साम्प्रदायिक जुनून का मुकाबला करते हुए शहीद होने वाले महान क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के शहादत दिवस (25 मार्च) के अवसर पर

(राजनीति और पत्रकारिता के क्षेत्र में क़दम रखते ही गणेशशंकर विद्यार्थी ने किसानों और मज़दूरों के मोर्चे पर ध्यान केन्द्रित किया था। दिसम्बर, 1919 में उन्होंने कानपुर के 25 हज़ार कपड़ा-मिल मज़दूरों की ऐतिहासिक हड़ताल का नेतृत्व किया था। उन्होंने कानपुर में कपड़ा मिल-मज़दूरों को संगठित किया और 1927 से मृत्युपर्यन्त तक कानुपर मिल मज़दूर सभा के अध्यक्ष रहे। ‘सभा’ का मुख्य पत्र ‘मज़दूर’ भी उन्हीं की पहलक़दमी से निकला था। 25 मार्च 1931 को कानपुर में साम्प्रदायिक दंगों की आग बुझाते हुए वे शहीद हो गये थे। यहाँ हम उनके लेखों के कुछ उद्धरण दे रहे हैं।– सं.)

  • देश की स्वाधीनता के लिए जो उद्योग किया जा रहा था, उसका वह दिन निस्सन्देह, अत्यन्त बुरा था, जिस दिन स्वाधीनता के क्षेत्र में ख़िलाफ़त, मुल्ला, मौलवियों और धर्माचार्यों को स्थान देना आवश्यक समझा गया। एक प्रकार से उस दिन हमने स्वाधीनता के क्षेत्र में एक कदम पीछे हटकर रखा था। हमें अपने उसी पाप का फल भोगना पड़ रहा है। देश की स्वाधीनता के संग्राम ही ने मौलाना अब्दुल बारी और शंकराचार्य को देश के सामने दूसरे रूप में पेश कर उन्हें अधिक शक्तिशाली बना दिया और हमारे इस काम का फल यह हुआ कि इस समय हमारे हाथों ही से बढ़ायी इनकी और इनके जैसे लोगों की शक्तियाँ हमारी जड़ उखाड़ने और देश में मजहबी पागलपन, प्रपंच और उत्पात का राज्य स्थापित कर रही हैं।
  • हमारे देश में धर्म के नाम पर कुछ इने-गिने आदमी अपने हीन स्वार्थों की सिद्धि के लिए लोगों को लड़ाते-भिड़ाते हैं। धर्म और ईमान के नाम पर किये जाने वाले इस भीषण व्यापार को रोकने के लिए साहस और दृढ़ता के साथ उद्योग होना चाहिए।
  • एक तरफ जहाँ जन आन्दोलन और राष्ट्रीय आन्दोलन हुए, वहीं, उनके साथ-साथ जातिगत और साम्प्रदायिक आन्दोलनों को भी जान-बूझकर शुरू किया गया क्योंकि ये आन्दोलन न तो अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ थे, न किसी वर्ग के, बल्कि ये दूसरी जातियों के खि़लाफ़ थे।
  • हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य को समाप्त करने का एक तरीका है कि ग्राम-संगठन के कार्य को हाथ में लेकर बिना भेदभाव के भारत के दीन किसानों की सेवा की जाये। उसी तरह शहर की मिलों में काम करने वाले लाखों-मज़दूरों के संगठनों की भी आवश्यकता है। किसानों और मज़दूरों का युग आ गया है। थोथी राजनीति से अब काम नहीं चलेगा।
  • लेनिन के अधूरे ग्रन्थ के पन्ने रूस में ही नहीं, सर्वत्र लिखे जा रहे हैं। विप्लव होंगे, परिवर्तन की धाराएँ घूमेंगी, पुराने आतताईपन पर गाज गिरेगी।

 

 

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