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साथी कविता कृष्णपल्लवी की एक मौजूँ कविता – हमला हो चुका है!

बर्बर हमलावरों ने हमला बोल दिया है।
आगे बढ़ रहे हैं वे लगातार
सृजन, विचारों, कल्‍पनाओं और स्वप्नों को रौंदते हुए
तर्क की मृत्यु की घोषणा करते हुए
धर्मध्वजा लहराते हुए
शिक्षा, कला, संस्कृति और जन संचार के
सभी प्रतिष्ठानों पर क़ब्ज़ा जमाते हुए

कविता – वे मुंतज़िर हैं / मेहजबीं

आज एक हफ्ता हो गया है फलाना ढिमकाना
को जेल में बंद हुए
इस बीच मैंने दस कविताएं लिख डाली हैं
एक पत्रिका में इस महीने मेरी कविताएं
आने वाली हैं
दो जगह से कविता पाठ का निमंत्रण भी
मिला है
मैंने जेल वाली पोस्ट को शेयर किया है
अपने प्रकाशित होने वाली पोस्ट को सब जगह शेयर किया है
अपने निमंत्रण समाचार को स्टेटस पर लगा दिया है

आज स्त्री मुक्ति की परियोजना को प्रतीकात्मक जश्न और रस्मी अनुष्ठानों से आगे ले जाने की ज़रूरत है!

इतिहास हमेशा इस बात का गवाह रहा है कि बिना संघर्ष किये, बिना लड़े, कुछ भी हासिल कर पाना मेहनतकश जनता के लिए नामुमकिन है। आज हमारे देश में भी मज़दूर-मेहनतकशों के हालात बेहद खराब है। खास तौर पर मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से यह स्थिति और भयावह होती चली गयी है। स्त्रियों की बात करें तो आज के भारत में उनकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। आज के दौर में स्त्री कामगारों को पुरुषों के मुकाबले लगभग 67 प्रतिशत ही वेतन मिलने के बाद हुक्मरानों द्वारा स्त्री-पुरुष समानता की लच्छेदार बात करना भी एक मज़ाक़ से कम नहीं लगता है। भारत में बड़ी संख्या में स्त्रियाँ असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं, जहाँ 12–14 घण्टे काम करने के बावजूद उन्हें न तो समान वेतन ही मिलता है और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा ही मिलती है। यही नहीं, आर्थिक मंदी के समय सबसे पहले स्त्री कामगारों की ही छंटनी होती है और आर्थिक तेज़ी के दौर में उन्हें सस्ते श्रम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। आज की सड़ी-गली पूँजीवादी व्यवस्था और इसकी बीमार संस्कृति ने स्त्रियों को सिर्फ़ उपभोग की वस्तु मात्र बना कर रख दिया है। स्त्रियाँ आज पूँजीवाद और पूँजीवादी पितृसत्ता की दोहरी गुलामी झेल रही हैं।

कविता – प्रचार की ज़रूरत / बेर्टोल्ट ब्रेष्ट Poem – The Necessity of Propaganda / Bertolt Brecht

प्रचार के मकसद के बारे में
और एक बात लाज़मी है : प्रचार जितना बढ़ता जाता है,
बाक़ी सारी चीज़ें उतनी ही घटने लगती हैं।

बिगुल के लिए एक कविता

हम तो बस इसी बहाने निकले हैं
धरती की गोद में बैठकर आसमाँ को झुकाने निकले हैं
ज़ुल्मतों के दौर से, इन्साँ को बचाने निकले हैं
विज्ञान की ज्वाला जलाकर, अँधेरा मिटाने निकले हैं
हम इन्सान है, इन्सान बनाने निकले हैं

कविता – नयी सदी में भगतसिंह की स्मृति / शशि प्रकाश

हमें तुम्हारा नाम लेना है
एक बार फिर
गुमनाम मंसूबों की शिनाख़्त करते हुए
कुछ गुमशुदा साहसिक योजनाओं के पते ढूँढ़ते हुए
जहाँ रोटियों पर माँओं के दूध से अदृश्य अक्षरों में लिखे
पत्र भेजे जाने वाले हैं, खेतों-कारख़ानों में दिहाड़ी पर
खटने वाले पच्चीस करोड़ मज़दूरों,
बीस करोड़ युवा बेकारों,
उजड़े बेघरों और आधे आसमान की ओर से।

फ़िलिस्तीनी कविताएँ Palestinian Poems

और इस तरह उन्होंने मेरी तलाशी ली…
अन्त में, मुझे दोषी ठहराते हुए उन्होंने कहा :
हमें कुछ नहीं मिला
उसकी जेबों में अक्षरों के सिवाय।
कुछ नहीं मिला सिवाय एक कविता के।

मुक्तिबोध की कविताओं के कुछ अंश

अगर मेरी कविताएँ पसन्द नहीं
उन्हें जला दो,
अगर उसका लोहा पसन्द नहीं
उसे गला दो,
अगर उसकी आग बुरी लगती है
दबा डालो
इस तरह बला टालो!!

कविता  की  ज़रूरत

रोटी पेट की भूख मिटाती है, कविता हमारी सांस्कृतिक-आत्मिक भूख मिटाती है। इनमें से पहली भूख तो जैविक है, आदिम है। दूसरी भूख सच्चे अर्थों में ‘मानवीय’ है, मनुष्य के सम्पूर्ण ऐतिहासिक विकास की देन है। समस्या यह है कि वर्ग विभाजित समाज के श्रम विभाजन जनित अलगाव, विसांस्कृतीकरण और विमानवीकरण की सार्विक परिघटना ने बहुसंख्यक आबादी से उसकी सांस्कृतिक-आत्मिक भूख का अहसास ही छीन लिया है। दूसरे, जब पेट की भूख और बुनियादी ज़रूरतों के लिए ही हडि्डयाँ गलानी पड़ती हों तो सांस्कृतिक भूख या तो मर जाती है या विकृत हो जाती है। भूखे लोग रोटी के लिए आसानी से, स्वत: लड़ने को तैयार हो जायेंगे, पर वास्तविक अर्थों में सम्पूर्ण मानवीय व्यक्तित्वों से युक्त मानव समाज के निर्माण की लम्बी लड़ाई के लिए, मानवता के ‘आवश्यकता के राज्य’ से ‘स्वतंत्रता के राज्य’ में संक्रमण की लम्बी लड़ाई के लिए, व्यक्ति की सम्पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक वैयक्तिकता के लिए ज़रूरी शोषणमुक्त सामाजिक संरचना और सामूहिकता के सुदूर भविष्य तक की यात्रा के सतत् दीर्घकालिक संघर्ष के लिए, लोग तभी तैयार हो सकते हैं, जब उन्हें विस्मृति से मुक्त किया जायेगा, उन्हें स्वप्न और कल्पनाएँ दी जायेंगी, उनमें कविता की भी भूख पैदा की जायेगी और फिर उस भूख को मिटाने के ज़रूरी इन्तज़ाम किये जायेंगे।

अल सल्वाडोर के क्रान्तिकारी कवि रोखे दाल्तोन (1935 – 1975) की कुछ कविताएँ

तुम तय कर सकते हो
नैतिक चरित्र एक राजनीतिक सत्ता,
एक राजनीतिक संस्थान
या एक राजनीतिक व्यक्ति का,
इस बात से कि ख़तरे की किस हद के लिए
रज़ामन्द होते हैं
वे प्रेक्षण पर,
नज़रों में
एक व्यंग्य कवि की।