तेल की बढ़ती कीमतों का बोझ फिर मेहनतकश जनता पर
सच तो यह है कि पेट्रोल की खपत को तभी कम किया जा सकता है, जब सार्वजनिक परिवहन की एक ऐसी चुस्त-दुरुस्त प्रणाली विकसित की जाये कि लग्ज़री गाड़ियों, कारों, मोटरसाइकिलों और स्कूटरों के निजी उपयोग की ज़रूरत न रहे। स्कूलों-कालेजों, विश्वविद्यालयों, कार्यालयों, खरीदारी और मनोरंजन स्थलों तक पहुँचने के लिए सड़कों पर पर्याप्त संख्या में सुविधाजनक (आज की तरह खटारा बसें नहीं) बसें थोड़े-थोड़े अन्तरालों पर दौड़ती रहें। कम दूरी के लिए साइकिलों का इस्तेमाल हो। परन्तु बाज़ार और मुनाफे की इस व्यवस्था के रहते निजी उपभोग की प्रणाली को ख़त्म नहीं किया जा सकता। निजी कारों और गाड़ियों के इस्तेमाल पर रोक लगाना तो दूर रहा इनके निजी उपयोग को कम भी नहीं किया जा सकता। और न ही तेल की कीमतों की बढ़ोत्तरी पर लगाम लगायी जा सकती है। यह कोई अचानक पैदा होने वाला संकट नहीं बल्कि संकटग्रस्त पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली की ही देन है और इसके ख़ात्मे के साथ ही यह ख़त्म होगा।






















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