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मोदी राज में जीडीपी वृद्धि के आँकड़ों में व्यापक हेराफेरी! यह महज़ आँकड़ों की बाज़ीगरी नहीं बल्कि खुली डकैती है!

जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद एक निश्चित अवधि में किसी भी देश के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को दर्शाता है। जीडीपी यह नहीं बताता कि उत्पादित मूल्य समाज में किस प्रकार वितरित हो रहा है और इसकी वृद्धि से किसे लाभ मिल रहा है। हम जानते हैं कि यह समस्त मूल्य मज़दूर वर्ग अपनी मेहनत से पैदा करता है लेकिन इसका फ़ायदा उसे नहीं मिलता है। अगर जीडीपी की दर मोदी राज में कुलांचे भर रही है तो फिर क्यों देश की कुल सम्पत्ति का 40 प्रतिशत ऊपर के 1 प्रतिशत के पास है और नीचे की आधी आबादी के पास महज़ 3 प्रतिशत है? क्यों मज़दूर वर्ग की वास्तविक मज़दूरी में कोई वृद्धि नहीं हो रही है? ज़ाहिर सी बात है कि पूँजीवादी समाज में जीडीपी का कोई भी आँकड़ा समाज की प्रगति की वास्तविक तस्वीर नहीं पेश कर सकता है। सच तो यह है कि इस ग़ैर-बराबरी वाली मुनाफ़े पर खड़ी व्यवस्था में सकल घरेलू उत्पाद का बड़ा हिस्सा जनता के हिस्से में नहीं बल्कि पूँजीपतियों की तिजोरियों में जा रहा है। साथ ही, जीडीपी आर्थिक प्रगति का इसलिए भी कोई सटीक सूचक नहीं है क्योंकि इसकी गणना में ऐसे कई घटक शामिल किये जाते हैं जो अनुत्पादक हैं, यानी जो समाज में नया मूल्य पैदा नहीं करते, भले ही वे पूँजीवाद के संचालन के लिए उपयोगी हो सकते हैं, मसलन वाणिज्यिक बिक्री, राज्य के प्रशासनिक कार्य आदि। इसके अलावा, भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले लम्बे समय से मुनाफ़े की दर के संकट से बुरी तरह प्रभावित है। अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में रुपये की गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था की ख़राब स्थिति का एक और संकेतक है। बावजूद इसके, मोदी जी जीडीपी में वृद्धि के हवाई गोले छोड़ रहे हैं  और हमें जश्न मनाने को कह रहे हैं!

कुछ उद्धरण व राजेन्द्र धोड़पकर के दो प्रासंगिक कार्टून

जब तक लोग अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने की ज़हमत नहीं उठायेंगे, तब तक तानाशाहों का राज चलता रहेगा; क्योंकि तानाशाह सक्रिय और जोशीले होते हैं, और वे नींद में डूबे हुए लोगों को ज़ंजीरों में जकड़ने के लिए, ईश्वर, धर्म या किसी भी दूसरी चीज़ का सहारा लेने में नहीं हिचकेंगे।