Category Archives: महान जननायक

भगतसिंह – बम काण्ड पर सेशन कोर्ट में बयान का एक अंश

समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। दुनियाभर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढँकनेभर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा-सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।

जब तक इंसानों के हाथों इंसानों का शोषण जारी रहेगा, तब तक मार्क्स के क्रान्तिकारी विचार शासक वर्गों को दु:स्वप्न देते रहेंगे

पूँजीवादी संकट एक दोहरी सम्भावना को जन्म देते हैं: पूँजीवाद से बेहतर एक न्यायपूर्ण और समानतामूलक व्यवस्था की स्थापना यानी समाजवाद की स्थापना या फिर पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा विनाश का उत्तरोत्तर बर्बरता, यानी प्रतिक्रियावाद, तानाशाही, युद्ध और तबाही, की ओर जाना। एक क्रान्तिकारी वैज्ञानिक के तौर पर इन दोनों सम्भावित नतीजों की पहचान ज़रूरी है। लेकिन हमारा क्रान्तिकारी आशावाद हमें यह भी बताता है कि प्रबल सम्भावना यह है कि ऐसी बर्बरता की मंज़िल पूर्ण हो, इससे पहले दुनिया भर की मेहनतकश जनता उठ खड़ी होगी और समाज को एक क्रान्तिकारी परिवर्तन की ओर ले जायेगी, वह पूँजीवाद को दुनिया को तबाह नहीं करने देगी।

भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस (23 मार्च) पर साम्राज्यवाद, पूँजीवाद के बारे में उनके विचार

हम मानते हैं कि स्वतन्त्रता प्रत्येक मनुष्य का अमिट अधिकार है। हर मनुष्य को अपने श्रम का फल पाने-जैसा सभी प्रकार का अधिकार है और प्रत्येक राष्ट्र अपने मूलभूत प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण स्वामी है। अगर कोई सरकार जनता को उसके इन मूलभूत अधिकारों से वंचित रखती है तो जनता का केवल यह अधिकार ही नहीं बल्कि आवश्यक कर्तव्य भी बन जाता है कि ऐसी सरकार को समाप्त कर दे।…

साम्प्रदायिक जुनून का मुकाबला करते हुए शहीद होने वाले महान क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के शहादत दिवस (25 मार्च) के अवसर पर

देश की स्वाधीनता के लिए जो उद्योग किया जा रहा था, उसका वह दिन निस्सन्देह, अत्यन्त बुरा था, जिस दिन स्वाधीनता के क्षेत्र में ख़िलाफ़त, मुल्ला, मौलवियों और धर्माचार्यों को स्थान देना आवश्यक समझा गया। एक प्रकार से उस दिन हमने स्वाधीनता के क्षेत्र में एक कदम पीछे हटकर रखा था। हमें अपने उसी पाप का फल भोगना पड़ रहा है। देश की स्वाधीनता के संग्राम ही ने मौलाना अब्दुल बारी और शंकराचार्य को देश के सामने दूसरे रूप में पेश कर उन्हें अधिक शक्तिशाली बना दिया और हमारे इस काम का फल यह हुआ कि इस समय हमारे हाथों ही से बढ़ायी इनकी और इनके जैसे लोगों की शक्तियाँ हमारी जड़ उखाड़ने और देश में मजहबी पागलपन, प्रपंच और उत्पात का राज्य स्थापित कर रही हैं।

काकोरी ऐक्शन के क्रान्तिकारियों के शहादत दिवस पर – धार्मिक बँटवारे की साज़िशों को नाकाम करो! एकजुट होकर संघर्ष करो!!

17 और 19 दिसम्बर की तारीख़ को काकोरी ऐक्शन के क्रान्तिकारियों ने अपनी शहादत से अमर बना दिया है। देश के इन चार बहादुर बेटों के नाम थे – राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफ़ाक़उल्ला खान, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह। 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी में क्रान्तिकारियों ने ट्रेन में जा रहे अंग्रेज़ी सरकार के ख़ज़ाने को लूट लिया था। यह घटना लूट और अन्याय पर टिकी अंग्रेज़ी हुकूमत के गालों पर एक करारा तमाचा थी। इस घटना से बौखलायी ब्रिटिश सरकार ने इन क्रान्तिकारियों की धरपकड़ शुरू की। इसके बाद 1927 में 17 दिसम्बर के दिन गोण्डा में राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी और 19 दिसम्बर को गोरखपुर में राम प्रसाद बिस्मिल, फ़ैज़ाबाद में अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान और इलाहाबाद में रोशन सिंह को अंग्रेज़ों ने फाँसी दी थी। कई अन्य क्रान्तिकारियों को काला पानी और कठोर कारावास की सज़ा मिली। चन्द्रशेखर आज़ाद अंग्रेज़ों के हाथ नहीं आये। ये सभी क्रान्तिकारी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) से जुड़े हुए थे।

दुर्गावती वोहरा (दुर्गा भाभी ): भारत की क्रान्तिकारी विरासत में चमकता हुआ एक नाम

दुर्गा भाभी इस बात की प्रतीक हैं कि राष्ट्रीय आन्दोलन में केवल पुरुष ही नहीं स्त्रियाँ भी बराबरी से लड़ रही थीं। वे राष्ट्रीय आन्दोलन में स्त्रियों की भागीदारी का प्रतिनिधित्व करती हैं और यह स्थापित करती हैं कि किसी भी सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई में स्त्रियों की भागीदारी अनिवार्यत: होनी चाहिए।

जोतिबा फुले की क्रान्तिकारी विरासत को जानो!

जोतिबा फुले एक ऐसे समय में पैदा हुए जब हमारा देश उपनिवेशवादी और सामन्ती शोषण के जुए तले पिस रहा था। उस समय दलित व स्त्री उत्पीड़न चरमोत्कर्ष पर था। ऐसे दौर में जोतिबा फुले का पूरा जीवन जाति-उन्मूलन और स्त्रियों की शिक्षा व मुक्ति के लिए समर्पित रहा। आज हम एक फ़ासीवादी दौर में जी रहे हैं जब प्रतिक्रियावादी ताकतें पूरे समाज में हावी हैं तथा तर्क और विज्ञान की हत्या करके पाखण्ड और कूपमण्डूकताओं को स्थापित कर रही हैं। स्त्रियों और दलितों के उत्पीड़न की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। शिक्षा कुछ मुट्ठी-भर लोगों की बपौती बनती जा रही है तब जोतिबा फुले की विरासत को याद करना बहुत ज़रूरी हो जाता है

शहीदे-आज़म भगतसिंह आज देश के मज़दूरों, ग़रीब किसानों और मेहनतकशों को क्या सन्देश दे रहे हैं?

भारत के मज़दूरो, ग़रीब किसानो, आम मेहनतकशो और आम छात्रो व युवाओ! तुम चाहे किसी भी धर्म, जाति, नस्ल, क्षेत्र या भाषा से रिश्ता रखते हो, तुम्हारे राजनीतिक व आर्थिक हित समान हैं, तुम्हारी एक जमात है! तुम्हें लूटने वाली इस देश की परजीवी पूँजीवादी जमात है जिसमें कारख़ाना मालिक, खानों-खदानों के मालिक, ठेकेदार, धनी व्यापारी, धनी किसान व ज़मीन्दार, दलाल और बिचौलिये शामिल हैं! ये जोंक के समान इस देश की मेहनतकश अवाम के शरीर पर चिपके हुए हैं! ये ही इस देश की मेहनत और कुदरत की लूट के बूते अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं! इनके जुवे को अपने कन्धों से उतार फेंको! इसके लिए संगठित हो, अपनी क्रान्तिकारी पार्टी का निर्माण करो! केवल यही शहीदे-आज़म भगतसिंह की स्मृतियों को इस देश के मेहनती हाथों का सच्चा क्रान्तिकारी सलाम होगा, उनको सच्ची आदरांजलि होगी : एक ऐसे समाज का निर्माण करके जिसमें सुई से लेकर जहाज़ बनाने वाले मेहनतकश वर्ग उत्पादन, समाज और राज-काज पर अपना नियन्त्रण स्थापित करेंगे, परजीवी लुटेरी जमातों के हाथों से राजनीतिक और आर्थिक सत्ता छीन ली जायेगी, जो मेहनत नहीं करेगा उसे रोटी खाने का भी अधिकार नहीं होगा, दूसरे की मेहनत की लूट का हक़ किसी को नहीं होगा, जिसमें, भगतसिंह के ही शब्दों में, मनुष्य के हाथों मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा।

रोज़ा लक्ज़मबर्ग की याद में

रोज़ा लक्ज़मबर्ग एक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी थीं। उनको याद करते हुए लेनिन ने कहा था – “गरुड़ कभी-कभी मुर्गियों से नीची उड़ान भर सकते हैं। लेकिन मुर्गियाँ  कभी भी गरुड़ के बराबर ऊँचाई तक नहीं उठ सकती हैं। …अपनी ग़लतियों के बावजूद वह हमारे लिए गरुड़ थीं और रहेंगी। न केवल दुनियाभर के कम्युनिस्ट उनकी याद को ज़िन्दा रखेंगे बल्कि उनकी जीवनी और उनका पूरा काम पूरी दुनिया के कम्युनिस्टों की कई पीढ़ियों को प्रशिक्षित करने के लिए महत्वपूर्ण सामग्री का काम करेंगे।”

कविता – नयी सदी में भगतसिंह की स्मृति / शशि प्रकाश

हमें तुम्हारा नाम लेना है
एक बार फिर
गुमनाम मंसूबों की शिनाख़्त करते हुए
कुछ गुमशुदा साहसिक योजनाओं के पते ढूँढ़ते हुए
जहाँ रोटियों पर माँओं के दूध से अदृश्य अक्षरों में लिखे
पत्र भेजे जाने वाले हैं, खेतों-कारख़ानों में दिहाड़ी पर
खटने वाले पच्चीस करोड़ मज़दूरों,
बीस करोड़ युवा बेकारों,
उजड़े बेघरों और आधे आसमान की ओर से।