स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फिर की खोखले दावों, अनगिनत झूठों और बेहिसाब जुमलों की बरसात
छात्र-युवा आन्दोलन से बौखलायी फ़ासीवादी मोदी सरकार अपने डर को छिपाने में नाकामयाब साबित हो रही है!
यही वक़्त है जब क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग को संगठित व सचेतन फ़ासीवाद-विरोधी जुझारू जनान्दोलन की तैयारी में तत्काल जुटना चाहिए!

सम्पादकीय अग्रलेख

इस बात को साबित करने की अब कोई ज़रूरत नहीं है कि फ़ासीवादी मोदी सरकार छात्र-युवा आन्दोलन से बुरी तरह से बौखलायी हुई है। यह बौखलाहट हर बीतते दिन के साथ और भी नंगे तौर पर सामने आ रही है। जहाँ एक तरह ‘जेन ज़ी आउटरीच’ के नाम पर नौजवानों को लुभाने के बेतरह असफल प्रयास भाजपाई और आरएसएस के लोग कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ युवा आन्दोलन से खौफ़ज़दा फ़ासीवादी सत्ता पुलिस-प्रशासन की समस्त मशीनरी का इस्तेमाल करके आन्दोलन में शामिल युवाओं का दमन करने से भी पीछे नहीं हट रही है। कुलमिलकर कहें तो भाजपा-संघ परिवार समझ नहीं पा रहे हैं कि आख़िर करें तो करें क्या, बोलें तो बोलें क्या! दरअसल यह इस आन्दोलन का ही डर था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 15 अगस्त के अपने भाषण में अपने राजनीतिक विरोधियों और आंदोलनरत युवाओं के लिए एक नया ‘तमगा’ ईजाद करना पड़ा: “दिमाग़ी नक्सल”!  यह ‘तमगा’ पहले से मौजूद उसी लम्बी-चौड़ी सूची में नवीनतम इज़ाफ़ा है जिसका इस्तेमाल भारतीय फ़ासीवादी हर प्रकार के विरोध को अवैध ठहराने के लिए उसकी ब्राण्डिग के तौर पर करते आये हैं: “अर्बन नक्सल”, “टुकड़े-टुकड़े गैंग’, “आन्दोलनजीवी”, “एण्टी-नेशनल”, “पाकिस्तानी एजेण्ट”, “चाइना फण्डेड” इत्यादि इत्यादि! हालाँकि इस बार इस तरह के तीन-तिकड़म भी काम नहीं आ रहे हैं। तमाम लोग सोशल मीडिया पर आकर गर्व से अपनी पहचान “दिमाग़ी नक्सल” के तौर पर बता रहे हैं और बे-दिमाग़ संघी अन्धभक्तों का जमकर मज़ाक़ उड़ा रहे हैं।

जून के महीने में शुरू हुआ छात्र-युवा आन्दोलन वैसे अभी भी जारी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में कॉलेज-विश्वविद्यालयों के छात्रों व आम नौजवानों के बाद अब स्कूली बच्चों के आन्दोलन भी स्वतःस्फूर्त तरीक़े से बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए शुरू हो गये हैं। पिछले 12 सालों में अरबों रुपये बहाकर जो “महामानव” की छवि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गढ़ी थी, वह इन बहादुर युवाओं ने एक महीने के भीतर धूलधूसरित कर दी। यह वही फ़ासीवादी सरकार थी जो दावा करते नहीं थकती थी कि हमारे शासन में इस्तीफ़े नहीं होते हैं! लेकिन इस जुझारू आन्दोलन ने इस सरकार के एक मंत्री का न सिर्फ़ इस्तीफ़ा करवाया बल्कि नरेन्द्र मोदी के आभामण्डल को भी चकनाचूर करके रख दिया। इन मायनों में यह आन्दोलन को मिली एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक जीत है। लेकिन इससे भी ज़्यादा जो बात ध्यान देने लायक है वह यह है कि यह आन्दोलन उस गुस्से और असन्तोष की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति था जो पिछले 12 सालों में इस देश की जनता और विशेषकर बेरोज़गारी और चौपट हो चुकी शिक्षा-परीक्षा व्यवस्था की मार झेलते नौजवानों में इक्कट्ठा हो रहा था। आन्दोलन को मिले व्यापक जन समर्थन से भी इस बात को समझा जा सकता है जब विशेषकर मेहनतकश जनता के हिस्सों ने इस संघर्ष को हर प्रकार की मदद पहुँचाने की कोशिश की। विशेष तौर पर मज़दूर वर्ग की युवा आबादी, जिसका एक विचारणीय हिस्सा अब ‘गिग वर्कर’ के तौर पर काम कर रहा है, आन्दोलन का अपने तरीक़ों से समर्थन कर रही थी। हमें वैसे भी यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि एक ‘जेन ज़ी’ मज़दूर वर्ग के भीतर भी मौजूद है। इस युवा मज़दूर आबादी ने अभी हाल ही में स्वतःस्फूर्त तरीक़े से देश के अलग-अलग औद्योगिक केन्द्रों में अपनी बेहद बुनियादी माँगों के लिए आन्दोलन छेड़े थे जिसका बर्बर दमन भाजपा सरकारों ने किया। ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश के नोएडा औद्योगिक क्षेत्र में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने मज़दूर आन्दोलन को कुचलने के लिए जो आतंक राज क़ायम किया उसे कोई भी मज़दूर नहीं भूल सकता है और न ही उसे भूलने की ग़लती करनी चाहिए।

बहरहाल भारतीय हुक्मरानों की बौखलाहट की सबसे नयी मिसाल प्रधानमंत्री मोदी के 15 अगस्त के भाषण में देखने को मिली। इसके साथ ही जुमलों और खोखली बयानबाज़ियों की भी कोई कमी मोदी जी के सम्बोधन में नहीं दिखलाई पड़ी। जब भी किसी को लगता है कि हमारे ‘विश्वगुरु’ की खोखली बयानबाज़ी की आदत अब इससे बदतर नहीं हो सकती, तभी “महामानव” एक नया चमत्कार दिखाकर हमें जुमलेबाज़ी की एक और मिसाल पेश करके चौंका देते हैं! दरअसल, जब अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने ऊंचे स्वर में “देश की अपनी क्षमताओं के शिखर तक पहुँचने” की बात कही, तो दरअसल वह जनता को गुमराह करने के लिए इस्तेमाल में लायी जाती रही अपनी झूठ बोलने की क्षमताओं के शिखर तक पहुँचने की बात कर रहे थे! हालाँकि अब देश की आम जनता ने भाजपा और नरेन्द्र मोदी द्वारा झूठ की इस लगातार बौछार को पहचानना सीख लिया है और वे हर बीतते दिन के साथ अपने अधिकारों पर होने वाले फ़ासीवादी हमले की असलियत को भाँप रही है।

प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण का केन्द्रीय बिन्दु, जो सबसे अधिक चर्चा में रहा, वह उनके द्वारा गढ़ा गया नया शब्द “दिमाग़ी नक्सल” था। वास्तव में छात्र-युवा आन्दोलन से बुरी तरह भयभीत होकर और अपने फ़ासीवादी शासन के ख़िलाफ़ बढ़ते जन-असंतोष की लहर को रोकने की ही कोशिश में “प्रधानसेवक” द्वारा  यह नया शब्द खोज निकाला गया है। यह उन छात्रों और आम युवाओं को बदनाम करने का वही पुराना घिसा-पिटा कल्पनाविहीन तरीक़ा है, जिन्होंने हाल के प्रदर्शनों में बढ़चढ़कर भागीदारी की थी। साथ ही, यह फ़ासीवादी शासन के राजनीतिक विरोधियों का नया नामकरण भी है जिसका दायरा लगातार विस्तारित होता गया है। यह फ़ासीवाद की ख़ासियत है जो कि नक़ली दुशमन का हौव्वा खड़ा करके, उसका अन्यीकरण करके धीरे-धीरे इस श्रेणी में हर प्रकार के विरोध को समेटता जाता है। इस “दुश्मन” की श्रेणी में कम्युनिस्ट, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, छात्र-युवा कार्यकर्ता, न्यूनतम मज़दूरी और बेहतर कार्यस्थितियों के लिए संघर्ष करते मज़दूर, रोज़गार माँगते नौजवान, परीक्षाओं में धाँधली के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले छात्र आदि सब शामिल हैं। यानी आज जो कोई भी हक़ के लिए लड़ रहा है, जो कोई भी अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ा है, जो कोई भी बेहतर शिक्षा, रोज़गार, चिकित्सा, आवास का अधिकार माँग रहा है, वह इस फ़ासीवादी निज़ाम की नज़रों में “दिमाग़ी नक्सल” है!

तो मज़दूर साथियो सावधान! नरेन्द्र मोदी जो वास्तव में कहना चाहते हैं वह यह है: आज के दौर में जो भी शिक्षा और रोज़गार के अधिकार की बात करेगा, जीवनयापन योग्य मज़दूरी और निश्चित काम के घण्टों के अधिकार की बात करेगा, मुसलमानों और दलितों के ख़िलाफ़ लगातार बढ़ रहे अत्याचारों की बात करेगा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर होने वाले हमलों की बात करेगा, कील-जड़े डण्डों और पैलेट गनों से बर्बरता का शिकार हुए युवाओं के पक्ष में बात करेगा, स्त्रियों के ख़िलाफ़ बढ़ते अपराधों की बात करेगा, सार्वजनिक उपक्रमों और प्राकृतिक संसाधनों को पूँजीपतियों को कौड़ियों के भाव बेचे जाने के विरोध में बात करेगा यानी आम जनता के जीवन से जुड़े किसी भी मुद्दे की बात करेगा—वे सभी फ़ासीवादी भाजपा और संघ परिवार की निगाहों  में “दिमाग़ी नक्सल” हैं!

हालिया छात्र-युवा आन्दोलन की प्रमुख उपलब्धियों नें से एक यह रही कि इसने आम जनता के व्यापक हिस्सों को निष्क्रियता की स्थिति से जगाने का काम किया और मोदी-शाह शासन द्वारा संचालित “हिन्दू-मुसलमान” और “मन्दिर-मस्जिद” की साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति के नक़ली मुद्दों को नकारते हुए उनके बरक्स आम जनता के वास्तविक मुद्दों को एक हद तक विमर्श के केन्द्र में फिर से स्थापित करने का काम किया, इसलिए फ़ासीवादी ताक़तों की बौखलाहट स्वाभाविक ही है। और चूँकि फ़ासीवादियों के पास उठाये जा रहे सवालों के कोई जवाब नहीं हैं, इसलिए उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने के लिए नये-नये राजनीतिक शब्द गढ़ने की अपनी पुरानी तरकीब का सहारा लेना पड़ रहा है और झूठे दावे करने पड़ रहे हैं कि यह देशविरोधी तत्व देश में “हिंसा और अराजकता” फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। ग़ौरतलब है कि देश की “सीमाओं के भीतर” होने वाले युद्ध की बात भी नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में की। लेकिन सबसे पहले मोदी जी को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि यह युद्ध कौन छेड़ रहा है और किसके ख़िलाफ़ छेड़ रहा है? पिछले 12 सालों का लेखा-जोखा निकालकर देख लिया जाये तो यह मोदी-शाह हुकूमत है जिसने देश में आतंक और हिंसा का माहौल क़ायम किया है, जिसकी लम्पट गुण्डा वाहिनियों ने कभी “लव जिहाद” तो कभी “गौ रक्षा” के नाम पर मुसलमानों का जीवन दूभर कर दिया है, जिसकी ट्रोल आर्मी ने सोशल मीडिया पर लड़कियों को बलात्कार, एसिड अटैक, हत्या तक की धमीकियाँ देकर उन्हें आतंकित करने का काम किया है, जिसकी आततायी पुलिस ने हर शान्तिपूर्ण आन्दोलन में निहत्थे मज़दूरों-नौजवानों को बर्बर दमन का निशाना बनाया है। दरअसल यह ख़ुद मोदी सरकार है जिसने पिछले 12 सालों में एक युद्ध छेड़ रखा है देश की अवाम के ख़िलाफ़!

प्रधानमंत्री के इसी भाषण में कई ढींगे भी हाँकी गयी, एक ऐसी कला जिसमें हमारे “महामानव” महामानवीय प्रतिभा से लैस हैं! कोविड महामारी के दौरान उत्पन्न संकटों और पश्चिम एशिया में अमेरिका तथा इज़रायल द्वारा थोपे गये साम्राज्यवादी युद्ध के कारण तेल और गैस की आपूर्ति के संकट से निपटने में अपनी सरकार की “उपलब्धियों” का बखान करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने उन आलोचकों को भी फटकार लगायी जो महज़ असहमति व्यक्त करने के लिए भारतीय जनता को “डराने और आतंकित करने” की कोशिश करते हैं!

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का यह दावा क्या उन हज़ारों आम लोगों का मज़ाक़ नहीं है, जो महामारी के दौरान ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में बिस्तरों की अनुपलब्धता और आवश्यक दवाओं की अत्यधिक क़ीमतों के कारण मारे गये—और यह सब उस समय हुआ जब मोदी-शाह सरकार बाबा रामदेव के कोरोनिल की प्रशंसा करने में व्यस्त थी! यह कहने की ज़रूरत नहीं कि मृतकों की एक बड़ी संख्या को मृत घोषित किये जाने की गरिमा तक नहीं मिली। आँकड़ों को छिपाने और डाटा में भारी हेरफेर करने के लिए मोदी सरकार कुख्यात है। हालाँकि तमाम स्वतंत्र पत्रकारों द्वारा की गयी जाँच और कई स्वास्थ्य पत्रिकाओं द्वारा लगाये गये अनुमानों, सरकारी आँकड़ों में विसंगतियों, लकड़ी की कमी के कारण अन्तिम संस्कारों को टाले जाने और गंगा के किनारों पर बहकर आये शवों से महामारी की विभीषिका और मोदी सरकार की आपराधिक लापरवाही का वास्तविक पैमाना सामने आ जाता है। इसके अलावा क्या पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण पैदा हुए संकट से शर्मनाक इनकार उन हज़ारों आम लोगों का अपमान नहीं है, जो लगातार बढ़ती महंगाई का ख़ामियाज़ा भुगत रहे हैं? वास्तव में यह संकट उन कारणों में से एक था जिसने मज़दूरों को नोएडा, मानेसर, पानीपत से लेकर सूरत और बरौनी तक देशभर में सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया। दरअसल प्रधानमंत्री का भाषण आम लोगों की दुख-तकलीफ़ों के प्रति मोदी सरकार की भयंकर संवेदनहीनता को दर्शाने का ही काम करता है। आम जनता के जीवन की भौतिक परेशानियों से इस सरकार का कोई लेना-देना नहीं है, उल्टे ऐसे खोखले दावे करके यह उनका मखौल उड़ाती है।

तो हमारे “विश्वगुरु”के अनुसार देश की आम जनता को अपनी ऊर्जा किस काम में लगानी चाहिए? “राष्ट्र के निर्माण” में! वही “राष्ट्र” जिसके केन्द्र में अम्बानी-अडाणी समेत देशी-विदेशी पूँजीपतियों का अकूत मुनाफ़ा है और इसी मुनाफ़े की दर को बरक़रार रखने और बढ़ाने के लिए देश की आम मेहनतकाश आबादी को पेट पर पट्टी बाँधकर और मुँह पर ताला लगाकर चुपचाप बिना कोई शिकायत किये हाड़तोड़ मेहनत करते रहनी चाहिए! “50 दिनों” और “60 महीनों” की अपनी पिछली समय-सीमाओं से एक उल्लेखनीय छलांग लगाते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने अब 2047 का टारगेट निर्धारित किया है! मोदी जी ने अपने भाषण में ‘सप्तधारा’ सूत्र भी पेश किया और जनता से “कार्य संस्कृति में बदलाव”(!) लाने तथा विनिर्माण, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, प्रौद्योगिकी और नवोन्मेष, अवसंरचना आदि क्षेत्रों में “विकास” में योगदान देने की अपील की। तो वास्तव में प्रधानमंत्री क्या कहना चाहते हैं? यही कि पूँजीपति वर्ग की तरक़्क़ी ही राष्ट्र की तरक़्क़ी है! पूरे भाषण में मोदीजी जनता को पूँजीवादी कम्पनियों की समृद्धि में वृद्धि का हवाला देकर “विकास” की कहानी पर विश्वास करने के लिए कहते हैं! दूसरे शब्दों में, आम मेहनतकश जनता के लिए उनका आह्वान यह है कि वे इन क्षेत्रों में काम करने वाले पूँजीपतियों के मुनाफ़े की दर को बढ़ाने के लिए कारख़ानों और मिलों में दिन-रात अपनी कमर तोड़ती रहे! “महामानव मोदी जी” ने निकट भविष्य में 50 भारतीय कंपनियों को फॉर्च्यून 500 की सूची में शामिल होते देखने का सपना भी देखा! कितना महान सपना है! स्पष्ट है कि फ़ासीवादी भाजपा के लिए “राष्ट्रीय हित” और कुछ नहीं, बल्कि उनके पूँजीपति आकाओं के हित हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने दूसरे देशों को हथियारों की आपूर्ति पर भी अपनी पीठ थपथपायी, लेकिन इस बात का उल्लेख नहीं किया कि आयातकों की सूची में सेटलर उपनिवेशवादी-ज़ायनवादी इज़रायल भी शामिल है! एक ऐसी नरसंहारकारी राज्यसत्ता का समर्थन करने पर हमें किस तरह का गर्व महसूस करना चाहिए, जो हज़ारों-लाखों बेगुनाह लोगों की अंधाधुंध हत्या कर रही है, जिसमें बड़े पैमाने पर औरतें और बच्चे शामिल हैं? एक बार फिर स्पष्ट हो जाता है कि हमारे देश की फ़ासीवादी सत्ता की हर प्रकार के दमनकारी शासकों से कितनी करीबी है। दरअसल “राष्ट्र-निर्माण” का अर्थ बस इतना है कि अडाणी और अम्बानी जैसे छोटे से अल्पसंख्यक शोषणकारी वर्ग के लिए और भी बड़ी तिजोरियाँ और धन-सम्पत्ति का निर्माण किया जाये और ज़रूरत पड़े तो यह प्रकार्य नरसंहार में भाग लेकर भी सम्पन्न किया जाये!

लेकिन आम मेहनतकश जनता का क्या, आप पूछेंगे? उन्हें तो बस “राष्ट्र-निर्माण” में योगदान देने की भावना से सन्तुष्ट रहना चाहिए, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति में उलझे रहना चाहिए और शासक वर्ग द्वारा उन पर किये जाने वाले दमन, उत्पीड़न और हिंसा को चुपचाप सहना चाहिए! और अगर वे ऐसा नहीं करते, तो वे “दिमाग़ी नक्सल” हैं! जो भी बुद्धिहीन बे-दिमाग़ अंधभक्त बनने को तैयार नहीं है, उसपर फ़ासीवादी सत्ता “दिमाग़ी नक्सल” का ठप्पा लगा देगी!

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में इस तरह की दिखावटी घोषणाओं के साथ कई सफ़ेद झूठ भी बड़ी चालाकी से मिला दिये। “हमने 25 करोड़ लोगों को ग़रीबी से बाहर निकाला है!” मोदीजी ने घोषणा की, लेकिन यह  बताने का कष्ट भला वह कैसे उठाते कि ग़रीबी निर्धारित करने के मानदण्डों और जीवनयापन के सबसे बुनियादी मानकों का ही मज़ाक़ उनकी सरकार ने बना दिया है! अर्थव्यवस्था “तेज़ रफ्तार” से आगे बढ़ रही है, मोदीजी एक बार फिर झूठों की बौछार करते हुए बोले, लेकिन रिकॉर्ड स्तर पर बेरोज़गारी और लगातार बढ़ती महँगाई पर एक शब्द “महामानव” के मुँह से नहीं निकला! उन्होंने “सार्वजनिक परिवहन को पुनर्जीवित करने” और “हाइड्रोजन से चलने वाले लोकोमोटिव” बनाने की बात भी की जबकि स्वयं सरकारी आँकड़े भारत में हर साल रेल दुर्घटनाओं से सम्बन्धित 21,000 से अधिक मौतों की ओर संकेत करते हैं। नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में सभी राजनीतिक दलों को आरक्षण लागू करके “महिलाओं का सम्मान करने” का उपदेश भी दिया, जबकि अपनी ही पार्टी में ऐसे स्त्रीद्वेषी तत्वों का वह खुलकर समर्थन करते हैं जो स्त्री-विरोधी अपराधों में संलिप्त पाये गये हैं और जो बलात्कारियों का सेवा-सत्कार करते हैं। वैसे ख़ुद मोदीजी का इस विषय में ट्रैक रिकॉर्ड कोई बहुत अच्छा नहीं है! मोदीजी ने अपने वक्तव्य में “शून्य बिजली शुल्क” का दावा भी किया, जबकि सच्चाई यह है कि बिजली आपूर्ति के एक महत्वपूर्ण हिस्से की बागडोर उनकी सरकार ने अपने पूँजीपति मित्रों को सौंप दी है, जिसके परिणामस्वरूप बिजली के बिलों में भारी वृद्धि हुई है। यानी एक बार फिर खोखले दावों, अनगिनत झूठों और बेहिसाब जुमलों की बरसात!

इन सबके बीच प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में आम मज़दूरों-मेहनतकशों, छात्रों-युवाओं व आम नागरिकों के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण और ग़ौर करने लायक बात है वह है ‘सिविल डिफ़ेन्स फोर्स’ बनाने का प्रस्ताव। यह एक बेहद ख़तरनाक फ़ासीवादी क़दम है। यह भारतीय फ़ासीवादियों द्वारा नात्सी जर्मनी में SS ब्रिगेड (SS Brigade) की तर्ज़ पर एक फ़ासीवादी अर्धसैनिक बल गठित करने की दिशा में उठाया गया क़दम है। एसएस (SS) का पूरा नाम शूट्जस्टाफेल (Schutzstaffel) था, जिसका जर्मन में अर्थ ‘सुरक्षा दस्ता’ या ‘प्रोटेक्शन स्क्वाड्रन’ होता है। यह हिटलर और नात्सी पार्टी के तहत एक प्रमुख अर्धसैनिक संगठन था। इन ब्रिगेडों का इस्तेमाल मुख्य रूप से राजनीतिक  विरोधियों को कुचलने और बड़े पैमाने पर नरसंहार को अंजाम देने के लिए किया जाता था। आज जब मोदी-शाह सत्ता एक ऐसी ‘डिफ़ेन्स फोर्स’ खड़ी करने की बात करती है तो वह दरअसल संघी दंगाई लम्पट गिरोहों को ही सरकारी मान्यता और उनके द्वारा अंजाम दी जा रही हिंसा को वैधता प्रदान करने का प्रयास है। साथ ही, दमन-उत्पीड़न के वे नंगे हथकण्डे जिनका इस्तेमाल पुलिस नहीं कर सकती है, अब इस फ़ासिस्ट मिलिशिया से करवाया जायेगा। इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि ऐसी फ़ासीवादी शक्ति पहले से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके अनुषंगी संगठनों के रूप में मौजूद है। यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि इस देश में हथियारों, त्रिशूलों, तलवारों के साथ सड़कों पर खुलेआम रैलियाँ निकालनी की आज़ादी और अधिकार भी इस फ़ासीवादी गिरोह के पास पहले से है। इसलिए ‘सिविल डिफ़ेन्स फ़ोर्स’ का गठन करने का उद्देश्य क़ानूनी तौर पर इन गुण्डा वाहिनियों को हिंसा करने का प्राधिकार देना है। असहमति की आवाज़ों  को दबाने और सभी राजनीतिक विरोधियों को कुचलने के लिए हर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े का इस्तेमाल अब क़ानून सम्मत होगा! इसलिए मोदीजी को यह स्पष्ट करने की ज़रूरत भी नहीं कि यह “नागरिक सुरक्षा” किसके ख़िलाफ़ लड़ेगी और किस क़ानूनी अधिकार के तहत लड़ेगी क्योंकि अब हर कोई जवाब जानता है! हालाँकि स्वतंत्रता दिवस के सम्बोधन के दौरान चुपके से इस ‘सिविल डिफ़ेन्स फोर्स’ का उल्लेख किया जाना न सिर्फ एक बार फिर फ़ासीवादी हुक्मरानों के डर और बौखलाहट को उजाकर करता है बल्कि यह घोषणा तमाम न्यायप्रिय लोगों के लिए चेतावनी भी होनी चाहिए। सवाल तो यह भी उठता है कि जब समाज के एक हिस्से को, यानी फ़ासीवादी गिरोहों को, हथियारबन्द होकर आम लोगों को आतंकित कर हिंसा फैलाने का अधिकार है तो फिर आम मेहनतकश अवाम को फ़ासीवादी दंगाइयों से अपने सुरक्षा करने के लिए ‘पब्लिक डिफेंस कमेटियाँ’ बनाने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए? इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है और यह सर्वथा न्यायसंगत बात है।

कुलमिलाकर, झूठों और जुमलों की इस बाढ़ के बावजूद आम जनता अब इन धोखों के धुएँ के पर्दे को भेदकर सच्चाई देखने में पहले से कहीं अधिक सक्षम है। पिछले 12 वर्षों में फ़ासीवादी भाजपा की जनविरोधी नीतियों के कारण झेले गए कष्टों और तकलीफ़ों ने आनुभविक तौर पर आम लोगों को फ़ासीवादी सत्ता की राजनीति और विचारधारा की असलियत से एक हद तक अवगत कराया है। हालिया छात्र-युवा आन्दोलन हिंदुत्ववादी फ़ासीवादी सत्ता और पूँजी के नग्न एवं बर्बर शासन के ख़िलाफ़ एक दीर्घकालिक और व्यापक जनान्दोलन की केवल शुरुआत है। चुप्‍पी का टूटना स्‍वागत-योग्‍य है लेकिन एक सचेत शासक वर्ग और उसके सुनियोजित शोषण व दमन के तंत्र के विरुद्ध न्‍याय का संघर्ष भी अन्‍तत: विजयी तभी हो सकता है, जब वह भी सचेत हो, उसके पास भी नेतृत्‍व, विचार और कार्यक्रम हो, योजना हो, अनुशासन हो। इसलिए स्‍वत:स्‍फूर्तता से आगे कार्यक्रम, नेतृत्‍व और योजनाबद्धता, यानी चेतनासम्‍पन्‍नता की ओर बढ़ना होगा। यह समझना आज बेहद आवश्यक है कि बिना सचेतन, संगठित और अनुशासित क्रान्तिकारी लामबन्दी के फ़ासीवाद की विषबेल को मुक्कमल तौर पर ख़त्म नहीं किया जा सकता है। देश के मज़दूर वर्ग की इस ऐतिहासिक कार्यभार को सम्पन्न करने में अग्रणी और महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए आने वाले समय के संघर्ष के लिए हमें आज से ही तैयारी शुरू करनी होगी और चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी कमर कसनी होगी।

हम ‘मज़दूर बिगुल’ के पिछले अंक के सम्पादकीय के उन शब्दों को यहाँ फिर दुहरायेंगे जहाँ हमने मज़दूर साथियों से कहा था कि किस प्रकार  हम मज़दूरों के बीच सत्ताधारी अपने विचारों की घुसपैठ करके यह बताने का काम करते हैं कि मज़दूरों के मसले शिक्षा या चिकित्सा या किसी अन्य जनवादी-नागरिक अधिकार से जुड़े नहीं होते हैं! हमें इस तरह की बातों में कभी नहीं आना चाहिए और हर संघर्ष में व्यापक छात्र-युवा-मज़दूर एकता क़ायम करने की तरफ बढ़ना चाहिए। वैसे भी क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग केवल अपनी संकीर्ण आर्थिक माँगों के लिए नहीं लड़ता। वह समूची मानव-मुक्ति और पूँजीवाद से आज़ादी के लिए लड़ता है। नतीजतन, क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग को हर जन-संघर्ष में भागीदारी करनी चाहिए, उसे क्रान्तिकारी दिशा देनी चाहिए चाहे वह छात्रों का हो, युवाओं का हो, स्त्रियों का हो, किसी भी दमित व शोषित आबादी का हो।

कहने की आवश्यकता नहीं कि आज का सर्वाधिक आवश्यक और फौरी कार्यभार एक सचेतन क्रान्तिकारी फ़ासीवाद-विरोधी जनान्दोलन का निर्माण करना है। भारत के मज़दूर वर्ग की इस कार्यभार को पूरा करने में महती भूमिका है। समाज में स्वतःस्फूर्त छात्र-युवा आन्दोलन से पैदा हुई ऊष्मा को हमें ज़ाया नहीं होने देना है, हमें इसे एक क्रान्तिकारी मोड़ देना होगा। विचारधारात्मक तौर पर सुदृढ़ एक संगठित क्रान्तिकारी नेतृत्व का निर्माण करने की दिशा में हमें तत्काल अग्रसर होना होगा, एक ऐसा नेतृत्व जो सुनियोजित व सुव्यवस्थित कार्यक्रम, क्रान्तिकारी राजनीतिक चेतना, सूझबूझ व अनुशासन और क्रान्तिकारी रणनीति और रणकौशल से लैस हो। इस ज़रूरी कार्यभार का दायित्व भारत के मज़दूर वर्ग पर सबसे अधिक है।

 

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026

 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन