Category Archives: मज़दूरों की क़लम से

मज़दूर की ज़िन्दगी इतनी सस्ती क्यों?

उस मज़दूर की मौत का कारण भी यही घुटन भरी परिस्थितियाँ थी। बस उसकी मौत फैक्टरी में न होकर उसके कमरे पर हुई। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में साफ़ आया कि फेफड़ों में सूजन व गर्दा की वजह से वह मरा। उसकी मौत की ख़बर उसके घरवालों को दी गयी और उसके घर वाले दौड़े-दौड़े बिहार से गुड़गाँव आये। उसकी माँ ने मौत के मुआवजे़ के लिए बहुत दौड़ लगायी मगर कम्पनी मैनजमेंट को ज़रा भी तरस नहीं आया। उसकी माँ ने कम्पनी मैनेजेण्ट से अपील की और पुलिस से गुहार लगायी। कम्पनी में पुलिस आयी भी मगर कोई कुछ भी नहीं बोला और कोई सुराग भी हाथ नहीं लगा। क्योंकि उसकी मौत के अगले दिन ही उसकी हाज़िरी रजिस्टर से सात दिन की उपस्थिति ग़ायब कर दी गयी।

आपस की बात – दिहाड़ी मज़दूरों की जिन्दगी!

मैं एक भवन निर्माण मज़दूर हूँ। मैं बिहार से रोजी-रोटी के लिए दिल्ली आया हूँ। यहाँ मुश्किल से 30 दिनों मंे 20 दिन ही काम मिल पाता है। जिसमें भी काम करने के बाद पैसे मिलने की कोई गारन्टी नहीं होती है। कहीं मिल जाते हैं तो कहीं दिहाड़ी भी मार ली जाती है। कोई-कोई मालिक तो जबरन पूरा काम करवाकर पैसे पूरे नहीं देते हैं और ज़्यादा समय तक काम करने पर उसका अलग से मज़दूरी भी नहीं देते हैं।

आपस की बात – झूठ फैलाने वाले नहीं सच बताने वाला अख़बार पढ़ो

बहुत से लोगों के हर दिन की शुरुआत बीते कल की घटनाओं को जानने की उत्सुकता के साथ शुरू होती है। लेकिन आज-कल के अखबारों को देख जाइए, मेहनतकश जनता की रोज़मर्रा की समस्याओं या समाज के लिए उपयोगी ख़बरें ढूँढे से भी नहीं मिलेंगी। हाँ, साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली मनगढ़न्त ख़बरें और हिन्दुत्व व नफ़रत के मसाले डालकर पकाई गई ज़हरीली कहानियाँ इसके पन्नों पर भरी रहती हैं। अख़बारों का यह चरित्र धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक देश कहलाने वाले भारत के लोकतंत्र के चौथे खंभे की ढोल की पोल खोल देता है।

बिगुल के लिए एक कविता

हम तो बस इसी बहाने निकले हैं
धरती की गोद में बैठकर आसमाँ को झुकाने निकले हैं
ज़ुल्मतों के दौर से, इन्साँ को बचाने निकले हैं
विज्ञान की ज्वाला जलाकर, अँधेरा मिटाने निकले हैं
हम इन्सान है, इन्सान बनाने निकले हैं

निर्माण मज़दूर की कलम से 

मेरे मज़दूर भाईयो, मैं निर्माण क्षेत्र से जुड़ा मज़दूर हूँ। हमारा काम गाड़ियों से रेती, बजरी, सीमेण्ट आदि उतारना और लादना होता है। काम के दौरान न तो किसी भी प्रकार का सुरक्षा इन्तज़ाम होता और रोज़-रोज़ काम का मिलना भी निश्चित नहीं होता। बहुत बार खाली हाथ भी घर लौटना पड़ जाता है। बिगुल अखबार पढ़ने के बाद मुझे पता चला कि हम दुनिया भर के मज़दूरों को क्यों संगठित होना चाहिए क्योंकि एकजुट होकर ही हम मालिक वर्ग को अपनी माँगों पर झुका सकते हैं। हम नरवाना के मज़दूरों ने कुछ महीने पहले हड़ताल की थी और अपनी कई माँगों को मनवाने में सफल रहे थे।

अपनी ज़िन्दगी बदलने के लिए बम्बइया मसाला फ़िल्मों की नही बल्कि मज़दूरों के संघर्षों के गौरवशाली इतिहास की जानकारी ज़रूरी है

आज हमें दिमाग़ी नशे की खुराकें नहीं चाहिए, जो कुछ देर के लिए हमें अपना दुःख दर्द भुलवा देती हैं मगर उसका कोई इलाज नहीं करतीं। हमें ऐसी सच्चाई चाहिए जिसके सहारे हम अपने जीवन और अपने जैसे करोड़ों मज़दूरों के जीवन को बदल सकते हैं।

आपस की बात – न्याय, विधान, संवि‍धान का घिनौना नंगा नाच

आज की परिस्थिति आठ बाई आठ के कमरे में रहना, ना सही से खाने को, ना ही जीने का कोई उत्साह। सुबह जगो तो काम के लिए, नहाओ तो काम के लिए, खाओ तो काम के लिए, रात बारह बजे सोओ तो काम के लिए। ऐसा लगता है कि हम सिर्फ़ काम करने के लिए पैदा हुए हैं ‌तो हम फिर अपना जीवन कब जीयेंगे। जहाँ तक तनख़ा की बात है, तो वो तो महीने की सात से दस के बीच में मिल जाती है, लेकिन सिर्फ़ पन्द्रह तारीख़ तक जेब में पैसे होते हैं, जिससे हम अपने बच्चों के लिए कुछ ज़रूरी चीज़ें ले पाते हैं। उसके बाद तो हर एक दिन एक-एक रुपया सोच-सोचकर ख़र्च करना पड़ता है। महीना ख़त्म होने से पहले ही बचे हुए रुपये भी ख़त्म हो जाते हैं।

बवाना के मज़दूर की चिट्ठी

सुबह जगो तो काम के लिए, नहाओ तो काम के लिए, खाओ तो काम के लिए, रात बारह बजे सोओ तो काम के लिए। ऐसा लगता है की हम सिर्फ काम करने के लिए पैदा हुए हैं ‌तो हम फिर अपना जीवन कब जियेंगे। महीने की सात से दस तारीख के बीच तनखा मिलती है, पन्द्रह तारीख तक जेब में पैसे होते हैं तो अपने बच्चों के लिए फल या कुछ ज़रूरी चीजें ले सकते हैं । उसके बाद हर दिन एक-एक रुपया सोचकर खर्च करना पड़ता है। महीना ख़त्म होते-होते ये भी सोच ख़त्म हो जाती है। अगर कहीं बीमार पड़ गये तो क़र्ज़ के बोझ तले दबना तय है।

ऑटोमोबाइल मज़दूर विकास की चिट्ठी

मैं अपने रिश्तेदार के साथ लॉज में उनके कमरे पर रुका। उन छोटे कमरों में मेरा दम घुटता है। एक कमरे में हमलोग 4 से 5 आदमी रहते हैं।  मेरे रिश्तेदार मार्क एग्जौस्ट सिस्टम लिमिटेड मैं काम करते थे। उन्होंने मेरा काम मीनाक्षी पोलिमर्स में लगवा दिया। यहाँ पर करीब 100 लोग काम करते थे। यहाँ बहुत बुरी तरह से हमारा शोषण होता था। कम्पनी फ़र्श पर झाड़ू-पोछा भी लगवाती थी और कभी प्रोडक्शन का काम नहीं हो तो नाली वगैरह भी साफ़ करवाती थी। काम जबरिया दबाव में कराया जाता था, बारह घण्टे का काम आठ घण्टे में करवाया जाता था। अन्दर में बैठने की व्यवस्था नहीं था। बारिश के समय खाने पीने के लिए कोई जगह नहीं थी। गर्मी में काम करवाया जाता और पीने के लिए गर्म पानी दिया जाता। मैं दिन-रात मेहनत करता था ताकि कुछ पैसे कमा बचा सकूँ। लेकिन यहाँ मालिक ज़िन्दा रहने लायक भी पैसा नहीं दे रहा था। हम अपना हक माँग रहे हैं और मालिक दे नहीं रहा है, हम यूनियन बनाने का प्रयास कर रहे हैं मालिक बनने नहीं दे रहा है। मैं जीवन में आगे बढ़ना चाहता हूँ, लेकिन मैं अब समझ गया हूँ कि मैं अकेले आगे नहीं बढ़ सकता। हम सबकी ज़िन्दगी ख़राब है इसीलिए हम सभी को एक साथ मिलकर लड़ना चाहिए। इसीलिए दोस्तों और मजदूर भाइयो अपना हक माँगो और यूनियन बनाओ।

चुपचाप सहना नहीं है, लड़ना है…

अगर कहीं बीमार पड़ गये या कोई चोट लग गयी तो महीनों की सारी बचत एक सप्ताह में उड़ जाती है। जो कम्पनी आपका खून चूसकर मुनाफा कमाती है वह घायल होने पर दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकती है। फैक्टरी में रुपया बचा रहता है वो भी मार लेते हैं। कोरोना के समय क्या हुआ था, आप सबने तो देखा ही होगा। मैं भी घर लौट गया था। मगर फिर सोचा कि यहाँ कितने दिन रह पाउँगा? रोज़गार की तलाश में तो फिर उसी नर्ककुण्ड में जाना ही पड़ेगा। लेकिन मैंने भी सोच लिया है – अब चुपचाप सहूँगा नहीं। मैं लड़ूँगा और मज़दूरों की एकता बनाउँगा। वरना गाँव और शहर के बीच दौड़ते-दौड़ते मर जाउँगा।