क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षणमाला – 32 : मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के सिद्धान्त (खण्ड-2)
अध्याय – 6
पूँजी का टर्नओवर
अभिनव
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यहाँ से मार्क्स पूँजी के दूसरे खण्ड के दूसरे भाग की शुरुआत करते हैं। जैसा कि हम पहले बता चुके हैं कि पूँजी के दूसरे खण्ड के पहले भाग में मार्क्स उन बुनियादी वैज्ञानिक अवधारणाओं और विश्लेषणात्मक उपकरणों को विकसित करने का काम करते हैं जिनका इस्तेमाल पूँजी के संचरण के अध्ययन के दो बुनियादी पहलुओं को समझने के लिए अनिवार्य है। ये दो बुनियादी पहलू ये हैं: पहला, पूँजी का टर्नओवर और दूसरा, कुल सामाजिक पूँजी का पुनरुत्पादन और संचरण। दूसरे खण्ड का दूसरा भाग पूँजी के टर्नओवर पर केन्द्रित है। तीसरा भाग कुल सामाजिक पूँजी के पुनरुत्पादन व संचरण के विषय को विस्तार से समझाता है।
दूसरे भाग में मार्क्स पहली बार चल पूँजी व अचल पूँजी की अवधारणाओं को विस्तार देते हैं, इन अवधारणाओं पर क्लासिकीय बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्त्र व भोंड़े बुर्जुआ अर्थशास्त्र की ग़लतियों की विस्तार से विवेचना करते हैं, पूँजी के अलग-अलग हिस्सों तथा बेशी मूल्य के टर्नओवर पर चर्चा करते हैं और बेशी मूल्य की वार्षिक दर पर टर्नओवर की गति के प्रभावों को स्पष्ट करते हैं। हम क्लासिकीय बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्त्रियों व भोंड़े बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों द्वारा पूँजी के टर्नओवर तथा चल व अचल पूँजी की अवधारणाओं के विषय में की गयी भूलों पर विस्तार से चर्चा नहीं करेंगे और कहीं-कहीं प्रसंगवश उन पर टिप्पणियाँ करेंगे। हमारा मुख्य ज़ोर मार्क्स की वैज्ञानिक अवधारणाओं को विस्तार से समझने पर होगा। इसलिए समूचे दूसरे भाग की हमारी चर्चा पूँजी के टर्नओवर पर मार्क्स की वैज्ञानिक अवधारणों पर केन्द्रित होगी।
पूँजी का टर्नओवर
मार्क्स सबसे पहले हमें याद दिलाते हैं कि पूँजी का टर्नओवर काल और कुछ नहीं बल्कि उत्पादन के समय और संचरण के समय का कुल योग होता है। दूसरे शब्दों में, पूँजी का निवेश किये जाने से लेकर पूँजीपति के हाथों में (बेशी मूल्य से संवर्धित होकर) मुद्रा-रूप में उसके लौटने तक की पूरी प्रक्रिया में लगने वाला कुल समय ही टर्नओवर का समय होता है। टर्नओवर का अर्थ होता है पूँजी का निवेशित होकर वापस बेशी मूल्य से लैस होकर मुद्रा–रूप में पूँजीपति के हाथों में वापस पहुँचना। जब ऐसा हो जाता है तो कहा जाता है कि पूँजी का टर्नओवर हो गया।
ज़ाहिर है, पूरी प्रक्रिया का लक्ष्य होता है बेशी मूल्य का उत्पादन और उसका वास्तवीकरण, यानी मुद्रा–रूप में उसका पूँजी के साथ नत्थी होकर मुद्रा–रूप में पूँजीपति तक पहुँचना। चाहे हम M…M’ को देखें या फिर P…P को देखें, पूँजीवादी उत्पादन का यह लक्ष्य स्पष्ट तौर पर प्रकट हो जाता है। जहाँ तक पूँजी के टर्नओवर का प्रश्न है, हम इसके विश्लेषण के लिए C…C, यानी माल-पूँजी के सर्किट का उपयोग नहीं करते हैं क्योंकि इस सर्किट की शुरुआत ही बेशी-मूल्य से संवर्धित पूँजी से होती है, न कि मूल निवेशित पूँजी-मूल्य से। यह पूँजी के सर्किट का एकमात्र रूप है जहाँ शुरुआत ही मूल्य-संवर्धित पूँजी से होती है। इसलिए पूँजी के टर्नओवर के अध्ययन में, जिसका लक्ष्य ही पूँजी का मूल्य-संवर्धन प्रकट करना है, यानी पूँजी के निवेशित होने, उसके मूल्य-संवर्धित होने और फिर मुद्रा-रूप में पूँजीपति के हाथों में वापस लौटने को प्रकट करना है, हम या तो मुद्रा-पूँजी के सर्किट का इस्तेमाल करते हैं या फिर उत्पादक-पूँजी के सर्किट का, क्योंकि पूँजी के मूल्य-संवर्धन को तभी स्पष्ट तौर पर दिखलाया जा सकता है। माल-पूँजी के सर्किट का प्रयोग कुल सामाजिक पूँजी के पुनरुत्पादन व संचरण के अध्ययन में किया जाता है, जिसके कारणों को हम पहले के अध्यायों में स्पष्ट कर चुके हैं।
जैसा कि हमने ऊपर इंगित किया, टर्नओवर का समय और कुछ नहीं बल्कि उत्पादन के समय और संचरण के समय का कुल योग होता है। इसीलिए टर्नओवर-अवधि का इस्तेमाल पूँजी के सर्किट के पुनर्नवीकृत होने में लगने वाले समय को मापने में भी किया जा सकता है क्योंकि एक टर्नओवर पूरा होने के साथ पूँजी अपने मूल्य-संवर्धन की प्रक्रिया को नये सिरे से शुरू करती है, यानी अपने सर्किट को नये सिरे से शुरू करती है। मार्क्स बताते हैं कि अलग-अलग पूँजियों का टर्नओवर का समय अलग-अलग होता है। इसके कई कारण हो सकते हैं। मसलन, पूँजी उत्पादन की किस शाखा में लगी है, पूँजी के निवेश का स्थान और उसके माल-उत्पाद के वास्तवीकरण के स्थानों की दूरी, आदि। मार्क्स लिखते हैं :
“अगर हम उन वैयक्तिक घटनाओं को नज़रन्दाज़ कर दें जिनके कारण किसी पूँजी की टर्नओवर-अवधि त्वरित या छोटी हो सकती है, तो अलग-अलग पूँजियों की टर्नओवर-अवधि अलग-अलग निवेश के क्षेत्रों में उनके लगे होने के आधार पर अलग-अलग होती हैं।” (वही, पृ. 236)
अलग-अलग उत्पादन की शाखाओं की प्रकृति अलग होती है। मसलन, एक रेल इंजन के निर्माण में किसी भी सूरत में एक कमीज़ के उत्पादन से ज़्यादा वक़्त लगेगा क्योंकि माल व उसके उत्पादन की प्रकृति ही भिन्न है। एक समुद्री जहाज़ और एक मोबाइल फ़ोन के उत्पादन में भी अलग-अलग समय लगेगा। इसलिए पूँजी उत्पादन की किस शाखा में लगी है, इससे उसके टर्नओवर-अवधि पर सबसे बुनियादी प्रभाव पड़ता है।
टर्नओवर–अवधि की माप क्या होती है? यानी, इसे समय की किस इकाई में मापा जाता है? मार्क्स बताते हैं कि टर्नओवर-अवधि को वर्ष की इकाई में मापा जाता है। मार्क्स के अनुसार, वजह यह है कि ऐतिहासिक तौर पर पूँजीवादी उत्पादन के सबसे पहले विकसित केन्द्रों में, जो कि समशीतोष्ण जलवायु के क्षेत्र में थे, पूँजीवादी उत्पादन के सबसे प्रमुख शुरुआती उत्पाद कृषि क्षेत्र में पैदा होने वाले उत्पाद थे। वास्तव में, इस तर्क को उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों के लिए भी सामान्यीकृत किया जा सकता है और मार्क्स यहाँ एक ऐतिहासिक तथ्य मात्र की ओर इशारा कर रहे हैं। पूँजीवादी खेती के ये उत्पाद पूँजीवादी उद्योग के लिए भी आधारभूत महत्व रखते हैं। खेती के ये उत्पाद वास्तव में वार्षिक उत्पाद के रूप में ही उत्पादित होते थे। मार्क्स लिखते हैं :
“जिस प्रकार कार्यदिवस श्रमशक्ति के प्रकार्य के लिए नैसर्गिक मापन इकाई का काम करते हैं, उसी प्रकार गतिमान पूँजी के टर्नओवरों के लिए वर्ष नैसर्गिक मापन इकाई का काम करते हैं। इस मापन का प्राकृतिक आधार यह है कि समशीतोष्ण क्षेत्र में, जो कि पूँजीवादी उत्पादन की मूल भूमि थी, अधिकांश महत्वपूर्ण खाद्य फसलें वार्षिक उत्पाद हैं।” (वही, पृ. 236)
टर्नओवर-अवधि की माप को T से प्रदर्शित किया जाता है, जो कि एक वर्ष या 12 महीनों के बराबर होती है। अगर टर्नओवर-अवधि को t और टर्नओवर की संख्या को n से प्रदर्शित किया जाय, तो टर्नओवर-अवधि के सूत्र को हम इस प्रकार लिख सकते हैं :
n = T/t
इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लें अगर कोई पूँजीपति अपनी पूँजी का निवेश करता है, माल का उत्पादन करता है और उसका माल अन्तत: बाज़ार में बिकता है, और इस पूरी प्रक्रिया में 3 माह लगते हैं, तो हम कहें कि इस पूँजी की टर्नओवर-अवधि 3 माह है। यानी, पूँजी के निवेशित होने, उत्पादन में लगने, माल का उत्पादन होने और माल के बिकने और बेशी-मूल्य से लैस पूँजी के वापस मुद्रा-रूप में पूँजीपति के हाथों में आने में लगने वाला समय। तो उपरोक्त सूत्र के अनुसार, यहाँ t = 3 माह, T हमेशा की तरह 12 माह होगा, और इसके आधार पर n की गणना इस प्रकार की जा सकती है :
n = T/t = 12/3 = 4
यानी, इस पूँजीपति की पूँजी का साल में 4 बार टर्नओवर होता है, या उसके पूँजी के टर्नओवर की संख्या 4 है। दूसरे शब्दों में, उसकी पूँजी एक वर्ष में वह चार बार निवेशित होकर बेशी-मूल्य के साथ मुद्रा-रूप में पूँजीपति के हाथों में लौटती है। उपरोक्त उदाहरण से यह स्पष्ट है कि आम तौर पर पूँजीपतियों की पूँजी का वह हिस्सा जो मशीनरी, इमारत व अवरचना में लगा होता है, उसकी टर्नओवर-अवधि समूची पूँजी की टर्नओवर-अवधि से आम तौर पर ज़्यादा होती है। अगर कच्चे माल और श्रमशक्ति पर लगी पूँजी साल में चार बार टर्नओवर पूरा करती है, और साथ में मशीनों, इमारतों आदि में लगी पूँजी का घिसाई-मूल्य चार बार टर्नओवर पूरा करता है, तो बिल्कुल सम्भव है कि पूँजीपति की कुल निवेशित पूँजी का टर्नओवर पूरा हो जाये, जबकि मशीनों, इमारतों, आदि में लगी पूँजी का टर्नओवर अभी पूरा न हुआ हो। यानी, मशीनों, इमारतों, आदि में लगी पूँजी अभी पूर्ण रूप से ख़र्च होकर वापस पुनर्नवीकृत न हुई हो, लेकिन कच्चे माल व श्रमशक्ति में लगी पूँजी का टर्नओवर कई दफ़ा होने की वजह से पूँजीपति की कुल निवेशित पूँजी अपना टर्नओवर पूरा कर ले। मिसाल के तौर पर, एक पूँजीपति ने कुल रु. 1 करोड़ का निवेश किया। इसमें से रु. 50 लाख उसने मशीनरी व इमारत, आदि पर लगाये, जबकि बाक़ी रु. 50 लाख उसने कच्चे माल व श्रमशक्ति पर लगाये। अगर एक वर्ष में वह पूँजीपति चार बार कच्चे माल व श्रमशक्ति पर अपनी पूँजी को निवेशित करता है, बेशी-मूल्य से लैस माल का उत्पादन करता है और बेशी-मूल्य समेत अपनी पूँजी को मुद्रा-रूप में वास्तवीकृत करता है, तो हम कहेंगे उसकी इस पूँजी का चार बार टर्नओवर होता है। ऐसे में, पूँजीपति 2 करोड़ रुपये का संचरण पूर्ण लेता है (बेशी-मूल्य के संचरण को हम फिलहाल नज़रन्दाज़ कर सकते हैं क्योंकि मूल पूँजी के टर्नओवर होने मात्र से पूँजीपति पुनरुत्पादन को जारी रखने में सक्षम हो जाता है और यहाँ सारा प्रश्न ही पुनरुत्पादन का है)। लेकिन उसकी मशीनरी व इमारत की घिसाई व अवमूल्यन अभी पूरा नहीं हुआ है। अगर उनकी घिसाई दर 10 प्रतिशत प्रति वर्ष तो वे 10 वर्ष तक अपनी सेवा उत्पादन में देते रहेंगे, उनका पूरा अवमूल्यन व ख़र्च 10 वर्ष में होगा और उनके पुनर्नवीकरण की आवश्यकता भी 10 वर्ष बाद होगी। दूसरे शब्दों में, इस उदाहरण में अचल पूँजी का टर्नओवर का समय 10 वर्ष है, जबकि पूँजीपति की पूरी पूँजी साल में कम-से-कम दो बार टर्नओवर पूरा कर लेती है, क्योंकि, चल पूँजी, यानी श्रमशक्ति और कच्चे माल पर लगे रु. 50 लाख का साल में चार बार टर्नओवर हो जाता है।
इसी के साथ हम चल और अचल पूँजी के अन्तर पर आते हैं। हम ऊपर पूँजी के जिन हिस्सों की बात कर रहे हैं, उन्हें ही चल पूँजी व अचल पूँजी कहा जाता है। मार्क्स इस श्रेणीकरण पर विस्तार से बात रखते हैं क्योंकि यह पूँजी के पुनरुत्पादन की प्रक्रिया को समझने के लिए बेहद अहम है। पूँजी के पहले खण्ड में परिवर्तनशील व स्थिर पूँजी का अन्तर हमें मूल्य-संवर्धन के आधार पूँजी की दो श्रेणियों के बारे में बताता है। लेकिन चल और अचल पूँजी के श्रेणीकरण का रिश्ता मूल्य-संवर्धन से नहीं है, बल्कि इस बात से है कि पूँजी के विभिन्न तत्व किस प्रकार से संचरित होते हैं, यानी उनका मूल्य किस तरह से उत्पाद में स्थानान्तरित होता है। इसी के आधार पर पूँजी के विभिन्न तत्वों का पुनरुत्पादन की प्रक्रिया में पुनर्नवीकरण होता है। इसलिए पुनरुत्पादन की प्रक्रिया के विश्लेषण के लिए चल व अचल पूँजी के अन्तर को समझना अनिवार्य है।
अचल व चल पूँजी
हमने पहले ही पढ़ा कि मूल्य-संवर्धन के आधार पर पूँजी को दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है: परिवर्तनशील पूँजी, जो श्रमशक्ति को ख़रीदने में लगती है और जो मूल्य-संवर्धन यानी बेशी-मूल्य के उत्पादन में लिए ज़िम्मेदार होती है (क्योंकि जीवित श्रम ही नया मूल्य पैदा करता है) और स्थिर पूँजी, जो उत्पादन के साधनों, यानी श्रम के उपकरण (मशीनरी, औज़ार, आदि) और कच्चे माल पर लगती है और जो कोई नया मूल्य नहीं पैदा करती बल्कि श्रम के अभिकरण के ज़रिये सिर्फ़ अपना मूल्य उत्पाद में स्थानान्तरित करती हैं, चाहे एक उत्पादन-चक्र में या कई उत्पादन-चक्रों में। अब हम एक नये श्रेणीकरण पर आते हैं, जिसका रिश्ता मूल्य के पैदा होने से नहीं है, बल्कि केवल मूल्य के संचरण से है। यानी, इस श्रेणीकरण का इस्तेमाल मूलत: और मुख्यत: संचरण की प्रक्रिया के विश्लेषण में होता है। यह श्रेणीकरण है चल व अचल पूँजी का अन्तर।
सबसे पहले समझते हैं कि अचल पूँजी क्या है। अचल पूँजी निवेशित होने वाली पूँजी का वह हिस्सा है जो उत्पादन के उन तत्वों पर ख़र्च होता है जो उत्पादन के एक चक्र में पूरी तरह से ख़र्च नहीं होते और इसलिए उत्पादन के एक चक्र में ही अपना पूरा मूल्य स्थानान्तरित नहीं करते। यानी, यह निवेशित पूँजी का वह हिस्सा होता है जो मशीनरी, इमारत आदि पर ख़र्च होता है। यानी स्थिर पूँजी के तत्वों में से ही कुछ तत्व (मशीनरी, इमारत, आदि) अचल पूँजी के तत्व होते हैं, जबकि अन्य तत्व (यानी कच्चा माल, सहायक सामग्री, आदि) चल पूँजी के तत्व होते हैं। अचल पूँजी के तत्व अपना मूल्य टुकड़ों में स्थानान्तरित करते हैं और, अगर खेती में इस्तेमाल होने वाले कुछ निश्चित खाद सामग्रियों को छोड़ दें, तो ये भौतिक रूप से उत्पादित होने वाले उत्पाद में स्थानान्तरित नहीं होते। भौतिक रूप में, वे कई टर्नओवरों तक उत्पादन में अपनी भूमिका निभाते रहते हैं, जबकि मूल्य के रूप में, वे अपना मूल्य अपनी घिसाई-दर के आधार पर टुकड़ों-टुकड़ों में कई टर्नओवर तक उत्पाद में स्थानान्तरित करते रहते हैं।
चूँकि भौतिक तौर पर वे उत्पादन की प्रक्रिया में ‘फिक्स्ड’ होते हैं, यानी अचल रहते हैं, और उत्पादित होने वाले उत्पाद में स्थानान्तरित नहीं होते, इसलिए उन्हें अचल पूँजी (fixed capital) की संज्ञा दी गयी। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उनका मूल्य भी स्थानान्तरित नहीं होता और वह भी पूरा का पूरा ‘फिक्स्ड’ रहता है! पूँजी के अन्य तत्वों से अन्तर सिर्फ़ इतना होता है कि उनका मूल्य एक बार में उत्पाद में स्थानान्तरित नहीं होता, बल्कि अंशों में स्थानान्तरित होता है। मिसाल के तौर पर, मशीन तब तक भौतिक तौर पर उत्पादन की प्रक्रिया में मौजूद रहती है जब तक उसकी घिसाई पूरी न हो जाये और वह उत्पादन में अपनी भूमिका निभाने में अक्षम न हो जाये। इस पूरे दौर में मशीन अपनी घिसाई की दर के अनुसार अपने मूल्य को अंशों में उत्पाद में स्थानान्तरित करती है, हालाँकि भौतिक तौर पर उसका कोई भी हिस्सा उत्पाद में स्थानान्तरित नहीं होता है, जैसा कि कच्चे माल के साथ होता है। घिसाई की दर किसी भी मशीन की कुल उम्र के आधार पर निर्धारित होती है। मसलन, अगर कोई विशेष मशीन किसी उत्पादन की प्रक्रिया में औसतन 5 वर्षों तक काम करने योग्य रहती है, तो उसका पूरा मूल्य 5 वर्षों में उत्पाद में रूपान्तरित होता है और जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो भौतिक तौर पर जो बचता है, वह उस ‘मशीन का शव’ (corpse of machine) होता है। यानी, हर वर्ष उस मशीन के मूल्य का 1/5 हिस्सा उत्पाद में स्थानान्तरित होता है।
मार्क्स बताते हैं कि अचल पूँजी दो मायनों में अचल या ‘फिक्स्ड’ होती है। एक तो उपयोग-मूल्य के तौर, यानी भौतिक तौर पर, वह उत्पादन की प्रक्रिया में अचल या ‘फिक्स्ड’ रहती है और उसके भौतिक शरीर का एक अणु भी उत्पाद में स्थानान्तरित नहीं होता। दूसरा, मूल्य के तौर पर भी उसका एक हिस्सा उत्पादन की प्रक्रिया में ‘फिक्स्ड’ रहता है, क्योंकि उसका पूरा मूल्य एक बार में स्थानान्तरित नहीं होता। जैसा कि हमने ऊपर बताया, अचल पूँजी का एक तत्व, यानी खेती में प्रयोग होने वाली खाद सामग्री इसका एक अपवाद है क्योंकि यह भौतिक तौर पर अंशत: उत्पाद में स्थानान्तरित होती है, लेकिन इसका मूल्य एक उत्पादन-चक्र में स्थानान्तरित नहीं होता, बल्कि कई उत्पादन-चक्रों तक अंश-अंश में स्थानान्तरित होता रहता है। इसलिए यह अचल पूँजी का हिस्सा मानी जाती है क्योंकि यह श्रेणीकरण ही इस आधार पर किया गया है कि उत्पादन के विभिन्न तत्व अपना मूल्य किस प्रक्रिया में उत्पाद में स्थानान्तरित करते हैं: एक बार में या अंशों में। इसलिए यहाँ उपयोग-मूल्य या उत्पादन के तत्व का भौतिक रूप गौण है जबकि मूल्य के स्थानान्तरित होने की प्रक्रिया प्रधान है।
दूसरे शब्दों में, उत्पादन का कोई तत्व अचल पूँजी का अंग है चल पूँजी का अंग, इसे निर्धारित करने का आधारभूत पैमाना यह है कि मूल्य का स्थानान्तरण उत्पाद में किस रूप में होता है: एक बार में या फिर अंश–अंश में।
मार्क्स बताते हैं कि किसी भी उत्पादन के तत्व की भौतिक विशिष्टता या प्रकृति के आधार यह तय नहीं किया जा सकता है कि वह अचल पूँजी का तत्व है या चल पूँजी का। वही चीज़ उत्पादन की प्रक्रिया में अपनी भूमिका के आधार अचल पूँजी का तत्व हो सकती है और उत्पादन की प्रक्रिया में किसी अन्य भूमिका के आधार पर चल पूँजी का तत्व हो सकती है। मसलन, कुछ बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों का यह भौतिकतावादी (physicalist) भ्रम था कि उत्पादन का वह तत्व जो भौतिक तौर पर गतिमान होता है, वह चल पूँजी का अंग होता है और वह जो अपना स्थान नहीं बदलता वह अचल पूँजी का अंग होता है। लेकिन मार्क्स एक समुद्री जहाज़ का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि वह भौतिक रूप से गतिमान होता है, लेकिन फिर भी वह अचल पूँजी का तत्व होता है न कि चल पूँजी का। उसी प्रकार, कुछ बुर्जुआ अर्थशास्त्री किसी वस्तु की प्राकृतिक विशिष्टताओं के आधार पर उसे चल या अचल पूँजी का तत्व क़रार देते थे। यह भी एक प्रकार भौतिकतावादी भ्रम था। मार्क्स इसके खण्डन करते हुए बताते हैं कि यदि किसी ढोर-डंगर का प्रयोग खेती में या बोझ ढोने वाले पशु के तौर पर किया जाता है, तो उक्त उत्पादन-प्रक्रिया में वह अचल पूँजी का तत्व होता है, लेकिन अगर उसी पशु का इस्तेमाल मांस-उद्योग में याने खाद्य-सामग्री के तौर पर किया जाता है, तो वह चल पूँजी का तत्व होता है। पहले मामले में उस पशु का मूल्य उत्पाद में अंशत: स्थानान्तरित होता है, जबकि दूसरे मामले में उसका मूल्य एक बार में ही उत्पाद में स्थानान्तरित हो जाता है। कह सकते हैं कि भाजपाइयों के लिए उत्तर भारत में गाय अचल पूँजी का हिस्सा है जबकि केरल, उत्तर–पूर्व, गोवा आदि में वह चल पूँजी का हिस्सा भी हो सकती है!
बहरहाल, मुद्दे की बात यह है कि यह चीज़ों का प्राकृतिक रूप या प्रकार नहीं होता या उनका भौतिक तौर पर स्थान बदलना या स्थिर रहना नहीं होता, जो यह तय करता है कि वह चल पूँजी का अंग है या अचल पूँजी का, बल्कि यह उत्पादन की प्रक्रिया में उस चीज़ की भूमिका होती है जिसके आधार पर यह तय होता है कि वह अपना मूल्य एक बार में उत्पाद में स्थानान्तरित कर रही है या फिर कई बार में, अंशों में। मार्क्स लिखते हैं :
“मिसाल के तौर पर, खेती में मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए डाली जाने वाली सामग्री वनस्पति-उत्पाद (यानी फसल या पौधे में – अनु.) में निर्माणात्मक तत्व के रूप में प्रवेश करते हैं। लेकिन उनका प्रभाव एक अच्छे-ख़ासे लम्बे दौर में, मसलन, चार से पाँच वर्ष में, फैला होता है। इसलिए उनका एक हिस्सा उत्पाद में भौतिक तौर पर प्रवेश करता है, और इसलिए तत्काल अपना मूल्य उसमें स्थानान्तरित करता है, जबकि एक दूसरा हिस्सा पुराने उपयोग-रूप में ही क़ैद रहता है, और इसलिए उसका मूल्य भी उस उपयोग-रूप में ही मौजूद रहता है। यह एक उत्पादन के साधन के तौर पर अपना काम करना जारी रखता है और इसलिए उसे अचल पूँजी का रूप प्राप्त होता है। एक भारवाहक पशु के रूप में एक बैल अचल पूँजी है। लेकिन अगर उसे खा लिया जाता है, तो वह श्रम के उपकरण के रूप में, या अचल पूँजी के रूप में काम नहीं करता।
“वह गुण जो उत्पादन के साधनों पर ख़र्च पूँजी–मूल्य के किसी हिस्से को अचल पूँजी का चरित्र देता है, वह केवल उस तरीके में निहित होता है जिससे मूल्य का संचरण होता है। संचरण का यह विशिष्ट तरीक़ा उस विशिष्ट रूप से पैदा होता है जिसमें वह श्रम का उपकरण अपना मूल्य उत्पाद में स्थानान्तरित करता है, या उत्पादन की प्रक्रिया में मूल्य निर्मित करने में काम करता है। और स्वयं यह रूप उस विशेष तरीके से पैदा होता है जिसमें कोई श्रम का उपकरण श्रम प्रक्रिया में काम करता है।” (वही, पृ. 239-40, ज़ोर हमारा)
अब यदि अचल पूँजी के तत्वों का मूल्य एक बार में उत्पाद में पूर्ण रूप से रूपान्तरित नहीं होता तो यह स्वत: स्पष्ट है कि अचल पूँजी का टर्नओवर का समय कुल पूँजी के टर्नओवर के समय से आम तौर पर ज़्यादा होता है। दूसरे शब्दों में, अचल पूँजी का एक टर्नओवर चल पूँजी के कई टर्नओवर के बराबर होता है। अचल पूँजी के टर्नओवर का समय एक पूँजीपति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है क्योंकि जब अचल पूँजी का टर्नओवर पूरा होता है, अचल पूँजी के तत्व ख़र्च हो जाते हैं, तो उनको फिर से ख़रीदने के लिए पूँजीपति को बड़ा निवेश करना पड़ता है। मसलन, किसी भारी मशीनरी या इमारत के उत्पादन की प्रक्रिया में पूर्णत: ख़र्च हो जाने के बाद पूँजीपति को उनके पुनर्नवीकरण के लिए भारी-भरकम निवेश करना पड़ता है। अचल पूँजी के मूल्य के अंशत: उत्पाद में रूपान्तरित हुए हिस्से हर बार माल-उत्पाद की बिक्री के साथ पूँजीपति के पास वापस भी आते रहते हैं, जो उसके लिए एक निधि का निर्माण करते हैं, जिसे एमॉर्टाइजेशन फण्ड या सिंकिंग फण्ड कहा जाता है। इसके ज़रिये, पूँजीपति अचल पूँजी के ख़र्च हो चुके तत्वों को फिर से ख़रीदता है या उनका पुनर्नवीकरण करता है। यहाँ बताने की आवश्यकता नहीं है कि अचल पूँजी के सारे तत्वों का टर्नओवर का समय एक बराबर नहीं होता, बल्कि वह स्वयं भी अलग-अलग होता है। मसलन, एक हल्की मशीनरी का टर्नओवर का समय, एक भारी मशीनरी का टर्नओवर का समय और एक इमारत के टर्नओवर का समय एक बराबर नहीं होते। इसलिए कुल अचल पूँजी के टर्नओवर के समय को एक औसत के तौर पर आकलित करना होता है।
बहरहाल, आज के दौर में, जब पूँजीवादी ऋण व्यवस्था बेहद विकसित हो चुकी है, पूँजीपति अचल पूँजी के तत्वों के पुनर्नवीकरण के लिए ऋण का इस्तेमाल भी कर सकता है। लेकिन इस ऋण की ब्याज समेत अदायगी भी वह माल-उत्पाद की बिक्री से आने वाली पूँजी से ही करता है। इसलिए इस मामले के सारतत्व पर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि पूँजीपति हर बार माल-उत्पाद की बिक्री से निर्मित एमॉर्टाइज़ेशन फ़ण्ड को बचाता है और उसे ख़र्च कर अचल पूँजी के तत्वों को ख़रीदता है, या फिर वह पूँजीवादी क्रेडिट तन्त्र का इस्तेमाल करता है।
मार्क्स बताते हैं कि अचल पूँजी के सभी तत्व न सिर्फ़ एक बराबर टर्नओवर–अवधि नहीं रखते बल्कि वे एक ही प्रकार से पुनर्नवीकृत भी नहीं होते। अचल पूँजी के कुछ तत्व ऐसे होते हैं, जो उत्पादन में अपनी सेवाएँ देते हुए ख़र्च हो जाते हैं और पूँजीपति उन्हें फिर से नये सिरे से ख़रीदता है। लेकिन अचल पूँजी के कुछ तत्व ऐसे होते हैं, जिनका पुनर्नवीकरण टुकड़ों-टुकड़ों में होता रहता है, मसलन, कुछ बेहद भारी मशीनें और इमारतें, गोदाम आदि। ये भौतिक तौर पर पूरी तरह ख़र्च होकर कबाड़ में नहीं जाते। इनका अंशों-अंशों में पुनर्नवीकरण उत्पादन की जारी प्रक्रियाओं के दौरान ही नियमित अन्तरालों पर होता रहता है। नतीजतन, वे बेहद लम्बे समय तक भौतिक तौर पर उत्पादन की प्रक्रिया में बने रहते हैं। लेकिन अंश-अंश में जारी पुनर्नवीकरण के कारण, एक समयान्तराल के बाद, वे भौतिक तौर पर कमोबेश पूरा ही बदल जाते हैं। लेकिन ऐसे तत्वों में मामले में भी उनके मूल्य के पूर्ण रूप से स्थानान्तरित होने के औसत समय का आकलन इन नियमित अन्तराल पर होने वाले पुनर्नवीकरण में होने वाले ख़र्च के आधार पर किया जाता है। ऐसे तत्वों के सतत् जारी पुनर्नवीकरण के ख़र्च को पूँजीपति अचल पूँजी की भरपाई फ़ण्ड के तौर पर ही दर्ज़ करता है।
अचल पूँजी के सारे ही तत्वों को नियमित मरम्मत और देखरेख की आवश्यकता होती है। मेण्टेनेंस का यह काम दो प्रकार से सम्पन्न होता है। पहला तो उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान स्वयं मज़दूर फ्री में करते रहते हैं। यह मेण्टेनेंस की सेवा मज़दूर पूँजीपति को मुफ़्त में देते हैं और श्रम का नैसर्गिक उपहार होता है जो पूँजीपति को फ्री में मिल जाता है। उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान ही मशीनों की छोटी-मोटी मरम्मत, सफ़ाई, रिपयेर व मेण्टेनेंस के तमाम काम उन मशीनों पर काम करने मज़दूर करते रहते हैं। इसके लिए उन्हें अलग से कोई मेहनताना नहीं मिलता और पूँजीपति को यह सेवा बिना किसी ख़र्च के हासिल हो जाती है। यह पूँजीपतियों के लिए श्रम का प्राकृतिक तोहफ़ा होता है। इसके अलावा, पूँजीपतियों को नियमित अन्तराल पर मेण्टेनेंस का विशिष्ट काम करने वाले मज़दूरों (टेक्नीशियन, इलेक्ट्रीशियन, प्लम्बर, इंजीनियर, आदि) को भी काम पर रखकर यह काम करवाना पड़ता है। इन मज़दूरों से यह कैजुअल काम पूँजीपति प्रत्यक्ष तौर पर करवा सकता है, या फिर मेण्टेनेंस का ही काम करने वाले किसी पूँजीपति की कम्पनी को दे सकता है। लेकिन यह नियमित होने वाला ख़र्च अचल पूँजी की भरपाई के खाते में नहीं जाता है, क्योंकि यह पूँजीपति के लिए एक ‘रनिंग एक्सपेण्डीचर’, यानी, नियमित तौर पर जारी सतत् जारी ख़र्च होता है, जिसका मूल्य औसतीकृत होकर एक बार में ही उत्पाद के मूल्य में स्थानान्तरित हो जाता है। मार्क्स लिखते हैं :
“अचल पूँजी मेण्टेनेंस की विशिष्ट लागतों को जन्म देती है। इस मेण्टेनेंस का एक हिस्सा तो स्वयं श्रम प्रक्रिया द्वारा ही पूरा कर दिया जाता है; अचल पूँजी अगर श्रम प्रक्रिया में काम नहीं करती तो यह बरबाद हो जाती है…यह मेण्टेनेंस जो श्रम प्रक्रिया में इस्तेमाल किये जाने से ही परिणत हो जाता है, वह जीवित श्रम द्वारा मुफ़्त में दिया जाने वाला प्राकृतिक उपहार होता है। वास्तव में, श्रम की संरक्षणकारी शक्ति दोहरे प्रकार की होती है। एक ओर यह उत्पाद में स्थानान्तरित कर श्रम की सामग्रियों के मूल्य का संरक्षण करता है, वहीं दूसरी ओर ये श्रम के माध्यम का संरक्षण इस मूल्य को उत्पाद में स्थानान्तरित किये बिना, यानी उत्पादन-प्रक्रिया में अपनी कार्रवाई के ज़रिये उनके उपयोग-मूल्य को बचाकर भी करता है।
“लेकिन अगर अचल पूँजी के तत्वों को अच्छी स्थिति में रखना है तो उसे श्रम के सकारात्मक अतिरिक्त ख़र्च की भी आवश्यकता पड़ती है। समय-समय पर मशीनरी की सफ़ाई होनी चाहिए। इसमें अतिरिक्त श्रम ख़र्च होता है, जिसके बिना वह काम करने योग्य नहीं रह जाती है. यह केवल उन तत्वों के क्षतिकारक प्रभाव से रक्षा मात्र है जो कि उत्पादन की प्रक्रिया से अभिन्न रूप से जुड़े होते हैं, और इसलिए एकदम शाब्दिक अर्थों में अचल पूँजी के तत्वों काम करने वाली हालत में रखते हैं। अचल पूँजी के सामान्य जीवनकाल का आकलन इस मान्यता के आधार पर ही किया जाता है कि जिन स्थितियों के तहत वे इस पूरी अवधि में सामान्य तौर पर काम कर सकती है, वे पूरी की जा रही हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे कि यह मान लिया जाता है कि अगर एक मनुष्य का औसत जीवन तीस वर्ष है, तो वह नियमित तौर पर नहाता ही होगा। यहाँ जो बात समझने वाली है वह यह नहीं है कि मशीन में लगे श्रम को प्रतिस्थापित किया जा रहा है, बल्कि अतिरिक्त श्रम ख़र्च किया जा रहा है जो इसके निरन्तर इस्तेमाल के लिए अनिवार्य है। यह मशीन द्वारा हुए श्रम का प्रश्न नहीं है, बल्कि मशीन पर किये जा रहे श्रम का प्रश्न है; यहाँ वह उत्पादन का अभिकर्ता नहीं है, बल्कि कच्चा माल है। इस श्रम पर ख़र्च होने वाली पूँजी तरल (चल – अनु.) पूँजी का हिस्सा होती है, हालाँकि यह उस वास्तविक श्रम प्रक्रिया में प्रवेश नहीं करता है, जिससे उत्पाद पैदा होता है। यह श्रम उत्पाद की प्रक्रिया में लगातार किया जाना चाहिए, और इसलिए इसका मूल्य भी उत्पाद के मूल्य द्वारा लगातार प्रतिस्थापित होना चाहिए। इस पर ख़र्च पूँजी तरल पूँजी के उस हिस्से में शामिल होती है जिससे सामान्य ओवरहेड लागत पूरी होती है, और यह उत्पाद के मूल्य पर एक औसत वार्षिक गणना के अनुसार वितरित कर दी जाती है। जैसा कि हमने देखा है, वास्तविक उद्योग में इस सफ़ाई के काम को मज़दूर अन्तरालों के दौरान मुफ़्त में करते हैं, और इसी वजह से इसे अक्सर उत्पादन प्रक्रिया के दौरान किया जाता है, जो कि दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण है। यह श्रम माल की कीमत में शामिल नहीं होता। इस रूप में, ग्राहक को यह मुफ़्त में प्राप्त होता है। इसके अलावा, पूँजीपति को अपनी मशीन के मेण्टेनेंस पर कोई ख़र्च नहीं करना पड़ता। मज़दूर स्वयं अपने व्यक्ति-रूप में इसका भुगतान करता है और यह पूँजी के आत्म-संरक्षण के रहस्यों में से एक है, जो वास्तव में मशीनरी के ऊपर मज़दूर के कानूनी दावे को निर्मित करता है, और बुर्जुआ दृष्टिकोण से भी कहें तो मज़दूर को मशीनरी का सह-स्वामी बना देता है। लेकिन उत्पादन की कई शाखाओं में जहाँ मशीनरी को सफ़ाई के लिए उत्पादन की प्रक्रिया से हटाना पड़ता है, और इसलिए सफ़ाई निर्विघ्न रूप में नहीं हो सकती, मसलन, जैसा कि लोकोमोटिव इंजनों के साथ होता है, ऐसी शाखाओं में मेण्टेनेंस कार्य एक सतत् जारी लागत (रनिंग कॉस्ट) के रूप में जोड़ा जाता है, यानी, तरल पूँजी के एक तत्व के रूप में।” (वही, पृ. 252-53, ज़ोर हमारा)
अचल पूँजी पर चर्चा करते हुए अन्त में मार्क्स अचल पूँजी की घिसाई और अवमूल्यन के तीन प्रकारों की बात करते हैं। अचल पूँजी के तत्वों का अवमूल्यन तीन प्रकार से होता है: पहला, श्रम–प्रक्रिया के दौरान व उसके ज़रिये; केवल इस रूप में होने वाले अवमूल्यन या घिसाई के ज़रिये ही अचल पूँजी के तत्वों का मूल्य उत्पाद में रूपान्तरित होता है और इसीलिए पूँजीपति चाहता है कि उसकी मशीन व अचल पूँजी के अन्य तत्व लगातार उत्पादन की प्रक्रिया में श्रम-प्रक्रिया द्वारा ख़र्च हों ताकि उनका मूल्य उत्पाद के मूल्य में स्थानान्तरित हो और वास्तवीकृत होकर मुद्रा-रूप में उसके पास वापस आ सके। दूसरा, प्राकृतिक शक्तियों की कार्रवाई द्वारा होने वाली घिसाई व अवमूल्यन। मशीनें जब नहीं चल रही होतीं, तो भी नमी, गर्मी, ज़ंग लगने, आदि के कारण उनका अवमूल्यन होता रहता है; इस रूप में मशीनों की होने वाली घिसाई व अवमूल्यन से उत्पाद में कोई मूल्य स्थानान्तरित नहीं होता। तीसरा रूप वह रूप है जिसे मार्क्स ‘नैतिक अवमूल्यन’ कहते हैं क्योंकि यह भौतिक अवमूल्यन से बिल्कुल भिन्न है। एक ओर पूँजीवादी उत्पादन के विकास के साथ मशीनों की उम्र बढ़ती भी है क्योंकि वे भौतिक तौर पर अधिक टिकाऊ हो जाती हैं, लेकिन एक दूसरा कारक उनका नैतिक अवमूल्यन, यानी मूल्य-ह्रास भी करता रहता है: श्रम की उत्पादकता में सतत् विकास। यह सम्भव है कि मशीन उपयोग-मूल्य के रूप में बिल्कुल अच्छी काम करने योग्य स्थिति में हो, लेकिन अब वह उतना मूल्य उत्पाद में स्थानान्तरित नहीं करेगी, जितने मूल्य पर पूँजीपति ने उसे ख़रीदा था। क्यों? क्योंकि श्रम की उत्पादकता के आम तौर पर विकास के साथ मशीनों का सामाजिक मूल्य भी गिरता है, यानी वे सस्ती होती जाती हैं और साथ ही तकनोलॉजी के मामले में उन्नत होती जाती हैं। नतीजतन, पूँजीपति ने जिस क़ीमत पर किसी विशिष्ट मशीन को ख़रीदा था, वह समय बीतने के साथ सस्ती हो सकती है। हर नयी निवेशित होने वाली पूँजी इस नये कम हो चुके मूल्य पर ही मशीन को ख़रीदेगी और उसके उत्पाद में मशीन का यह नया सामाजिक मूल्य ही अंश-अंश में स्थानान्तरित होगा। इसलिए कोई पुरानी पूँजी का स्वामी यह नहीं कह सकता कि उसने मशीन अतीत में इससे ज़्यादा क़ीमत पर ख़रीदी थी, इसलिए वह अपने उत्पाद के मूल्य में मशीन के पुराने मूल्य को ही जोड़ेगा! बाज़ार में पूँजियों की आपसी प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित करती है कि हर मशीन का वर्तमान सामाजिक मूल्य ही उत्पाद में स्थानान्तरित होता है। इसलिए भी पूँजीपति चाहते हैं कि उनकी मशीनें निरन्तर श्रम-प्रक्रिया में चलकर ख़र्च हों, न कि उनका नैतिक (भौतिक के विपरीत) अवमूल्यन हो, जिसका अर्थ है श्रम की उत्पादकता में वृद्धि के कारण किसी पुरानी मशीन का मूल्य-ह्रास। मार्क्स लिखते हैं :
“जिस हद तक काम में लगायी गयी अचल पूँजी का मूल्य और टिकाऊपन पूँजीवादी उत्पादन पद्धति के विकास के साथ विकसित होता है, उसी हद तक हर विशिष्ट निवेश में उद्योग व औद्योगिक पूँजी का जीवन विकसित होता है, जो बढ़ते हुए कई वर्षों तक चला जाता है, मान लें, औसतन दस वर्षों तक। अगर अचल पूँजी का विकास एक ओर उसके जीवन-काल को बढ़ाता है, तो वहीं दूसरी आर वह उत्पादन के साधनों के निरन्तर क्रान्तिकारी रूपान्तरण के कारण छोटा भी होता जाता है, जो स्वयं पूँजीवादी उत्पादन पद्धति के विकास के साथ त्वरित होता जाता है। यह भी उत्पादन के साधनों में बदलाव की ओर ले जाता है; उन्हें उनके नैतिक अवमूल्यन के कारण उनके भौतिक तौर पर ख़र्च हो जाने के काफ़ी पहले ही बार-बार बदलना पड़ता है।” (वही, पृ. 264)
यानी, केवल श्रम-प्रक्रिया द्वारा अचल पूँजी के तत्वों का अवमूल्यन ही पूँजीपति के हित में है और प्राकृतिक शक्तियों द्वारा अवमूल्यन और नैतिक अवमूल्यन को पूँजीपति हमेशा न्यूनातिन्यून बनाना चाहता है। यही वजह है कि अट्ठारहवीं सदी में आधुनिक मशीनों के आने साथ श्रम की सघनता घटने के बजाय बढ़ी क्योंकि पूँजीपतियों ने कार्यदिवस के घण्टे बढ़ा दिये, रात्रि-कार्य करवाना शुरू करवा दिया, मशीनों की गति बढ़ायी, ताकि श्रम-प्रक्रिया के ही ज़रिये मशीनों के अवमूल्यन को अधिक से अधिक तेज़ कर उनका मूल्य उत्पाद में स्थानान्तरित किया जा सके। इस प्रकार, पूँजीवादी उत्पादन-सम्बन्धों के मातहत वह चीज़ जिसे मनुष्य के प्रयासों को आसान बनाना चाहिए था, श्रम की सघनता को कम करना चाहिए था, काम के घण्टे घटाने चाहिए थे, ठीक उसी चीज़ ने इनका ठीक उल्टा किया।
इसके बाद मार्क्स चल पूँजी पर आते हैं और उस पर विस्तार से चर्चा करते हैं।
(अध्याय 6 अगले अंक में जारी)
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













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