Category Archives: बोलते आँकड़े, चीख़ती सच्चाइयाँ

मोदी सरकार के ‘अमृतकाल’ में आर्थिक-सामाजिक  असमानता की लगातार गहराती खाई

सरकारी तथ्य जब इस बात को स्पष्ट करते हैं कि देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, मुट्ठीभर लोगों के हाथ में समस्त सम्पत्ति-सम्पदा इकट्ठी होती जा रही है तो इसका दूसरा कड़वा पहलू यह है कि एक बड़ी आबादी को बदहाली, मुफ़लिसी और मौत के कगार पर धकेला भी जा रहा है। मोदी सरकार द्वारा लाये गये ‘अमृतकाल’ में इस गहराती आर्थिक-सामाजिक असमानता में भारत ने बिना शक बेहतर प्रदर्शन किया है! यह पिछले 12 सालों में भाजपा सरकार की पूँजीपरस्त नीतियों और पूँजीपति वर्ग की सेवा में न्योछावर होने की देन है। ‘अच्छे दिन’ का नारा देश के पूँजीपतियों, धन्नासेठों के लिए था, तो वहीं ‘सबका साथ, सबका विकास’ से अर्थ सभी अमीरों, करोड़पतियों का साथ और उनके विकास से था। हालाँकि, यह पूँजीवादी विकास की नैसर्गिक गति है कि एक तरफ़ तो सुख-समृद्धि और विलासिता की मीनारें खड़ी होती हैं, तो दूसरी तरफ़ ग़रीबी, भूखमरी, अभाव और बेबसी का गहरा कुआँ खोदा जा रहा होता है, जिसे मौजूदा फ़ासीवादी हुकूमत ने तेज़ी से अंजाम दिया है। बढ़ती आर्थिक असमानता यानी अमीरी-ग़रीबी के बीच की लगातार चौड़ी और गहरी होती खाई फ़ासीवादी ताक़तों और इस मानवद्रोही पूँजीवादी व्यवस्था के अन्त को और क़रीब लाती जा रही है।

रेलवे-सम्बन्धी कैग की रिपोर्ट ने खोली पोल: 89 प्रतिशत रेलवे स्टेशनों पर बुनियादी यात्री सुविधाओं की कमी, सुरक्षा से जुड़े 20,304 काम आज भी अधूरे!

कैग की रिपोर्ट के अनुसार, जिन 512 ग़ैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशनों का ऑडिट किया गया, उनमें से 458, यानी क़रीब 89 प्रतिशत स्टेशनों पर निर्धारित बुनियादी यात्री सुविधाओं तक में कमी पायी गयी। इन स्टेशनों पर पीने का पानी, शौचालय, बैठने की जगह, पंखे, वाटर कूलर और प्लेटफॉर्म शेड जैसी सुविधाओं तक आम नागरिकों को मुहैया नहीं करायी गयी हैं। यानी जिस रेलवे को “विश्वस्तरीय” बनाने के बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं, उसके लगभग हर नौ में से आठ स्टेशनों पर यात्रियों को अभी भी बुनियादी सुविधाएँ पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं।

बोलते आँकड़े  चीख़ती सच्चाइयाँ

यह भयानक असमानता और ज़बरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिये जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक क़ायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।

बोलते आँकड़े – चीख़ती सच्चाइयाँ : डीज़ल-पेट्रोल के नाम पर जारी लूट

दुनिया के किसी भी देश में शायद ही पेट्रोल पर इतना भारी टैक्स लगता हो। मसलन, तेल पर इंग्लैण्ड में 61 फ़ीसदी, फ्रांस में 59 और अमेरिका में 21 फ़ीसदी टैक्स लगता है। यह डकैती नहीं तो क्या है कि माल की कीमत पर माल की कीमत से भी ज़्यादा टैक्स लगाकर जनता को बेचा जाये? मोदी ने ठीक ही कहा था: “धन्धा मेरे ख़ून में है, पैसा मेरे ख़ून में है!” (3 सितम्बर 2014, डेकन क्रॉनिकल, नरेन्द्र मोदी का बयान)।

बोलते आँकड़े – चीख़ती सच्चाइयाँ : मेहनतकश आबादी की घटती आमदनी

आय में गिरावट और वस्तुओं के बढ़ते दाम का नतीजा है कि मेहनतकश तबके की थालियों से लगातार दालें व सब्ज़ियाँ गायब होते जा रहे हैं। राष्ट्रीय पोषण निगरानी ब्यूरो द्वारा 2012 में किये गए आखिरी सर्वे में बताया गया था कि 1979 की तुलना में 2012 में औसतन हर ग्रामीण को 550 कैलोरी उर्जा, 13 ग्राम प्रोटीन, 5 मिग्रा आयरन, 250 मिग्रा कैल्शियम और 500 मि ग्रा विटामिन ए प्रतिदिन कम मिल रहा है। अब ऊपर दिए आँकड़ों से साफ़ अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि कीमतों के बढ़ने से ये आँकड़े पिछले 10 सालों में और भी अधिक भयानक हुए होंगे। एक बड़ी आबादी सिर्फ़ रोज़ जीनेभर के सामान जुटाने लायक़ कमा रही है।

योगी के रामराज्य में इलाज बिना मरते मेहनतकश

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार हर ज़िले में मेडिकल कॉलेज खोलने जैसे बड़े-बड़े दावे कर रही है लेकिन वहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत इतनी ख़राब है कि ग़रीब आदमी बीमारी की तकलीफ़ से मुक्ति पाने के लिए मौत चुनने पर मजबूर हो जाये। बात सुनने में भयानक लगेगी लेकिन योगी के “रामराज्य” का सच यही है।

आज़ादी का (अ)मृत महोत्सव : अडानियों-अम्बानियों की बढ़ती सम्पत्ति, आम जनता की बेहाल स्थिति

मेहनतकश साथियों, इस साल हमारा देश आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। हर बार की तरह मोदीजी फिर इस बार लाल क़िले पर चढ़कर लम्बे-लम्बे भाषण देंगे। बड़े-बड़े वायदे करेंगे, जो हर बार की तरह पूरे नहीं होने वाले। इसका कारण भी है क्योंकि मोदी जी के लिए देश का मतलब आम जनता नहीं बल्कि देश के पूँजीपति हैं, इसलिए धन्नासेठों से किये सारे वायदे पूरे होते हैं और जनता को दिये जाते हैं बस जुमले। इस बार ये सरकार आज़ादी का मृत महोत्सव, माफ़ कीजिएगा, “अमृत महोत्सव” मना रही है। पर सवाल है किसके लिए आज़ादी?

मोदी सरकार के निकम्मेपन और लापरवाही ने भारत में 47 लाख लोगों की जान ली

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रपट के अनुसार कोविड महामारी के कारण दुनियाभर में क़रीब डेढ़ करोड़ लोगों की मौत हुई। इनमें से एक तिहाई, यानी 47.4 लाख लोग अकेले भारत में मरे। भारत के आम लोग अभी वह दिल तोड़ देने वाला दृश्य भूले नहीं हैं, जिसमें नदियों में गुमनाम लाशें बह रही थीं, कुत्ते और सियार इन लाशों को खा रहे थे और श्मशान घाटों व विद्युत शवदाहगृहों के बाहर लोग मरने वाले अपने प्रियजनों की लाशें लिये लाइनों में खड़े थे।

कोरोना से हुई मौतों के आँकड़े छिपाने में जुटी मोदी सरकार के झूठों की खुलती पोल

मोदी सरकार के हिसाब से भारत में 11 जनवरी 2022 तक कोरोना के 3.59 करोड़ मामले और 4.84 लाख मौतें दर्ज की गयी हैं। लेकिन कई नये अध्ययनों और रिपोर्टों ने इस झूठ की कलई खोलकर रख दी गयी है। विश्व स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘साइंस’ में 6 जनवरी को ‘भारत में कोविड से मौतें : राष्ट्रीय सर्वे का डेटा और अस्पतालों में हुई मौतें’ शीर्षक से प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक़ कोरोना के दौरान 32 लाख लोगों की मौत हुई, जो सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज मौतों से 7 गुना ज़्यादा है। एक अन्य प्रतिठित अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका ‘नेचर’ के अनुसार भारत में कोविड से क़रीब 50 लाख, यानी सरकारी आँकड़े से दस गुना ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं।

जनता का जीवन रसातल में तो चुनावबाज़ पार्टियों की सम्पत्तियाँ शिखरों पर क्यों?

हाल ही में एडीआर (असोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स) नामक संस्था ने विभिन्न पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियों की सम्पत्तियों और उनकी देनदारियों का विवरण पेश किया है। चुनावी चन्दा लेने में सबसे आगे रहने वाली भाजपा सम्पत्ति के मामले में भी सबसे आगे है। भाजपा की कुल घोषित सम्पत्ति सात पार्टियों की कुल घोषित सम्पत्ति का क़रीब 70 प्रतिशत है। एडीआर ने अपनी रिपोर्ट में सात राष्ट्रीय बुर्जुआ पार्टियों और 44 क्षेत्रीय बुर्जुआ पार्टियों की सम्पत्तियों की जानकारी दी है।