कॉकरोच जनता पार्टी और उसकी लोकप्रियता : भारतीय जनता में व्‍यवस्‍था और मौजूदा सरकार के प्रति बढ़ते गुस्‍से व असन्‍तोष और साथ ही विकल्‍पहीनता की अभिव्‍यक्ति

गायत्री भारद्वाज

सर्वोच्‍च न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीश जस्टिस सूर्यकान्‍त द्वारा बेरोज़गार युवाओं को तिलचट्टा (कॉकरोच) कहे जाने के बाद देश में एक तूफ़ान-सा खड़ा हो गया। जस्टिस सूर्यकान्‍त को फ़ौरन ही यह सफ़ाई देनी पड़ी कि वे तो महज़ फ़र्जी डिग्री वाले लोगों की बात कर रहे थे (हालाँकि, यह सफ़ाई भी सरकार और मौजूदा भाजपा के कई शीर्षस्‍थ नेताओं के लिए बहुत अच्‍छी टीका नहीं थी)। लेकिन बाद में सुनवाई के सामने आये वीडियो से तो यही प्रतीत होता है कि जस्टिस सूर्यकान्‍त ने यह टीका आम तौर पर बेरोज़गार युवाओं के लिए की थी। लेकिन अभी हम इस बहस में नहीं जाते हैं कि माननीय न्‍यायाधीश महोदय का क्‍या तात्‍पर्य था। हम इस बयान के बाद हुई घटनाओं पर थोड़ा विचार करना चाहते हैं।

इस बयान के बाद अभिजीत दिपके नामक एक शख्‍़स द्वारा एक ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ऑनलाइन लांच कर दी गयी। इसके बाद, देश में इसे विशेष तौर पर युवाओं के बीच से भारी समर्थन मिला। इसके ऑनलाइन फॉलोवर्स की संख्‍या भाजपा से भी ज्‍़यादा हो गयी। यह बात सत्‍ताधारी भाजपा के लिए चिन्‍ताजनक थी। हमेशा की तरह भाजपा नेता, मसलन, केरल के राजीव चन्‍द्रशेखरन ने इसे “भारत को अस्थिर करने की विदेशी साज़‍िश” क़रार दे दिया, जिसमें विपक्षी पार्टियाँ सहायता कर रही हैं! वैसे तो हमारे देश भारत की अभी जो स्थिति है, उसे स्थिरता तो कहीं से नहीं कहा जा सकता है! देश भर में मज़दूर सम्‍मानजनक जीवन-योग्‍य मज़दूरी के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं और उन्‍हें बर्बर राजकीय दमन का सामना करना पड़ रहा है; भाजपा सरकार के दौरान शुरू हुआ दीर्घकालिक परीक्षा घोटाला अभी भी जारी है जिसकी ताज़ा मिसाल नीट पेपर लीक के रूप में सामने आयी है; इस पेपर लीक के बाद लाखों छात्र अवसाद और रोष में हैं, कुछ छात्रों ने आत्‍महत्‍याएँ तक की हैं; देश में रसोई गैस की किल्‍लत है और ग़रीब मेहनतकश शहरों से गाँवों की ओर लौटने को मजबूर हो गये हैं; दक्षिणी राज्‍यों से पहले ही ‘लेबर शॉर्टेज’ की ख़बरें आने लगी हैं; डीज़ल और पेट्रोल की क़ीमतों में मई में दस दिन के भीतर ही भाजपा सरकार ने चार बार बढ़ोत्‍तरी कर कुल लगभग साढ़े सात रुपये तक की बढ़ोत्‍तरी की है और सीएनजी की क़ीमत में भी एक रुपये की बढ़ोत्‍तरी कर दी गयी है; इस संकट के लिए वैश्विक परिस्थितियाँ तो एक हद तक ही ज़‍िम्‍मेदार हैं, लेकिन ईरान पर अमेरिका-इज़रायल द्वारा थोपे गये युद्ध पर भारत सरकार द्वारा अपनायी गयी बेतुकी विदेश नीति भी ज़‍िम्‍मेदार है; इन बढ़ोत्‍तर‍ियों का नतीजा यह सामने आने वाला है कि पहले से आसमान छू रही महँगाई में और भी ज्‍़यादा और कमरतोड़ बढ़ोत्‍तरी होगी; देश में बेरोज़गारी के हालात पहले से भी ज्‍़यादा विकराल हो गये हैं; मन्‍दी से बिलबिलाया हुआ पूँजीपति वर्ग मज़दूरों के वेतन, कार्यस्थितियों आदि में कोई सुधार करने को तैयार नहीं है; इन पूँजीपतियों से ही अरबों रुपये चन्‍दे व चुनावी बॉण्‍ड लेने के बाद सरकार बनाने वाली पार्टी ज़ाहिरा तौर पर उनके हितों की सीमा में ही कोई भी काम करेगी; नतीजतन, स्थिति और भी ज्‍़यादा भयंकर होगी; लाखों भारतीय श्रमिक जो विशेष तौर पर मध्‍य-पूर्व में काम करते हैं, वे वापस लौट चुके हैं या लौट रहे हैं; नतीजतन, उनके द्वारा भेजे जाने वाले विदेशी मुद्रा का एक बड़ा स्रोत सूख गया है; रुपया गिरते-गिरते लगभग 1 डॉलर में 97 रुपयों की सीमा तक पहुँच चुका है; सत्‍ताधारी पार्टी के नेता या उनके पुत्र (मसलन, बण्‍डी संजय कुमार का बेटा, कुलदीप सेंगर, स्‍वामी चिन्‍मयानन्‍द, प्रज्‍ज्‍वल रेवन्‍ना, आदि) आये दिनों बलात्‍कार, छेड़खानी आदि जैसे स्‍त्री-विरोधी अपराधों में पकड़े जा रहे हैं। यानी, देश की जनता के लिए हालात अभूतपूर्व रूप से भयंकर और अस्थिरतापूर्ण हैं और इनके और बदतर होने की पूरी सम्‍भावना मौजूद है। तो भाजपा नेता कॉकरोच जनता पार्टी की वजह से कौन-सी स्थिरता के भंग होने की बात कर रहे हैं, यह गहरे रहस्‍य का विषय है!

इसके अलावा, जो भी भाजपा सरकार के विरुद्ध कोई भी बात करता है, वह तो ऑटोमैटिकली “विदेशी” विशेष तौर पर “पाकिस्‍तानी” या “चीनी साज़‍िश” का एजेण्‍ट हो जाता है और उसमें हमेशा राहुल गाँधी और विपक्ष या किसी न किसी राजनीतिक विरोधी का हाथ होता है! गोदी मीडिया इसके बाद अफ़वाहसाज़ी में लग जाता है, ताकि यह साबित कर सके कि ये सब तो विदेशी साज़‍िश है और देश के भीतर तो “सब चंगा सी”! जिस नॉर्वेजियन पत्रकार ने नरेन्‍द्र मोदी से सवालों का जवाब देने को कहा, वह जॉर्ज सोरोस की एजेण्‍ट बना दी जाती है! कॉकरोच जनता पार्टी को विदेशी साज़‍िश साबित करने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं! नोएडा मज़दूर आन्‍दोलन में समर्थन देने वाले एक्टिविस्‍ट विदेशी एजेण्‍ट या नक्‍सली बना दिये जाते हैं! सरकार ने देश की जगह अपने आपको रख दिया है। जो भाजपा सरकार और उसके नेताओं का विरोध करता है, वह “देशद्रोही” या “राष्‍ट्रद्रोही” बना दिया जाता है! उसे तुरन्‍त देश की सीमा पर तक़लीफ़ें झेल रहे जवानों का वास्‍ता दिया जाता है! लेकिन ये जवान भी आम मज़दूरों और ग़रीब किसानों के ही बेटे-बेटियाँ हैं। जैसा कि रबिन्‍द्रनाथ टैगोर ने कहा था, “देश आपके पाँवों के नीचे की ज़मीन नहीं है, बल्कि उसमें रहने वाले लोग हैं।” या, जैसा कि सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना ने कहा था, “देश कोई कागज़ पर बना नक्‍़शा नहीं होता।”

बहरहाल, हर राजनीतिक विरोध और असहमति को “देशद्रोह”, “विदेशी साज़‍िश”, आदि क़रार दे दिया जाना एक ‘टूलकिट’ है जिस पर भाजपा पार्टी, उसकी सरकार और गोदी मीडिया मिलकर बार-बार काम करते हैं। लेकिन एक दिक्‍़क़त है : देश की जनता का बहुलांश अब इस पर ध्‍यान नहीं देता और इनका ‘ब्‍लफ़’ अब पकड़ में आ गया है। 2019 में टीवी के इन्‍हीं गोदी चैनलों को देखने वालों की संख्‍या 7.2 करोड़ के क़रीब थी, जो अब 5 करोड़ पर आ गयी है। जनता का बड़ा हिस्‍सा गोदी मीडिया पर विश्‍वास नहीं करता और उससे नफ़रत करता है। सोशल मीडिया व इण्‍टरनेट पर मौजूद वैकल्पिक मीडिया जो पत्रकारिता के उसूलों का किसी हद तक पालन कर रहा है और वस्‍तुपरक व निष्‍पक्ष रवैया रखता है, वह जनता के बीच कहीं ज्‍़यादा लोकप्रिय हो गया है। यही वजह है कि हर दूसरे दिन भाजपा की केन्‍द्र व राज्‍य सरकारें किसी न किसी सोशल मीडिया पेज या हैण्‍डल को प्रतिबन्धित करने के प्रयासों में लगी रहती हैं, जो लोकप्रियता में अब गोदी मीडिया से आगे निकल गये हैं। भाजपा चाहती है कि सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल केवल मोदी-शाह सरकार व भाजपा पार्टी के बॉट्स करें, और कोई न करे!

सोशल मीडिया एक ऐसा स्‍पेस है, जिस पर पूर्ण नियन्‍त्रण स्‍थापित कर पाना सम्‍भव नहीं है और इण्‍टरनेट पर कोई दीर्घकालिक प्रतिबन्‍ध लगाया नहीं जा सकता है। ऊपर से स्‍वयं सरकारें और उनके काम-काज ऑनलाइन प्रक्रियाओं पर बुरी तरह से निर्भर हैं। नतीजतन, सरकार और भाजपा तथा संघ परिवार के समक्ष एक समस्‍या है : एक ऐसा स्‍पेस जो पूरी तरह से उनके नियन्‍त्रण में नहीं है, जो देश की जनता के भारी हिस्‍से तक पहुँच रखता है और जहाँ अब भाजपा और संघ परिवार का नैरेटिव कुछ कमज़ोर पड़ने लगा है।

ऊपर से देश भर में बढ़ रहे जनअसन्‍तोष के कारण सरकारें बुरी तरह से भयाक्रान्‍त हैं और अपने पैरानोइया में स्‍वयं ऐसी स्थिति पैदा करने की तरफ़ जा रही हैं, जिसे मौजूदा व्‍यवस्‍था के दूरदर्शी पहरेदार संशोधनवादी माकपा नेता नीलोत्‍पल बसु ने शासक वर्गों को समझाते और चेताते हुए “सामाजिक विस्‍फोट” की संज्ञा दी है। एक ओर मज़दूर आन्‍दोलन का देश भर में बर्बर दमन किया जा रहा है, योगी सरकार ने मई दिवस मनाने पर प्रभावत: रोक लगा दी थी, अभी कुछेक दिन पहले की ही ख़बर है कि कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थन में मानव श्रृंखला बनाने की एक ऑनलाइन अपील पर बंगलुरू पुलिस ने एक्‍शन लिया और उसे प्रसारित करने वालों पर कार्रवाई करने की धमकी दी है। ग़ौरतलब है कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार है, लेकिन वह भी भयाक्रान्‍त है! ज़ाहिर है, समूचा शासक वर्ग ही भयंकर होती आर्थिक व सामाजिक स्थितियों के मद्देनज़र जनता के गुस्‍से और असन्‍तोष से बुरी तरह से डरा हुआ है। ऊपर से, पिछले कुछ वर्षों में देश के आस-पड़ोस में जो घटनाएँ घटी हैं, वे किसी तरह से भी हदसे हुए भारतीय शासक वर्ग और मौजूदा फ़ासीवादी हुक्‍़मरानों को सुकून देने वाली घटनाएँ नहीं हैं, चाहे वह नेपाल हो, बंगलादेश हो या श्रीलंका। वैसे तो अरब बसन्‍त के तहरीर स्‍क्‍वायर और तुर्की के तकसीन स्‍क्‍वायर को भी दुनिया भर के हुक्‍मरान अभी भूले नहीं हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी की अचानक बढ़ी भारी लोकप्रियता के पीछे मुख्‍य कारण यह है कि हमारे देश का शासक वर्ग, उसकी राज्‍यसत्‍ता और उसके विभिन्‍न अंग-उपांग मेहनतकश जनता की तक़लीफ़ों के प्रति आश्‍चर्यजनक असंवेदनशीलता दिखा रहे हैं और उनका रवैया काफ़ी हद तक पुराने फ्रांस की रानी मैरी एन्‍त्‍वानेत जैसा हो चुका है जिसने पूछा था कि “अगर जनता के पास खाने के लिए रोटी नहीं है, तो वह केक क्‍यों नहीं खा लेती?” उसी प्रकार, भूख और कुपोषण की कगार पर खड़ी भारी बहुसंख्‍यक मेहनतकश और आम मध्‍यवर्गीय आबादी को बताया जा रहा है कि “सब चंगा सी”, “मेलोडी खाओ खुद जान जाओ”, “देश शान्ति और विकास के पथ पर अग्रसर है”, आदि। वहीं दूसरी ओर, खाता-पीता उच्‍च मध्‍य वर्ग और उच्‍च वर्ग नशे में बुरी तरह से टल्‍ली है। यह नशा है उपभोक्‍तावाद, खाऊ-पियू-अघाऊ संस्‍कृति का जिसमें चूर यह वर्ग निरन्‍तर “खाओ-पियो-ऐश करो मितराँ” गाने पर उन्‍मादी नृत्‍य करता रहता है। उसे न सिर्फ़ सुई से लेकर जहाज़ तक बनाने वाली और हर सेवा पैदा करने वाली जनता के दुख-दर्द से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वह उसकी खिल्‍ली भी उड़ाता है। प्राचुर्य और धनाढ्यता का उसका यह अश्‍लील प्रदर्शन भी आँसुओं के समन्‍दर में खड़ी मेहनतकश जनता के धैर्य को परख रहा है।

देश में इस समय जो माहौल है, वह शासक वर्गों को डराने वाला है। और यह डर ही है जिसमें अक्‍सर शासक वर्ग अतिशय दमनकारी और उत्‍पीड़नकारी हो जाते हैं क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि लोगों को दबा-कुचलकर, डरा-धमकाकर उनकी न्‍याय और समानता की माँगों को दफ़नाया जा सकता है। और ये दमनकारी क़दम ही उनके लिए पहले से भी ज्‍़यादा परेशानियाँ भी पैदा करता है, जो कई बार प्राण-घातक भी सिद्ध होती हैं।

दिक्‍़क़त यह है कि जिन कारणों से देश में यह माहौल पैदा हुआ है, उस पर सत्‍ताधारी पार्टी, शासक वर्ग के शासक ब्‍लॉक, उसके दूरदर्शी चिन्‍तकों, रणनीतिज्ञों और थिंकटैंक्‍स का कोई नियन्‍त्रण नहीं है, चाहे वे अख़बारी कॉलमों में कितना भी ज्ञान क्‍यों न ठेल लें। महँगाई, बेरोज़गारी, भूख-कुपोषण, भ्रष्‍टाचार आदि के उपरोक्‍त जिन हालात की हमने चर्चा की है, उनका हरेक तत्‍व वास्‍तव में एक ऐसी सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक व्‍यवस्‍था का नैसर्गिक परिणाम है जिसमें केन्‍द्र में मुट्ठी-भर धनपतियों का मुनाफ़ा है, जहाँ समस्‍त वस्‍तुओं और सेवाओं का उत्‍पादन योजनाबद्ध तरीक़े से सामाजिक आवश्‍यकता के अनुसार नहीं किया जाता, बल्कि जहाँ तमाम निजी पूँजीपति हर उत्‍पादन-क्षेत्र में मुनाफ़े की अन्‍धी हवस और गलाकाटू प्रतियोगिता में लगे रहते हैं, जहाँ नियोजन नहीं बल्कि अराजकता का राज होता है, जहाँ इसी उत्‍पादन की अराजकता के चलते एक ओर ऐश्‍वर्य की मीनारें खड़ी होती हैं, तो वहीं दूसरी ओर आँसुओं का समन्‍दर होता है, एक ओर अश्‍लील होने की हद तक प्राचुर्य और धनाढ्यता का प्रदर्शन होता है तो वहीं दूसरी ओर दारिद्र्य और निर्धनता की खाई होती है, जहाँ अमीर और अमीर होते जाते हैं और ग़रीब और ग़रीब होते जाते हैं, जहाँ करोड़ों की संख्‍या में नौजवान बेरोज़गार सड़कों पर ठोकरें खा रहे होते हैं और देश के शीर्ष पर बैठे शासक वर्ग के अहलकारों के लिए वह महज़ तिलचट्टों की फौज होते हैं।

एक ऐसी व्‍यवस्‍था हमेशा ही नियमित अन्‍तराल पर भयंकर मन्‍दी और संकट का शिकार होती ही है, जिसका कारण और कुछ नहीं बल्कि इसका मुनाफ़ा-केन्द्रित होना और अराजक होना है। इसमें लोग इसलिए भूखों नहीं मरते कि देश में खाने की कमी है; उल्‍टे खाद्यान्‍न उत्‍पादन आवश्‍यकता से ज्‍़यादा होता है और हर साल गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ जाता है। उसी प्रकार, अगर तार्किक और वैज्ञानिक तौर पर सोचा जाय तो बेरोज़गारी का हमारे जैसे देश में कोई कारण नहीं होना चाहिए क्‍योंकि यहाँ प्रचुर मात्रा में मानव संसाधन भी हैं और प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन भी हैं। इन दोनों का मेल कर दिया जाय तो असीमित विकास हो सकता है और हर हाथ को काम भी मिल सकता है। लेकिन इन दोनों के बीच मुनाफ़े की दीवार खड़ी है। जहाँ मुनाफ़ा नहीं है, वहाँ निवेश नहीं है और पूँजीपति वर्ग और उनकी कम्‍पनियाँ समाज-सेवा करने के लिए निवेश नहीं करती हैं, बल्कि मुनाफ़े के लिए निवेश करती हैं।

आज यह अवैज्ञानिक, अतार्किक और मानवद्रोही व्‍यवस्‍था और उसके शीर्ष पर बैठा शासक वर्ग अभूतपूर्व रूप से पतनशील और असंवेदनशील हो चुके हैं। यह दुनिया को लूट, शोषण, युद्ध, पर्यावरणीय विनाश, बेरोज़गारी, अपराध और भ्रष्‍टाचार के अलावा कुछ नहीं दे सकते हैं। जनता के दुख-दर्द से उन्‍हें दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। ऐय्याशी और भ्रष्‍टाचार के गटर में गोते लगाने में उन्‍होंने सारे रिकार्ड ध्‍वस्‍त कर दिये हैं, वह भी एक ऐसे दौर में जब जनता भयंकर परेशानियों और तक़लीफ़ के दौर से गुज़र रही है। लिहाज़ा, जनता में भयंकर असन्‍तोष और गुस्‍सा मौजूद होना लाज़‍िमी है। यह किसी की साज़‍िश नहीं है, जैसा कि तमाम भाजपा सरकारें (केन्‍द्र व राज्‍यों की) हमें यक़ीन दिलाना चाहती हैं! यह उनके किये-धरे का नैसर्गिक परिणाम है, जिसका ठीकरा वह न तो “विदेशी एजेण्‍टों” पर थोप सकती हैं, न ही राजनीतिक असहमति रखने वाले सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियनों, या विपक्ष पर। जनता में मौजूद भयंकर असन्‍तोष और गुस्‍से की ठोस और वाजिब वजहें हैं और जब तक उन वजहों का कोई निवारण नहीं होता, तब तक वह अपने आपको प्रकट करता रहेगा।

कॉकरोच जनता पार्टी ने इस असन्‍तोष और गुस्‍से को ही एक मध्‍यवर्गीय अभिव्‍यक्ति दी है। यही वजह है कि उसे जनता के एक अच्‍छे-ख़ासे हिस्‍से के बीच से अभूतपूर्व प्रतिक्रिया मिली है। कॉकरोच जनता पार्टी का 5 बिन्‍दु का एक घोषणापत्र है। उस घोषणापत्र से उसकी राजनीति के चरित्र के कुछ तत्‍व पता चलते हैं। एक तो इसे लांच करने वाले अभिजीत दिपके पहले आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया विंग में काम करते थे और अमेरिका में संचार के विद्यार्थी हैं। वह आम आदमी पार्टी को पहले ही छोड़ चुके थे। उनकी नयी ‘पार्टी’ के घोषणापत्र पर आगे आयेंगे, पहले एक छोटा-सा रिमाइण्‍डर आम आदमी पार्टी के बारे में।

जैसा कि मीडिया में आज से 10-12 साल पहले अक्‍सर सुनने में आता था, आम आदमी पार्टी “भारतीय राजनीति में ताज़ा हवा के एक झोंके के समान” आयी थी। लेकिन अब वह बदबू भरी सड़ाँध में तब्‍दील हो चुकी है! वास्‍तव में, आम आदमी पार्टी का चरित्र शुरू से ही एक दक्षिणपंथी लोकरंजकतावादी पार्टी का था और वह शुरू से ही राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के एक व्‍यापक प्‍लान का अंग थी। अब यह बात सभी मानते और जानते हैं। अभी भी कुछ राज्‍यों में आप की भूमिका यही है कि वह भाजपा की चुनावी विजय में योगदान करती है, क्‍योंकि वह मुख्‍य पूँजीवादी विपक्षी पार्टी के वोट का एक हिस्‍सा काट लेती है। गुजरात के पिछले कुछ चुनाव इसका जीता-जागता उदाहरण है। लेकिन संघ की योजना से खड़े हर ऐसे राजनीतिक मंच की नियति यही होती है कि वह कालान्‍तर में सापेक्षिक रूप से संघ से स्‍वायत्‍त हो जाता है और कई बार भाजपा का प्रतिस्‍पर्द्धी बनने का प्रयास भी करता है, जैसा कि आप के साथ हुआ। लेकिन इसके बावजूद उसकी राजनीति का चरित्र आज भी दक्षिणपंथी लोकरंजकतावादी ही है और वह भाजपा की साम्‍प्रदायिक फ़ासीवादी नीतियों व प्रचार पर कभी हमला नहीं करती और अपने तरीके से अन्‍धराष्‍ट्रवाद का झण्‍डा भी बुलन्‍द किये रहती है। उसका कोर मसला भ्रष्‍टाचार था, जिसका पूँजीवादी व्‍यवस्‍था के भीतर कोई समाधान हो ही नहीं सकता है और यह बात जनता को भी एक हद तक समझ आयी है। जिस व्‍यवस्‍था में मुनाफ़ा ही सबकुछ हो, पैसा ही सबकुछ हो, उसमें श्रम की लूट क़ानूनी तौर पर तो होगी ही, लेकिन वह उसी तक सीमित नहीं रहेगी और शासक वर्ग के अलग-अलग धड़े लूट में अपनी-अपनी हिस्‍सेदारी बढ़ाने के लिए ग़ैर-क़ानूनी यानी भ्रष्‍टाचार के तौर-तरीक़ों का इस्‍तेमाल भी करते ही हैं और जब एक दफ़ा भ्रष्‍टाचार की गंगोत्री चालू हो जाती है, तो वह जनता के कुछ वर्गों को भी अपनी ज़द में ले ही लेती है। लुब्‍बेलुआब यह कि एक मुनाफ़ा-केन्द्रित व्‍यवस्‍था में भ्रष्‍टाचार का ख़ात्‍मा हो ही नहीं सकता है। हमने 2014 में लिखा था कि आम आदमी पार्टी की नियति यही है कि या तो वह कालान्‍तर में भाजपा के बरक्‍स कांग्रेस को तमाम राज्‍यों में पर्याप्‍त नुक़सान पहुँचाने के बाद धीरे-धीरे क्रमिक प्रक्रिया में समाप्‍त हो जायेगी या फिर यह छोटी नाली भाजपा के बड़े गन्‍दे नाले में समाहित हो जायेगी। फिलहाल तो ऐसा ही होता नज़र आ रहा है।

कॉकरोच जनता पार्टी एक अलग परिघटना है। यह किसी सामाजिक आन्‍दोलन से नहीं पैदा हुई है। यह अभी तक केवल एक ऑनलाइन परिघटना है, जिसके कुछ निश्चित ठोस सामाजिक प्रभाव और नतीजे सामने आने की सम्‍भावना है। दूसरी बात, इस पार्टी का 5-बिन्‍दु का घोषणापत्र एक निश्चित वर्गीय चरित्र रखता है। उसके अहम बिन्‍दु ये हैं कि सेवानिवृत्ति के बाद किसी न्‍यायाधीश को राज्‍यसभा सीट नहीं दी जायेगी, लोकसभा में सीटों की संख्‍या बढ़ाये बिना स्त्रियों को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा, दल बदलने वाले विधायकों व सांसदों को 20 वर्षों के लिए चुनाव से प्रतिबन्धित कर दिया जायेगा, कोई वैध वोट नहीं काटा जायेगा और ऐसा करने वाले प्रमुख चुनाव आयुक्‍त को यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया जायेगा क्‍योंकि वोट चुराना आतंकवाद के समान है, अडाणी और अम्‍बानी से जुड़े सारे मीडिया संस्‍थानों का लाईसेंस रद्द कर दिया जायेगा और उनके एंकरों के बैंक खातों की जाँच की जायेगी। इसके अलावा, पार्टी ने यह भी कहा है कि वह स्‍वयं को सूचना के अधिकार आवेदन के दायरे में रखेगी और कोई गुप्‍त कॉकरोच केयर फण्‍ड नहीं बनायेगी जो पीएम केयर्स फण्‍ड घोटाले की ओर इशारा करता है।

ये सारी माँगें मूलत: और मुख्‍यत: पूँजीवादी लोकतन्‍त्र की उन कमियों-ख़ामियों को दुरुस्‍त करने से जुड़ी हुई हैं, जो जनता के बीच इस असलियत को उजागर कर देती हैं कि पूँजीवादी लोकतन्‍त्र वास्‍तव में धनाढ्य पूँजीपति वर्ग के ही अधिनायकत्‍व का एक रूप है। उसमें आम जनता के लिए जो जनवादी व नागरिक अधिकार काग़ज़ी तौर पर मौजूद होते हैं वे हमेशा बाशर्त और औपचारिक होते हैं और जैसे-जैसे हम सामाजिक पदानुक्रम में नीचे उतरते हुए मज़दूरों व ग़रीब किसानों, मेहनतकश जनता के वर्गों तक जाने लगते हैं, वैसे-वैसे ये औपचारिक अधिकार प्रभावत: अदृश्‍य ही हो जाते हैं। ग़ौरतलब है कि जिस दौर में कॉकरोच जनता पार्टी का उभार हुआ है, उसी दौर में देश के दर्जनों शहरों व औद्योगिक केन्‍द्रों में औद्योगिक मज़दूरों ने भयंकर रूप से कम मज़दूरी, बद से बदतर होते काम और जीवन के हालात के विरुद्ध हड़तालें और आन्‍दोलन किये, मनरेगा को रद्द किये जाने के विरुद्ध ग्रामीण मज़दूर निरन्‍तर विरोध और आन्‍दोलन कर रहे हैं, ग़रीब किसान अपनी माँगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं, घरेलू कामगारों ने बार-बार अपनी जायज़ माँगों को लेकर हड़तालें व प्रदर्शन किये हैं। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी के 5-सूत्रीय घोषणापत्र में शहरी और ग्रामीण मज़दूरों और ग़रीब किसानों की माँगों, उनकी तक़लीफ़ों और ज़रूरतों के बारे में कोई बात नहीं कही गयी है। हो सकता है भविष्‍य में इस चुभने वाली और आश्‍चर्यजनक अनुपस्थिति व कमी पर अभिजीत दिपके का ध्‍यान जाये!

निश्चित तौर पर, बेरोज़गारों, युवाओं और परीक्षार्थियों के मुद्दे बेहद अहम हैं, जनता के बुनियादी मुद्दों में से एक हैं। इन्‍हें प्रभावी तरीक़े से जनता के बीच चर्चा का मुद्दा बना देने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी और उसके संस्‍थापक अभिजीत दिपके धन्‍यवाद के पात्र हैं। लेकिन युवाओं और बेरोज़गारों की भी भारी आबादी मेहनतकश जनता यानी मज़दूरों और ग़रीब किसानों के घरों से ही आती है। अगर कॉकरोच जनता पार्टी को अपने चार्टर को वाक़ई जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्‍व करने वाला चार्टर बनाना है, तो उसे देश के बहुसंख्‍यक वर्ग यानी ग्रामीण और शहरी मज़दूर वर्ग और ग़रीब किसान वर्ग की माँगों को भी अपने चार्टर में शामिल करना चाहिए। अन्‍यथा, यह चार्टर शहरी मध्‍यवर्ग के असन्‍तोष और गुस्‍से के विशिष्‍ट पहलुओं को रेखांकित करने वाला चार्टर मात्र कहलायेगा।

इन पाँच मुद्दों की भी बात करें तो वह एक प्रकार का सेण्ट्रिस्‍ट पाप्‍युलिज्‍़म (लोकरंजकतावाद) ही है। मसलन, अगर मुख्‍य न्‍यायाधीशों को राज्‍यसभा सीटें देने पर रोक लग जाये, तो देश की सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक व्‍यवस्‍था में कौन-सा बड़ा बुनियादी बदलाव आ जायेगा? वैसे भी यह प्रथा तो भाजपा के सत्‍ता में आने के बाद ही ज्‍़यादा प्रचलित हुई है। उसके पहले, जब ऐसे ‘फ़ेवर’ मुख्‍य न्‍यायाधीशों को आम तौर पर नहीं मिलते थे, तो ही कौन-से बड़े अच्‍छे हालात थे देश के बेरोज़गारों, छात्रों-युवाओं और आम नागरिकों के लिए? तब भी हर क्षेत्र में धन की शक्ति का ही बोलबाला था। या, अगर हम इसकी बात करें कि दल-बदलू विधायकों व सांसदों को बीस साल तक चुनाव लड़ने नहीं दिया जायेगा। इससे पूँजीवादी चुनावी व्‍यवस्‍था में कुछ जनवादी सुधार मात्र हो सकता है। इससे चुनावों की पूरी प्रक्रिया में धनबल और बाहुबल की भूमिका और उसमें से जनता की प्रभावी अनुपस्थिति (सिवाय वोट डाल देने वाले प्रकार्य के) और जनप्रतिनिधियों पर उसके प्रभावी नियन्‍त्रण की अनुपस्थिति की समस्‍याएँ हल नहीं होतीं। उसी प्रकार, अगर बिना लोकसभा की सीटें बढ़ाये 50 प्रतिशत महिला आरक्षण की भी बात करें, तो अपने आप में इससे लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में जनता की हिस्‍सेदारी और उसका नियन्‍त्रण बढ़ने का कोई रास्‍ता नहीं खुलता है। सवाल महिला सांसदों व विधायकों की राजनीति के चरित्र का है, न कि सांसद या विधायक की जेण्‍डर पहचान का। जनता का यह नारा नहीं हो सकता कि “हमें महिला सांसदों व विधायकों द्वारा शोषित व दमित होने का अधिकार चाहिए!” अम्‍बानी और अडाणी से जुड़े समाचार चैनलों के लाईसेंस रद्द किये जाने और उनके एंकरों के बैंक खातों की जाँच की माँग बिल्‍कुल उचित है क्‍योंकि यह गोदी मीडिया के चरित्र को बेनक़ाब करती है। यह मीडिया में जनवादी सुधार की माँग मानी जा सकती है। साथ ही, पूँजीवादी लोकतन्‍त्र के भीतर मीडिया जितना स्‍वतन्‍त्र हो सकता है (वह पूर्णत: पूँजी की शक्ति और पूँजीपति वर्ग के हितों से स्‍वतन्‍त्र तो नहीं हो सकता), उतना स्‍वतन्‍त्र बनाने की हर माँग का समर्थन किया जाना चाहिए हालाँकि उसके लिए और बुनियादी माँगों को उठाये जाने की आवश्‍यकता है। सवाल केवल अडाणी और अम्‍बानी के मालिकाने वाले मीडिया संस्‍थानों का ही नहीं है। इसके अलावा, वोट चोरी करने और एक भी वैध वोट काटने पर चुनाव आयुक्‍त को दण्डित करने का प्रस्‍ताव भी सही है, लेकिन उस पर यूएपीए लगाने की माँग इसी प्रक्रिया में यूएपीए जैसे ग़ैर-जनवादी और तानाशाहाना क़ानून को भी जायज़ ठहरा देता है। क्‍या अभिजीत दिपके को यह पता है कि यूएपीए के प्रावधान क्‍या हैं और उनका किस प्रकार सरकारों द्वारा इस्‍तेमाल किया गया है? ऐसे इस्‍तेमाल को हम “दुरुपयोग” नहीं कहेंगे क्‍योंकि वह इसी प्रकार के उपयोग के लिए बना क़ानून है।

इस चार्टर का एक लोकरंजकतावादी चरित्र है, जो आम आदमी पार्टी के लोकरंजकतावाद से भिन्‍न है। कम-से-कम अभी तो ऐसा ही लगता है। भविष्‍य में क्‍या होगा, इसके बारे में अभी कुछ भी कहना सही नहीं होगा। आम आदमी पार्टी का लोकरंजकतावाद दक्षिणपंथी लोकरंजकतावाद था। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का लोकरंजकतावाद अधिक सेण्ट्रिस्‍ट चरित्र रखता है और पूँजीवादी लोकतन्‍त्र को आज के दौर में उसकी सबसे घृणास्‍पद हो चुकी कुछ विशिष्‍टताओं से साफ़ करने का लक्ष्‍य रखता है, जिन पर इस समय जनता में सबसे ज्‍़यादा गुस्‍सा है।

इस ‘पार्टी’ ने अब तक अपना कोई आर्थिक कार्यक्रम सामने नहीं रखा है, इसलिए हम नहीं जानते कि नये लेबर कोड, निजीकरण, देश की प्राकृतिक सम्‍पदा को पूँजीपति वर्ग (केवल अडाणी और अम्‍बानी नहीं, बल्कि पूरे पूँजीपति वर्ग) को सौंपे जाने, ग़रीब किसानों के हित में धनिक वर्गों पर विशेष कर लगा कर लागत-मूल्‍य को घटाने की माँग, मनरेगा को ख़त्‍म किये जाने, आदि केन्‍द्रीय आर्थिक प्रश्‍नों पर उसका क्‍या कहना है। अभी उसका जो घोषणापत्र सामने आया है उसका निशाना आज के निज़ाम और उसे चलाने वाले हुक्‍़मरानों की सबसे अश्‍लील हो चुकी विशिष्‍टताएँ हैं और निश्चित तौर पर उस पर व्‍यंग्‍यात्‍मक शैली में हमला करके इस पार्टी ने देश के मध्‍यवर्गीय युवाओं की नब्‍ज़ पर हाथ रखा है। उसके द्वारा, शिक्षा मन्‍त्री धर्मेन्‍द्र प्रधान के इस्‍तीफ़े के लिए ऑनलाइन याचिका पर 6 लाख से ज्‍़यादा हस्‍ताक्षर हो चुके हैं। यह माँग भी बिल्‍कुल दुरुस्‍त है क्‍योंकि भाजपा सरकार आने के बाद से जारी परीक्षा घोटाला के दोषियों पर कार्रवाई होनी ही चाहिए और कुछ प्‍यादों को पकड़कर बड़े खिलाड़‍ियों को बचाने की कोशिश को नाकाम किया जाना चाहिए।

इसलिए अभी तक जितने तथ्‍य सार्वजनिक तौर पर मौजूद हैं, उसके आधार पर कॉकरोच जनता पार्टी का यही विश्‍लेषण किया जा सकता है कि यह मध्‍यवर्गीय गुस्‍से को अभिव्‍यक्ति दे रही है, जो भ्रष्‍टाचार, विविध न्‍यायाधीशों की असंवेदनशील, निरंकुश व ग़ैर-जनवादी बातों, परीक्षा घोटाले, भाजपा नेताओं की राजनीतिक अश्‍लीलता के कारण उसके भीतर भरा हुआ है। इसके प्रस्‍तावों का चरित्र मूलत: और मुख्‍यत: सेण्ट्रिस्‍ट लोकरंजकतावादी प्रतीत होता है, जो आम आदमी पार्टी से इसे एक अलग परिघटना बना देता है। साथ ही, यह किसी सामाजिक आन्‍दोलन से निकली परिघटना नहीं है, बल्कि अभी मुख्‍यत: एक ऑनलाइन परिघटना है। लेकिन इससे इसका महत्‍व कम नहीं हो जाता। समकालीन विश्‍व के इतिहास से ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जिसमें बड़े सामाजिक आन्‍दोलनों की शुरुआत के लिए एक ‘ट्रिगर’ का काम करने वाली बात या बयान पहले किसी ऑनलाइन माध्‍यम पर ही आये थे, लेकिन चूँकि वे एक ‘टिपिंग प्‍वाइण्‍ट’ पर आये थे, इसलिए उन्‍होंने किसी बड़े सामाजिक आन्‍दोलन की शुरुआत कर दी।

हमारे देश में जिस तरह से जनता की ज़‍िन्‍दगी के हालात बद से बदतर हो रहे हैं, उसे देखते हुए ही कॉकरोच जनता पार्टी की परिघटना से भाजपा सरकार और संघ परिवार इस क़दर डरा हुआ है कि उसके सभी ऑनलाइन हैण्‍डलों व वेबसाइट को बन्‍द करवा दिया गया है। यह मूर्खतापूर्ण कार्रवाई है। इससे वे ठीक उन्‍हीं चीज़ों को बढ़ावा दे रहे हैं, जिनके बारे में सोचकर उनकी रूह काँप जाती है! इस प्रकार के तानाशाहाना क़दमों से कभी जनता की प्रतिक्रिया को स्‍थायी या दीर्घकालिक तौर पर दबाया नहीं जा सकता है। इसका असर अन्‍तत: उल्‍टा होता है। यह इस बात को भी प्रदर्शित करता है कि जनता के बीच मौजूदा निज़ाम की जन-वैधता (mass legitimacy) और जनता के बीच उसका राजनीतिक वर्चस्‍व कमज़ोर हो रहा है। अपनी जन-वैधता को लेकर आश्‍वस्‍त सरकारें इस प्रकार के राजनीतिक हमलों को पचा लेती हैं और उनके व्‍यंग्‍य को ‘एप्रिशियेट’ करने का नाटक भी करती हैं और कई बार तो कुछ माँगों को स्‍वीकार भी कर लेती हैं! लेकिन जिस पार्टी व उसकी सरकार का मक़सद ही समूची राज्‍यसत्‍ता के उपकरण पर अन्‍दरूनी तौर पर फ़ासीवादी कब्‍ज़ा कर चुनावों, लोकतान्त्रिक संस्‍थाओं और प्रक्रियाओं को बेअसर कर देना हो और उन्‍हें महज़ औपचारिक बना देना हो, उनके लिए न तो यह सम्‍भव होता है और न ही वांछनीय।

बहरहाल, कॉकरोच जनता पार्टी के सोशल मीडिया हैण्‍डलों और वेबसाइट को बन्‍द किया जाना कतई अलोकतान्त्रिक क़दम है और इसका विरोध किया जाना चाहिए। यह अभिव्‍यक्ति के अधिकार पर हमला है। किसी भी नागरिक या नागरिकों को सरकार और न्‍यायपालिका तक की आलोचना का पूरा अधिकार होता है। लेकिन बुरी तरह से डरा हुआ और भयाक्रान्‍त भारतीय शासक वर्ग किसी भी आलोचना और विरोध से इस क़दर घबराया हुआ है कि असहमति और विरोध की हर आवाज़ को दबा देने पर आमादा है। अन्‍तत: ऐसे तानाशाहाना क़दम ही उसकी मुश्किलें बढ़ाने वाले हैं। दूसरी बात, जनता की माँगों को एक उपयुक्‍त रूप में राजनीतिक अभिव्‍यक्ति दिये जाने की आवश्‍यकता है। मध्‍यवर्गीय प्रस्‍थान-बिन्‍दु से भ्रष्‍टाचार, ऐय्याशी आदि के कुछ उदाहरणों और लोकतन्‍त्र की कुछ प्रक्रियाओं के हनन पर व्‍यंग्‍यात्‍मक टिप्‍पणी मात्र कर देना पर्याप्‍त नहीं है। यह कुल मिलाकर अन्‍त में जनता की राजनीतिक आकांक्षाओं को अनुत्‍पादक दिशा में मोड़कर महज़ एक भड़ाँस निकालने का माध्‍यम बनकर रह जायेगा।