भारतीय शिक्षा व्यवस्था और विज्ञान के विकास की पोल खुल गयी
एआई समिट और गलगोटिया यूनिवर्सिटी प्रकरण में
आदित्य
16-18 फ़रवरी के बीच देश की राजधानी में सम्पन्न हुआ एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) समिट सिर्फ़ देश में ही नहीं, दुनिया भर में सुर्ख़ियों में रहा। लेकिन यह नयी और बेहतरीन एआई टेक्नोलॉजी की वजह से या शानदार मेज़बानी की वजह से नहीं बल्कि ठीक इसके उलट गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा पहले से विकसित चीनी तकनीक को अपना बताकर झूठा दावा करने तथा बेहद खराब मेज़बानी करने के कारण चर्चा में रहा! इस एआई समिट ने तीन दिन में ही पूरी दुनिया के सामने भारत के “विश्वगुरु” होने के दावे की पोल खोल दी।
यह एआई समिट पहले दिन से ही अव्यवस्था, अराजकता, अफ़रातफ़री और उथल-पुथल की वजह से सुर्ख़ियों में था। पहले दिन से ही कोई सुचारु मैनेजमेण्ट नहीं होने की वजह से घण्टों तक लम्बी लाइनें लगी रहीं। “दुनिया के सबसे बड़े” एआई समिट में इण्टरनेट की सुविधा ही ठप्प हो गयी! हर दिन के साथ इस एआई समिट की पोल खुलती रही। वीवीआइपी लोगों के कारण आम लोगों को पहले दिन से ही तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ा। समिट के तीसरे दिन सैकड़ों देशी-विदेशी लोगों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उस रास्ते से गुज़रने वाले थे, और इसलिए बिना कोई व्यवस्था किये सारे रास्तों को बन्द कर दिया गया।
लेकिन इस शिखर सम्मेलन को “शिखर” पर ले जाने का काम गलगोटिया नाम की एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी ने किया। दिल्ली में हुए इस सम्मेलन में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर द्वारा चीन के रोबोडॉग यूनिट्री गो2 को यूनिवर्सिटी द्वारा बनाया गया बताया गया! इतना ही नहीं, इसके बाद सॉकर रोबोट को भी बनाने का दावा विश्वविद्यालय द्वारा किया गया! लेकिन सच्चाई सामने आते ही गलगोटिया यूनिवर्सिटी के एआई पर 350 करोड़ रुपये ख़र्च करने की पोल खुल गयी। हद तो तब हो गयी जब देश के ‘टेक्नोलॉजी जायण्ट’ विप्रो ने भी इसे अपना अनुसन्धान बताते हुए प्रदर्शित किया और फ़िर देश के आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी इस रोबोट के कसीदे पढ़ते हुए ट्वीट कर डाले!
वैसे जिस देश का प्रधानमंत्री ही अपनी डिग्री को लेकर फ़र्ज़ीवाड़ा करता हो वहाँ एक निजी विश्वविद्यालय का फ़र्ज़ीवाड़ा करना कोई चौंकाने वाली बात नहीं होनी चाहिए।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी के पिछले कारनामे और इसका इतिहास
यह पहली बार नहीं है कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी अपने कारनामों के कारण सुर्ख़ियों में आयी है। इससे पहले भी दो साल पहले गलगोटिया यूनिवर्सिटी के छात्र अपनी “बौद्धिकता” का परिचय देते हुए मोदी और भाजपा के समर्थन में प्रदर्शन करने उतरे थे और तब भी गलगोटिया ने अपनी “शानदार” शिक्षा व्यवस्था की मिसाल दुनिया के सामने पेश की थी। प्रदर्शन के दौरान जब इन छात्रों से प्रदर्शन के बारे में पूछा गया था तब एक भी छात्र बता नहीं पाया कि वे प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं! हद तो तब हो गयी थी जब ज़्यादातर गलगोटिया के “स्कॉलर” हाथ में लिए हिन्दी पोस्टरों को भी नहीं पढ़ सके!
यह अनायास नहीं है कि इस विश्विद्यालय को देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए एआई समिट जैसे सम्मेलन में चुना जाता है। यह वही गलगोटिया यूनिवर्सिटी है जिसने पिछले 12 सालों में भाजपा सरकार की चाटुकारिता करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पिछले कुछ वर्षों में, विश्वविद्यालय के संस्थापक और कुलाधिपति सुनील गलगोटिया ने संस्थान के मिशन को भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार की राजनीतिक दृष्टि के अनुरूप बताया है। सुनील गलगोटिया ने अपने बयानों में कहा है कि गलगोटिया विश्वविद्यालय “भारत को विश्वगुरु बनाने के प्रधानमंत्री मोदी के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।” उन्होंने कई बार देश के प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा में कसीदे पढ़े हैं और उनके नेतृत्व को राज्य को निवेश और उच्च शिक्षा के उभरते केन्द्र में बदलने का श्रेय दिया है।
गलगोटिया विश्वविद्यालय ने सरकार के तलवे चाटने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। इस बात का अन्दाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2020 में इस विश्विद्यालय ने यह रिसर्च पेश की थी कि कैसे थाली बजाने से कोरोना को भागना पड़ा! इसी विश्वविद्यालय ने सरकार द्वारा लाये गये छात्र विरोधी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को सही मायने में 100% लागू करने वाला पहला कैम्पस होने की बात कही है। तत्कालीन शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल की मौजूदगी में आयोजित एक समारोह में यूनिवर्सिटी ने इस नीति के लिए 12-सूत्रीय रोडमैप को लागू करने की शपथ ली। इस रोडमैप में विश्वविद्यालय द्वारा सरकार द्वारा प्रस्तावित भारतीय ज्ञान प्रणाली को लागू करना भी शामिल था। आपको बता दें कि भारतीय ज्ञान प्रणाली सरकार द्वारा शिक्षा का मिथ्याकरण करने और छात्रों को तर्क और विज्ञान से दूर करने की एक फ़ासीवादी परियोजना है। इसके तहत प्राचीन ज्ञान को आधुनिक शिक्षा में समाहित करने के नाम पर छात्रों को ग़लत इतिहास और छद्म विज्ञान परोसा जायेगा।
इतना ही नहीं, विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ भी नज़दीकियाँ बनाकर रखी हैं। नवम्बर 2024 में गलगोटिया विश्वविद्यालय ने भारतीय शिक्षण मण्डल द्वारा आयोजित VIVIBHA 2024 (विकसित भारत का विज़न) कार्यक्रम में भाग लिया, जिसका सम्बन्ध सीधा संघ से है। इस कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख मोहन भगवत ने भी शिरकत की थी। इसी तरह गलगोटिया के कई कार्यक्रमों में संघ के लोगों का आना-जाना लगा रहता है।
विश्वविद्यालय का कहना है कि उसने 2017 और 2024 के बीच 2,430 पेटेण्ट के लिए आवेदन दिया है। लेकिन इन दावों की पोल भी इसी बात से खुल जाती है कि देश का सबसे अधिक शोध-केन्द्रित संस्थान आईआईटी मद्रास को माना जाता है और इस संस्थान ने 1975 में अपना पहला पेटेण्ट आवेदन दाखिल करने के बाद से आज तक लगभग 2,550 पेटेण्ट आवेदन ही दाखिल किये हैं।
सरकार की इसी चाटुकारिता का नतीजा है कि इस विश्वविद्यालय को पिछले पाँच सालों में सरकार द्वारा करोड़ों रुपये दिये गये। एनआईआरएफ़ की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2021 के बाद से इस विश्वविद्यालय को अलग-अलग स्कीमों के तहत 6 करोड़ से ज़्यादा पैसे दिये गये हैं। इतना ही नहीं, विश्वविद्यालय को ‘मेक इन इण्डिया कॉन्क्लेव फॉर स्किल्ड मैनपावर डेवलपमेण्ट’ में केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा सम्मानित भी किया गया था। एक तरफ़ सरकार द्वारा निजी विश्वविद्यालयों को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ तमाम सरकारी संस्थानों को, जिनमें आईआईटी, एनआईटी आदि संस्थान भी शामिल हैं, उन्हें संस्थागत तरीक़े से बर्बाद किया जा रहा है।
देश की शिक्षा व्यवस्था की हक़ीक़त बयान करता गलगोटिया
गलगोटिया विश्वविद्यालय के इन झूठे दावों ने इस एआई समिट की पोल तो खोली ही, साथ में देश की शिक्षा व्यवस्था और विज्ञान के हालात की पोल भी खोलकर रख दी है। यह अनायास नहीं है कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी जैसे निजी संस्थान इतने बड़े स्तर पर फ़र्ज़ीवाड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। आज देश की शिक्षा व्यवस्था को सरकार लगातार सोचे-समझे तरीक़े से बर्बाद करने में लगी है। भाजपा सरकार के आने के बाद से अब तक शिक्षा पर लगातार फण्ड कटौती की जा रही है। 2014 में शिक्षा के लिए बजट का 4.7 प्रतिशत आवण्टित किया गया था जिसको घटाकर 2024-25 में 2.5 प्रतिशत कर दिया गया। स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (डीएसईएल) का कुल बजट में हिस्सा 2014-15 में 2.75% से घटकर 2024-25 तक 1.51% हो गया, और उच्च शिक्षा विभाग का हिस्सा 2024-25 में घटकर 0.91% रह गया। 2014-15 और 2023-24 के बीच 89,441 सरकारी स्कूल बन्द कर दिये गये हैं। 2019 और 2021 के बीच, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के वित्त पोषण को 10% कम कर दिया गया, जबकि आईआईटी में 20% की कटौती की गयी।
इस देश की सरकार गोबर और गोमूत्र से कैंसर के इलाज़ पर 3.5 करोड़ रुपये खर्च कर देती है! अब जिस देश में पाठ्यक्रम से उद्भव के सिद्धान्त, पीरियॉडिक टेबल आदि विषय हटाये जा रहे हैं, इतिहास का मिथ्याकरण किया जा रहा है, आईआईटी के डायरेक्टर भूतों में विश्वास करते हों, हिमालय की तबाही का कारण मांस खाने को बताते हों, उस देश की शिक्षा व्यवस्था की हालत का अन्दाज़ा सहज लगाया जा सकता है। लोगों की तार्किकता पर लगातार हमले किये जा रहे हैं और शिक्षा का निजीकरण करके उसे आमजन से दूर किया जा रहा है ताकि उसी आबादी को तथाकथित “धर्म की रक्षा” के नाम पर दुकानें-घर तोड़ने और आये दिन लोगों को पीटने के लिए इस्तेमाल किया जा सके। इसी प्रक्रिया को नयी शिक्षा नीति, एफवाईयूपी आदि जैसी नीतियाँ लाकर बढ़ावा दिया जा रहा है।
विज्ञान की बलि चढ़ा रहे भाजपा और संघ
विज्ञान की तरक़्क़ी पर बात करें तो इसकी हालत इसी बात से समझी जा सकती है कि सरकार में मौजूद लोगों ने विज्ञान की बखिया उधेड़ते हुए दर्जनों बयान सार्वजनिक तौर पर दिये हैं। यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है कि इसमें हमारे देश के माननीय प्रधानमंत्री अव्वल स्थान पर हैं! नीचे प्रधानमंत्री जी के कुछ ऐसे ही बयान दिये गये हैं:
- 2014 में नरेंद्र मोदी ने गणेश जी के हाथी के सिर का हवाला देते हुए कहा कि प्लास्टिक सर्जरी तो प्राचीन भारत में मौजूद थी!
- मोदी ने महाभारत के चरित्र कर्ण का जिक्र करते हुए कहा था कि प्राचीन भारत में जेनेटिक इंजीनियरिंग का अभ्यास किया जाता था!
- 2019 में मोदी ने जेट विमानों को रडार से बचाने का नया नुस्खा निकाल दिया और बताया कि बादल में छिपे रहने से रडार विमानों का पता नहीं लगा पायेगा! जबकि यह विज्ञान के 8वीं कक्षा का छात्र भी बता सकता है कि रडार का बादल से कोई सम्बन्ध नहीं है क्योंकि यह रेडियो वेव का इस्तेमाल करता है।
- 2018 में प्रधानमंत्री मोदी ने यह बताया कि कैसे एक “चाय वाला” गटर में पाइप डाल कर उसकी गैस से चाय पकाता था! हाल ही में ईरान पर किए गए अमेरिकी-इज़राइली साम्राज्यवादी हमले के बाद पश्चिमी एशिया में शुरू हुए युद्ध के कारण पैदा हुए गैस सिलेण्डर संकट में मोदी की यह “थ्योरी”विशेष चर्चा का विषय रही!
- 2014 में ही जलवायु परिवर्तन को लेकर एक बच्चे के सवाल पर प्रधानमंत्री जी ने बेशर्मी के साथ कहा कि यह जलवायु परिवर्तन नहीं है, बल्कि हमारी सहने की क्षमता कम हो गयी है!
- 2020 में मोदी जी ने पवन टर्बाइनों के लिए एक “नया नुस्खा” इजाद कर दिया और सुझाव दिया कि टर्बाइनों को हवा से नमी निकालकर स्वच्छ पानी बनाने और यहाँ तक कि वातावरण से ऑक्सीजन अलग करने के लिए डिज़ाइन किया जा सकता है!
ऐसे ही दर्जनों बयान भाजपा के अन्य मंत्रियों-नेताओं द्वारा भी दिये गये हैं जिसमें डार्विन के उद्भव के सिद्धान्त को ग़लत बताने से लेकर महाभारत के समय इंटरनेट और सेटेलाइट होने तथा वेद में तमाम वैज्ञानिक खोजों के होने के झूठे दावे किये गये हैं।
ऐसा नहीं है कि यह विज्ञान और तर्कणा विरोधी बातें बस बयानबाज़ी तक सीमित हैं। सरकार द्वारा सांस्थानिक रूप से छद्म विज्ञान को बढ़ावा देने की पूरी कोशिश की जा रही है। सरकार द्वारा शिक्षा को लेकर लायी गयी तमाम नितियाँ और उठाये गये सारे क़दम यह साफ़-साफ़ बताते हैं कि कैसे योजनाबद्ध तरीक़े से शिक्षा का निजीकरण किया जा रहा है और इसे बर्बाद किया जा रहा है। छात्रों के तर्क करने की शक्ति पर हमला किया जा रहा है, उनकी आलोचनात्मक क्षमता को बाधित करके उसे सचेतन तौर कुन्द किया जा रहा है, वे सरकार की किसी भी नीति या बात पर सवाल न खड़ा करें, बस चुपचाप अनुशासित होकर फ़ासीवादी सरकार के हुक्म की तामील करें इसके लिए ही उन्हें अवैज्ञानिक और अतार्किक बनाने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है ताकि उन्हें आसानी से फ़ासीवादी उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनाया जा सके। पाठ्यक्रम से उद्भव के सिद्धान्त, पीरियॉडिक टेबल आदि विषयों का हटाया जाना, इतिहास का मिथ्याकरण करना आदि इसी दूरगामी फ़ासीवादी परियोजना के परिणाम हैं।
इसके अलावा विज्ञान के विकास के लिए सही शोधों व अनुसन्धानों पर खर्च करने के बजाय ऐसे शोधों पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है जिनका विज्ञान से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। नीचे सरकार द्वारा ऐसे ही उठाये गये क़दमों की एक सूची दी गयी है:
1) पंचगव्य और ‘गाय विज्ञान‘ (SUTRA-PIC): सरकार ने स्वदेशी गायों के उत्पादों (दूध, मूत्र, गोबर) पर शोध के लिए एक औपचारिक कार्यक्रम शुरू किया है। इसका पूरा नाम ‘अनुसंधान संवर्धन के माध्यम से वैज्ञानिक उपयोग – देसी गायों से प्राप्त प्रमुख उत्पाद’ है। सरकार द्वारा इसके लिए लगभग 98 करोड़ रुपये का बजट प्रस्तावित किया गया, जिसका उद्देश्य गाय के मूत्र और गोबर से दवाइयाँ, कैंसर का इलाज और अन्य उपयोगिता वाली वस्तुएं बनाना है।
2) पौराणिक संरचनाओं पर शोध (राम सेतु और सरस्वती नदी): पौराणिक कथाओं में वर्णित स्थलों की “वैज्ञानिक पुष्टि” के लिए सरकारी संस्थानों का उपयोग किया गया। भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) ने राम सेतु के “मानव निर्मित” होने के प्रमाण खोजने के लिए पानी के नीचे शोध परियोजनाएँ शुरू कीं और बिना किसी वैज्ञानिक सबूत के इसपर पानी की तरह पैसे बहाये गये। इसी तरह हरियाणा और राजस्थान सरकार ने ‘लुप्त सरस्वती नदी’ की खोज के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये और खुदाई करवाई, ताकि इसे हड़प्पा सभ्यता और वेदों से जोड़ा जा सके।
3) भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS): शिक्षा मंत्रालय के तहत प्राचीन भारतीय विज्ञान को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने के लिए भारी निवेश किया जा रहा है ताकि इतिहास का मिथ्कयाकरण करके इसे ज़बरदस्ती विज्ञान से जोड़ा जा सके। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के तहत IKS डिवीजन के लिए 2025-2030 के लिए 405.78 करोड़ रुपये आवण्टित किये गये हैं।
4) ज्ञान भारतम मिशन: यह मिशन शिक्षा मंत्रालय के तहत ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ (IKS) को बढ़ावा देने की एक बड़ी योजना है जिसका मुख्य उद्देश्य भारत की प्राचीन विद्याओं, पाण्डुलिपियों और पारम्परिक ज्ञान को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ना है। सरकार ने इसके लिए 482.85 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आवण्टित किया है। इसका एक बड़ा हिस्सा प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण और बिना किसी वैज्ञानिक आधार के उन्हें कॉलेजों के पाठ्यक्रमों में शामिल करने पर खर्च किया जा रहा है।
5) भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI): इस संस्थान का इस्तेमाल तो खुले आम धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए किया जा रहा है। धार्मिक स्थलों का उत्खनन और सर्वेक्षण करने के नाम पर अयोध्या, ज्ञानवापी मस्जिद (वाराणसी), धार और सम्भल जैसी कई जगहों पर पहले ही यह किया जा चुका है। इसी को और सुचारू रूप से करने के लिए बजट 2025 के अनुसार, ASI को 1,278.49 करोड़ रुपये आवण्टित किये गये हैं।
कुल मिलाकर एआई समिट में हुई उपरोक्त घटना बस कोई अकेली घटना नहीं बल्कि पिछले एक दशक से भी अधिक समय से फ़ासीवादी भाजपा सरकार द्वारा अंजाम दी जा रही शिक्षा व्यवस्था और विज्ञान की व्यवस्थागत बर्बादी को दर्शाता है। गलगोटिया यूनिवर्सिटी बस उसी का एक प्रातिनिधिक उदाहरण है। आज जिस क़दर उपरोक्त तमाम तरीक़ों से लोगों की सोचने-समझने और तर्क करने की क्षमता को कुन्द किया जा रहा है, उस सूरत में यह बेहद ज़रूरी बन जाता है कि इन क़दमों का पुरज़ोर विरोध किया जाये और छात्रों-युवाओं समेत देश के आम लोगों में तार्किकता और वैज्ञानिक मूल्यों का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार किया जाये अन्यथा आने वाले समय में ऐसे कई गलगोटिया यूनिवर्सिटी पैदा होंगे जो हमारे देश को दशकों पीछे धकेल देंगे!
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













