मजदाताओं की संख्‍या से कम है। यही नहीं भाजपा ने 18 ऐसी सीटों पर जीत हासिल की हैं जो मुस्लिम बहुल क्षेत्र हैं और जहाँ एसआईआर के तहत बड़ी संख्‍या में मतदाताओं के नाम हटाये गए थे। ऐसी तमाम सीटों पर भाजपा की जीत निश्‍चित ही समूची निर्वाचन प्रक्रिया की निष्‍पक्षता पर बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है। स्‍पष्‍ट है कि चुनाव आयोग के घोर पक्षपाती रवैये और अदालतों की उदासीनता के मंज़र में सम्‍पन्‍न हुई एसआईआर की क़वायद ने भाजपा को पश्चिम बंगाल में सत्‍ता तक पहुँचाने के लिए सीढ़ी का काम किया है। ऐसे में पश्चिम बंगाल में सम्‍पन्‍न हुई निर्वाचन प्रक्रिया पर जो सवाल उठ रहे हैं वे बिल्‍कुल वाजिब हैं। यह चुनावी तंत्र सहित राज्‍य की पूरी संरचना में फ़ासीवादी घुसपैठ का ही प्रमाण है।

परन्‍तु पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत की पूरी व्‍याख्‍या महज़ एसआईआर की क़वायद तक सीमित करके नहीं की जा सकती है। फ़ासीवादियों ने बंगाल में सत्‍ता तक पहुँचने के लिए साम-दाम-दण्‍ड-भेद सभी हथकण्‍डे अपनाये। भाजपा के नेताओं ने बंगाल की विचारणीय मुस्लिम आबादी को बांग्‍लादेशी घुसपैठियों के रूप में प्रस्‍तुत करके उनके ख़‍िलाफ़ बेहिसाब साम्‍प्रदायिक ज़हर फैलायी जिसकी बदौलत वे साम्‍प्रदायिक ध्रुवीकरण करने में कामयाब रहे। कहने की ज़रूरत नहीं चुनावों में पानी की तरह पैसे फेंके गए और इसमें भाजपा के धनबल के सामने बाक़ी पार्टियाँ आसपास भी नहीं टिक सकीं। इन सभी कारकों के अलावा पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के 15 वर्ष के मुख्‍यमंत्री काल में हुए ज़बर्दस्‍त भ्रष्‍टाचार और निहायत ही निरंकुश प्रशासन तथा टीएमसी के नेताओं की गुंडागर्दी के ख़‍िलाफ़ आम जनता में पैदा हुए ग़ुस्‍से का फ़ायदा भी भाजपा को हुआ।

पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों से ग़ैर-फ़ासीवादी पार्टियों द्वारा भाजपा को चुनावों में हराकर फ़ासीवाद को हराने का दिवा-स्‍वप्‍न देखने वाले मध्‍यवर्गीय सेक्‍युलर और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को बहुत बड़़ा सदमा लगा है। परन्‍तु मज़दूर वर्ग के नज़रि‍ये से देखें तो इसमें ज़रा भी ताज्‍जुब की बात नहीं है। चुनावी दंगल में फ़ासीवादी भाजपा की जीत वास्‍तव में समाज में फैल रहे प्रतिक्रयावादी फ़ासीवादी आन्‍दोलन की ही एक अभ‍िव्‍यक्ति है। संघ परिवार के नेतृत्‍व में चल रहा यह प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्‍दोलन वास्‍तव में पूँजीवाद के आर्थिक संकट, बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी आदि का ही नतीजा है। क्रान्तिकारी ताक़तों की कमज़ोरी और बिखराव का लाभ प्रतिक्रियावादी ताक़तें उठा रही हैं। ऐसे में मज़दूर वर्ग के नेतृत्‍व में एक शक्तिशाली क्रान्तिकारी आन्‍दोलन के ज़रिये ही फ़ासीवाद को निर्णायक शिकस्‍त दी जा सकती है। जो लोग इस सच्‍चाई से किनारा करके चुनावी गण‍ित के ज़रिये फ़ासीवाद को हराने के लिए ज़ोर-आज़माइश कर रहे हैं उन्‍हें अन्‍तत: निराशा और हताशा ही हाथ लगेगी।

असम के नतीजों में कोई उलटफेर नहीं दिखा। वहाँ पिछले कई दशकों से प्रवासी-विरोध के नाम पर की जा रही राजनीति को भाजपा ने कुटिलता से साम्‍प्रदायिक रंग देने में ज़बर्दस्‍त कामयाबी हासिल कर ली है। इस प्रकार मुस्लिम-विरोधी साम्प्रदायिक नफ़रत के शोरगुल में मेहनतकश अवाम की ज़‍िन्‍दगी से जुड़े अहम मुद्दे दबकर रह जाते हैं। असम का मुख्‍यमंत्री हिमंत बिस्‍वा सरमा साम्‍प्रदायिक नफ़रत का पैगम्‍बर बनकर उभरा है और इस बार के चुनावों में भी उसने बेशर्मी से मुस्लिमों के ख़‍िलाफ़ नफ़रत का ज़हर फैलाकर सत्‍ता में वापसी सुनिश्चित की। साथ ही असम में हुई कुटिलतापूर्ण परिसीमन की प्रक्रिया ने भी भाजपा की बड़ी जीत सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभायी। यह चुनाव तंत्र में फ़ासीवादी घुसपैठ का एक और उदाहरण है जो समूची चुनाव प्रक्रिया को बेमतलब बना देता है। साथ ही असम के नतीजे एक बार फिर दिखाते हैं कि कांग्रेस की लचर, ढुलमुल और समझौतावादी राजनीति फ़ासीवादी आक्रामकता के सामने कोई कारगर प्रतिरोध खड़ा कर पाने में अक्षम है। पुडुचेरी के चुनावों में भी कोई उलटफेर नहीं हुआ और वहाँ भाजपा का सहयोगी दल अख‍िल भारतीय एनआर कांग्रेस ने आसानी से जीत हासिल करके सत्‍ता में वापसी कर ली है।

तमिलनाडु के चुनावी नतीजों में इस बार हैरतअंगेज़ उलटफेर देखने में आया। महज़ दो साल पहले तमिलनाडु के मशहूर फ़‍िल्‍म अभ‍िनेता विजय के नेतृत्‍व में बनी पार्टी टीवीके ने एमके स्‍तालिन के नेतृत्‍व वाली द्रमुक सरकार को सत्‍ता से बाहर का रास्‍ता दिखा दिया है। इन चुनावों में टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, हालाँकि उसे पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ है और इसलिए वह अब सरकार बनाने के लिए अन्‍य दलों की मदद की दरकार है। तमिलनाडु के चुनावों ने दोनों ही द्रविड़ पार्टियों द्रमुक और अन्‍नाद्रमुक की ज़बर्दस्‍त हार हुई है। ग़ौरतलब है कि तमिलनाडु के इतिहास में पिछले पाँच दशकों के दौरान एक के बाद एक इन्‍हीं दो पार्टियों की सरकारें रही हैं। स्‍तालिन के नेतृत्‍व वाली द्रमुक सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्‍टाचार व निरंकुशता ने उस सरकार के ख़‍िलाफ़ जनमत तैयार करने की परिस्‍थ‍ितियाँ तैयार कीं। ऐसे में विजय जैसे फ़‍िल्‍मस्‍टार ने अपनी फ़‍िल्‍मों में भ्रष्‍टाचार, स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍था में अन‍ियम‍िता और चुनावी धाँधली जैसे मुद्दों को उठाकर लोगों के समक्ष सामाजिक न्‍याय के मसीहा जैसी अपनी छवि पेश की। ग़ौरतलब है कि तमिल समाज में ऐतिहासिक रूप से फ़‍िल्‍म उद्योग व राजनीति का बेहद घनिष्‍ठ सम्‍बन्‍ध रहा है और वहाँ आमजन के बीच फ़‍िल्‍म कलाकारों की ज़बर्दस्‍त लोकप्रियता है। पहले भी वहाँ करुणानिध‍ि, एमजीआर और जयललिता जैसे नेताओं ने फ़‍िल्‍म उद्योग से राजनीति का सफ़र तय किया था। उसी कड़ी में अब विजय ने इस बार के चुनावों में बड़ी सफलता हासिल की है। परन्‍तु पहले के द्रविड़ नेताओं के उलट विजय की अपनी कोई स्‍पष्‍ट विचारधारा नहीं है और इसकी पूरी सम्‍भावना है कि वह व्‍यवहारवादी ढंग से अपनी राजनीति संचालित करेगा। हमने भारतीय राजनीति के इतिहास में पहले भी ऐसे बिन पेंदी के लोटों को समझौतापरस्‍ती की ढलान पर उतरते देखा है। फ़‍िलहाल वह कांग्रेस की मदद से सरकार बनाने की कोशिशों में लगा है, परन्‍तु इसमें कोई ताज्‍जुब की बात नहीं होगी अगर वह कालान्‍तर में अन्‍नाद्रमुक और भाजपा के साथ गलबहियाँ करने लगे। अगर ऐसा होता है तो वह भाजपा को तमिलनाडु की राजनीति में जड़ें जमाने का मौक़ा देगा।

केरल में चुनावी नतीजे उम्‍मीद के मुताबिक़ ही रहे। पिनारायी विजयन के नेतृत्‍व में वामपन्थी गँठजोड़ एलडीएफ़ के दस साल के कार्यकाल के दौरान हुए भ्रष्‍टाचार व निरंकुश दमन की कार्रवाइयों से वहाँ के लोग त्रस्‍त आ चुके थे। वैसे भी केरल की जनता हर पाँच साल बाद सरकार बदलने के लिए जानी जाती है। यह क्रम केवल 2021 में ही टूटा था जब एलडीएफ़ को लगातार दूसरी बार सरकार बनाने का मौक़ा मिला था। इस प्रकार यह कांग्रेस की जीत से ज्‍़यादा वामपन्थियों की हार है जिसने मज़दूर वर्ग के इन ग़द्दारों के सामने अस्तित्‍व का संकट पैदा कर दिया है। 1977 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब इन नक़ली कम्‍युनिस्‍टों की किसी भी प्रदेश में सरकार नहीं है। संसदीय वामपन्‍थ का यह गहराता संकट मज़दूर वर्ग में क्रान्तिकारी राजनीति की पैठ बनाने में मदद ही करेगा। इसलिए मज़दूर वर्ग को अपने इन ग़द्दारों की हार से दुखी होने का कोई कारण नहीं है।

पाँच राज्‍यों के इन चुनावी नतीजों से कुल मिलाकर जो तस्‍वीर उभरती है वह निश्चित रूप से मज़दूर वर्ग के लिए चिन्‍ता का सबब है। फ़ासीवादी दानव की बढ़ती ताक़त और देश के नए हिस्‍सों में उसका पैर पसारना निश्चित रूप से मज़दूर वर्ग के लिए एक बुरी ख़बर है क्‍योंकि इसमें कोई दो राय नहीं कि फ़ासीवादी भाजपा मज़दूरों की दुश्‍मन नंबर वन है। परन्‍तु ऐसे में बदहवास होकर किसी ग़ैर-फ़ासीवादी पार्टी का पिछलग्‍गू बनने से मज़दूरों की समस्‍याओं का समाधान नहीं होने वाला और न ही इससे फ़ासीवादियों को निर्णायक शिकस्‍त मिलने वाली है। आज ज़रूरत योजनाबद्ध ढंग से मज़दूर वर्ग के बीच क्रान्तिकारी विचारों का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार करने की है और फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष को पूँजीवाद-विरोधी संघर्ष के अभ‍िन्‍न अंग के रूप में आगे बढ़ाने की है।