असम में बाढ़ से 100 से ज़्यादा लोगों की मौत, लाखों लोग प्रभावित
प्रकृति को दोष देकर फ़ासीवादी हुक्मरान अपने निकम्मेपन को नहीं छिपा सकते

आनन्द व सनी

असम में लगभग हर साल बाढ़ आती है जिससे लोगों का जीवन और उनकी आजीविका अस्त-व्यस्त हो जाती है। लेकिन इस बार असम में बाढ़ का स्वरूप और उससे होने वाली तबाही का पैमाना बिल्कुल अलग ही स्तर पर जा पहुँचा। इस साल असम 1950 के दशक के बाद की सबसे भीषण बाढ़ का साक्षी बना जिसका अंदाज़ा कुछ आँकड़ों से लगाया जा सकता है। एक महीने के भीतर असम में बाढ़ से 100 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गयी, 600 से ज़्यादा गाँव और 3 लाख से ज़्यादा लोग इस बाढ़ की चपेट में आ गये। क़रीब 50 हज़ार हेक्टेयर के खेत भी बाढ़ में डूब गये और उनमें लगी फसलें स्वाहा हो गयीं। लोगों के घर, सड़कें और रेलमार्ग तक बाढ़ के कहर से नहीं बच सके। बाढ़ में डूबने से इंसानों के अलावा बड़ी संख्या में पशुओं की भी मौत हो गई। बाढ़ का सबसे ज़्यादा असर ऊपरी असम के शिवसागर और चराइदेव ज़िलों में हुआ जहाँ 18-19 जुलाई के बीच अचानक जल प्रलय जैसी स्थिति पैदा हो गयी। कहने की ज़रूरत नहीं कि बाढ़ का सबसे बुरा असर ग़रीबों और मेहनतकशों की ज़िन्दगी पर हुआ क्योंकि उनके घर सबसे निचले और नदियों के सबसे क़रीबी हिस्सों में पड़ते हैं और उनके पास बाढ़ की स्थिति में किसी अन्य स्थान पर जाने के साधन नहीं उपलब्ध होते हैं। जलस्तर के उतरने के साथ अब भी लाशों का मिलना जारी है और मृतकों की संख्या अभी भी बढ़ रही है। लोग भूख और बीमारी से त्रस्त हैं। कुछ जगह राहत सामग्री लोगों तक पहुँचने लगी है पर जिस पैमाने पर खेतों, घरों, मवेशियों का नुकसान हुआ है उसकी भरपाई नहीं हो सकेगी।

हर बार की तरह इस बार भी असम के मुख्यमंत्री ने बाढ़ को कुदरती आपदा बताते हुए कुछ आर्थिक मुआवज़े की घोषणा करके इतनी भयानक आपदा में अपनी सरकार की ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। यही नहीं, राहत सामग्री देने में भी भाजपा सरकार साम्प्रदायिक नीति अपना रही है और संघ और भाजपा से इतर ज़मीनी स्तर पर राहत कार्य में जुटे संगठनों और व्यक्तियों को परेशान कर रही है। आपदा को रोकने की नीति, उसे भांपने का विज्ञान और राहत देने की तकनीक मौजूद होने के बावजूद इतने बड़े पैमाने पर लोगों की जान इसलिए गयी क्योंकि भाजपा सरकार ने आम जनता के लिए आपदा और राहत की व्यवस्था के ढांचे को ही ख़त्म करने का काम किया है और आपदा रोकने की हर नीति को कूड़ेदान के हवाले किया है। ऐसे में यह सवाल उठाना लाज़िमी हो जाता है कि इस आपदा के लिए कुदरत को ज़िम्मेदार बताना कहाँ तक उचित है!

इसमें कोई दो राय नहीं कि असम की भौगोलिक परिस्थिति वहाँ बाढ़ जैसे हालात पैदा करने में अहम भूमिका निभाती है। दुनिया में सबसे ज़्यादा जल बहाव वाली नदियों में से एक और हिमालय से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र नदी असम के बीचो-बीच गुज़रती है। असम के आसपास भूटान, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड और मेघालय की पहाड़ियों से निकलने वाली तमाम सहायक नदियाँ व धाराएँ भी ब्रह्मपुत्र में मिलकर उसके जलप्रवाह को विस्तार देती हैं। आम तौर पर भी नदियाँ मानसून के वक़्त सालाना बाढ़ को जन्म देती हैं लेकिन इंसानी जीवन पर बाढ़ से पड़ने वाला प्रभाव प्रकृति की नहीं बल्कि मौजूदा पूँजीवादी विकास के मॉडल की देन है। बरसात में नदियाँ पानी और गाद से फूलकर अपने आम पथ का अतिक्रमण करते हुए बाढ़क्षेत्र तक फैल जाती हैं और कई बार उस सीमा को भी पार कर देती हैं। पहाड़ों पर जंगलों के सफ़ाये व कोयले, पत्थर व बालू के बेरोकटाक खनन के चलते पहाड़ खोखले और नंगे होते चले गये हैं जिसके चलते ज़मीन का कटाव बढ़ता चला गया है, जलगहण क्षेत्र बर्बाद होता गया है और नदीपथ के कमज़ोर होने के साथ उनकी पर्वतीय ढ़लान बढ़ गयी है। पहाड़ों में खनन, सुरंग, बाँध और रास्ते काटने के चलते एक तरफ़ नदियों में गाद की मात्रा का भी आधिक्य हुआ है और दूसरी तरफ़ नदी-पथ भी विकृत होता गया है। पूँजीवाद के चलते पैदा हुए पर्यावरणीय परिवर्तनों का प्रभाव मानसून पर भी पड़ा है। अब बरसात का पानी पूरे मौसम में अचानक केवल एक-दो दिन के अन्दर बरस पड़ता है जिस वजह से नदियों में आकस्मिक बाढ़ जन्म लेती है।

हालाँकि जहाँ तक असम में बाढ़ का प्रश्न है तो वहाँ इस दी हुई भौगोलिक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए यदि उस समूचे क्षेत्र के पारिस्थिति तंत्र में असन्तुलन पैदा किये बिना विकास की गतिविधियों को योजनाबद्ध ढंग से अंजाम दिया जाये तो बाढ़ की विभीषिका पर काफ़ी हद तक काबू किया जा सकता है। परन्तु चूँकि पूँजीवादी विकास समाज के हित में न होकर मुट्ठी भर धन्नासेठों के हित में किया जाता है इसलिए बाढ़ जैसी आपदा को रोकने और उससे निपटने की कोई समग्र और दूरगामी योजना नहीं बनायी जाती जिसका खा़मियाज़ा पूरे समाज को बाढ़ के प्रकोप व पर्यावरण विनाश के रूप में झेलना पड़ता है।

 असम में इस बार की बाढ़ और इसकी वजह

असम में हेमन्त बिस्व शर्मा की भाजपा सरकार बाढ़ के लिए अपनी सरकार की नीतियों और लापरवाही से ध्यान भटकाने के लिए बाढ़ को प्राकृतिक आपदा क़रार दे रही है। मुख्यमंत्री कभी बादल फटने तो कभी नागालैण्ड में खनन व निर्माण पर दोष मढ़ अपनी सरकार को दोषमुक्त सिद्ध कर रहे हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री नड्डा असम दौरा करके बता रहे हैं कि बाढ़ तो प्राकृतिक आपदा है और सरकार से करिश्मे की उम्मीद न की जाये! भाजपा सरकार और गोदी मीडिया के लिए असम में हुई बाढ़ से मौतें केवल आँकड़े हैं जिन्हें वे तराज़ू में रखकर नेहरू और भाजपा-पूर्व सरकारों के दौर के आँकड़ों से नापने का खेल खेल रहे हैं। हमें बताया जा रहा है कि आज़ादी के पहले से असम में लोग बाढ़ में मरते रहे हैं और इसपर हैरत में पड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है। मुख्यमंत्री हेमन्त शर्मा प्रधानमंत्री मोदी जी से अपील करते हुए असम बाढ़ को ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने का जुमला छोड़ रहे हैं और कह रहे हैं कि वैज्ञानिक उन्हें बताएं कि बाढ़ को कैसे रोका जाए! पिछले 50 सालों से अधिक समय से वैज्ञानिकों द्वारा असम में बाढ़ के प्रभाव को न्यूनतम करने और मानव जीवन पर उससे पड़ने वाले प्रभावों को नगण्य करने की नीतियों का प्रस्ताव मौजूद है लेकिन सरकारें ऐसी रिपोर्टों का तकिया बनाकर सोती रहती हैं। पिछले एक दशक में मोदी सरकार ने एक ओर प्रकृति के दोहन में हर अवरोध को बेशर्मी से ख़त्म किया है तो दूसरी ओर आपदा बचाव व राहत की व्यवस्था के ढाँचे को समाप्त किया है जिसका परिणाम पिछले कुछ सालों में पंजाब, कश्मीर व अन्य राज्यों में आयी विनाशकारी बाढ़ के रूप में दिखायी दिया और अब इस साल असम की बाढ़ के रूप में दिखायी दे रहा है। आलम यह है कि दिल्ली में बाढ़ में नाले में डूबकर करण्ट लगने से लोगों की मौत हो रही है। गुडगांव से लेकर नोएडा तक में मौहल्ले, हाईवे से लेकर हवाई अड्डे तक जलमग्न हो गये। यही हाल मुम्बई, पुणे, सूरत, चेन्नई और अन्य शहरों का है। शहरों में बाढ़ नयी परिघटना है जिसमें सबसे अधिक तबाही ग़रीब बस्तियों में मचती है। हालाँकि पूरे देश के साथ शहरों में भी बाढ़ की आवर्तिता और तीव्रता पिछले एक दशक में बढ़ी है।

ऐसे में सवाल उठता है कि असम में बाढ़ की वजह क्या है? असम में आमतौर पर बाढ़ वहाँ मानसून की भीषण वर्षा के कारण ब्रह्मपुत्र नदी के अपने किनारों के पार फैल जाने की वजह से आती है। परन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि इस साल असम में मानसून की बारिश सामान्य से लगभग 30 प्रतिशत कम हुई है। इसके बावजूद भी अगर असम के लोगों को बाढ़ की विभीषिका का सामना करना पड़ रहा है तो इसका अर्थ यह हुआ कि केवल असम में हुई वर्षा के आधार पर असम में आयी बाढ़ को नहीं समझा जा सकता है। वास्तव में इस बार हुआ यह कि पड़ोसी राज्य नागालैण्ड के मोन, वोखा और मोकोकचुंग जैसे पहाड़ी स्थानों में हुई भीषण वर्षा की वजह से ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों—दिखौ, दिसांग, जंजी और धनसेरी—में जलप्रवाह के बढ़ने की वजह से असम में अचानक बाढ़ आयी। यही वजह है कि जहाँ पहले निचले असम में बाढ़ से तबाही ज़्यादा होती आयी है, वहीं इस बार तबाही ऊपरी असम में हुई है। सबसे ज़्यादा तबाही शिवसागर, जोरहाट, चराइदेव और गोलाघाट जैसे ऊपरी असम के ज़िलों में हुई क्योंकि ब्रह्मपुत्र की उपरोक्त सहायक नदियाँ ब्रह्मपुत्र में मिलने से पहले नागा पहाड़ियों से होते हुए इन ज़िलों से होकर गुज़रती हैं। नागालैण्ड में बहुत कम समय में हुई भीषण बारिश को जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखा जा रहा है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से वहाँ इतनी ज़्यादा बारिश नहीं होती आयी है। कहने की ज़रूरत नहीं कि जलवायु परिवर्तन स्वयं अन्धाधुन्ध पूँजीवादी विकास की ही परिणति है।

लेकिन ऊपरी असम और नागालैण्ड में ​भीषण बारिश महज़ एक ट्रिगर था। दरअसल इसके पीछे कई ढाँचागत कारक काम कर रहे थे। इस बार बाढ़ को भयावह बनाने में नागा पहाड़ियों में स्थित जंगलों की बड़े पैमाने पर कटाई की बड़ी भूमिका रही है। हम सभी जानते हैं कि जंगल एक विशाल स्पंज की भाँति वर्षा के जल को सोखते हैं और उसके बड़े हिस्से को ढलान से बह जाने के बजाय ज़मीन के नीचे रिसने देते हैं जिससे एक ओर भूजल का स्तर बढ़ता है और दूसरी ओर नदियों और धाराओं के बहाव की रफ़्तार घटती है जिससे पहाड़ियों की तलहटी और मैदानी इलाकों में विशाल मात्रा में पानी इकट्ठा नहीं होता है और वहाँ बाढ़ की सम्भावना कम हो जाती है। परन्तु विकास के नाम पर जंगलों की बड़े पैमाने पर हो रही अन्धाधुन्ध कटाई की वजह से पहाड़ों में हो रही वर्षा का पानी बेरोकटोक तेज़ रफ़्तार से ढलान से होता हुआ मैदानी इलाकों में बाढ़ का सबब बनता है। पहाड़ों में जंगल सड़क बनाने, खनन, और बाज़ार में लकड़ी की माँग पूरा करने के लिए बेरोकटोक काटे जा रहे हैं। यह सरकारी और ग़ैर-सरकारी, क़ानूनी और गैर-क़ानूनी दोनों रास्तों से हो रहा है और नेता-मंत्रियों की क्षत्रछाया में हो रहा है।

जंगलों की बेहिसाब कटाई के अलावा असम-नागालैण्ड की सीमा के आसपास हो रहा बेरोकटोक अवैध खनन भी इस बार की बाढ़ के प्रमुख कारणों में से एक है। दिखौ जैसी ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों के तल पर अवैध रूप से पत्थरों और बालू के खनन की वजह से उस नदी के प्राकृतिक बहाव के पथ में हाल के वर्षों में भारी बदलाव हो गया है जिसकी वजह से आसपास की पहाड़ियों में बड़े पैमाने पर मिट्टी के क्षरण होने से बाढ़ की सम्भावना बढ़ गयी है। इसी प्रकार अवैध रूप से कोयले के खनन की वजह से उस इलाक़े में बड़े-बड़े गड्ढे अस्तित्व में आये जिनमें बारिश का पानी भर जाता है और जो बाद में दिखौ जैसी नदियों में मिलकर पानी की मात्रा में ज़बर्दस्त इज़ाफ़ा करता है। पहाड़ों पर चूहे के बिल के आकार में आड़ी सुरंगों से कोयले की परतों तक पहुँचने की रैट-होल खनन तकनीक ने पर्वतों को खोखला कर दिया है। इसके साथ ही ओपन-कट खनन तकनीक पहाड़ की सतह को पूरी तरह खोदकर वनस्पति और पर्वत की ऊपरी परत को उघाड़ देती है। खोखले और नंगे पर्वत तेज़ बारिश में ढह जाते हैं। यह कोयला खनन सरकारी और निजी, वैध और अवैध दोनों रास्तों से हो रहा है। काटके कमिशन की रिपोर्ट के अनुसार सरकारी नॉर्थ ईस्ट कोलफिल्ड्स विभाग ने ही 487.2 करोड़ रुपये का कोयला अवैध तौर पर बेचा है। कोयला माफि़या के ट्रक असम में बेरोकटोक घूमते हैं। कोयला माफि़या ज़्यादातर चायबागान के मालिकों और ईंट भट्टे के मालिकों को कोयला बेचते हैं जिनसे भाजपा को चुनावी चन्दा प्राप्त होता है।

इसके अलावा पहाड़ी इलाक़ों में पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर अन्धाधुन्ध ढंग से सड़कों और होटलों का निर्माण भूस्खलन की घटनाओं को बढ़ाता है जिससे नदियों का प्रवाह अनियंत्रित हो जाती है। पहाड़ी इलाक़ों से नदियों द्वारा भारी मात्रा में लाया गया गाद भी बाढ़ की विभीषिका बढ़ाने में बड़ी भूमिका अदा करता है क्योंकि उसकी वजह से नदियों का तल ऊपर होता जाता है और नदियों का पानी किनारों से बाहर की ओर फैल जाता है और बाढ़ जैसी त्रासदी पैदा होती है। नदियों में भारी मात्रा में पानी के बहाव की वजह से उनके तटबन्ध टूट जाते हैं जिससे बाढ़ बहुत तेज़ी से फैल जाती है।

उपरोक्त कारणों को जानने के बाद यह स्पष्ट है कि विकास का पूँजीवादी मॉडल बाढ़ जैसी आपदा को जन्म देता है और उसकी भयावहता को बढ़ाने का काम करता है। यदि विकास का लक्ष्य मुट्ठी भर धनिकों का मुनाफ़ा न होकर आम लोगों की ज़िन्दगी की ज़रूरतें पूरी करना हो तो बा़ढ़ जैसी विभीषिका को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। पिछले कई दशकों के दौरान तमाम पूँजीवादी पार्टियों के नेता-मंत्री हर साल असम में बाढ़ को काबू में करने के लम्बे-चौड़े वायदे करते हैं, परन्तु ज़मीन पर ये वायदे कहीं भी अमल में होते हुए नहीं दिखते क्योंकि इन नेता-मंत्रियों के तार जंगलों की कटाई, खनन और होटल व्यवसाय में लिप्त माफ़ियाओं से जुड़े हैं जो इन चुनावबाज़ पार्टियों को फ़ण्ड करते हैं। फ़ासीवादी भाजपा के डबल इंजन शासन में असम व उत्तर-पूर्व में बाढ़, भूस्खलन सहित अन्य प्रकार की पर्यावरण विनाश की रफ़्तार और तेज़ होती गयी है। असम में पिछले 10 सालों से भाजपा की सरकार है और इस समय उत्तर-पूर्व के अधिकांश राज्यों में एनडीए की सरकारें हैं। चुनाव प्रचारों के दौरान केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह और असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने असम को बाढ़ मुक्त करने के वायदे किये और अपने चुनावी घोषणापत्र में भी इस वायदे को दोहराया। लेकिन फ़ासीवादियों को असम सहित समूचे उत्तर-पूर्व में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ाने की साज़िशें रचने से फ़ुरसत ही कहाँ है कि वे बाढ़ जैसी समस्या का निवारण करने के बारे में सोचें!

हक़ीक़त यह है कि मोदी सरकार के 2014 में सत्तासीन होने के बाद से ही पूरे देश में प्रकृति की लूट बेहद अधिक त्वरण के साथ हो रही है। कुदरत की लूट के रास्ते से हर क़ानूनी बाधा को धड़ल्ले से हटा दिया गया है। असम की बाढ़ के कुछ दिन बाद ही ‘मां गंगा के पुत्र’ की सरकार ने गंगा के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण की रोक को हटाने का काम किया है! जब विपदा आती है तो भाजपा नेताओं द्वारा नेहरू और कांग्रेस पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया जाता है। असम के मुख्यमंत्री ने बाढ़ पर जवाबदेही से बचने का सबसे आसान रास्ता निकाला है। वह आसान रास्ता है धड़ल्ले से झूठ बोलने का! हेमंत शर्मा ने पहले कहा कि पूरे असम में कोयले की खानों से कोयला निकाला ही नहीं जाता है! फिर कहा कि सब नागालैण्ड की वजह से हो रहा है और नागालैण्ड की सरकार को यह देखना चाहिए! यानी अब बाढ़ को असम बनाम नागालैण्ड का मसला बनाया जा रहा है।  जब इससे भी बात नहीं बनी तो असम की भाजपा सरकार ने घाटी के लोगों में यह झूठ फैलाना शुरू कर दिया कि यह पहाड़ी लोगों की वजह से हो रहा है।! मज़ेदार बात यह है कि नागालैण्ड में भाजपा समर्थित सरकार है, असम में भाजपा और केन्द्र में भी भाजपा सरकार है लेकिन भाजपा के अनुसार इनमें से कोई भी इस बाढ़ के लिए जि़म्मेदार नहीं है! फिर कौन जि़म्मेदार है? नदियों से रेत और पत्थरों के खनन का ठीकरा हेमंत शर्मा ने बाढ़ पीडि़त लोगों पर ही डाल दिया है। शर्मा के अनुसार जिन ज़िलों में बाढ़ आयी है वहाँ के लोगों की रोज़ी-रोटी इस खनन से चलती है और वे खुद ही इस बाढ़ के लिए जि़म्मेदार हैं! यही देश के स्तर पर मोदी सरकार कर रही है। यानी पूँजीवाद द्वारा पैदा की गयी समस्याओं का दोष जनता के मत्थे ही मढ़ दिया जा रहा है। असम की बाढ़ के लिए असम सरकार, मोदी सरकार, उनके पूँजीपति यार और यह समूची पूँजीवादी व्यवस्था जि़म्मेदार हैं। यह केवल असम के मेहनतकशों का मसला नहीं है बल्कि यह देश की मेहनतकश जनता का मुद्दा है। यह नागालैण्ड बनाम असम का या पहाड़ बनाम मैदान का मसला नहीं है बल्कि फ़ासीवादी सरकार की नंगी पूँजीपरस्त और ग़रीब-विरोधी नीतियों का मसला है। यह फ़ासीवादी सत्ता का झूठ और फ़रेब है जिसके सैलाब में असम के लोग डूबे हैं। हमें इस सरकार के झूठ और फ़रेब का पर्दाफा़श करना होगा।

क्या असम में बाढ़ से निजात पायी जा सकती है?

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या असम के लोग भविष्य में भी बाढ़ की विभीषिका झेलने के लिए अभिशप्त हैं या फिर इस समस्या को कोई समाधान हो सकता है। अमूमन सरकारें बाढ़ की समस्या के समाधान के नाम पर नदियों के किनारे तटबन्ध बनाकर खानापूरी करती हैं। परन्तु असम में साल-दर-साल आ रही बाढ़ से यह स्पष्ट है कि केवल तटबन्ध बनाकर इस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है। नदियों में जल प्रवाह की मात्रा और रफ़्तार बढ़ने की वजह से ये तटबन्ध कुछ ही वर्षों में टूट जाते हैं जिसकी वजह से बाढ़ का स्वरूप और विकराल हो जाता है। इसीलिए तमाम पर्यावरणविद ज़ोर देते हैं कि केवल ब्रह्मपुत्र नदी पर ध्यान केन्द्रित करके उसके किनारे तटबन्ध बनाकर संतुष्ट होने के बजाय उस नदी के समूचे बेसिन को ध्यान में रखकर समग्रता में बाढ़ नियंत्रण की एक योजना बनानी चाहिए। ब्रह्मपुत्र का नदी बेसिन भारत में अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड और मेघालय तक फैला हुआ है। एक दीर्घकालिक योजना के तहत इस समूचे बेसिन में जंगलों की कटाई, खनन, ढाँचागत निर्माण आदि जैसी गतिविधियों को विनियमित और नियंत्रित करके और पारिस्थिति तंत्र में बढ़ते हुए असन्तुलन को रोका जा सकता है। यदि ऐसा किया जाता है तभी जाकर तटबन्ध भी बाढ़ रोकने में कारगर होंगे। इसके अतिरिक्त समूचे बेसिन में लोगों की भागीदारी से बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण भी बाढ़ की भयावहता कम करने के लिए ज़रूरी है। इसमें तिब्बत, भूटान और बंग्लादेश से अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग की भी आवश्यकता होगी। साथ ही लोगों की भागीदारी से बाढ़ जैसी आपदा की त्वरित चेतावनी लोगों तक प्रसारित करने का तंत्र विकसित करके और आपदा प्रबन्धन का तंत्र चुस्त-दुरुस्त करके भी बाढ़ से हुए जानमाल की क्षति को काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है। परन्तु पूँजीवाद की चौहद्दी में इस प्रकार की सांगोपांग, दीर्घकालिक योजना नहीं बन पाती है क्योंकि पूँजीवादी विकास अपनी प्रकृति से ही अनियोजित और अनियंत्रित होता है। इसी प्रकार पर्यावरण विनाश को रोकने और आपदा प्रबन्धन की गतिविधि में जनता की भागीदारी के बजाय एक नौकरशाही तंत्र खड़ा किया जाता है जो आपदा हो जाने के बाद सक्रिय होता है जब बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए बाढ़ की आपदा से बचने का संघर्ष एक ऐसे समाज के निर्माण से जुड़ा है जिसमें समस्याओं से निपटने की सामूहिक और समग्र योजना हो जिसे लोग मिलजुलकर अमल में लाएँ। ऐसे समाज का निर्माण एक समाजवादी व्यवस्था क़ायम करके ही किया जा सकता है। एक समाजवादी समाज में ही असम ही नहीं बल्कि समूचे उत्तर-पूर्व के पारिस्थिक तंत्र में पैदा हुए असन्तुलन को दूर करके बाढ़, भूस्खलन व पर्यावरण विनाश जैसी समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है। अन्यथा पूँजीवाद द्वारा तेज़ी से किये जा रहे पर्यावरण विनाश से मनुष्यता के अस्तित्व का संकट गहराता जायेगा।

 

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026

 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन