Category Archives: महँगाई

बढ़ती महँगाई और ईंधन की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी के ख़िलाफ़ दिल्ली में विरोध प्रदर्शन

आज मेहनतकश आम लोगों, छात्रों और युवाओं को अडानी, मोदी और हरदीप पुरी के पापों और स्वार्थों का बोझ उठाना पड़ रहा है। वर्तमान प्रधानमन्त्री महँगाई को लेकर चिन्तित नहीं हैं, जो आम लोगों की ज़िन्दगी को असहनीय बना रही है, बल्कि वे पूँजीपति वर्ग के मुनाफ़े को लेकर चिन्तित हैं। इस महँगाई का सबसे बड़ा बोझ मज़दूरों पर पड़ रहा है।

एक इंसान जैसी ज़िन्दगी जीने के लिए न्यूनतम मज़दूरी कितनी होनी चाहिए?

हमारे देश में 90 फ़ीसदी से ज़्यादा अनौपचारिक मज़दूरों की औसत मासिक आय 10 से 12 हज़ार रुपये के क़रीब है! यह हमारी मानवीय गरिमा पर चोट नहीं है तो क्या है? हमें कीड़ा-मकोड़ा और कॉकरोच समझा जाता है। हमें न तो इंसान माना जाता है और न ही इंसानों जैसा बर्ताव हमारे साथ किया जाता है। पूँजीपतियों के लिए हम बोझा ढोने वाले पशुओं से ज़्यादा और कुछ नहीं हैं, जिन्हें बस जीने की ख़ुराक़ दे दी जाय और बदले में वे कमरतोड़ मेहनत कर धन्नासेठों की तिजोरियाँ भर सकें, उनकी औलादों की ऐय्याशियों का ख़र्च उठा सकें, उनकी सात पुश्तों का भविष्य सुरक्षित कर सकें, जबकि हमारे बच्चे हमेशा भूख और कुपोषण की रेखा पर जियें, दवा-इलाज से वंचित रहें, शिक्षा उनकी पहुँच से बाहर रहे और हम पुश्त-दर-पुश्त रोज़ ग़ुलामों के समान खटने का अभिशप्त हों।

कॉकरोच जनता पार्टी और उसकी लोकप्रियता : भारतीय जनता में व्‍यवस्‍था और मौजूदा सरकार के प्रति बढ़ते गुस्‍से व असन्‍तोष और साथ ही विकल्‍पहीनता की अभिव्‍यक्ति 

कॉकरोच जनता पार्टी की अचानक बढ़ी भारी लोकप्रियता के पीछे मुख्‍य कारण यह है कि हमारे देश का शासक वर्ग, उसकी राज्‍यसत्‍ता और उसके विभिन्‍न अंग-उपांग मेहनतकश जनता की तक़लीफ़ों के प्रति आश्‍चर्यजनक असंवेदनशीलता दिखा रहे हैं और उनका रवैया काफ़ी हद तक पुराने फ्रांस की रानी मैरी एन्‍त्‍वानेत जैसा हो चुका है जिसने पूछा था कि “अगर जनता के पास खाने के लिए रोटी नहीं है, तो वह केक क्‍यों नहीं खा लेती?” उसी प्रकार, भूख और कुपोषण की कगार पर खड़ी भारी बहुसंख्‍यक मेहनतकश और आम मध्‍यवर्गीय आबादी को बताया जा रहा है कि “सब चंगा सी”, “मेलोडी खाओ खुद जान जाओ”, “देश शान्ति और विकास के पथ पर अग्रसर है”, आदि। वहीं दूसरी ओर, खाता-पीता उच्‍च मध्‍य वर्ग और उच्‍च वर्ग नशे में बुरी तरह से टल्‍ली है। यह नशा है उपभोक्‍तावाद, खाऊ-पियू-अघाऊ संस्‍कृति का जिसमें चूर यह वर्ग निरन्‍तर “खाओ-पियो-ऐश करो मितराँ” गाने पर उन्‍मादी नृत्‍य करता रहता है। उसे न सिर्फ़ सुई से लेकर जहाज़ तक बनाने वाली और हर सेवा पैदा करने वाली जनता के दुख-दर्द से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वह उसकी खिल्‍ली भी उड़ाता है। प्राचुर्य और धनाढ्यता का उसका यह अश्‍लील प्रदर्शन भी आँसुओं के समन्‍दर में खड़ी मेहनतकश जनता के धैर्य को परख रहा है।

पेट्रोल-डीज़ल के दामों में पिछले 11 दिनों में चौथी बार बढ़ोतरी से मेहनतकश आबादी बेहाल

ऐसे में इस सरकार से यह सवाल बनता है कि जब अन्‍तरराष्‍ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतों में हुई भारी गिरावट का फ़ायदा आम जनता को नहीं हुआ तो फिर आज कच्‍चे तेल की क़ीमत में हो रही बढ़ोतरी का ख़ामियाज़ा आम जनता क्‍यों भुगते? पिछले 12 सालों में मोदी सरकार ने जहाँ अप्रत्‍यक्ष करों के रूप में आम जनता पर करों का बोझ बढ़ाया है वहीं पूँजीपतियों और सेठ-व्‍यापारियों को करों में अरबों रुपयों की रियायत दी है। प्रभावी कॉरपोरेट कर को 35 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत से भी कम कर दिया गया है। अगर आज इस सरकार को ग़रीबों-मज़दूरों आह सुनायी देती तो वह आसानी से पेट्रोल-डीज़ल पर लगाये जा रहे केन्‍द्रीय करों में ज्‍़यादा कटौती करके उसकी भरपायी धन्‍नासेठों पर करों का बोझ बढ़ाकर कर सकती थी। परन्‍तु सरकार की प्राथमिकता लोगों की भूख शान्‍त करना नहीं बल्कि धन्‍धा करने की सहूलियत सुनिश्चित करना है। यही वजह है देश की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है और धन्‍नासेठों की ऐय्याशियाँ बढ़ती जा रही हैं। इस प्रकिया में इस सरकार का जनविरोधी चरित्र ज्‍़यादा से ज्‍़यादा उजागर होता जा रहा है।

ईरान पर अमेरिकी और इज़रायली साम्राज्यवादी-ज़ायनवादी हमले के मायने

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध केवल ईरानी जनता की तकलीफ़ों को ही नहीं बढ़ा रहा है बल्कि समूचे पश्चिम एशिया की आम मेहनतकाश जनता की मुसीबतों को बढ़ा रहा है। पूँजीवाद-साम्राज्यवाद दुनिया को बर्बादी, अस्थिरता और अनिश्चितता के अलावा कुछ दे भी नहीं सकते हैं। चूँकि रूस और चीन प्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में शामिल नहीं हो रहे हैं इसलिए यह युद्ध किसी विश्व युद्ध की शक़्ल अख़्तियार करता नहीं नज़र आ रहा है। लेकिन इतना तो तय है कि इस क्षेत्रीय युद्ध के भीषण दुष्परिणाम होंगे। पश्चिम एशिया की इस अस्थिरता का असर भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में ऊर्जा संकट के रूप में पहले से ही दिखना शुरू हो गया है।

गैस-सिलेण्डर के बढ़ते संकट और मोदी सरकार की चुप्पी के ख़िलाफ़ देश भर में आक्रोश प्रदर्शन!

बड़े पैमाने पर सिलेण्डर की कालाबाज़ारी शुरू हो गयी है। अमीर तो पैसे के दम पर ब्लैक में सिलेण्डर हासिल कर ले रहे हैं, लेकिन ग़रीबों के घरों में चूल्हा जलने पर भी संकट आ गया है। प्रवासी मज़दूरों-मेहनतकशों की बड़ी आबादी के पास गैस कनेक्शन नहीं है, इसलिए वे छोटे सिलेण्डरों का इस्तेमाल करते हैं। अब उन्हें मजबूरन 300-400 रुपये किलो गैस ख़रीदना पड़ रहा है। कुछ मज़दूर बस्तियों से लोग पलायन करने को मजबूर हैं। 7 मार्च को सरकार ने घरेलू एलपीजी सिलेण्डर में 60 रुपये और कमर्शियल सिलेण्डर में 115 रुपये बढ़ा दिये।

पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट के नाम पर भाजपा ने दिया एक और “राष्ट्रवादी” लूट को अंजाम!

निखिल गडकरी की कम्पनी ‘सी.आई.ए.एन एग्रो’ ने 2024 में इथेनॉल सेक्टर में क़दम रखा। इससे पहले यह मसाला और खाने के तेल बेचने वाली कम्पनी थी। 2024 में कम्पनी का टर्नओवर 171 करोड़ था, जोकि 2025 में बढ़कर 1029 करोड़ हो गया। इस कम्पनी के शेयर की क़ीमत जनवरी, 2025 में 41 रुपये थी, जो कि अब बढ़कर 850 रुपये से अधिक हो गयी है यानी इनकी क़ीमतों में 552 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। सिर्फ़ एक साल में यह कम्पनी इथेनॉल उत्पादन में देश की सबसे बड़ी कम्पनी बन चुकी है। यही है भाजपा के नेता-मन्त्रियों की “राष्ट्रवादी” लूट!

जीएसटी 2.0 : पाँव के नीचे से ज़मीन खिसकती देखकर मोदी-शाह सरकार द्वारा जनता के साथ एक और धोखाधड़ी

सच तो यह है कि जीएसटी में “सुधार” से कोई बुनियादी फ़र्क नहीं आयेगा और महँगाई दर में मामूली-सा अन्‍तर आयेगा, जबकि ज़रूरत यह थी कि इन अप्रत्‍यक्ष करों को समाप्‍त या लगभग समाप्‍त किया जाता, विशेष तौर पर उन वस्‍तुओं और सेवाओं पर जिनका उपयोग आम तौर पर आम मेहनतकश जनता करती है। शिक्षा, चिक‍ित्‍सा, आदि बुनियादी सुविधाओं और उनसे जुड़ी वस्‍तुओं व सेवाओं पर तो जीएसटी लगाने का कोई अर्थ ही नहीं है। मोदी सरकार ने उन्‍हें ख़त्‍म करने के बजाय उनमें मामूली-सी कमी की है और इसी का डंका बजाकर श्रेय लेने की कोशिश कर रही है।

रसोई गैस के दाम और पेट्रोल-डीज़ल पर कर बढ़ाकर मोदी सरकार का जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका!

सरकार लगातार कॉरपोरेट कर और उच्च मध्य वर्ग पर लगने वाले आयकर को घटा रही है और इसकी भरपाई आम जनता की जेबों से कर रही है। भारत में मुख्‍यत: आम मेहनतकश जनता द्वारा दिया जाने वाला अप्रत्‍यक्ष कर, जिसमें जीएसटी, वैट, सरकारी एक्‍साइज़ शुल्‍क, आदि शामिल हैं, सरकारी खज़ाने का क़रीब 60 प्रतिशत बैठता है। यह वह टैक्‍स है जो सभी वस्तुओं और सेवाओं ख़रीदने पर आप देते हैं, जिनके ऊपर ही लिखा रहता है ‘सभी करों समेत’। इसके अलावा, सरकार बड़े मालिकों, धन्‍नासेठों, कम्‍पनियों आदि से प्रत्‍यक्ष कर लेती है, जो कि 1990 के दशक तक आमदनी का 50 प्रतिशत तक हुआ करता था, और जिसे अब घटाकर 30 प्रतिशत तक कर दिया गया है। यह कॉरपोरेट और धन्‍नासेठों पर लगातार प्रत्‍यक्ष करों को घटाया जाना है, जिसके कारण सरकार को घाटा हो रहा है। दूसरी वजह है इन बड़ी-बड़ी कम्‍पनियों को टैक्‍स से छूट, फ़्री बिजली, फ़्री पानी, कौड़ियों के दाम ज़मीन दिया जाना, घाटा होने पर सरकारी ख़र्चों से इन्‍हें बचाया जाना और सरकारी बैंकों में जनता के जमा धन से इन्‍हें बेहद कम ब्याज दरों पर ऋण दिया जाना, उन ऋणों को भी माफ़ कर दिया जाना या बट्टेखाते में, यानी एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट) बोलकर इन धन्‍नासेठों को फोकट में सौंप दिया जाना। अब अमीरों को दी जाने वाली इन फोकट सौगातों से सरकारी ख़ज़ाने को जो नुक़सान होता है, उसकी भरपाई आपके और हमारे ऊपर टैक्‍सों का बोझ लादकर मोदी सरकार कर रही है।

‘भगतसिंह जनअधिकार यात्रा’ का दूसरा चरण : समाहार रपट

3 मार्च को दिल्ली में यात्रा के समापन के तौर पर होने वाले विशाल प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने एड़ी-चोटी का पसीना एक कर दिया, बवाना औद्योगिक क्षेत्र में यात्रा के समर्थन में हुई हड़ताल को कुचलने के लिए गिरफ्तारियाँ और हिरासत में यातना तक का सहारा लिया, जन्तर-मन्तर से कई लहरों में हज़ारों लोगों को बार-बार हिरासत में लिया और शहर में जगह-जगह जत्थों में आ रहे मज़दूरों, मेहनतकशों, छात्रों-युवाओं को रोकने की कोशिश की और जन्तर-मन्तर पर कई दफ़ा लाठी चार्ज तक किया। लेकिन इससे भी वह प्रदर्शन को रोकने में कामयाब नहीं हो पायी। जन्तर-मन्तर पर तो बार-बार प्रदर्शन हुए ही, दिल्ली के करीब आधा दर्जन पुलिस थानों में भी प्रदर्शन होते रहे। प्रदर्शन का सन्देश सीमित होने के बजाय पूरे शहर में और भी ज़्यादा व्यापकता के साथ फैला।