नोएडा की एक फ़ैक्ट्री में लगी भीषण आग
फ़ैक्ट्री मालिकों को बचाने में लगा पुलिस-प्रशासन और गोदी मीडिया हुआ बेनक़ाब
देश के कारख़ानों में सुरक्षा के खस्ताहाल इन्तज़ामात
आदित्य
बीते 12 मार्च को नोएडा के सेक्टर 4 की स्मार्ट इलेक्ट्रिक मीटर बनाने वाली एक निजी कम्पनी कैपिटल पॉवर सिस्टम लिमिटेड में आग लग गयी। यह आग सुबह के चार बजे लगी जब कम्पनी में नाइट शिफ़्ट चल रही थी। इस आग में अबतक (यह रिपोर्ट लिखे जाने तक) एक 28 वर्षीय मज़दूर के जलकर मरने की पुष्टि हुई है। आधिकारिक तौर पर तो और किसी के लापता होने की ख़बर नहीं है लेकिन घटना के साक्षी रहे मज़दूरों की मानें तो यह संख्या एक से ज़्यादा हो सकती है।
मज़दूरों के अनुसार इस पाँच मंज़िला फ़ैक्ट्री में घटना के वक़्त क़रीब 500-600 मज़दूर काम कर रहे थे। आग लगने के बाद कम्पनी में कोई अलार्म या सायरन नहीं बजा, जिस वजह से कई लोग बाहर नहीं निकल पाये। आग का पता तब चला जब कैन्टीन में सिलेण्डर फटने से ज़ोरदार धमाका हुआ। धमाका इतना तेज़ था कि फ़ैक्ट्री के सामने रहने वाले कुछ मज़दूरों के घरों की छतें भी टूट गयीं। अपनी जान बचाने के लिए मज़दूरों को पाँचवी मंज़िल तक से कूदना पड़ा। आग इतनी भीषण थी कि इसे बुझाने में चार दिन लग गये। छत से कूदने से लगभग 35 मज़दूर घायल हुए जिनमें ज़्यादातर के पैर टूट गये हैं, जबकि एक मज़दूर के सर में चोट आयी है।
आग लगने से पहले फ़ैक्ट्री और वहाँ काम कर रहे मज़दूरों की स्थिति
नोएडा की इस फ़ैक्ट्री में हुई इस घटना ने न सिर्फ़ नोएडा की फ़ैक्ट्रियों में सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है बल्कि साथ ही पुलिस, प्रशासन और इस पूँजीवादी मीडिया की हक़ीक़त भी बयान कर दी है। इस फ़ैक्ट्री में काम कर रहे सभी मज़दूर ठेके पर थे, जिन्हें अलग-अलग ठेकेदारों द्वारा भर्ती किया जाता था। उनकी तनख्वाह 10-12 हज़ार रुपये ही थी। यहाँ 12-12 घण्टे की दो शिफ़्ट चलती थीं। ओवरटाइम का भुगतान भी डबल रेट से नहीं करके सिंगल रेट से ही किया जाता था। कम्पनी ने सुरक्षा व्यवस्था के सारे नियमों को दरकिनार करते हुए तमाम सुरक्षा उपकरणों को बाईपास कर रखा था। ऐसे में यह लाज़मी था कि कोई भी घटना होने पर मज़दूरों की जान को ख़तरा हो सकता था।
वैसे तो पुलिस और प्रशासन द्वारा आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है, लेकिन वहाँ काम कर रहे मज़दूरों ने बताया कि ज़्यादा सम्भावना है कि यह आग लिफ़्ट की वजह से लगी हो, जिसकी हालत लम्बे समय से ख़राब थी। मैनेजमेण्ट के लोगों ने इसपर कोई ध्यान नहीं दिया। नतीजतन 12 तारीख़ को फ़ैक्ट्री में भीषण आग लग गयी। आग बेसमेण्ट से शुरू हुई और फिर ऊपर फैली। मज़दूरों ने बताया कि अगर समय से सायरन या अलार्म बज गया होता तो सभी मज़दूर आराम से फ़ैक्ट्री से बाहर निकल सकते थे और आग पर क़ाबू पाया जा सकता था।
घटना के बाद पुलिस, प्रशासन और गोदी मीडिया का रवैया
नोएडा में जिस जगह आग लगी वहाँ से दो किलोमीटर से भी कम दायरे में पुलिस और दमकल विभाग दोनों के स्टेशन हैं। लेकिन पुलिस और दमकल को घटनास्थल पर पहुँचने में ढाई-तीन घण्टे का समय लग गया। घटनास्थल पर पहुँचने के बाद भी पुलिस और प्रशासन का ज़ोर इस बात पर ज़्यादा था कि इस घटना का पता लोगों को न चले और मामले को रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाये। ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ के कार्यकर्ता जब घटनास्थल पर पहुँचे तो उन्हें अन्दर तक नहीं जाने दिया गया। पुलिस ने बेशर्मी की हद तो तब पार कर दी जब घटना में एक मज़दूर की मौत की पुष्टि होने के बावजूद पुलिस ने एफ़आईआर तक दर्ज नहीं की। पुलिस का कहना है कि क्योंकि उन्हें कोई लिखित शिक़ायत नहीं मिली है इसलिए वे एफ़आईआर दर्ज नहीं कर सकते!
बाद में ज़िलाधिकारी मेधा रूपम द्वारा यह दावा किया गया कि घायल मज़दूरों को उचित उपचार मुहैया कराया जा रहा है। लेकिन जब ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ के कार्यकर्ता अस्पताल में घायल मज़दूरों से मिलने पहुँचे तो पता चला कि उपचार के नाम पर बस खानापूरी की गयी थी और सभी मज़दूरों की दूसरे दिन ही अस्पताल से छुट्टी कर दी गयी। इनमें तो कई मज़दूर ऐसे थे जिनके दोनों ही पैर टूटे थे और वे चलना तो दूर खड़े होने की हालत में भी नहीं थे। इन मज़दूरों को मुआवज़े के नाम पर ठेकेदारों द्वारा बस दो से चार हज़ार रुपये दिये गये हैं।
इतना ही नहीं, नोएडा के सेक्टर 4 से दो किलोमीटर दूर फ़िल्म सिटी भी है जहाँ कमोबेश सभी बड़े मीडिया चैनलों के दफ़्तर मौजूद हैं, लेकिन क्या मजाल कि एक भी बड़े न्यूज़ चैनल ने इसे तवज्जो दी हो! ये वही मीडिया चैनल हैं जो अभी दो महीने पहले पुलिस व प्रशासन के नाकारेपन की वजह से हुए सॉफ़्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत पर रिपोर्टें तैयार किये जा रहे थे। यह अलग बात है कि उस घटना में भी सरकार और प्रशासन की सच्चाई उजागर करने की जगह वे इसमें बस मसाला ढूँढ रहे थे।
नोएडा व देश की फ़ैक्ट्रियों के हालात
यह कहानी आज कमोबेश नोएडा के या यूँ कहें देशभर के तमाम कारख़ानों की है। आज लगभग हर जगह मज़दूरों से ठेके पर काम कराया जा रहा है। ओवरटाइम का भुगतान डबल रेट से तो दूर, मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी तक नहीं दी जाती। उत्पादन बढ़ाने के लिए कारख़ानों में तमाम सुरक्षा नियमों को बाईपास कर दिया जाता है, जिससे आये-दिन मज़दूरों के साथ कोई न कोई हादसा होता रहता है और जिसे पुलिस और प्रशासन मिलकर बाहर नहीं आने देते। सामाजिक सुरक्षा का तो इन मज़दूरों के लिए जैसे अस्तित्व ही नहीं है। मज़दूरों को जब चाहे तब काम से निकाल दिया जाता है। श्रम क़ानूनों की तो पहले ही तिलांजलि दी जा चुकी है। अब नये फ़ासीवादी लेबर कोड लागू होने के बाद से तो ये हालात और भी भयावह होने वाले हैं।
कुल मिलाकर हर जगह मज़दूरों के हालात बद से बदतर हैं और उन्हें बस काम करने की मशीन समझा जाता है। उनका जमकर शोषण किया जा रहा है ताकि कम्पनी मालिकों, पूँजीपतियों को बेहिसाब मुनाफ़ा पहुँचाया जा सके। लेकिन इनका काम इतने से भी नहीं चल रहा है। यही कारण है कि सत्ता में मौजूद और फ़िलहाल पूँजीपतियों की चहेती फ़ासीवादी भाजपा पुराने श्रम क़ानूनों को ख़त्म करके 4 लेबर कोड लेकर आयी है। इन नये क़ानूनों के आने के बाद तो कहने के लिए जो सुरक्षा के उपकरण कम्पनियों को लगाने पड़ते थे उसकी भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि अब कम्पनियाँ ख़ुद को सर्टिफिकेट दे सकेंगी कि उनकी कम्पनी में सारी सुविधाएँ और सारे सुरक्षा के उपकरण मौजूद हैं! और तो और, फ़ैक्ट्री इंस्पेक्टरों की भूमिका को ख़त्म करके ‘फ़ेसिलिटेटर’ की भूमिका में तब्दील कर दिया गया है जोकि अब अनौपचारिक तौर पर नहीं बल्कि औपचारिक और क़ानूनी तौर पर मालिकों को मदद पहुँचायेंगे! इसके अलावा कारख़ानों के औचक निरीक्षण का प्रावधान भी इन नये काले क़ानूनों में खत्म कर दिया गया है।
जब पुराने श्रम क़ानूनों के होते हुए मज़दूरों का इस क़दर शोषण किया जा रहा है, सुरक्षा की कोई गारण्टी नहीं है, सुरक्षा के सारे नियमों की धज्जियाँ उड़ायी जा रही हैं, तो ऐसे में यह समझा जा सकता है कि 4 लेबर कोड लागू होने के बाद मज़दूरों की हालत क्या होगी! आज देश के हरेक मज़दूर को यह बात समझ लेनी होगी कि इस पूँजीवादी व्यवस्था में इन नारकीय और ख़तरनाक परिस्थितियों में काम करना ही हमारी नियति है। जब तक यह व्यवस्था बनी रहेगी तब तक ऐसे ही अपनी जान जोखिम में डालकर काम करने के लिए हमारी मजबूरी भी बनी रहेगी। इसलिए वक़्त आ गया है कि हम इन्सानी ज़िन्दगी जीने के अपने बेहद बुनियादी हक़ को हासिल करने की लड़ाई में तत्काल शामिल हों। पहले ही बहुत देर हो चुकी है।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













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