साहित्य में पक्षधरता, विश्वबोध और मानव-मूल्य / मुक्तिबोध
साहित्य में पक्षधरता का प्रश्न हमेशा से रहा है और रहेगा। पक्षधरता का सम्बन्ध मनुष्य के विश्वबोध और सद्-असद्-विवेक बुद्धि अर्थात् अन्तरात्मा के विवेक से है। हिन्दी में आत्मा की बात की जाती है, विभिन्न सन्दर्भों के अनुसार उसके विभिन्न अर्थ भी हैं। हिन्दी में आभ्यन्तर जगत, अन्तरतम, अन्तर, हृदय आदि का प्रयोग भी है। उन सबका सार-रूप अर्थ है-मनुष्य का अन्तर्मन, या कहिए मनो-जगत्, जिसमें बुद्धि, कल्पना, संवेदना, भावना आदि की प्रक्रियाएँ चलती हैं। किन्तु, अन्तरात्मा एक विशेष अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसका अर्थ है-मनुष्य की कानशैन्स, अर्थात् वह भावनापूर्ण सद्सदविवेक बुद्धि जो मनुष्य को बुरे कामों से रोकती है, और अच्छे कामों की ओर प्रवृत्त करती है।…















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