आज स्त्री मुक्ति की परियोजना को प्रतीकात्मक जश्न और रस्मी अनुष्ठानों से आगे ले जाने की ज़रूरत है!
इतिहास हमेशा इस बात का गवाह रहा है कि बिना संघर्ष किये, बिना लड़े, कुछ भी हासिल कर पाना मेहनतकश जनता के लिए नामुमकिन है। आज हमारे देश में भी मज़दूर-मेहनतकशों के हालात बेहद खराब है। खास तौर पर मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से यह स्थिति और भयावह होती चली गयी है। स्त्रियों की बात करें तो आज के भारत में उनकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। आज के दौर में स्त्री कामगारों को पुरुषों के मुकाबले लगभग 67 प्रतिशत ही वेतन मिलने के बाद हुक्मरानों द्वारा स्त्री-पुरुष समानता की लच्छेदार बात करना भी एक मज़ाक़ से कम नहीं लगता है। भारत में बड़ी संख्या में स्त्रियाँ असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं, जहाँ 12–14 घण्टे काम करने के बावजूद उन्हें न तो समान वेतन ही मिलता है और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा ही मिलती है। यही नहीं, आर्थिक मंदी के समय सबसे पहले स्त्री कामगारों की ही छंटनी होती है और आर्थिक तेज़ी के दौर में उन्हें सस्ते श्रम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। आज की सड़ी-गली पूँजीवादी व्यवस्था और इसकी बीमार संस्कृति ने स्त्रियों को सिर्फ़ उपभोग की वस्तु मात्र बना कर रख दिया है। स्त्रियाँ आज पूँजीवाद और पूँजीवादी पितृसत्ता की दोहरी गुलामी झेल रही हैं।






















Recent Comments