पूँजीवादी व्यवस्था और युवा आबादी को अनियमित व अनौपचारिक क्षेत्र में धकेले जाने की बाध्यता

प्रसेन

अभी हाल ही में चेन्नई स्थित ‘ग्रेट लेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेण्ट’ द्वारा ‘भारत में काम करने वाले युवाओं’ का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में पाया गया कि 20-29 वर्ष की आयु वर्ग के केवल 47 प्रतिशत नौजवान ही तनख़्वाह-शुदा रोज़गार में हैं। शहरी क्षेत्रों में यह आँकड़ा 48.8 प्रतिशत है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आँकड़ा 45.6 प्रतिशत है। इस अध्ययन से पता चलता है कि अनौपचारिक रोज़गार ही अधिकांश लोगों के लिए रोज़गार का मुख्य ज़रिया बना हुआ है। केवल 9.5 प्रतिशत युवा औपचारिक उद्यमों में काम करते हैं, जबकि 37.2 प्रतिशत अनौपचारिक उद्यमों में कार्यरत हैं। ग्रामीण भारत में लगभग 85 प्रतिशत कामकाजी वयस्क अनौपचारिक उद्यमों में काम करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं का 22.5 प्रतिशत औपचारिक उद्यमों में कार्यरत है जबकि 23.9 प्रतिशत अनौपचारिक उद्यमों में। यह आँकड़ा औपचारिक क्षेत्र में रोज़गार के सीमित देशव्यापी विस्तार का संकेत देता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ औपचारिक नौकरियों तक पहुँच भी लिंग और स्थान के आधार पर काफी भिन्न होती है। शहरी क्षेत्रों में लगभग चार में से एक युवा पुरुष औपचारिक उद्यमों में काम करता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आँकड़ा दस में से एक है। महिलाओं में औपचारिक रोज़गार की दर और भी कम है, ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 2.3 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 9.8 प्रतिशत युवा महिलाएँ ही औपचारिक रोज़गार में शामिल हैं। रोज़गार के परिणाम राज्यों में व्यापक रूप से भिन्न हैं, जो रोज़गार सृजन और श्रम बाज़ार संरचनाओं में अन्तर को दर्शाते हैं। युवा रोज़गार गुजरात में 58.1 प्रतिशत से लेकर बिहार में लगभग 37.1 प्रतिशत तक है, जो युवा श्रमिकों को समायोजित करने की राज्यों की क्षमता में बड़े अन्तर को इंगित करता है। केवल आठ राज्यों, जिनमें गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक, दिल्ली, तमिलनाडु, तेलंगाना और हरियाणा शामिल हैं, में आधे से अधिक युवा वेतन-सहित रोज़गार में हैं।

यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि कार्यस्थल और आवास के बीच संरचनात्मक स्थानिक असन्तुलन होने के चलते आवागमन में लगने वाला समय काम के बोझ को बढ़ा देता है। आने-जाने का समय शामिल करने पर काम पर आठ घण्टे से अधिक समय बिताने वाले औपचारिक उद्यमों के कर्मचारियों का हिस्सा दोगुने से भी अधिक, यानी 26.7 प्रतिशत से बढ़कर 63.2 प्रतिशत हो जाता है।

इस रिपोर्ट से तीन बातें बहुत स्पष्ट हैं। पहला, युवा आबादी के लिए पक्के व नियमित रोज़गार के अवसर तेज़ी से घटते जा रहे हैं। युवाओं को अनियमित और अनौपचरिक क्षेत्रों में काम के लिए धकेला जा रहा है। दूसरे, देश में अलग-अलग राज्यों के स्तर पर रोज़गार सृजन में बहुत असमानता है। तीसरे, कार्यस्थल तथा रिहाइश में दूरी के चलते आवागमन काम के समय में अतिरिक्त समय का बोझ बढ़ा देता है।

वास्तव में, श्रमशक्ति का अनौपचारिकीकरण पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली के विकास का अनिवार्य विशिष्ट चरित्र है। अनौपचारिकीकरण की प्रक्रिया के दो अंग हैं। पहला, पूरी अर्थव्यवस्था में एक विशालकाय अनौपचारिक क्षेत्र का पैदा होना। इसका अर्थ है विशाल संख्या में ऐसी औद्योगिक इकाइयों का पैदा होना जो किसी भी प्रकार के क़ानून या सरकार द्वारा लागू किसी भी विनियमन के अन्तर्गत नहीं आतीं। इनमें घरों में उप-ठेकाकरण के तहत होने वाले काम से लेकर, दस्तकारी उद्योग, वर्कशॉप, छोटे-छोटे कारख़ाने तक शामिल हैं। इसमें काम करने वाली श्रमिक आबादी का 98 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जिसके पास निश्चित मज़दूरी वाला पक्का नियमित रोज़गार नहीं है और किसी भी प्रकार की क़ानूनी सुरक्षा उन्हें हासिल नहीं है।

अनौपचारिकीकरण की प्रक्रिया का दूसरा अंग है, संगठित और असंगठित, दोनों ही क्षेत्र में कार्यरत कार्यशक्ति का अनौपचारिकीकरण। यानी कि जो आबादी संगठित क्षेत्र में पक्के रोज़गार और नियमित पक्के वेतन के साथ काम कर रही थी, उसके आकार को ठेकाकरण-उपठेकाकरण और छँटनी के ज़रिये तेज़ी से छोटा करना। यानी संगठित क्षेत्र में भी अनौपचारिक क़रार के तहत काम करने वाली आबादी के हिस्से को लगातार बढ़ाना। देश के सरकारी विभागों में ख़ाली पदों को ख़त्म कर, बचे पदों पर नियमित रोज़गार की जगह ठेके-संविदा की व्यवस्था इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

विकसित होते पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली के इस विशिष्ट चरित्र को मार्क्स ने अपने समय में समझ लिया था। मार्क्स ने ‘पूँजी’ खण्ड-1 के ‘पूँजी का संचय’ अध्याय में ‘सापेक्षिक अतिरिक्त आबादी के निर्माण’ के बारे में लिखा है। इस विश्लेषण के ज़रिये हम अनौपचारिकीकरण की वर्तमान प्रक्रिया को समझ सकते हैं। मार्क्स लिखते हैं :

“…संचय की प्रगति के साथ-साथ परिवर्तनशील पूँजी के साथ स्थिर पूँजी का अनुपात बदल जाता है। शुरू में यदि, मान लीजिए 1:1 का अनुपात था, तो अब उत्तरोत्तर 2:1,3:1,4:1,5:1,7:1 इत्यादि का अनुपात होता जाता है, जिसका नतीजा यह होता है कि जैसे-जैसे पूँजी में वृद्धि होती जाती है, वैसे-वैसे उसके कुल मूल्य के 1/2 भाग के बजाय केवल 1/3, 1/4, 1/5, 1/6, 1/7 इत्यादि भाग ही श्रमशक्ति में रूपान्तरित किये जाते हैं और दूसरी ओर 2/3, 3/4, 4/5, 5/6, 6/7 इत्यादि भाग उत्पादन के साधनों में बदल दिये जाते है। चूँकि श्रम की माँग कुल पूँजी की मात्रा से नहीं, बल्कि केवल उसके परिवर्तनशील संघटक की मात्रा से निर्धारित होती है, इसलिए कुल पूँजी के बढ़ने के साथ-साथ यह माँग उसके अनुपात में नहीं बढ़ती, जैसा कि हमने पहले मान रखा था, बल्कि वह उत्तरोत्तर घटती जाती है।…वास्तव में पूँजीवादी संचय ख़ुद ही लगातार मज़दूरों की एक अपेक्षाकृत अनावश्यक संख्या का उत्पादन करता रहता है, अर्थात पूँजी के आत्मविस्तार की औसत आवश्यकताओं के लिए जो आबादी पर्याप्त होती है, पूँजीवादी संचय उससे बड़ी आबादी का, जो इस कारण बेशी आबादी होती है, उत्पादन करता रहता है, और यह उत्पादन वह स्वयं अपनी ऊर्जा और विस्तार के प्रत्यक्ष अनुपात में करता है।”

पूँजी संचय की प्रक्रिया में पैदा हुई बेशी आबादी पलटकर पूँजी संचय की ज़रूरी शर्त बन जाती है। या कहा जाये कि बेरोज़गारों की आरक्षित सेना पूँजी के विस्तार के लिए आवश्यक हो जाती है। मार्क्स आगे लिखते हैं :

“परन्तु यदि श्रमजीवियों की बेशी आबादी पूँजीवादी आधार पर धन के संचय अथवा विकास की अनिवार्य उपज है, तो यह बेशी आबादी उलटकर पूँजीवादी संचय का लीवर भी बन जाती है – नहीं, बल्कि कहना चाहिए कि वह उत्पादन की पूँजीवादी प्रणाली के अस्तित्व की एक आवश्यक शर्त बन जाती है। यह बेशी आबादी एक औद्योगिक रिज़र्व सेना का रूप धारण कर लेती है, जिस पर पूँजी का ऐसा परमाधिकार होता है कि मानो स्वयं पूँजी ने ही उसे अपने ख़र्चें से पाल-पोसकर तैयार किया हो। आबादी में सचमुच कितनी वृद्धि होती है, उसकी सीमाओं से स्वतन्त्र होकर यह बेशी आबादी पूँजी के आत्मविस्तार की बदलती हुई आवश्यकताओं के लिए मानव-सामग्री की एक ऐसी राशि का सृजन कर देती है, जिसका सदैव ही शोषण किया जा सकता है।”

बेशी आबादी की बढ़ोत्तरी जहाँ एक तरफ़ पलटकर पूँजी संचय की शर्त बन जाती है वहीं दूसरी ओर प्रतियोगिता के द्वारा यह आबादी कार्यरत आबादी पर चुपचाप पूँजी का हुक्म बजाते रहने का दबाव डालती है। मार्क्स आगे लिखते हैं :

“मज़दूर वर्ग का काम पर लगा हुआ भाग जो अत्यधिक श्रम करता है, उससे रिज़र्व भाग की संख्या और बढ़ जाती है; दूसरी ओर, रिज़र्व भाग अपनी प्रतिस्पर्धा के द्वारा नौकरी में लगे हुए भाग पर अब पहले से अधिक दबाव डालता है, और उसके फलस्वरूप इस भाग को अत्यधिक श्रम करने तथा चुपचाप पूँजी का हुक्म बजाने के लिए मजबूर कर देता है। मज़दूर वर्ग के एक भाग से अत्यधिक काम कराके दूसरे भाग को ज़बरदस्ती बेकार बनाये रखना और एक भाग को ज़बरदस्ती ख़ाली हाथ बैठाकर दूसरे भाग से अत्यधिक काम लेना – यह अलग-अलग पूँजीपतियों का धन बढ़ाने का साधन बन जाता है।”

मार्क्स के उपरोक्त विश्लेषण की रोशनी में देखा जाये तो वर्तमान समय में अनौपचारिकीकरण को और युवा आबादी को अनौपचारिक क्षेत्र में धकेलने की परिघटना को समझा जा सकता है। वर्तमान वैश्विक दीर्घकालिक मन्दी के दौर से भारत का पूँजीपति वर्ग भी गुज़र रहा है। पूँजी के आवयविक संघटन में वृद्धि के चलते यहाँ भी एक बड़ी आबादी सापेक्षिक बेशी आबादी में तब्दील की जा चुकी है। एक तरफ़ बड़ी आबादी ख़ाली बैठी है, उसके लिए काम नहीं है। दूसरी तरफ़ कार्यरत आबादी के काम के घण्टे लगातार बढ़ाये जा रहे हैं। सापेक्षिक बेशी आबादी के चलते जो आबादी कार्यरत है वो काम के छिनने, दूसरे शब्दों में कहें तो बेशी आबादी में धकेल दिये जाने के डर से शोषण सहते हुए भी चुपचाप काम करते रहने के लिए बाध्य है। दूसरी तरफ़ बेशी आबादी पूँजीपतियों की ज़रूरत पड़ने पर बहुत कम दाम में अपनी श्रमशक्ति बेचने के लिए तैयार/बाध्य है। मोदी सरकार द्वारा लाये गये ‘चार लेबर कोड’ न केवल हर क्षेत्र के कामगारों को पहले मिलने वाली या काग़ज़ों पर मौजूद सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम मज़दूरी, यूनियन बनाने के अधिकारों पर हमला है बल्कि इसमें काम के घण्टों को क़ानूनी तौर पर बढ़ाने का प्रावधान भी है। नियमित प्रकृति के कामों में भी ठेका, संविदा की व्यवस्था है या लायी जा रही है। जनता के ख़ून-पसीने की कमाई से खड़े सरकारी विभागों को पूँजीपतियों को बेचा जा रहा है या ठेके-संविदा के हवाले किया जा रहा है। पूँजीपति वर्ग के मुनाफ़े की दर को बरक़रार रखने/बढ़ाने के लिए पूरी दुनिया में पूँजीपति वर्ग के हित में ‘राज्य’ का हस्तक्षेप बढ़ा है और इस काम को अंजाम देने के लिए धुर दक्षिणपन्थी/फ़ासीवादी ताक़तों का पूरी दुनिया में ही उभार देखने को मिल रहा है और कई देशों में वे सत्ता में विराजमान भी हैं।

उपरोक्त रिपोर्ट में देश में राज्य स्तर पर रोज़गार सृजन में असमानता और कार्यस्थल तथा रिहाइश में दूरी के कारण अतिरिक्त समय के बोझ की जो बात आयी है, वह भी पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली की चारित्रिक विशेषता है। पूँजीवादी व्यवस्था में मुनाफ़े की होड़ में जिस तरह से बहुत से छोटे-छोटे पूँजीपतियों के हाथ से पूँजी निकलकर मुट्ठीभर पूँजीपतियों के हाथों में केन्द्रित होने की प्रक्रिया चलती है उसी तरह भौगोलिक तौर पर भी पूँजी का केन्द्रण होता रहता है। पूँजी निवेश की सहूलियत के मुताबिक़ कुछ शहर/राज्य उद्योगों के केन्द्र के तौर पर विकसित होते जाते हैं। गाँवों और शहरों में अन्तर बढ़ता जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पूँजीवादी विकास से ग्रामीण आबादी का ध्रुवीकरण तेज़ होता जाता है। एक बड़ी आबादी सापेक्षिक बेशी आबादी में तब्दील हो जाती है जिसका एक हिस्सा काम-काज की तलाश में शहरों की तरफ़ पलायन करता है। मज़दूरों का बड़ा हिस्सा कारख़ानों के इर्द-गिर्द नारकीय स्थिति में रहने के लिए मजबूर होता है या अपनी श्रम-शक्ति की बेहतर क़ीमत के लिए एक कोने से दूसरे कोने भटकता रहता है। भारत जैसे देशों में आज़ादी के बाद पूँजीवादी विकास के प्रारम्भिक दौर में पब्लिक सेक्टरों में या संगठित क्षेत्रों में कार्यरत आबादी के लिए कई बार सस्ती दरों पर रिहाइश का इन्तज़ाम कार्यक्षेत्र के आस-पास किया जाता था। लेकिन नवउदारवादी दौर के आगमन के बाद और पूँजीवाद के वर्तमान दीर्घकालिक आर्थिक संकट के दौर में पूँजीपति वर्ग या सरकार ने इससे पल्ला झाड़ लिया है। ऐसे में इन क्षेत्रों में कार्यरत आबादी अपनी क्षमता और उपलब्धता के मुताबिक़ अपने रहने की जगह चुनने के लिए बाध्य होती है न कि कार्यस्थल से नज़दीकी के हिसाब से।

इस विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि उपरोक्त रिपोर्ट में युवा आबादी के अनौपचारिक क्षेत्र में काम की बाध्यता, राज्यवार रोज़गार के अवसरों की असमानता और कार्यस्थल से दूरी की वजह से काम के समय पर अतिरिक्त बोझ की जो बात सामने आयी है वह कोई आकस्मिक परिघटना या अनहोनी नहीं है, बल्कि मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था की अनिवार्य उपज है। इसी तरह, ये हालात किन्हीं सुधारात्मक उपायों से किसी भी तरह से सुधरने वाले नहीं हैं। पूँजीवादी व्यवस्था का मौजूदा दीर्घकालिक संकट उतने भी “सुधार” की गुंजाइश नहीं छोड़ता जो पहले एक हद तक सम्भव थे, या हो सकते थे।

निश्चित तौर पर मौजूदा व्यवस्था में हर जगह ‘सबके लिए पक्के रोज़गार’ की माँग एक बेहद ज़रूरी क्रान्तिकारी माँग है क्योंकि इस माँग पर संघर्ष आगे बढ़ने पर पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा सबको पक्का रोज़गार देने की असम्भाव्यता की चौहद्दी जनता को दिखने लगती है। वहीं इस दिशा में जनएकजुटता के बल पर कोई भी जीत पहले से ही संकटग्रस्त पूँजीवादी खेमे के संकट को और बढ़ायेगी। ये दोनों ही सूरतें मेहनतकश वर्ग के संघर्ष के पक्ष में हैं। लेकिन इस स्थिति से पूरी तरह मुक्ति तभी मिल सकती है जबकि मुट्ठीभर पूँजीपति जमात के मुनाफ़े पर टिकी वर्तमान व्यवस्था को क्रान्ति के रास्ते उखाड़ फेंका जाये और उसकी जगह पर समाजवादी व्यवस्था का निर्माण किया जाये। समाजवादी देशों के अतीत के अनुभव बताते हैं कि किस तरह समाजवादी नियोजित अर्थव्यवस्था में कुछ ही समय में ऐसी समस्याएँ जड़ से मिटा दी गयी थीं।   l

 

मज़दूर बिगुल, मार्च 2026