हॅंगामा है क्यों बरपा, गाली ही तो दी है!

नौरीन

हैलो फ़्रैण्ड्स! जी चाहता है कि मोदी जी द्वारा दिये गये अब तक के सारे ‘कल्चरल शॉक्स’ को लिख दूँ। लेकिन एक वस्तुगत समस्या है। मोदी जी द्वारा ‘कल्चरल शॉक’ देने की कोई सीमा नहीं है लेकिन आप जानते हैं कि अख़बारों में शब्दों की सीमा होती है। इसलिए हम इस सीमा में रहकर ही प्रधानसेवक की भद्रता का मुखौटा उठाने की कोशिश करेंगे।

31 जुलाई की आधी रात को प्रधानमंत्री की रील के साथ-साथ भारतीय राजनीति में एक बेहद ही ज़रूरी मुद्दे की एण्ट्री हो गयी। महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, पेपर लीक, परिक्षाओं में धाँधली जैसे ग़ैर-ज़रूरी मुद्दों को पीछे छोड़ते हुए अचानक “भाषाई हाइजीन” अत्यावश्यक और बेहद संजीदा मुद्दा बनकर सामने आ गया। कहाँ तो देश में यह बहस होनी चाहिए थी कि 20 जुलाई को देश की राजधानी दिल्ली में शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर दिल्ली पुलिस द्वारा आँसू गैस के गोले क्यों छोड़े गये? कील लगी लाठियों से क्यों मारा गया? निहत्थे छात्रों पर पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया था? बिना नेमप्लेट के पुरुष पुलिसकर्मियों ने महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बदतमीज़ी क्यों की ? इसका ज़िम्मेदार कौन है? लेकिन हो इसका ठीक उल्टा रहा है। गोदी मीडिया से लेकर सरकार की पूरी मशीनरी पेपर लीक के ख़िलाफ़ हुए आन्दोलन में शामिल छात्रों को चुन-चुन कर निशाना बना रही है। ऐसे अभिनेता और अभिनेत्री जिनका मुँह 20 जुलाई को छात्रों पर हुए बर्बर हमले के बाद भी नहीं खुला अब वे भी भाषा की शुद्धता पर लेक्चर दे रहे हैं! जो लोग कल तक माँ-बहन की गालियाँ देते नहीं थक रहे थे, आज इन गालियों को सुनकर उनकी भावनाएँ आहत होती जा रही हैं!

कुल मिलाकर, एक तरफ़ भाजपा और आरएसएस के आईटी सेल से लेकर सरकार की पूरी मशीनरी और गोदी मीडिया मिलकर अपनी एकमुश्त ताक़त के साथ इस आन्दोलन को बदनाम करने और यह नेरेटिव फैलाने कि आन्दोलन में सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रधानमंत्री को भद्दी-भद्दी गालियाँ दी गयी, की कोशिश में लग गये हैं, तो दूसरी तरफ़ इन गालियों को बहाना बनाकर प्रदर्शन में शामिल छात्रों के ऊपर एफ़आईआर दर्ज करके उनका ‘विच हण्ट’ और फ़ासीवादी दमन का कुचक्र जारी है। “भाषाई हाइजीन” के नाम पर दिल्ली पुलिस बदले की भावना से अपने राजनीतिक स्वामियों, यानी मोदी-शाह सरकार की शह पर, आन्दोलनकारी छात्रों-छात्राओं का उत्पीड़न करने का काम कर रही है।

भद्रता का मुखौटा हटाइए मोदी जी!

तानाशाह को भी सबसे ज़्यादा चिढ़ लोगों की हँसी से होती है। जब लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं, उससे होती है। 15 साल के छात्रों की गालियों से 56 इंच की सरकार घबरा गयी है! मोदी जी रील बनाकर संस्कृति की दुहाई दे रहे हैं। महामानव  इतने सुसभ्य और शालीन हैं कि छात्रों के व्यंग्य से क्षुब्ध होकर मूल मुद्दे को ही गोल कर रहे हैं! कितनी हास्यास्पद बात है कि जो प्रधानमंत्री महिलाओं को जर्सी गाय कहते हैं अब वह नैतिकता और संस्कृति की दुहाई दे रहे हैं। 15 – 16 साल के छात्रों द्वारा दी गयी गालियों को ‘कल्चरल शॉक’ बताने वाले नरेन्द्र मोदी जी को यह भी बताना चाहिए कि भरी सभा में सोनिया गांधी को जर्सी गाय, सुन्नदा पुष्कर को 55 करोड़ की गर्लफ्रेण्ड कहना क्या है? क्या प्रधानमंत्री इसके लिए माफ़ी माँगेंगे। क्या यह अभद्र भाषा नहीं है? भद्रता का मुखौटा हटाइये मोदी जी! जिन गालियों से आपको ठेस पहुँच रही है उनसे भी अधिक घटिया गालियों को संसद में खड़े होकर प्रचलित करने का काम आपकी ख़ुद की पार्टी के नेता रमेश बिधूड़ी ने किया है। 2023 में रमेश बिधूड़ी ने संसद में खड़े होकर मुसलमानों को भद्दी-भद्दी गालियाँ दी थीं। लेकिन आज तक आपको रमेश बिधूड़ी की गालियों से ‘कल्चरल शॉक’ तो छोड़िए कोई छोटी-मोटी फुरफुरी भी नहीं मची, फिर बिधूड़ी पर कोई कार्रवाई की बात तो बहुत दूर की है! गली के लोफरों-लफ़ंगों के स्टैण्डर्ड की भाषा बोलने वाले असम के मुख्यमंत्री की गालियों से आजतक आपकी भावनाएँ आहत नहीं हुई।

अब तो आप इन्स्टाग्राम पर रील पर रील बनाकर डाल रहे हैं। काफ़ी सक्रिय भी हो गये हैं तो इतना तो आपको पता ही होगा कि आये दिन बीजेपी की पूरी ट्रोल आर्मी महिलाओं को उनके कमेण्ट बॉक्स में जाकर खुलेआम रेप करने की धमकी देती है, उनको आपसे भी ज़्यादा भद्दी-भद्दी गालियाँ दी जाती हैं। इतना ही नहीं उनकी फ़ोटो को ‘बुल्ली बाई’, ‘सुल्ली डील्स’ जैसे ऐप पर डालकर उनकी निलामी की जाती है। क्या वह अभद्रता और अश्लीलता के दायरे में नहीं आता है? क्या इससे हमारी संस्कृति में चार चाँद लगते हैं? मुझे यक़ीन है कि यह सब आपको अच्छी तरह पता होगा। फिर प्रधानमंत्री जी आप इसपर क्यों नहीं कुछ बोलते हैं? एक 15 साल की लड़की की पहचान को सार्वजनिक करके उसको धमकाने, उसके ऊपर एफ़आईआर दर्ज करवाने, उससे माफ़ी मँगवाने, उसका घर खाली करवाने से अगर आपको फ़ुर्सत मिल गयी हो तो आप यह बताने का कष्ट करेंगे कि वे तमाम आईटी सेल के कुण्ठित, बलात्कारी मानसिकता वाले लोग जो आये दिन सोशल मीडिया पर लड़कियों को रेप करने और जान से मारने की धमकी देते हैं, जिनको स्वयं आप सोशल मीडिया पर फॉलो करते हैं उन पर एफ़आईआर कब होगी? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि ये लोग आपकी ‘कल्चरल हेरिटेज’ का हिस्सा हैं!

असली समस्या क्या है?

गाली देना अच्छा है या नहीं इसका पैमाना कभी यह नहीं हो सकता कि गाली कौन दे रहा है और किसको दे रहा है।  अगर गाली देना ग़लत है तो यह प्रधानमंत्री के ऊपर भी लागू होगा और जनता के ऊपर भी। लेकिन अगर स्वयं प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और भाजपा के तमाम नेता सार्वजनिक मंचों से खड़े होकर अपने विरोधियों को स्त्री-विरोधी, साम्प्रदायिक और जाति सूचक गालियाँ देंगे फिर वे यह उम्मीद कैसे कर रहे हैं कि उनको ये गालियाँ कभी नहीं पड़ेंगी। ख़ैर! हो सकता है कि एण्टायर पालिटिकल साइंस वाले कोर्स में “बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय” नहीं पढ़ाया गया हो!

15-15, 16-16 साल के नौजवानों की भाषा पर जो लोग बवाल काट रहे हैं उन्हें ये समझना चाहिए कि ये बच्चे आज अपने असन्तोष और विरोध को अभिव्यक्त करने के लिए जो वैचारिक व राजनीतिक रूप से शब्द भण्डार उनके पास सहज उपलब्ध है, उसमें ही अपनी बात कह रहे हैं और वह भी व्यंग्य के रूप में। इसके अलावा जिन लोगों को लगता है कि प्रधानमंत्री को समस्या गालियों से है वे किसी म़ुगालते में हैं। प्रधानमंत्री को समस्या गालियों से नहीं है और न ही कभी हो सकती है। ऐन मुमकिन है कि अगर यही गालियाँ आरएसएस, आईटी सेल, गोदी मीडिया, प्रधानमंत्री स्वयं अपने विरोधियों को देते तो इस पर हंगामा नहीं होता बल्कि इसे प्रधानमंत्री का अंदाज़-ए-बयां कहा जाता है। अब समस्या यह है कि हज़ारों-करोड़ों रुपये लगाकर जिन गालियों को प्रचलित करवाया गया था ताकि उसका इस्तेमाल अपने विरोधियों को शान्त करने के लिए किया जा सके वही गालियाँ आज पलट कर ख़ुद प्रधानमंत्री को पड़ रही हैं! यही वजह है कि अब इसको नैतिकता की चाशनी में डुबोकर संस्कृति की दुहाई देकर अपने आप को ‘विक्टिम’ बनाकर सहानुभूति लेने की कोशिश की जा रही है। लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि इतने सालों से जो आपने अपने विरोधियों के लिए ‘इकोसिस्टम’ तैयार किया था अगर उसी ‘इकोसिस्टम’ से दो-चार गालियाँ आपको पड़ गयी हैं तो इतना हैरान होने की ज़रूरत नहीं है।

इसके अलावा, अरबों रुपए ख़र्च करके नरेन्द्र मोदी की जो महामानव की छवि और फ्यूहरर कल्ट गढ़ा गया था,  उसको मौजूदा छात्र-युवा आन्दोलन ने धराशायी कर दिया है। इतने सालों से यह बात लोगों के दिमाग़ में बैठायी जा रही थी कि प्रधानमंत्री ‘नॉन बायोलॉजिकल’ हैं! उनसे कोई सवाल नहीं कर सकता। वह भगवान के अवतार हैं! उस छवि को भी इस आन्दोलन ने ध्वस्त कर दिया है। 15 साल के छात्र आँखों में आँखें डालकर इस सरकार से और ख़ास तौर पर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का नाम लेकर उनसे सवाल कर रहे हैं। इससे फ़ासीवादी मोदी सरकार को गहरा धक्का लगा है। 15-16 साल के छात्रों पर एफ़आईआर दर्ज करना, उनकी पोस्ट को हटाना और उनको ऑनलाइन ट्रोल करवाना बीजेपी और आरएसएस की इसी बौखलाहट को दिखाता है। फ़ासिस्ट स्वतंत्र स्त्रियों से भय-मिश्रित घृणा से भरे होते हैं! वे उन्हें डरावनी और संस्कृति-विनाशक प्रतीत होती हैं! इसीलिए लड़कियों का गाली देना प्रधानमंत्री को थोड़ा ज्यादा चुभ रहा है। वैसे तो ‘लड़कियों का गाली देना कल्चरल शॉक नहीं बल्कि लड़कियों को गाली देना कल्चरल शॉक होना चाहिए’। लेकिन हम जानते हैं कि हमारे देश में आजकल उलटी गंगा बह रही है! अभी हाल ही में छात्र अपने ऊपर हुई बर्बरता के लिए अमित शाह से माफ़ी की माँग कर रहे थे लेकिन बदले में मोदी जी आकर बच्चों को ही माफ़ करके चले गये! लड़कियों का गाली देना आरएसएस और भाजपा को इसलिए भी चुभ रहा है क्योंकि यह लोग ‘मनुस्मृति’ के समर्थक हैं। वही ‘मनुस्मृति’ जो स्त्रियों को पैरों की जूती और बच्चा पैदा करने की मशीन समझती है। इन फ़ासीवादियों को यह बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं है कि लड़कियाँ बिना अपने भाई, पति, पिता के सहारे के अपने हक़ों के लिये लड़ रही हैं। भयमुक्त होकर सरकार से सवाल कर रही हैं। जन्तर-मन्तर पर चले इस आन्दोलन ने इस पितृसत्तात्मक मानसिकता वाले संघियों के प्रभुत्व को भी चुनौती दी है। इसलिए सरकार की बौखलाहट लाज़मी है।

अगर सच में यह सरकार भाषा को लेकर इतनी संजीदा है और उसे लगता है कि गाली देना ग़लत है तो उसे इस ग़लती को सुधारने की शुरुआत अपनी पार्टी और संगठन से करनी चाहिए। मोदी जी को भाजपा में मौजूद तमाम बलात्कारियों को पार्टी से निकाल देना चाहिए। कंगना रनौत के ऊपर एफ़आईआर करनी चाहिए जो बच्चों को ‘गटर जेनरेशन’ कह रही है। असम के मुख्यमंत्री हेमन्त बिस्व शर्मा, रमेश बिधूड़ी, कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर समेत दर्जनों भाजपा नेताओं के ऊपर कार्रवाई करनी चाहिए और स्वयं महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश से माफ़ी माँगनी चाहिए और तत्काल इस्तीफ़ा देना चाहिए। इसके अलावा आरएसएस का विचारक टीजी मोहनदास जो ये कहता है कि जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन में शामिल महिलाएँ रेप इंजॉय करती हैं, को गिरफ़्तार करना चाहिए और दिन भर जो आरएसएस-भाजपा के आईटी सेल के टट्टू महिलाओं का हैरेसमेण्ट करने, उन्हें रेप करने की धमकी देने का काम करते हैं उनके उपर एफ़आईआर करके उन्हें जेल भेजना चाहिए। लेकिन हम सब जानते हैं कि इसमें से कुछ भी नहीं होने वाला है। इस बात के कोई भी आसार दूर–दूर तक नज़र नहीं आते कि भाजपा और आरएसएस के गालीबाज़ों पर कोई कार्रवाई होगी। फिर ‘भाषाई हाइजीन’ का ढोंग क्यों किया जा रहा है? हम सब जानते हैं कि यह सिर्फ़ इसलिए किया जा रहा है ताकि प्रदर्शनकारियों की आवाज़ों को दबाया जा सके और शान्तिपूर्ण विरोध को बदनाम किया जा सके। मोदी सरकार शायद यह भूल गयी है कि ‘पेड़ बोए बबूल के तो आम कहाँ से खाए’!

 

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026

 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन