एसआईआर मेहनतकश जनता का मताधिकार छीनने के लिए किया गया एक घोटाला है!
एसआईआर को रद्द कराने और ईवीएम को प्रतिबन्धित कराने के जुझारू संघर्ष के लिए आम जनता को एकजुट होना होगा!

सम्पादकीय अग्रलेख

हाल ही में ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ अख़बार द्वारा किये गये खुलासे से स्पष्ट तौर पर ज़ाहिर हो गया है कि विशेष सघन पुनरीक्षण (स्पेशल इण्टेंसिव रिविज़न – एसआईआर) जनता के विरुद्ध किया गया एक ख़तरनाक चुनावी घोटाला है। इस घोटाले का मक़सद है मज़दूरों, आम ग़रीब अल्पशिक्षित मेहनतकश जनता, मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों और औरतों के मताधिकार, यानी वोट देने के अधिकार को छीनना। यानी एसआईआर के ज़रिये ठीक उन सामाजिक वर्गों और समुदायों के वोट के अधिकार को छीन लेना मोदी–शाह सरकार का लक्ष्य है जिनमें भाजपा के विरुद्ध वोट देने की सम्भावना अधिक होती है। हाल ही में ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ अख़बार की एक पत्रकार द्वारा किये गये भण्डाफोड़ से इस साज़िश की कई नयी परतें उजागर हुई हैं।

एसआईआर और केन्द्रीय चुनाव आयोग पर नया खुलासा

‘इण्डियन एक्सप्रेस’ अख़बार द्वारा किये गये खुलासे से यह सत्य उद्घाटित हुआ है कि केन्द्रीय चुनाव आयोग के दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 माह के दौरान ही मुख्य केन्द्रीय चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा लागू किये गये एसआईआर-सम्बन्धी फ़ैसलों पर 14 बार आपत्तियाँ दर्ज करायीं। लेकिन इसके बावजूद अपने राजनीतिक आक़ाओं, यानी मोदी-शाह, की शह पर ज्ञानेश कुमार ने धक्कड़शाही कर मनमानेपन से अपने असंवैधानिक और अवैध फ़ैसलों को लागू करवाया। इन आपत्तियों का रिश्ता वोटरों के नाम के काटे जाने, नये वोटरों के नाम जोड़े जाने और काटे गये नामों को फिर से जोड़ने की ग़लत प्रक्रिया और सम्पूर्ण मतदाता सूचियों पर चुनावी पंजीकरण अधिकारियों के नियन्त्रण को सीमित करने और उसे केन्द्रीय यानी ज्ञानेश कुमार के नियन्त्रण में लाने के तानाशाहाना फ़ैसलों से था। ज़ाहिर है, केचुआ आयुक्त ज्ञानेश कुमार भाजपा के पक्ष में जनता के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से के मताधिकार को छीनने के लिए केन्द्रीय चुनाव आयोग के अन्य दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को नज़रन्दाज़ कर रहा था।

इस खुलासे के बाद केचुआ ने एक आधिकारिक बयान में स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि वह एसआईआर के सवाल पर एकमत है! हमेशा की तरह केचुआ व ज्ञानेश कुमार के बचाव में देश भर में लम्बे समय से हँसी का पात्र बना हुआ भाजपा प्रवक्ता सम्बित पात्रा उतर पड़ा। उसने दावा किया कि केचुआ के भीतर ये “असहमतियाँ” तो यह दिखलाती हैं कि हमारे देश के चुनाव आयोग के भीतर कितना जीवन्त “लोकतन्त्र” है! यह व्यक्ति क्यों जनता के बीच लम्बे समय से हँसी का पात्र बना हुआ है, आप उसके इस बयान से समझ सकते हैं। लेकिन ये बेहूदा जुमलेबाज़ियाँ, कुर्तक, थेंथरई और गलदोदई अब काम नहीं आ रही हैं क्योंकि जनता के बीच सच को छिपा पाना अब मुश्किल हो गया है।

बहरहाल, ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ के इस खुलासे से कोई नयी बात ज़ाहिर नहीं हुई है, हालाँकि यह खुलासा करने वाली पत्रकार ने क़ाबिले-तारीफ़ काम किया है। इस खुलासे से वही बात एक बार फिर से पुष्ट हुई है जिसका अन्देशा देश भर में तमाम चुनाव विश्लेषक, भूतपूर्व चुनाव आयुक्त, सर्वोच्च न्यायालय के तमाम वक़ील, जनवादी-नागरिक अधिकार संगठन व कार्यकर्ता और क्रान्तिकारी संगठन लम्बे समय से अभिव्यक्त कर रहे थे : भाजपा वोटचोरी करके जनादेशों की सेंधमारी करती रही है और इसी तरह से केन्द्र में और विभिन्न राज्यों में सरकारें बनाती रही है। इसके लिए वह ईवीएम घोटाला व मतगणना घोटाला तो करती ही रही है, साथ में अब वह एसआईआर की इस नयी ख़तरनाक साज़िश के ज़रिये मेहनतकश जनता के एक अच्छे–ख़ासे हिस्से का मताधिकार ही छीन रही है। ऐसे में, हम मज़दूरों, कर्मचारियों, ग़रीब किसानों, व आम मेहनतकश लोगों को अच्छी तरह से समझना चाहिए कि यह एसआईआर है क्या और क्यों सड़क पर उतरकर इसके विरुद्ध एक जुझारू जनान्दोलन खड़ा करना हमारे अस्तित्व का प्रश्न है, क्योंकि यह हमारे सबसे बुनियादी राजनीतिक जनवादी अधिकार से जुड़ा हुआ है।

एसआईआर क्या है और यह कैसे जनता के वोट देने का अधिकार छीनता है?

एसआईआर यानी वोटर सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण वास्तव में एक ग़ैर-क़ानूनी और अवैधानिक क़दम है जिसका मक़सद आम मेहनतकश जनता के एक बड़े हिस्से के वोट देने के अधिकार को छीनना है। क्यों? वजह यह कि हमारे देश में आज़ादी के बाद से ही नियमित प्रक्रिया में मतदाता सूची का संशोधन स्थापित प्रक्रियाओं से होता रहा है, नये वोटरों के नाम जुड़ते रहे हैं, मृत हो गये या देश से बाहर चले गये वोटरों के नाम कटते रहे हैं, अपने निवास-स्थान से कहीं और चले जाने पर मतदाता की जानकारियों में बदलाव भी होते रहे हैं और यह मौजूद वोटर सूची में संशोधन के ज़रिये होता रहा है; इसके लिए किसी ऐसे एसआईआर की आवश्यकता कभी नहीं हुई जो पुरानी वोटर सूची को कचरापेटी के हवाले कर नयी वोटर सूची बनाये और “योग्य वोटर” होने को प्रमाणित करने की ज़िम्मेदारी हर भारतीय व्यक्ति पर डाल दे और उसके लिए सभी भारतीय लोगों से ऐसे दस्तावेज़ माँगे जो उनकी एक अच्छी-ख़ासी आबादी के पास है ही नहीं!

पहले यह प्रक्रिया स्वयं सरकार की पहलक़दमी पर होती थी। पहले चुनाव आयोग का नारा था : ‘कोई वोटर न छूटे’। लेकिन बहुत कम लोगों ने ग़ौर किया होगा कि अब उसका नारा हो गया है : ‘कोई योग्य वोटर न छूटे’। “योग्य वोटर” कौन होगा? यह मोदी–शाह की फ़ासीवादी सरकार तय करेगी! यहाँ एक बहुत बड़ा बदलाव किया गया है। पहले इस बात की ज़िम्मेदारी राज्यसत्ता पर होती थी कि वह यह पक्का करे कि हर नये वोटर का नाम मतदाता सूची में जुड़े। इसे ‘राजकीय पहलक़दमी पर होने वाला मतदाता पंजीकरण’ कहा जाता है। दुनिया के हर देश में जहाँ पूँजीवादी जनवाद किसी न किसी हद तक काम करता है, वहाँ यही होता है। इसके बरक्स कुछ देशों में एक दूसरा मॉडल लागू किया जाता है जिसे कहा जाता है ‘व्यक्तिगत पहलक़दमी पर होने वाला मतदाता पंजीकरण’। यह आम तौर पर सर्वसत्तावादी तानाशाहियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला तरीक़ा है, जिसका मक़सद ही यह होता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं का नाम काटा जाये और उनके मताधिकार को छीन लिया जाये। इसके कारणों को हम कुछ आगे समझेंगे।

पहले मॉडल में, जिसमें सभी को मताधिकार देने की ज़िम्मेदारी सरकार की होती है, बीएलओ (बूथ लेवल ऑफ़िसर, जो आम तौर पर स्थानीय स्कूल के शिक्षक, आँगनवाड़ीकर्मी आदि होते हैं) का यह काम होता था कि वह अपने इलाक़े में घर-घर जाये और स्वयं नये वोटरों का पंजीकरण करे, मृत वोटरों के नाम को काटे, पता बदल जाने वाले वोटरों की सूचना में बदलाव करे और यह सुनिश्चित करे की कोई वोटर इसमें छूटे नहीं। यह काम पहले से मौजूद मतदाता सूची में संशोधन के ज़रिये होता था।

लेकिन एसआईआर के इस दूसरे मॉडल में, जिसमें हर भारतीय को साबित करना होगा कि वह नागरिक है और इसलिए “योग्य वोटर” है, पुरानी मतदाता सूची को ही रद्द कर दिया गया है और नये सिरे से भाजपा की फ़ासीवादी सरकार मतदाता सूची बना रही है! इसमें वोटर के रूप में पंजीकरण कराने की ज़िम्मेदारी स्वयं वोटर पर होती है और उसे सरकार के सामने साबित करना पड़ता है वह एक वैध वोटर के रूप में पंजीकृत होने का अधिकार रखता है! यानी अब आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप अपनी योग्यता साबित करें। इसके लिए आपको एक फ़ॉर्म दिया जायेगा, जिसे भरकर एक निश्चित तिथि तक वापस करें। अगर आप किसी भी वजह से ऐसा नहीं कर पाते हैं तो आपका नाम मसविदा मतदाता सूची से भी काट दिया जायेगा। पहले यह सरकारी कर्मचारी (बीएलओ) की ज़िम्मेदारी होती थी कि वह सुनिश्चित करे कि आपका नाम वोटर लिस्ट में है, लेकिन अब आपको अपनी योग्यता साबित कर सुनिश्चित करना होगा कि आपका नाम वोटर लिस्ट में है!

यह हमारे देश में पहली बार हो रहा है, जिसका मक़सद ही कम शिक्षित आम मेहनतकश ग़रीब आबादी, प्रवासियों, स्त्रियों, दलितों और विशेष तौर पर मुसलमानों का नाम मतदाता सूची से काटना है। हमारे देश के अधिकांश चुनावों में जीत–हार का फ़ैसला 1.5-2 प्रतिशत वोट अन्तर से होता है। ऐसे में, अगर 25 से 40 प्रतिशत तक आम मेहनतकश जनता, मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों व प्रवासियों का नाम मतदाता सूची से कट जाता है (जिनका बहुलांश सामान्यत: भाजपा को वोट नहीं देता) तो चुनावों में भाजपा की जीत की गुंजाइश हमेशा बेहद ज़्यादा होगी। यही एसआईआर का असली लक्ष्य है और इसीलिए मोदी–शाह ने अपने एक चाटुकार ज्ञानेश कुमार को केचुआ का मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया है। ठीक इसीलिए मुख्य केन्द्रीय चुनाव आयुक्त को नियुक्त करने के नियम ही मोदी-शाह सरकार ने बदल दिये ताकि हमेशा अपने किसी गुर्गे को चुनाव आयोग का मुख्य चुनाव आयुक्त बना सकें, इसीलिए 2023 में 140 से ज़्यादा विपक्षी सांसदों को सदन से निलम्बित कर एक ऐसा क़ानून लाया गया है जिसके तहत केन्द्रीय चुनाव आयुक्त पर इन आपराधिक षड्यन्त्रों के लिए कभी कोई आपराधिक मुक़दमा ही न किया जा सके। आगे बढ़ते हैं।

आधुनिक दुनिया के इतिहास में मतदाता पंजीकरण के इन दोनों ही मॉडलों के नतीजे डेढ़ सौ साल में सामने आ चुके हैं। जहाँ पर राज्य की पहलक़दमी और ज़िम्मेदारी पर सभी मतदाताओं का पंजीकरण करने का मॉडल लागू किया जाता रहा है, यानी 99 प्रतिशत देश, वहाँ पर 95 से 100 प्रतिशत लोगों का नाम मतदाता सूची में दर्ज होता रहा है। वहीं जहाँ वोटर बनने के लिए अपनी योग्यता सिद्ध करने की ज़िम्मेदारी आम जनता पर डाल दी जाती है और इस योग्यता को सिद्ध करने के लिए उससे बेतुकी माँगें की जाती हैं, वहाँ पर अधिकतम 75 प्रतिशत लोग ही मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवा पाते हैं, क्योंकि ग़रीब, प्रवासी, कम शिक्षित लोग, स्त्रियाँ, दमित समुदायों के लोग अक्सर इन बेतुकी माँगों को पूरा कर ही नहीं पाते। एक उदाहरण से इसे समझते हैं, क्योंकि इतिहास में यह कुकर्म अलग-अलग प्रकार की सर्वसत्तावादी हुकूमतों ने पहले भी किया है।

जब अमेरिका में उन्नीसवीं सदी में काले लोगों की ग़ुलामी का उन्मूलन हो गया तो उसके दक्षिणी प्रान्तों में श्वेत पूँजीवादी शासक वर्ग को भारी संख्या में मौजूद काले लोगों के वोटिंग अधिकार के नतीजों का भय सताने लगा। तब अमेरिका के इन दक्षिणी प्रान्तों में वहाँ के श्वेत पूँजीवादी शासक वर्ग ने ठीक एसआईआर जैसा प्रावधान लागू किया और उसमें अपने आपको योग्य वोटर सिद्ध करने की ज़िम्मेदारी जनता पर डालते हुए उससे ऐसे दस्तावेज़ माँगे जो अधिकांश काले मेहनतकश लोगों के पास थे ही नहीं! साथ ही, ये दस्तावेज़ ठीक–ठाक श्वेत मेहनतकश आबादी के पास भी नहीं थे। नतीजा यह हुआ कि काले लोगों की बहुसंख्या तो मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवाने में असफल रही ही, गोरी मेहनतकश आबादी का भी एक हिस्सा अपने आपको “योग्य वोटर” सिद्ध नहीं कर पाया। दक्षिण अफ्रीका में भी पूँजीवादी शासक वर्ग ने एक समय यही किया था।

भाजपा की फ़ासीवादी मोदी-शाह सरकार आज अमेरिकी तानाशाहाना नस्लवादी शासक वर्ग और दक्षिण अफ्रीका के तानाशाहाना नस्लवादी शासक वर्ग की इस चाल का इस्तेमाल कर रही है, ताकि मतदाता सूची इस तरह बनायी जाये कि चुनावों में भाजपा की हार ही लगभग असम्भव हो जाये। क्योंकि जैसे ही आप “योग्य वोटर” होने की ज़िम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं, वैसे ही 20 से 30 प्रतिशत आबादी मतदाता सूची से बाहर हो जाती है। क्यों? एक बहुत बड़ी ग़रीब मेहनतकश आबादी के पास वे दस्तावेज़ ही नहीं होते जो माँगे जा रहे हैं। दूसरा, एक बहुत बड़ी आबादी के पास शिक्षा का वह स्तर ही नहीं है कि वह फ़ॉर्म भरने से लेकर, नोटिसों का जवाब देने, तमाम प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने का काम कर सके। तीसरा, एक बहुत बड़ी मेहनतकश आबादी के पास वह समय और संसाधन नहीं होते कि वह लाइनों में खड़ी हो, शहर जाकर फोटो खिंचवाये, नये प्रमाणपत्र बनवाये क्योंकि वह दिनों–रात अपनी रोज़ी–रोटी के लिए कमरतोड़ मेहनत करने के लिए बाध्य कर दी गयी है। नतीजा यह होगा कि प्रवासी मज़दूर, खेतिहर मज़दूर, औरतें, ग़रीब दलित, आदिवासी और विशेष तौर पर मुसलमान मतदाता सूची से बाहर हो जायेंगे और उनका मताधिकार छीन लिया जायेगा।

वोटर के रूप में अपनी योग्यता साबित करने के लिए अब एसआईआर के तहत केन्द्रीय चुनाव आयोग (केचुआ) आपसे उन दस्तावेज़ों या प्रमाणपत्रों की माँग कर रहा है, जो देश की आम मेहनतकश जनता के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से के पास हैं ही नहीं। इन ग्यारह दस्तावेज़ों में न तो आधार कार्ड शामिल है, न राशन कार्ड शामिल है, न पैन कार्ड शामिल है, न ड्राइविंग लाइसेंस शामिल है! यानी ठीक वे दस्तावेज़ जिनकी पहुँच व्यापक आबादी में गहराई तक है, मसलन, आधार कार्ड जिसकी पहुँच लगभग 100 प्रतिशत है, या राशन कार्ड जिसकी पहुँच आम मेहनतकश आबादी में 60 प्रतिशत से ऊपर है, उन्हें इस सूची से बाहर कर दिया गया है! स्वयं केन्द्रीय चुनाव आयोग द्वारा जारी एपिक कार्ड को भी किसी के “योग्य मतदाता” होने का प्रमाण होने की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है! यानी केन्द्रीय चुनाव आयोग अपने द्वारा जारी किये गये पहचानपत्र को भी नहीं मान रहा!

तर्क यह दिया गया है कि ये फ़र्ज़ी तौर पर बनवाये जा सकते हैं और इनसे नागरिकता सिद्ध नहीं होती! लेकिन जो दस्तावेज़ शामिल किये गये हैं, मसलन, जाति प्रमाणपत्र, जन्म प्रमाणपत्र, 1987 से पहले जारी आधिकारिक प्रमाणपत्र या पहचानपत्र, दसवीं उत्तीर्ण करने का प्रमाणपत्र, ज़मीन या मकान का सरकारी पट्टा, वे भी या तो ऐसे दस्तावेज़ हैं जो 80 प्रतिशत आबादी के पास हैं ही नहीं, या उन्हें भी फ़र्ज़ी तौर पर बनवाया जा सकता है, या उनसे भी नागरिकता सिद्ध नहीं होती! साफ़ है कि मतदाता बनने की योग्यता सिद्ध करने के लिए माँगे जाने वाले दस्तावेज़ों में से ठीक उन दस्तावेज़ों को हटा दिया गया है जो भारी मेहनतकश आम जनता के पास होते हैं और ठीक उन दस्तावेज़ों को शामिल किया गया है जो मज़दूरों, ग़रीब किसानों, प्रवासी कामगारों, औरतों, ग़रीब मुसलमानों, दलितों व आदिवासियों के पास नहीं होते। नतीजा यह हुआ है कि जहाँ-जहाँ एसआईआर हुआ है वहाँ पर ठीक इन्हीं सामाजिक वर्गों और समुदायों से भारी संख्या में वोटरों के नाम मतदाता सूची से काट दिये गये हैं।

दूसरी बात यह है कि पहली बार केन्द्रीय चुनाव आयोग मतदाता सूची में शामिल होने के लिए देश के लोगों से नागरिकता का प्रमाण–पत्र माँग रहा है, जबकि यह केन्द्रीय चुनाव आयोग के अधिकार–क्षेत्र में ही नहीं है कि वह लोगों से नागरिकता का सबूत माँगे या नागरिकता निर्धारित करे। वैसे मोदी सरकार अभी तक नहीं बता पायी है कि कौन-से दस्तावेज़ से नागरिकता सिद्ध होती है! बहरहाल, प्रसिद्ध लाल बाबू हुसैन केस (1995) में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही इस बात की सख़्त मनाही की थी कि चुनाव आयोग नागरिकता के सबूत या दस्तावेज़ नहीं माँग सकता है। यह अधिकार केवल गृह मन्त्रालय का होता है कि वह नागरिकता को निर्धारित करे। केन्द्रीय चुनाव आयोग ने कहने के लिए बिहार के एसआईआर में छूट दी थी कि यदि आप ही नहीं यदि आपके माता-पिता या कोई सम्बन्धी 2003 की सूची में थे, तो आपको कोई दस्तावेज़ पेश करने की आवश्यकता नहीं है। बिहार में राजनीतिक स्थिति अपने पक्ष में बनते देख भाजपा ने इस बात की इजाज़त भी चुनाव आयोग को एसआईआर के दौरान दे दी थी कि अगर किसी का रिश्तेदार या पिता, चाचा, मामा आदि भी 2003 की सूची में थे, तो उसे भी कोई दस्तावेज़ पेश करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन याद रहे, यह एसआईआर के जारी केन्द्रीय निर्देश के नियम नहीं हैं और जिस भी राज्य में चाहे केन्द्रीय चुनाव आयोग एसआईआर में ये छूटें देने से इंकार कर सकता है और करता है, जैसा कि पश्चिम बंगाल और असम में देखने में आया। एसआईआर के इन अन्यायपूर्ण प्रावधानों में केचुआ ने कोई बदलाव नहीं किया और जब चाहे उसे लागू कर सकता है, जैसा कि बिहार के बाद हुए एसआईआर में साबित भी हो गया है।

तीसरी बात यह है कि योग्यता यानी नागरिकता को सिद्ध करने वाले दस्तावेज़ों में यह कहकर आधार कार्ड को बाहर कर दिया गया कि वह नागरिकता का प्रमाण–पत्र नहीं है, लेकिन जिन दस्तावेज़ों को शामिल किया गया है क्या वे नागरिकता के प्रमाण–पत्र हैं? मसलन, क्या दसवीं का प्रमाणपत्र नागरिकता का सबूत है? नेपाल से ही एक भारी आबादी भारत में आती है और दसवीं की परीक्षा यहीं से उत्तीर्ण करती है। क्या निवास प्रमाण-पत्र नागरिकता का सबूत है? भारत में कुत्तों के नाम पर, ट्रैक्टर कम्पनी के नाम पर, डोनाल्ड ट्रम्प के नाम पर, सनी लियोनी के नाम पर निवास प्रमाण-पत्र जारी किये गये हैं! पासपोर्ट के अलावा स्वीकृत दस्तावेज़ों की सूची में कोई भी नागरिकता का प्रमाण-पत्र नहीं है और अब तो मोदी-शाह सरकार यह दावा तक कर रही है कि पासपोर्ट भी नागरिकता का निर्णायक प्रमाण-पत्र नहीं है! साफ़ है कि एसआईआर के तहत माँगे जा रहे स्वीकृत दस्तावेज़ों के आधार पर भी नागरिकता सिद्ध नहीं होती।

तो फिर नागरिकता और मतदाता की “योग्यता” सिद्ध कैसे होती है? शायद भाजपा और आरएसएस के सदस्यता पहचान–पत्र से! असल खेल क्या है? जो दस्तावेज़ मेहनतकश जनता के भारी बहुलांश के पास है, वह केचुआ नहीं मानेगा और ठीक वे ही दस्तावेज़ माँगेगा जो मेहनतकश जनता के बहुलांश के पास आम तौर पर नहीं होते! मिसाल के तौर पर, एक व्यापक सर्वेक्षण में पता चला कि बिहार में एसआईआर के दौरान 43 प्रतिशत जनता के पास वे दस्तावेज़ थे ही नहीं जो केन्द्रीय चुनाव आयोग द्वारा माँगे जा रहे हैं! ज़ाहिर है, इस सारे घपले के पीछे असली मक़सद है आम मेहनतकश जनता के एक विचारणीय हिस्से के मताधिकार को छीनना।

यही कारण है कि सितम्बर 2026 तक हुए एसआईआर में अब तक देश के 13.98 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची के काटकर उन्हें मताधिकार से वंचित किया जा चुका है! दिल्ली जैसे राज्य में मतदाता सूची से काटे गये नामों की संख्या 48 लाख के क़रीब है जबकि अन्य 33 लाख वोटरों को योग्यता सिद्ध करने के नोटिस जारी किये गये हैं! यानी, क़रीब आधे लोगों का नाम या तो वोटर लिस्ट से काट दिया गया है या उन पर कटने की तलवार लटक रही है! इसी प्रकार, पश्चिम बंगाल में जारी पहली सूची में क़रीब 91 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से काट दिये गये जो संख्या अन्तिम सूची आते-आते क़रीब 27 लाख तक पहुँची और इनके कारण ही भाजपा पश्चिम बंगाल में चुनाव जीत सकी, वरना उसकी सीटों में वृद्धि अवश्य हो सकती थी, लेकिन बहुमत तक उसका पहुँच पाना सम्भव नहीं था। बिहार में 47 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से काटे गये! बिहार विधानसभा में भाजपा की चुनावी जीत में भी इस घपले का बहुत बड़ा योगदान था। उत्तर प्रदेश में लगभग 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जा चुके हैं! महाराष्ट्र में यह संख्या 1.58 करोड़ है! तमिलनाडु में करीब 98 लाख नाम काटे गये हैं!

“घुसपैठिया–घुसपैठिया” चिल्लाने की भाजपा की फ़ासीवादी राजनीति की असलियत

क्या वे 14 करोड़ लोग जिनके नाम मतदाता सूची से काटे गये हैं, वे सभी बंगलादेशी घुसपैठिये हैं? क्या वे सभी भारत के नागरिक नहीं हैं? इससे बड़ी बकवास और कोई नहीं हो सकती है। स्पष्ट है कि बंगलादेशी घुसपैठियों की पहचान का इससे कोई रिश्ता ही नहीं है। ऊपर से घुसपैठियों की पहचान करना केन्द्रीय चुनाव आयोग का काम ही नहीं है, न ही नागरिकता को निर्धारित करना केन्द्रीय चुनाव आयोग का काम है। ये दोनों ही गृह मन्त्रालय का काम है। तो क्या अमित शाह के नीचे बैठा गृह मन्त्रालय पिछले 12 साल से रागणी गा रहा है कि अभी तक हुए एसआईआर में ही देश में 14 करोड़ घुसपैठिये निकल गये? मोदी के चाटुकार मंत्री किरण रिजिजू ने ही संसद में बयान दिया है कि देश में क़रीब 2 करोड़ बंगलादेशी घुसपैठिये हैं, हालाँकि यह कतई फ़र्ज़ी तौर पर बढ़ाकर दिखाया गया आँकड़ा है। 2004 में तब के गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने बताया था कि बंगलादेशी घुसपैठियों की संख्या 1 करोड़ है। तो क्या मोदी-शाह शासन काल में यह संख्या बढ़कर 2 करोड़ हो गयी! तब तो मोदी और शाह की “मज़बूत सरकार” को फ़ौरन इस्तीफ़ा दे देना चाहिए!

वास्तव में, सच्चाई यह है कि बंगलादेशी “घुसपैठियों” के बाबत की जा रही इस भाजपाई बकवास का असली मक़सद ग़रीब मेहनतकश मुसलमानों को निशाना बनाना है। ऐसे बहुतेरे मामले सामने आ चुके जिसमें आम मुसलमान ग़रीब व्यक्तियों को बंगलादेशी-बंगलादेशी बोलकर निशाना बनाया गया और बाद में पता चला कि वह व्यक्ति बंगलादेश से नहीं आया था। इसके अलावा, पूरी दुनिया में सभी देशों में वैध और अवैध आप्रवासी मज़दूरों की एक आबादी मौजूद है। हर जगह ही दक्षिणपंथी और फ़ासीवादी पार्टियाँ अपने देश के बहुसंख्यक नस्ली, धार्मिक या एथनिक आबादी के सामने इस आबादी को एक नक़ली दुश्मन के तौर पर पेश करती हैं और देश की समस्याओं का ठीकरा उसके सिर फोड़कर पूँजीवादी व्यवस्था और पूँजीपति धन्नासेठों के वर्ग को अपराधमुक्त करने का प्रयास करती हैं। इस पर क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग का रवैया क्या होगा? ये “घुसपैठिये” आम तौर पर कौन होते हैं? ये आम तौर पर रोज़ी-रोटी के लिए दर-ब-दर होने वाली मज़दूर आबादी होती है, अपने देश में अपने धर्म, जाति या जातीयता के आधार पर उत्पीड़न और बर्बर हत्याकाण्ड झेलने वाली ग़रीब दुखियारी जनता होती है। ये कोई नुक़सान पहुँचाने, साज़िश करने, या देश की जनता के विरुद्ध कोई षड्यन्त्र करने के लिए आये लोग नहीं होते। प्यू रिसर्च सेण्टर के अनुसार केवल अमेरिका में 7.5 लाख अवैध भारतीय प्रवासी हैं। कनाडा में, पश्चिम एशिया के तमाम देशों में, दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड में और कई यूरोपीय देशों में भी लाखों अवैध भारतीय प्रवासी मौजूद हैं। ये कौन हैं? ये भी मज़दूर हैं, मेहनतकश हैं। इनको भी इन देशों की दक्षिणपंथी और भाजपा-सरीख़ी फ़ासीवादी पार्टियाँ उसी तरीक़े से निशाना बना रही हैं, जैसे हमारे देश में भाजपा बंगलादेशी घुसपैठियों का हौव्वा खड़ा करके कर रही है। वास्तव में, देश की जनता को कुछ लाख बंगलादेशी आप्रवासी मज़दूरों से ख़तरा नहीं है, बल्कि उसे भाजपाई फ़ासीवाद से और उस वर्ग से ख़तरा है जिसकी यह भाजपाई फ़ासीवाद सेवा करता है, यानी, अडाणी, अम्बानी, टाटा, बिड़ला, आदि से, यानी पूँजीपति वर्ग से, पूँजीवादी व्यवस्था से जो मेहनत और क़ुदरत को लूटकर इस देश को ग़रीबी, बदहाली, दुख के समन्दर में धकेल रही है। ठीक इसीलिए कि इन असली अपराधियों को कठघरे से बाहर किया जा सके, कभी रोहिंग्या-रोहिंग्या का शोर मचाया जाता है, कभी बंगलादेशी-बंगलादेशी का शोर मचाया जाता है और जनता को बेवकूफ़ बनाया जाता है। वैसे भी जब देश की सीमाओं का नियन्त्रण गृह मन्त्रालय के हाथों में है, तो अवैध आप्रवासियों की संख्या में किसी भी बढ़ोत्तरी की ज़िम्मेदार भाजपा सरकार ही है। दूसरे, इन अवैध आप्रवासियों की संख्या मामूली है और उसकी वजह से हमारे देश की सारी समस्याएँ नहीं पैदा हुई हैं।

बहरहाल, इतना स्पष्ट है कि एसआईआर जनता के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से का मताधिकार छीनने के लिए फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा की गयी साज़िश है। इसका पुरज़ोर विरोध देश की आम जनता को करना होगा, अन्यथा उनका बुनियादी राजनीतिक अधिकार यानी वोट देने का अधिकार उनसे छीन लिया जायेगा। भाजपा का नारा है कि मतदाता सरकार को चुनें, इससे पहले भाजपा सरकार मतदाताओं को चुनेगी! यह पूँजीवादी लोकतन्त्र के मानकों के अनुसार भी जनता के बुनियादी जनवादी अधिकारों का निषेध है।

एसआईआर के अतिरिक्त भाजपा द्वारा देश की चुनावी प्रणाली पर आन्तरिक कब्ज़े के कुछ अन्य पहलू

हमें महज़ एसआईआर के विरुद्ध ही नहीं लड़ना है, बल्कि भारत की समूची चुनावी प्रक्रिया, संस्थाओं और मशीनरी के भाजपा की मोदी-शाह सरकार द्वारा फ़ासीवादी भ्रष्टीकरण के विरुद्ध लड़ना है। क्यों? इसलिए क्योंकि एसआईआर के आने के पहले से ही एक भयंकर ईवीएम घोटाला जारी है। इसके बहुत से स्पष्ट संकेत और तथ्य मौजूद हैं, जिन पर बार-बार सर्वोच्च न्यायालय तक में याचिकाएँ दायर की गयी हैं। लेकिन जिस प्रकार भारत की चुनावी मशीनरी पर संघ परिवार व भाजपा सरकार ने अन्दर से क़ब्ज़ा कर लिया है, उसी प्रकार भारत की न्यायपालिका पर भी उन्होंने अन्दर से कब्ज़ा किया है। इसके दर्जनों प्रमाण हर माह देश के सामने उपस्थित हो रहे हैं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने ईवीएम पर कोई हस्तक्षेप नहीं किया और ईवीएम घपला जारी रहने दिया। उसी प्रकार, एसआईआर पर भी सर्वोच्च न्यायालय बस नामों के ज़्यादा कटने पर ‘जाने भी दो यारो’ फिल्म के धृतराष्ट्र की तरह ‘ये क्या हो रहा है-ये क्या हो रहा है’ बोलता रहता है! एक न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची ने तो एक वैध वोटर के नाम कटने पर दायर याचिका पर कहा कि “इस चुनाव में वोट नहीं दे पाये तो क्या हुआ, अगले चुनावों में दे देना!” ज़रा सोचें यह कैसा भयंकर तर्क है। इस प्रकार पश्चिम बंगाल के 27 लाख वोटरों से न्यायपालिका ने कहा कि कोई बात नहीं, इस चुनाव में वोट नहीं दे सके, तो अगले चुनावों में दे देना! इस पर क्या बोला जा सकता है सिवाय इसके कि भारतीय न्यायपालिका में संघ परिवार और भाजपा का आन्तरिक क़ब्ज़ा हो गया है?

ईवीएम के जारी घपले के अलावा मतगणना घोटाला भी जारी है। चुनाव आयोग चुनावों के बाद जो मतदान के आँकड़े जारी करता है, उसमें आख़िरी घण्टों के दौरान करोड़ों वोटों का अन्तर आ जाता है! इस पर बार-बार सवाल उठते हैं, लेकिन चुनाव आयोग कोई जवाब नहीं देता। ये सारे कुकर्म चुनाव आयोग फ़ासीवादी भाजपा के पक्ष में बिना किसी दिक़्क़त के कर सके, इसके लिए केन्द्रीय चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के नियम भी भाजपा की फ़ासीवादी मोदी–शाह सरकार ने बदल दिये। पहले केन्द्रीय चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की अनुशंसा करने वाले पैनल में सरकार, विपक्ष के एक-एक प्रतिनिधि के साथ भारत के मुख्य न्यायाधीश होते थे। लेकिन अब उसमें सरकार के दो प्रतिनिधि होंगे और विपक्ष का एक प्रतिनिधि। वैसे तो न्यायपालिका के संघ परिवार द्वारा आन्तरिक क़ब्ज़े के बाद के हालात में मुख्य न्यायाधीश भी सरकारी प्रतिनिधि जैसा बर्ताव ही करते, इसकी गुंजाइश ही ज़्यादा है! जैसे कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त ने ज्ञानेश कुमार की बेटी डी.एम. मेधा रूपम को बचाने के लिए नोएडा मज़दूर आन्दोलन सम्बन्धी एक याचिका को स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए एक ऐसी बेंच के सामने भेज दिया जो मेधा रूपम को नोएडा के मज़दूर कार्यकर्ताओं पर नाजायज़ तरीक़े से रासुका थोपने के कारण लगे भारी जुर्माने से राहत देती और ऐसा ही हुआ! इसी प्रकार, जस्टिस सूर्यकान्त ने अपने कार्यकाल में अब तक ही जो गुल खिला दिये हैं, वह लम्बे समय तक जनस्मृति में दर्ज रहेगा। बहरहाल, निष्पक्षता के किसी दिखावे को भी त्यागते हुए अब केन्द्रीय चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को पूरी तरह से सरकार की इच्छा पर निर्भर बना दिया गया है। ऐसे में, कोई भी चुनाव आयुक्त आये वह भाजपा का टट्टू ही होगा, जैसा कि पिछले कुछ चुनाव आयुक्त सिद्ध कर चुके हैं।

इसके अलावा, केन्द्रीय चुनाव आयुक्त अपने इन कुकर्मों के लिए कभी किसी आपराधिक मुक़दमे का सामना करके जेल की हवा न खाएँ इसके लिए विपक्ष के 140 से ज़्यादा सांसदों को निलम्बित कर मोदी–शाह सरकार ने एक नया क़ानून ही बना दिया कि “अपने कर्तव्यों के निर्वाह” में केन्द्रीय चुनाव आयुक्त कुछ भी करे, उस पर कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती है!

कुल मिलाकर, देश की समूची चुनावी पद्धति, प्रणाली, संस्थाओं और प्रक्रियाओं के पूँजीवादी जनवादी चरित्र को भी भाजपा की मोदी-शाह सरकार ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। सच है कि पूँजीवादी समाज में चुनावों में भी धनबल हावी होता है। आम तौर पर जिस पूँजीवादी पार्टी के पीछे देश का पूँजीपति वर्ग खड़ा होता है, आम जनता के दिमाग़ में उसी के प्रति समर्थन और सहमति का पूँजीवादी मीडिया घरानों, अखबारों, रेडियो, टीवी आदि द्वारा निर्माण किया जाता है। ऐसे में, जनता वोट अवश्य देती है, लेकिन आम तौर पर उसके पास कोई वास्तविक विकल्प, यानी पूँजीवादी विकल्पों के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। इसमें ज़्यादा से ज़्यादा जनता सत्ताधारी पूँजीवादी पार्टी को उसकी पूँजीपरस्ती और श्रमिक-विरोधी होने के लिए दण्डित कर, पूँजीपरस्ती करने का अधिकार अगले पाँच वर्ष किसी अन्य पूँजीवादी पार्टी को दे सकती है और इस प्रक्रिया में उसे कुछ तात्कालिक राहत, कुछ ख़ैरात, कुछ पैबन्दसाज़ी हासिल हो सकती है। फ़ासीवाद यह अधिकार भी जनता से छीनता जाता है।

हमारे तात्कालिक कार्यभार

हिटलर की नात्सी पार्टी और मुसोलीनी की फ़ासीवादी पार्टी ने पूँजीवादी जनवाद को ख़त्म करने का और जनता के पूँजीवादी जनवादी अधिकारों को निरस्त करने का फ़ासीवाद का यह प्रकार्य जर्मनी और इटली में चुनावों और मताधिकार पर ही खुली पाबन्दी लगाकर किया था। इसका नतीजा यह हुआ था कि अन्त में हिटलर और मुसोलीनी की जनता ने न सिर्फ़ सरकारी सत्ता से विदाई की, बल्कि उनकी राज्यसत्ता से और यहाँ तक कि जीवन से ही उनकी विदाई कर दी! आज के फ़ासीवादियों ने अपने इन पुरखों की ग़लतियों से सबक लिया है। उनकी समझ में यह बात आयी है कि आज के दौर में कहीं भी खुले तौर पर चुनावों, संसद, विधानसभा, मत देने के अधिकार आदि पर पाबन्दी नहीं लगायी जा सकती है, बशर्ते कि आप अपना अन्त हिटलर या मुसोलीनी जैसा नहीं चाहते। आज पूँजीवादी जनवाद के खोल/रूप को त्यागना हानिकर होगा और यह फ़ासीवादियों की हार और उनके अन्त को केवल उनके सरकारी सत्ता से बाहर होने तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि उन्हें इतिहास के रंगमंच से ही लम्बे समय तक उठाकर बाहर फेंक देगा, जैसा कि जर्मन नात्सीवाद और इतालवी फ़ासीवाद के साथ हुआ था। इसलिए अब पूँजीवादी जनवाद के खोल/रूप को बरक़रार रखा जाता है जबकि उसकी अन्तर्वस्तु को फ़ासीवादी शक्तियाँ निरन्तर पगुराती और चबाती जाती हैं और उसका निरन्तर ह्रास होता रहता है।

यह प्रक्रिया कभी पूर्णता तक नहीं पहुँच सकती, बल्कि एक सतत् जारी प्रक्रिया का स्वरूप धारण करती है। पूँजीवादी व्यवस्था का पूँजीवादी जनवादी रूप औपचारिक तौर पर बना रहता है, मगर उसकी राजनीतिक अन्तर्वस्तु सतत् क्षरण और ह्रास की अवस्था में रहती है। इसी वजह से क्षरण और ह्रास की प्रक्रिया कभी पूर्णता पर नहीं पहुँचती। वजह यह कि पूँजीवादी जनवाद के खोल/रूप को बरक़रार रखने की बाध्यता एक प्रति-गति, यानी विपरीत दिशा में भी एक गति पैदा करती है, जिसके कारण यह प्रक्रिया अपनी सीमाओं से टकराती है। ऐसे दौरों में, फ़ासीवादी शासन व सरकार बुरी तरह से अलोकप्रिय हो जाते हैं और उनका सरकारी सत्ता से बाहर होना सम्भव हो जाता है। आज हम ऐसे ही दौर में जी रहे हैं।

फ़ासीवादी मोदी सरकार अभूतपूर्व रूप से अलोकप्रिय हो चुकी है और उसके ख़िलाफ़ जनता के विभिन्न वर्ग और हिस्से बार-बार सड़कों पर उतर रहे हैं। जनता के प्रतिरोध की लहर पर सवारी करते हुए कोई अन्य पूँजीवादी पार्टी या पूँजीवादी पार्टियों का गठबन्धन 2029 के आम चुनावों में सत्ता में पहुँच सकता है। इस सम्भावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी तभी सम्भव होगा, जब आम मेहनतकश जनता एक प्राथमिक क़दम के तौर पर एसआईआर को रद्द करने, एसआईआर के बाद हुए सारे राज्य चुनावों को रद्द कर पुन: पुरानी वोटर लिस्ट पर चुनावों को आयोजित कराने, नये युवा वयस्क वोटरों का तत्काल पंजीकरण करवाने (जिस काम को फ़ॉर्म-6 में बदलाव करके मोदी–शाह सरकार ने लगभग नामुमकिन बना दिया है), ईवीएम पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने और आने वाले सभी चुनाव बैलट पेपर से करवाने की माँगों को लेकर, यानी समूची चुनावी मशीनरी के फ़ासीवादी भ्रष्टीकरण को रद्द करने की माँगों को लेकर सड़कों पर उतरकर संघर्ष नहीं करती। किसी भी अन्य पूँजीवादी या टुटपुँजिया पूँजीवादी दल में यह शक्ति नहीं है कि सड़कों पर उतरकर तृणमूल स्तर से निर्मित एक शक्तिशाली जनान्दोलन खड़ा करे और उसे जुझारू तरीक़े से विजय प्राप्त होने तक चलाये। यह याद दिलाना ज़रूरी है कि अगर फ़ासीवादी भाजपा 2029 में चुनव हार कर सरकारी सत्ता से बाहर भी हो जाये, तो राज्यसत्ता के समूचे उपकरण पर उसके आन्तरिक क़ब्ज़े की समाप्ति नहीं होगी। न ही समाज के पोरों में उनकी व्याप्ति और घुसपैठ की समाप्ति होगी। ये दोनों घुसपैठ, समाज में और राज्यसत्ता के उपकरण में, पिछले 100 वर्षों में और विशेष तौर पर पिछले लगभग 75 वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संस्थाबद्ध कार्य के ज़रिये की गयी है। यह महज़ भाजपा के सरकारी सत्ता से अस्थायी तौर पर बाहर होने पर समाप्त नहीं होगी। पहले भी नहीं हुई है। दीर्घकालिक आर्थिक संकट के दौर में समाज में विशेष तौर टुटपुँजिया यानी निम्न मध्यवर्गों में मौजूद सामाजिक व आर्थिक असुरक्षा और अनिश्चितता बार-बार एक अन्धी प्रतिक्रिया का माहौल पैदा करने की सम्भावना पैदा करेंगे, जो क्रान्तिकारी शक्तियों की दख़लन्दाज़ी के बिना बार-बार वास्तविकता में तब्दील होगी। यही अन्धी प्रतिक्रिया फ़ासीवादियों को बार-बार सरकार में सत्तारोहण करने का अवसर देगी और हर बार फ़ासीवादी प्रतिक्रियावादी टुटपुँजिया सामाजिक आन्दोलन और भी ज़्यादा उग्र रूप में उभरेगा और फ़ासीवादी शक्तियाँ और भी प्रबलता से सरकारी सत्ता में पहुँचेंगी। पूँजीपति वर्ग मन्दी के दौर में अपनी समूची आर्थिक शक्तिमत्ता को फ़ासीवादी पार्टी के समर्थन में खड़ा करेगा क्योंकि मन्दी उसे किसी भी प्रकार के राजनीतिक उदारवाद, मध्यमार्ग आदि की इजाज़त लम्बे समय तक नहीं देगी। पूँजीपति वर्ग की आर्थिक शक्ति के समर्थन और टुटपुँजिया वर्गों के प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन और साथ ही एक सदी में राज्यसत्ता के उपकरण और समाज के ताने-बाने में की गयी संस्थाबद्ध घुसपैठ के ज़रिये फ़ासीवादी पार्टी फिर-फिर सरकारी सत्ता में पहुँचेगी। इस पूरे दौर को हम उत्तरवर्ती पूँजीवाद के दीर्घकालिक संकटग्रस्तता का प्रतिक्रियावादी दौर कह सकते हैं, जिसमें उन सभी देशों में जहाँ फ़ासीवादी विचारधारा से लैस और काडर–आधारित फ़ासीवादी संगठन मौजूद होगा, वहाँ फ़ासीवादी शासन और सरकार बार–बार स्थापित होंगे। अब फ़ासीवाद का निर्णायक अन्त समाजवादी मज़दूर क्रान्ति के साथ ही सम्भव है। यहाँ यह ज़िक्र करना ज़रूरी है कि फ़ासीवाद के ये मंसूबे उस सूरत में ही कामयाब होते हैं, जिसमें क्रान्तिकारी शक्तियाँ कमज़ोर और बिखरी हुई होती हैं, मज़दूर वर्ग असंगठित होता है, मज़दूर आन्दोलन में सर्वहारा विचारधारा और राजनीतिक लाइन का अभाव होता है। यदि कोई क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी मौजूद होती है तो वह फ़ासीवादी विचारधारात्मक और राजनीतिक प्रचार का जवाब देते हुए व्यापक टुटपुँजिया व मध्यवर्ग की आबादी में यह स्पष्ट कर सकती है कि उसके जीवन में मौजूद सामाजिक व आर्थिक असुरक्षा व अनिश्चितता पूँजीवादी व्यवस्था के तोहफ़े हैं, उसका दुश्मन कोई मुसलमान, कोई प्रवासी, कोई यहूदी आम आदमी नहीं है, बल्कि पूँजीवाद और पूँजीपति वर्ग है, कि धर्म और आस्था पूरी तरह से व्यक्तिगत मसला होते हैं और उनका सामाजिक और राजनीतिक जीवन में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, कि उन्हें समाजवादी व्यवस्था में ही पक्की नौकरी, इज़्ज़त-आसूदगी की ज़िन्दगी, बेहतर समान व निःशुल्क शिक्षा, चिकित्सा, आवास का अधिकार मिल सकता है। इस क्रान्तिकारी राजनीतिक व विचारधारात्मक प्रचार को अधिकतम सम्भव सूक्ष्म, व्यापक और विकसित रूप में और रचनात्मक रूप में आयोजित करके क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी जनता के वर्गों, यानी मज़दूर वर्ग, शहरी व ग्रामीण अर्द्धसर्वहारा वर्ग व मध्यवर्ग के बीच एक क्रान्तिकारी संयुक्त मोर्चा बना सकती है, एक फ़ासीवाद-विरोधी जुझारू जनान्दोलन खड़ा कर सकती है और समाजवादी क्रान्ति की दिशा में व्यापक मेहनतकश जनता की अगुवाई कर सकती है।

लेकिन ये सारे कार्यभार पूर्ण करने के लिए क्रान्तिकारी शक्तियों को ज़मीन पर हरेक राजनीतिक जनवादी अधिकार के लिए क़दम-क़दम पर लड़ना होगा, जिसमें मताधिकार विशेष महत्व रखता है। उसे हर जगह जनवादी स्पेस के लिए संघर्ष करना होगा। उसे हर वर्ग व समुदाय के जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा। यही वह ज़मीन तैयार करता है, जिस पर क्रान्तिकारी मज़दूर संगठन व्यापक मेहनतकश जनता को समूची पूँजीवादी व्यवस्था के ध्वंस के लिए संगठित कर सकता है। इसलिए आज फ़ासीवादी शक्तियों को सरकारी सत्ता से बाहर करने का संघर्ष हमारे लिए एक महत्वपूर्ण तात्कालिक राजनीतिक कार्यभार है। यह क्रान्तिकारी शक्तियों और क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग को एक मोहलत देगा कि वह अपने आपको भावी निर्णायक संघर्षों के लिए व्यापक मेहनतकश जनता को जागृत, गोलबन्द और संगठित कर सके। इसके लिए एसआईआर व समूचे चुनावी घपले द्वारा जनता के सबसे बुनियादी राजनीतिक जनवादी अधिकारों में से एक, यानी वोट देने के अधिकार के अपहरण के विरुद्ध जुझारू और ज़मीनी संघर्ष करना होगा। एक नयी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के संघर्ष की ज़मीन तैयार करने के लिए यह अनिवार्य है।

यह आज फ़ासीवाद–विरोधी मज़दूर वर्गीय कार्यभारों में प्रमुख तात्कालिक कार्यभार है। पूरे देश की जनता में एसआईआर और ईवीएम के विरुद्ध गहरी भावना है। उसके अन्दर मौजूदा मोदी-शाह सरकार के विरुद्ध भारी गुस्सा और नफ़रत है। वह महँगाई, बेरोज़गारी, पहुँच से दूर होती शिक्षा, परीक्षा घोटालों, भुखमरी, ग़रीबी और भ्रष्टाचार से त्रस्त है। इन समस्याओं का समाधान पूँजीवादी व्यवस्था के दायरे में सम्भव नहीं है। लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने और मेहनतकशों की सत्ता और समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के संघर्ष को एक क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी के नेतृत्व में संगठित करने का पहला तात्कालिक क़दम ही फ़ासीवादी शक्तियों को सरकारी सत्ता से बाहर करना है। यह क्रान्तिकारी सर्वहारा संगठन को अपनी शक्तियों को संचित करने, उन्हें पंक्तिबद्ध करने और निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार करने का अवसर देगा। और फ़ासीवादी शक्तियों को सरकारी सत्ता से बाहर करना पहला अहम तात्कालिक कार्यभार है और इसके लिए आज के दौर में सबसे पहले भाजपा सरकार द्वारा लागू एसआईआर, उसके द्वारा किये जा रहे ईवीएम घोटाले और मतगणना हेर-फेर के विरुद्ध सड़कों पर उतरना होगा।

 

मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026

 

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