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दिल्ली में म्यूनिसिपल कर्मचारियों की हड़ताल – भाजपा का मज़दूर-कर्मचारी-विरोधी चेहरा एक बार फिर हुआ बेनक़ाब!

एमसीडी के ये कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर इन कामों को अंजाम देते हैं लेकिन दिल्ली में “चार इंजन” की सरकार इन्हें बुनियादी सुरक्षा देने में नाकाम है। ड्यूटी के दौरान जोखिम भरे हालात में काम करने वाले कर्मचारियों की मौत होने पर उनके परिजनों को नौकरी तक नहीं दी जाती है। बीमारी की स्थिति में, काम पर न आ पाने की सूरत में, जितने दिन काम पर नहीं आये उतने दिन की तनख़्वाह काट ली जाती है। “एक देश एक टैक्स” और “एक देश एक चुनाव” का राग अलापने वाली भाजपा सरकार देश की राजधानी में इन कर्मचारियों को कहीं 12 हज़ार रुपये तो कहीं 20 हज़ार रुपये में खटा रही है लेकिन “एक काम एक वेतन” नहीं दे रही है! एक ही विभाग के अन्दर छ: अलग अलग वेतनमान लागू होते हैं। 5200 कर्मचारियों में मात्र 212 लोगों को 27 हज़ार रुपये वेतन मिलता है।

जीएसटी 2.0 : पाँव के नीचे से ज़मीन खिसकती देखकर मोदी-शाह सरकार द्वारा जनता के साथ एक और धोखाधड़ी

सच तो यह है कि जीएसटी में “सुधार” से कोई बुनियादी फ़र्क नहीं आयेगा और महँगाई दर में मामूली-सा अन्‍तर आयेगा, जबकि ज़रूरत यह थी कि इन अप्रत्‍यक्ष करों को समाप्‍त या लगभग समाप्‍त किया जाता, विशेष तौर पर उन वस्‍तुओं और सेवाओं पर जिनका उपयोग आम तौर पर आम मेहनतकश जनता करती है। शिक्षा, चिक‍ित्‍सा, आदि बुनियादी सुविधाओं और उनसे जुड़ी वस्‍तुओं व सेवाओं पर तो जीएसटी लगाने का कोई अर्थ ही नहीं है। मोदी सरकार ने उन्‍हें ख़त्‍म करने के बजाय उनमें मामूली-सी कमी की है और इसी का डंका बजाकर श्रेय लेने की कोशिश कर रही है।

नक़ली और ख़राब दवाओं के ज़रिये मुनाफ़ा बटोरने के लिए दवा कम्पनियों को मोदी सरकार की छूट और चरमराती सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था

आज नक़ली दवाओं का बहुत बड़ा व्यापार खड़ा है। दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य नकली व ख़राब गुणवत्ता वाली दवाओं की बिक्री का गढ़ बने हुए हैं। ड्रग कण्ट्रोलर जनरल ऑफ़ इण्डिया ने जाँच में पाया कि देश में बिक रही 50 प्रतिशत दवाइयाँ ख़राब स्तर की बन रही हैं। इस स्थिति की भयावहता का अन्दाज़ा हालिया दिनों में आयी कुछ ख़बरों से लगाया जा सकता है कि चन्द मुट्ठी भर लोगों के मुनाफ़े के लिए किस तरह इन्सानी ज़िन्दगी को मौत के मुँह में धकेला जा रहा है।

पाठ्यक्रमों में बदलाव और इतिहास का विकृतिकरण करना फ़ासीवादी एजेण्डा है!

भारतीय फ़ासीवादियों का इतिहास को बदलने की एक वजह और है। वह है भारतीय राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में इनकी ग़द्दारी। आज यह कितना भी ख़ुद को सबसे बड़ा देशभक्त होने के तमगे दे लें लेकिन सच्चाई से सब वाकिफ़ हैं कि आज़ादी की लड़ाई में इन्होंने एक ठेला तक नहीं उठाया उल्टे चन्द्रशेखर आज़ाद जैसे क्रान्तिकारियों की मुखबिरी की। वी डी सावरकर जैसे इनके नेताओं ने माफ़ीनामे लिखकर दिये।